Thursday, November 14, 2013

दिल-दिमाग ने की तौबा

 इश्क़ में हम तुम्हें क्या बताएं किस कदर चोट खाये हुए हैं...… इस गाने कि लाइन को अब कुछ इस तरह गाया जा सकता है....,  राजनीति में हम  तुम्हें क्या बताएं किस कदर चोट खाये हुए हैं. आलाकमान की एक ना से जान तक गवां चुके है….
इन दिनों आम लोगो के साथ साथ नेताओं की जान भी सस्ती हो चली है, आज काफी देर तक दिमाग में खलबली मची हुयी थी कि एक टिकट मिलने या न मिलने के कारण, जिन लोगो ने बड़ी ही आसानी से अपनी जान गंवा दी, फिर वो टिकट मिलने के बाद का टेंशन  रहा हो? या फिर न मिलने का दुख, या फिर नहीं मिलने के बाद की आत्मग्लानि. जो भी कहें, एक बड़ा सवाल  सामने आया है, क्या राजनीति जान से भी बड़ी हो गयी है?
एक नेता की मौत इसलिए हो जाती है क्योंकि उनको पार्टी ने टिकट दे दिया है, लेकिन चुनाव जीतने का टेंशन, इतना ज्यादा कि दिल ने धड़कने से मना  कर दिया. एक नेता ऐसे कि टिकट नहीं मिली तो खुदखुशी कर ली, एक ऐसे कि टिकट नहीं मिली तो टेंशन में ब्रेन हेमरेज का शिकार हो गए, वहीं कईयो ने पार्टी की अनदेखी से पार्टी में ही बगावत कर दी.
इन नेताओ से जब राजनीति होती नहीं है तो ये करते क्यों है??? इस सवाल के साथ-साथ एक सवाल ये भी, कि पार्टी ने जो भी नियम कानून बनाये थे, उनको दरकिनार कर दिया गया है जब ये बात समझ आ गयी थी तब क्यों टिकट के लिए इतनी माथापच्ची की. मुझे ये कहने में जरा भी अफ़सोस नहीं है, कि जो नेता अपनी पार्टी का नहीं हुआ, अरे यहाँ तक कि अपने परिवार का भी नहीं हुआ, जान देने से पहले, परिवार के लोगो का नहीं सोचा, इतना सेल्फिश कोई कैसे हो सकता है?
ये वही लोग है आपके परिवार के जिन्होंने आपकी नेतागिरी के चक्कर में न जाने कितने लोगो से दुआएं कम, बददुआएं फ्री में ली है. और आप नेताजी, टिकट नहीं मिला और एक झटके में चलते बने!
मरने वाले के लिए यहाँ मुझे भाषा का इस्तमाल सही करना चाहिए, या थोड़ा नम्र होके लिखना चाहिए था शायद. लेकिन मैं आपकी इस तरह की हरकत को कतई सही नहीं कहूँगी, जो इंसान अपने परिवार का न हुआ, वो इन आम जनता के लिए क्या करेगा.
आज मेरे जबलपुर के एक नेता की चुनावी टेंशन के कारण हुई मौत का खामियाज़ा उस क्षेत्र की जनता को भुगतना पड़ेगा. कारण उनके बेटे को बिना कुछ किये, पिता की जगह अनुकम्पा नियुक्ति की तरह  पार्टी ने फ्री का टिकट दे दिया है. इस बार उसका जीतना तय है, पिताजी की मौत का फ़ायदा उसको सहानुभूति में मिले वोटो से जो होने वाला है. अभी भी क्षेत्र की जनता का रुझान उस परिवार के लिए ज्यादा है, बाप के नाम पे बेटा फ्री वोट पाके बन जायेगा नेता! यहाँ नेताजी की मौत का फ़ायदा हुआ है परिवार को. इसे अपवाद कहा जा सकता है अन्य की अपेक्षा, लेकिन उनका क्या जहां न टिकट मिला, न कोई घर से दावेदार है.
अभी तक ये सुना था, कि राजनीति में अपना खून भी साथ नहीं देता, ये तो देखने मिल रहा है. लेकिन अब इस जुमले को बदलने का वक़्त आ गया है कि राजनीती में अब अपना दिल और दिमाग दोनों कब साथ छोड़ दें, भरोसा नहीं. परिवर्तन की बेला शायद यही है, जिसका इंतज़ार न जाने कब से था. इस बार पार्टियों ने जिस तरह नियम कानून को दरकिनार किया है दावों के साथ, ये होना लाज़मी था. और एक तरह से अच्छा भी है, इस तरह अब भविष्य में नयी सोच के साथ नए ऊर्जा के साथ लोग इस हवन में अपनी आहुति देंगे.

उत्तर-मध्य में मच के रहेगी उथल-पुथल!

विधान सभा चुनाव के लिए जबलपुर उत्तर-मध्य क्षेत्र इस बार अपने आप में लोगो की नज़र में चर्चा का विषय बना हुआ है. वैसे देखा जाये तो, यहाँ कोई नया चेहरा नहीं है. दोनों बड़ी पार्टियों ने वही पुराने चेहरों को मैदान में उतारा है. इस बार ख़ास यह है कि यहाँ से स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने वालों की अधिकता है, जिसमे एक महिला पार्षद भी है. इसके साथ ही इस इलाके से किन्नर हीराबाई भी मैदान  में है. ये दोनों पहले भी चुनाव लड़ चुकी हैं.
इस बार इस इलाके के कई वोट इधर उधर होने कि गुंजाइश बनी है. बड़ा कारण ये है कि बीजेपी के प्रत्याशी खिलाफ पार्टी में बगावत के स्वर सुनने मिल रहे है, वही कांग्रेस के प्रत्याशी के खिलाफ भी क्षेत्र की जनता के मन में काफी रोष है. इसके साथ ही स्वतंत्र महिला प्रत्याशी ने अपने इलाके में अपनी एक अलग पहचान  बनाई हुई है, वही किन्नर समुदाय के वोट का फ़ायदा हीराबाई को मिलेगा. उनके पार्षद रहते किये गए कामो का फ़ायदा उन्हें इस समय मिल सकता है.
बीजेपी के प्रत्याशी को भले ही पार्टी ने चुनाव का टिकट दे दिया है लेकिन उन्होंने अपने 10 साल के कार्यकाल में अपनी जनता के लिए ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे जनता उन्हें वोट दे. लोगों से हुई बातचीत में जनता की राय यह है कि -अब नहीं. इस शराबी को इस बार वोट नहीं देना, इसने सिर्फ अपना भला किया है जनता को बेवक़ूफ़ बनाया है. वहीं कांग्रेस के उम्मीदवार ने भी कुछ ख़ास नहीं किया. उनके भी अपनी पार्टी के साथ मनमुटाव शुरू से रहे हैं. जो अपनी पार्टी का नहीं हुआ वो हम जनता का क्या होगा. 10 साल में इनके तो दर्शन भी दुर्लभ थे, ये तो ये, जो विधायक बने उनके भी.
तो अब बचे स्वतंत्र उमीदवार, इनमें से भी कुछ की छंटनी सोमवार को हो जायेगी, तब कहीं जा कर पूरा समीकरण सही तरीके से समझ में आएगा. अन्य पार्टियो के उम्मीदवारों के हिस्से में जो वोट जायेंगे उससे भी इस बार दोनों बड़ी पार्टियों को फर्क पड़ेगा. इस इलाके में अधिकांश लोगों का इरादा नोटा बटन दबाने का बन रहा है.
एक नज़र इस इलाके पर
ये इलाका मुस्लिम, जैन और सभी समुदायो के साथ व्यापार का मुख्य केंद्र है. इस इलाके में 10 साल में आज तक कोई भी तरक्की नहीं हुई. यहाँ न तो पार्किंग की व्यवस्था है, न ही  चौड़ी सड़को का जाल. आये दिन यहाँ ट्रैफिक की समस्या मूंह खोले रहती है. व्यापारिक इलाका होते हुए यहाँ सुरक्षा के कोई इंतज़ाम नहीं है. बाज़ार में एक भी सुलभ शौचालय नहीं है, जनता को परेशानी का सामना करना पड़ता है. विधायक मद का इस्तेमाल नहीं हुआ, कारण इलाका नगर निगम के अंतर्गत आता है. ये सब बहाने पर्याप्त है जनता के पास और उनके पास एक बड़ा सवाल ये भी है कि इनको वोट हम क्यों दें?
विधायक का बातचीत का अंदाज़ भी यहाँ के लोगों के गले नहीं उतरता. कुल जमा बात कि इस बार इस सीट पे भी मुकाबला देने के लिए दोनों उम्मीदवारों के सामने जहां नए लोग हैं, वही नोटा का असर भी देखने मिलेगा.

कोई जोर से तो कोई होश में, बिक रहा है सब कुछ यहां, बेमोल राजनीति

 चुनाव में जीतने के लिए जो न करो वो कम हैं. देश से अगर चंदा नहीं मिल रहा तो विदेशो से मंगवाए जा रहे हैं. जितना बड़ा आसामी, मतलब उमीदवार उतने बड़े चोंचले. इसी तरह का हाल हमारे जबलपुर का भी है.
एक नेता जी ने चुनाव की टिकट मिलने से पहले ही इलाके में गांधी जी के कागज़ बटवा दिए और टिकट मिलने के बाद टेंशन में जान चली गयी. पिता कि मृत्यु का फ़ायदा बेटे को हुआ. पार्टी ने टिकट भी दिया और जनता को पिता जी पहले ही खुश कर गए, तो अब उनको कोई चिंता नहीं. पर जनाब एक्टिंग है बेटे की, उसको जब ये कहते हुए सुनो कि दादा के जैसे ही जनता का ख्याल रखूँगा.
वहीं एक निर्दलीय महिला नेत्री का MMS  चुनाव प्रचार के पहले ही चर्चा का विषय बना हुआ है. इसके साथ ही उसके त्रिया चरित्र को लेकर भी विपक्ष और जनता में माहौल गरम है. आज नाम वापस लेने के आखिर दिन सुबह से बाज़ार गरम रहा कि पति ने अभी तक पत्नी के नाम पे बहुत ऐश  किये है, उसका कोई भरोसा नहीं कि शाम तक वो बिक जाये और बीबी का नाम वापस ले ले. कहने वालों का ये भी कहना है कि पति और पत्नी दोनों का चरित्र कोई साफ़ नहीं है.
महिलाओं के लिए जो महिला कल तक एक उम्मीद बनी हुयी थी, आज उसको लेकर महिलाओं में भी गुटरगूं शुरू हो गयी है. इस महिला प्रत्याशी  ने अपना नाम वापस ले लिया है खबर लिखे जाने के पहले ही. अभी अभी आयी ताज़ा खबर के अनुसार पति ने लाखों रुपए लेके बीबी का नाम वापस ले लिया है.
वही पश्चिम इलाके में दारु के साथ कम्बल पिछले चुनाव में मिली थी इस बार तो उसकी आस  में गरीब जनता उम्मीद की चादर लिए बेरहम ठण्ड से दो चार हो रही है. उम्मीद पर दुनिया कायम है. उनको इससे कोई मतलब नहीं कि कौन जीतेगा या कौन हारेगा. उनको ठण्ड से राहत इस चुनाव के बहाने मिल जायेगी और नेता जी की तो वैसे ही वाट लगने वाली है. इस बार वहां से दूसरी पार्टी के उम्मीदवार का परचा अभी से दमदार है. इस बार जनता ने सोच लिया है, न रेत न डम्पर और न चलेगा अब कोई बम्पर. हमको चाहिए बस एक सज्जन सा नेता, जिसका हाथ हमारे साथ, उसको देंगे अपना साथ.
चुनाव आयोग की नज़र बचा के सब जगह नोटों की दीवाली हो चुकी है. कुछ खेल शुरू में खेले जा चुके हैं कुछ सीधे-सीधे नज़रो के सामने खेले जा रहे है. यहाँ हर कोई बिक रहा है, ये खेल वाकई में अब बहुत रोचक बन चला है. आने वाले दिनों में देखना यह है कि अब जो बचे हुए है उनमे से कौन अपना गेम किस दिशा में ले जायेगा.

अति हमेशा नुकसानदायी रहे है ,समय है संभल जाओ।

अति हमेशा नुकसानदायी रहे है ,समय है संभल जाओ।


''enjoy the  rape ''वाले सीबीआई डायरेक्टर के बयान को बिना पढ़े गलत बताने में भारतीये जनता पार्टी कि महिला नेता सुषमा स्वराज को एक मिनिट का वक़्त नहीं लगा। लेकिन  उनसे मध्य प्रदेश में महिला अत्याचारो ,और बलात्कारो के बारे में सवाल किया ,तो वो इस तरह मुकर गयी ,कि उनके लिए ये आकड़े कोई मायेने नहीं रखते। और तो और प्रदेश में बलात्कार के मामले में तुरंत फ़ासी कि है  उन्होंने इस तरह किया  उनकी सरकार कि बहुत बड़ी उपलब्धि है ,उनके अनुसार सारे आकड़े गलत है ,मनगढ़त है। ,सुषमा जी से मेरा सवाल ,क्या आपको ये नहीं लगता कि विपक्षी दल कि एक मात्र सशक्त  महिला नेता होने के बाद आपका इस तरह का रवैया ,वो भी ऐसे वक़्त पे जब आप जनता के पास अपनी सरकार को दोबारा जीतने के लिए  वोट मांगने जा रही है ,आपको शोभा देता है???। चलिए माना  कि राजनीती में ऐसे बयान दिए जाते है ,लेकिन एक महिला होने के बाद आपका महिलाओ के प्रति ये रवैया कहा तक सही है ,आज आपसे हुयी मुलाकात में एक बात और समझ आयी कि महिला नेता होने का फ़ायदा आपके द्वारा आपकी पार्टी कि महिलाओ को नहीं मिला है ,जब आप किसी मंच से इस तरह का सफ़ेद झूठ इतनी आसानी से कह जाती है ,तो हम सब आधी आबादी के लोग आप जैसे लोगो पे क्यों भरोसा करे ???
मुझे आपकी पार्टी कि एक बुजुर्ग महिला ने आके कहा कि आपने हम लोगो  के लिए सवाल किया ,अच्छा किया। 
सुषमा जी बात यहाँ सिर्फ महिलाओ पे हो रहे अत्याचारो कि नहीं है ,बात है आपकी पार्टी के दावो कि जो खोखले साबित हुए है , 
एक तरफ आपकी पार्टी महिलाओ कि रक्षा का दावा करती है वही उसका मजाक बनाने से भी पीछे नहीं है ,महिला का मंगलसुत्र  उसके सुहाग कि निशानी होता है आपने तो उसको तक नहीं बक्शा। चुनाव प्रचार के नाम पे मंगल सूत्र को हीदाव  पे लगा दिया। इन सब बातो को दरकिनार कर भी दिया जाये तो आपकी पार्टी ने महिलाओ को टिकट देने में जो कंजूसी दिखायी है उसका क्या ?आपके  कथनी और करनी के इस फर्क का नतीज़ा आपको चुनाव परिणाम में देखने मिलेगा ,इस बात को भी आपने सिरे से नकार दिया ,अगर इन सारे बातो को आप के साथ आपकी पार्टी के लोग इस तरह से नकार रहे है ,तो क्या ये समझा जाए कि ,१० सालो में जो कुछ भी किया वो यही हुआ ,कि मकान बनाया किसी ने उसको पुतवा के किसी ने वाहवाही लूट ली ,क्युकी अगर आप और आपकी पार्टी के सभी नेता अपने कामो कि वजह से तीसरी बार सरकार में आने वाले है ,जैसा कि आपका दवा ही नहीं पूर्ण विश्वास है ,तो सिर्फ ये बताइये कि इस बार के आपके मैनिफेस्टो  में महिलाओ कि सुरक्षा कि बात पे आप का निरुतर होना ,और अभी तक सभी नेताओ का सिर्फ एक बात को कहना कि चाँद दिन में सब सही हो जायेगा। आप लोग ऐसा क्या करने वाले है किसी खरीद फरोख्त होने वाली है जो सारे समीकरण अचानक से बदल जायेंगे। अंधे इंसान का ये विश्वास कि वो बिना सहारे के चल लेगा ,समझ आता है ,लेकिन दिमाग के अन्धो का क्या ,जिनके पल्ले आप नेताओ कि दोगली बाते  पल्ले नहीं पड़ती |  

आपका ये विश्वास कही अति उत्साहित  बयान तो नहीं ,कि इस बार फिर आप सरकार बना रही है। 

Wednesday, September 25, 2013

THE LUNCH BOX.......

सुन्दर,अनमोल पलों की कहानी है लंच बॉक्स

प्रेषित समय :13:14:09 PM / Wed, Sep 25th, 2013 palpalindia.com mai mere sabdo mai lunch box ka swaad..... 

खाना कब धीरे से किसी अकेले इंसान की ज़िन्दगी को एक नया रूप दे दे ,और कैसे खाने के बहाने एक औरत की ज़िन्दगी में नए सपनो के पंख लिए कोई इंसान नयी उमीदे भर देता है ,कुछ ऐसे ही सुन्दर ,अनमोल पलों की कहानी है लंच बॉक्स ,इला  को नहीं पता  की उसके हाथ का बना खाना  जिसे वो अपने पति को सोच के बड़े प्यार से बनाती  है, लेकिन वो गलती से किसी और को मिलता है ,जिसके लिए वो खाना उसकी नौकरी के अंतिम दिनों में एक नयी हवा के झोके की तरह आता है जो अकेले इंसान को उस अजनबी  के प्रति आकर्षित ही नहीं करता ,बल्कि उसके लिए प्यार का बीज भी बोता  है, इला के हाथ के खाने को धन्यवाद देने  के बहाने  पत्रों का सिलसिला ,कुछ इस तरह आगे बढता है की इला की पडोसी आंटी ,और उसके परिवार के सभी लोगो का परिचय एक अनजान इंसान साजन  से ,यहाँ तक की दर्शको से भी ,की लगता है जैसे वो इला को बहुत अच्छे से समझ रहे है ,ये उनके ही बीच की किसी एक की कहानी है , इरफ़ान का अभिनय जब वो लंच बॉक्स का इंतज़ार करते है और जब टेबल पे उसे खोलने की जल्दी के साथ आस पास को निहायत ही तरीके से देखना ,जबरदस्त ,
मुंबई के डिब्बावालो की दिनचर्या ,इला का भूटान जाने की बात ,और वहा  के रेडियो स्टेशन  में वहा  का गाना,वाकई सोचने पे मजबूर कर देता है की प्यार ,किस तरह से किसी के खाली जीवन को उमंगो से भर देता है ,इरफ़ान के दोस्त बने   नवाज़ुद्दीन ने शानदार  अभिनय किया है ,कुछ जगह वो हम दर्शको को हँसाने में सफल रहे है ,अभिनय  की होड़ में इला ,इरफ़ान ,दोनों बराबर रहे है ,  तय करना मुश्किल होगा कि कौन इक्कीस है,
 अच्छा साहित्य, अच्छी फिल्म और अच्छी कला तक कम ही लोग पहुँचते हैं।ठीक वैसा ही यहाँ भी हुआ है.आज हॉल में मात्र २५ लोग मिले ,जो इस शानदार प्रेम कहानी को देखने पहुचे.मुझे तकलीफ हुयी ,जहा बिना आइटम सोंग, और फाइट सीन ,के साथ उबाऊ वल्गर द्रश्य  नहीं थे.वह आज दर्शक भी नहीं थे. ये   फिल्म की खूबियों में इसका छायांकन और बैकग्राउंड म्यूजिक  भी है.फिल्म के रंग और ध्वनि में शहर की ऊब, भीड़ , खुशी और गम के साथ ही हर व्यक्ति  अकेलेपन को भी हम देख-सुन पाते हैं.
किसी अनाथ के साथ जब कुनबा मिलता है तब उसके अन्दर के भावनाए किस तरह मचलती है किसी को अपना बनाने के लिए उसका चित्रांकन भी जबरदस्त है ,मुंबई के डिब्बावालो की दिनचर्या ,इला का भूटान जाने की बात ,और वहा  के रेडियो स्टेशन  में वहा  का गाना,वाकई सोचने पे मजबूर कर देता है की प्यार ,किस तरह से किसी के खाली जीवन को उमंगो से भर देता है ,इरफ़ान के दोस्त बने   नवाज़ुद्दीन ने शानदार  अभिनय किया है ,कुछ जगह वो हम दर्शको को हँसाने में सफल रहे है ,अभिनय  की होड़ में इला ,इरफ़ान ,दोनों बराबर रहे है ,  तय करना मुश्किल होगा कि कौन इक्कीस है,
 अच्छा साहित्य, अच्छी फिल्म और अच्छी कला तक कम ही लोग पहुँचते हैं।ठीक वैसा ही यहाँ भी हुआ है.आज हॉल में मात्र २५ लोग मिले ,जो इस शानदार प्रेम कहानी को देखने पहुचे.मुझे तकलीफ हुयी ,जहा बिना आइटम सोंग, और फाइट सीन ,के साथ उबाऊ वल्गर द्रश्य  नहीं थे.वह आज दर्शक भी नहीं थे. ये   फिल्म की खूबियों में इसका छायांकन और बैकग्राउंड म्यूजिक  भी है.फिल्म के रंग और ध्वनि में शहर की ऊब, भीड़ , खुशी और गम के साथ ही हर व्यक्ति  अकेलेपन को भी हम देख-सुन पाते हैं.
किसी अनाथ के साथ जब कुनबा मिलता है तब उसके अन्दर के भावनाए किस तरह मचलती है किसी को अपना बनाने के लिए उसका चित्रांकन भी जबरदस्त है ,
रितेश बत्रा की द लंचबॉक्स. सुंदर, लजीज , संवेदनशील, रियलिस्टिक और दिव्य जायेको वाली  फिल्म है.हिंदी फिल्मों में मनोरंजन की भीड़  में ये कुछ दर्शकों के लिए खासकर वो जिन्हें ५ सितारा में खाना खाने का शौक है ,एक अच्छा स्वादिस्ट  व्यंजन के सामान है  .बाजारू मानशिकता को दरकिनार कर   यह फिल्म  लंच बॉक्स आत्मा को  सुकून देती है..

Friday, August 30, 2013

mere pahali film samiksha



बाज़ार में बिकने वाली नींद की एक अलग सी कहानी, सोना स्पा

प्रेषित समय :20:51:46 PM / Fri, Aug 30th, 2013Share this on Facebook
स्नेहा चौहान. अनिद्रा एक ऐसे बीमारी है जिसकी चपेट में न जाने कितने लोग है. खास कर वो जिनकी जिज्ञासाएं, महत्वकांक्षाएं इतनी ज्यादा है कि वो इस सुकून भरी नींद का आनंद नहीं ले पाते और फिर अनचाही बीमारियां उनके शरीर को अपना घर बना लेती हैं. लेकिन अगर आपको कोई कहे कि आपको आपकी नींद बाज़ार में खरीदने से मिल जाएगी तो क्या आप उसे खरीदना चाहेंगे? सुनने में ये जितना अटपटा है उतना ही मजेदार भी. ये कितना आसान होगा आप सोच के देखें? आपके लिए कोई और सोयेगा और आप बिलकुल फ्रेश फील करेंगे!
ये सब्जेक्ट जरा नहीं, बहुत अलग है, बोले तो हट के है. ये असल में एक मूवी की कहानी है, सोना स्पा जिसे देख के मुझे ये समझ आया कि, देश की कई समस्याओं का समाधान इस तरीके से किया जा सकता है? क्यूँकि जिस दिमाग में शान्ति नहीं है, सुकून नहीं है, वही कहीं न कहीं जाके न जाने कितनी सारी घटनाओ को अंजाम देता है!
तो सोचें, उन इंसानों को जिनके दिमाग को सुकून नहीं है, अगर उनके लिए कोई सोये और वो तरोताजा हो जाये. सारी खुराफात  को भुलाया जा सकता है तो इस तरह की नींद देने में कोई आपति किसी को नहीं होगी.
SONA SPA की कहानी कुछ ऐसी ही है. इस नींद से लोगो को न जाने कितनी बातों से निजात मिल जाएगी. मुझे ये कहानी अच्छी लगी. मकरंद देशपांडे की कहानी में दम है, इसको अगर किसी तरह इस  भासी दुनिया में सच में कारगर कर दिया जाये, तो वाकई न जाने कितने लोगो का भविष्य सुधर जायेगा. लीक से हट के एक उम्दा सोच के साथ, सामाजिक दायरों को कहीं न कहीं गलत साबित करती फिल्म. एक बार देखा जा सकता है. मुझे स्टार देने की परंपरा को नहीं निभाना, क्यूँकि जब किसी बोल्ड सब्जेक्ट पर कोई कलाकार एक्टिंग करता है, तो उसको समझने के लिए एक कलाकार की आत्मा काफी है.

Wednesday, August 7, 2013

mera article palpalindai.com mai



इंटरनेट मीडिया का विकृत रुप पोर्न पत्रकारिता
 
प्रेषित समय : 7 अगस्त, 2013
अखबार की खबर पर पाठक प्रतिक्रिया नहीं कर सकता, लेकिन मित्रों..इन्टरनेट मीडिया में त्वरित टिप्पणी की सुविधा मौजूद है. कहने का मतलब इन्टरनेट इंटरेक्टिव मीडिया है. न्यूज़ साईट हो या सोशल साईट, जिसमें विचारों का आदान-प्रदान होता रहता है. यदि किसी ने भी अश्लील सामान परोसा या इसी आशय का कोई विचार रखा तो पढ़ने वालो को पूरा अधिकार रहता है कि वह तुरंत अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करा कर सभी को अवगत करा सकता है. वो फिर चाहे अच्छी हो या बुरी. स्पष्ट है कि आपको उसकी जवाबदेही स्वीकार करनी होती है.
इंसान जितनी तेजी से हर मुकाम को हासिल करने की जद्दोजहद में आज अपने उसूलो को हर रोज दरकिनार कर रहा है ये कहीं न कहीं उसको ऐसे गर्त की तरफ ले जा रहा है की अभी तो इसके परिणाम से ये अनभिज्ञ हैं.
दो-तीन दिन से एक सोशल साइट पर, हमारे मित्रों को एक गंभीर मुद्दे के लिए धमकियां मिल रही हैं. जी हाँ मैं बात कर रही हूँ, पोर्न पत्रकारिता के जनकों की. आज एक मित्र की पोस्ट पढ़ी. … उसमे ऑनलाइन न्यूज़ साईट भास्कर डॉट कॉम की एक खबर को लेकर बात प्रतिक्रिया दी गयी थी. इस खबर की प्रतिक्रिया व्यक्त किये जाने पर पर फेस बुक के मित्रों को वहां काम करने वाले ने फ़ोन करके धमकी पर धमकी दिए जा रहे हैं. कारण उनकी न्यूज़ पेश करने का तरीका अश्लील से ओतप्रोत था. पोर्न पत्रकारिता को बढावा देने के बहाने अपनी न्यूज़ साईट की हिट्स बढ़ाने के हथकंडे के बारे में इस हरकत के बारे में किसी ने कुछ भी पोस्ट नहीं किया, क्योंकि किसी पत्रकार मित्र की हिम्मत ही नहीं हुयी ,उल्टा जिन मित्रों ने इनकी न्यूज़पर गरियाया उनकी एक भी पोस्टर को शेयर करने की हिम्मीत भी आज तक किसी की नहीं हुई.सबसे तेज दौड़ने वाले मीडिया के खिलाफ ऐसे बोलने के लिए जिगरा चाहिए, जो आजकल आप सब या मेरे जैसों के पास शायद नहीं है ,क्योंकि ये बड़े लोग हैं,इनको कोई फर्क नहीं पड़ता .यह हमलोग मान कर चलते हैं . जिगरा आजकल पत्रकारों के पास भी नहीं है.उनका खून सफेद हो गया है ,अब पत्रकारों पर से यकीन उठ गया.सब दलाल ही हैं.कोई सामने है तो कोई परदे के पीछे. ये कहना जितना आसान है ,उतना ही सोचने वाली बात ,ये है की जो इंसान धमकी दे रहा है ,कभी उसकी मानसिक स्थिति की तो सोचो,उसको भी ऊपर से आर्डर होंगे कि जो बोल रहे हैं उनको पहले धमकी दो .फिर बाद में हरे नोटों के दर्शन करा के अपनी तरफ कर लो ,छोटे लोग हैं- कब तक चिल्लायेंगे ,और इसमें गलत भी नहीं है ,जो बेचारा धमकी दे रहा है ,उसकी भी कमाई होगी ,मेरे जिन मित्रों को ,भास्कर कॉम .की तरफ से धमकी मिली है ,मुझे उनपर गर्व है ,इसलिए नहीं कि वो मेरे मित्र हैं,बल्कि इसलिए कि इन जैसे लोग ,आज के बाद आपसे डरेंगे ,आपने अपने आप को साबित कर दिया है ,ये वो लोग हैं जो शायद ,इन बनियों की दूकान को सजाने के लिए दिन भर ,नौकरी करते है ,और जो समय मिलता है ,उस समय में इनसे फ्रीफंड में ऑनलाइन न्यूज़ का काम. पत्रकारों की गलती नहीं है ,इन्होनें अपनी ऐसे हालत प्रबंधन के सामने खुद ही बनायीं है ,आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए ,इस बात को लेकर की ये पोर्न पत्रकारिता इस तरह कर रहे हैं ,सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता कि इनके ऑफिस का माहौल किस तरह का होगा . सिर्फ नाम बड़े है ,दर्शन खोटे हैं ,खुद लोग सब अन्दर से बिके हुए हैं ,ये अखबार नहीं चला रहे ,इनके मालिकों के ऊपर भी नेताओ का हाथ है.,ये सब बातें नयी नहीं है,पुरानी है.अखबार की आड़ में कितने धंधे चल रहे है ,पता लगाने जाओ ,तब पता चलेगा .असल बात यह है कि इस तरह की कई झंझटो से हर कोई गुजर रहा है.किसी पत्रकार के घर जाके देखोगे ,तब पता चलेगा, वो जब सड़क पर कैमरा लिए होता है ,तो शेर नजर आता है .उसका रुतबा ,उसका गुरूर ,उसका काम जिसके लिए उसको आखिर तक एक झूठा चोला चढ़ाये रखना पड़ता है.उसने अपनी खबर बनायीं.अगर दिन भर में मिल गयी तो ,वरना ऑफिस में आके गूगल बाबा की जय ,और काम किया निकले ,और जब बहुत दिन तक एक-सा भोजन मिले और कभी कोई ख़ास खबर मिल जाये तब वो अचानक जोश से भर जाता है ,और अच्छा करने के चक्कर में एक ऐसे गलती कर जाता है,जिसका खामियाजा सारी जमात को भुगतना पड़ता है.इसमें वो सब आ जाते हैं ,जो पत्रकार हैं या कभी थे ,या जिन्होंने उस अखबार को रामराम कह दिया है वो सब ,हम सब सिर्फ आपस में दोषारोपण करते हैं कि तुम ऐसे हम ऐसे .लेकिन हकीक़त क्या है असल में हम सब जानते हैं , फिर वो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पत्रकार हो या कोई और.लेकिन अगर पत्रकारों को चौथा स्तम्भ कहा गया है ,तो हमारी भी कहीं न कही जिम्मेदारी बनती है कि जो खबर हमने बनायीं है उसके प्रति हम कितने ईमानदार हैं ,
मेरे जो मित्र इस तरह की पोर्न पत्रकारिता को बढावा दे रहे हैं-क्या कभी सोचा है कि आपके घर में बच्चे हैं ,वो भी उस न्यूज़ को देखेंगे व पढेंगे .अगर तो आपमें इतनी हिम्मत है कि आप उनसे सेक्स पर खुली चर्चा कर सकते हो ,तो आपकी न्यूज़ की हैडलाइन सही है ,आप जो कर रहे हैं ,वही करें,उस दोयम दर्जे की कमाई को खा पी के जो चाहे वो करें ,लेकिन यदि आप के पास पोर्न सब्जेक्ट पर या सेक्स पर बात करने की हिम्मत अपने घर में नहीं है तो आपको कोई हक नहीं बनता कि आप नई नसल को इस तरह से गर्त के रास्ते धकेलें . अपने ही मित्रों को धमकी दे के भी आप लोग कोई महान काम नहीं कर रहे.आप लोगों की उन्नति कभी नहीं हो सकती क्योंकि आप लोगों को आपस में ही एक दूसरों की टाँगे खीचने से फुरसत नहीं मिल रही. कभी खुद के मतलब के लिए ,कभी मालिकों की चापलूसी के लिए ,और वो जनाब लोग जो खुद को बड़ा एडिटर समझते हैं ,उनको अगर एडिटर का काम नहीं मालूम तो ऐसे एडिटर होने से अच्छा है की आप अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दें .आप लोगों को एक रूम में बैठ के खैनी खाने के लिए नोट नहीं मिलते ,इस तरह की बातों के लिए आपकी भी ज़िम्मेदारी है ,जैसा आप लोग कर रहे हैं वही नयी पीढ़ी कर रही है .दूसरों की खबर बनाने से पहले अपने अन्दर भी देखें . मेरी इन बातों से लोगो को मिर्ची लगेगी . हो सकता है कई मेरे दुश्मन बन जाये .कुछ लोग मुझे भी बहुत गन्दा कहेंगे ,मुझे कोई फरक नहीं पड़ने वाला . क्योंकि मैं भी आपकी ही ज़मात से निकल के आई हूं ,लेकिन जब इस तरह की बातें सुनती हूँ या पढ़ती हूँ ,तब बहुत शर्म महसूस होती है और कहीं न कहीं एक गर्व भी , कि अच्छा हुआ ,सही समय में उस कीचड़ से निकल आई.पर आज जब आपस में अपने ही मित्रो को इस तरह धमकी देते ,और न जाने कितनी बातों ,कितनों के मुंह से सुना ,तो अपने को रोक नहीं पायी और सोचा अपने अन्दर को, अपने शब्दों में, अपनों से व्यक्त कर दूं,



स्नेहा चौहान
स्नेहा चौहान जबलपुर में सक्रिय फ्रीलांस पत्रकार हैं 
पूर्व में समाचारपत्र दैनिक भास्कर में कार्यरत 
सामाजिक ज्वलंत मुद्दों और स्त्री विमर्श पर सतत लेखन 
शिक्षा: माता गुज़री कॉलेज जबलपुर
1.सोलह बरस की बाली उमर को सलाम
2.हर औरत रेप की हकदार है?
3.प्यार से नहीं...बाबू.. इन सड़कों से डर लगता है
4.पुलिस आला कमान के नाम एक खुला खत
5.इंटरनेट मीडिया का विकृत रुप पोर्न पत्रकारिता

Friday, August 2, 2013

मेरे मुस्कुराने की आदत भी कितनी महंगी पड़ी मुझे ,
भुला दिया सबने मुझे ये कहके की,                                                                                                                     तुम तो 
अकेले भी खुश रह सकते हो ………

कुछ लोग मतलब के लिए खोजते है मुझे ,
बिन मतलब जो आयें तो क्या बात है ,
कतल कर के तो सब ले जायेंगे दिल मेरा ,
कोई चाहत से ले जाये तो क्या बात है …।

लोग डूबते हैं तो समंदर को दोष देते हैं,
मंजिल ना मिले तो किस्‍मत को दोष देते हैं,
खुद तो संभलकर चलते नहीं,
जब लगती है ठोकर तो पत्‍थर को दोष देते हैं।

कही बारिश बरस जाये ,कही दरिया तरस जाये ,
कही आके घटा ठहरे, तुम्हारे और मेरे दरमियाँ आकर खुदा ठहरे ....|
चाँद के साथ कई दर्द पुराने निकले ,
कितने ग़म थे जो तेरे ग़म के बहाने निकले,
दिल ने एक ईंट से तामीर किया था हसीन ताजमहल ,
तूने एक बात कही लाख फ़साने निकले ……।

जाने क्या सोच कर हम तुमसे वफ़ा करते है , 
क़र्ज़ है कोई पिछले जन्म का जो अदा करते है

Tuesday, July 2, 2013

पुलिस आला कमान के नाम एक खुला खत

पुलिस आला कमान के नाम एक खुला खत 
 

  

लैटर तो मैंने बहुत लिखे हैं, अपने बचपन से न जाने कितने और कितनों को,कुछ लोगों ने तो आज भी शायद मेरे ख़त संभाल के रखे होंगे,आज किसी प्रेस के एडिटर को नहीं,न ही किसी मित्र को ,बल्कि सोचा,जबलपुर के पुलिस आला कमान साहब को एक खुला ख़त लिखूं.............
मुझसे भले ही ज्यादा अच्छे शब्द, शायद ही निकले, पर कोशिश करने में क्या हर्ज़ है .जनाब,
आपने एक अच्छा काम किया है,पिछले दिनों,जो आपने सभी पुलिस वालो की परेड करवा दी.जी, मैं सड़कों में दिन-रात गश्त की बात कर रही हूं.जिन्हें नहीं पता उन्हें बता दूं कि हमारे यहाँ पिछले हफ्ते सड़कों पर लूट की घटना, एक-साथ तीन जगहों पर हुई,वैसे यह हमारे यहाँ हमेशा होती ही रहती है,अगर आप महिला हैं,तो उन्हें अपने जेवर पहन के नहीं निकलना चाहिए या अपने पर्स को संभाल के रखना यह उनकी जिम्मेदारी है.यहाँ आए-दिन कभी भी कोई भी बाइक सवार खुली सड़कों पर आते-जाते महिलाओं से पर्स छीन कर ले भागता है खासतौर पर काली बाइक पर सवार.इस तरह की घटना यहाँ के आम घटनाओं में शुमार माना जाता है.जी,....तो मैं बता रही थी कि उस दिन भी तीन लूट की वारदात एक साथ घट गईं
आला कमान ने सारे थाने की अफसरों की मीटिंग बुलाई और उनको गश्त लगाने के फरमान सुना दिए,पहले दिन तो गजब की पेट्रोलिंग हुई,पुलिस के वाहनें तेजी से सड़को पर आवाजाही करते दिखी.दूसरे दिन उनकी गति में थोड़ी कमी दिखी,शानिवार को दिन में तीन या चार बार,कल रविवार था इसलिए शायद पुलिस वालों को भी छुट्टी चाहिए थी,कुछ ज्यादा ही आराम हो गया,लेकिन अब आज एक भी बार कोई टाइगर वेन नज़र नहीं आई,जो दिखी भी तो कहीं सुस्ताते हुए जैसा.
सही भी है,आखिर कब तक मनचलों की तलाशी लेते रहते ?आखिर वो सब भी तो इंसान ही हैं.थकना भी स्वाभाविक है.
जनाब आपको यह जान कर हैरानी होगी कि इस दौरान मेरी एक पुलिस वाले से बात हुई ....जब उनसे पूछा कि ये क्या हो रहा है? कब तक चलेगा ? क्या ऐसे में लूटेरे पकड़ लिए जायेंगे?आपको यह जानकार आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि उस पुलिस वाले ने क्या जवाब दिया....उसने बड़े ही विनम्र स्वर में बताया कि मैडम,अब आप ही बताइए,क्या वो लूटेरे पागल हैं,जो खुले आम अब तक घूमेंगे,जब तक हमें पेट्रोल खर्च करना है,तब तक तो करेंगे ही.दो दिन की कहानी है..बस, आप देखना उसके बाद ,जो जैसे थे वो वैसे ही हो जायेंगे,ऐसे अगर सब लूटेरे घुमने लगे तो हो गयी,हमारी नौकरी ?
अब आप ही बताइए कि क्या हुआ?क्या सभी महिलाओं ने अपना जेवर पहनना छोड़ दिए या मनचलों ने सड़कों पर बाइक भगाना छोड़ दिया.आज भी बाइक पर चार लोगों की सवारी हो रही है,यातायात पुलिस अंधी बनी बैठी रहती है ,आपके पुलिस के लोग सिर्फ खाना पूर्ति कर रहे होते हैं,सड़को पर आवारापन पूरी तरह से हावी है.आपकी पुलिस की इतनी मेहनत का क्या नतीजा हुआ ?सिर्फ ये की इन चार दिनों में कोई लूट की घटना नहीं हुई,तो इस बात पर आपके लोगों को तमगे दिए जाने चाहिए,इन्होनें बहुत अच्छा काम किया.
जनाब,आप लोगों के पास भोपाल, रायपुर की तरह काम करने का जज्बा क्यों नहीं है,न तो आपके पास और न ही यातायात पुलिस के पास.आज भी कोई भी,कहीं भी अपनी गाडी पार्क कर रहा है.क्योंकि सड़कें इसी काम के लिए बड़ी बनाई गयी है.
इस हालत में अगर कोई लूट की घटना हो जाए और आम जनता कोशिश भी करे कि उस लूटेरे को पकड़ लें तो उनकी हिम्मत नहीं होती....क्योंकि आपके जबलपुर में ,आपके क्यों मेरे जबलपुर में ...कोई लॉ एंड आर्डर नाम की कोई चीज ही नहीं है.हर कोई बेफिक्र है,उसको मालूम है कि यहाँ कोई कुछ नहीं सकता,जिनका सामान गया,वो तो गया..भूल जाओ,लेकिन जो आज भी सड़को पर है उनका क्या?आप जब सड़को पर आने-जाने वालों की सुरक्षा नहीं कर सकते तो आप कैसे कह सकते हैं कि आप किसी बड़े केस को आसानी से सुलझा लेंगे.
अभी बारिश का बढ़िया मौसम है,कोई जरुरत नहीं है कि मुंह बंद करके सड़कों पर लोग चलें,लेकिन इसके बावजूद मनचले मुंह ढंक के घूम रहे हैं ,लडकियां भी घूम रही है,उन्हें कोई कुछ कहने वाला ही नहीं है,बाइकर गैंग के इस वारदात से आज पुलिस होश में आई.इसके पहले क्यों नहीं आई ? आज जिस तरह से आपके सहकर्मी दिन रात गाडियां घुमा रहे हैं .उससे इस समस्या का हल नहीं होगा,आपको सड़कों के लिए नियम कानून बनाने पड़ेंगे ?तभी आपकी इस मेहनत का कोई औचित्य है वरना पुलिस कर्मियों की परेड करवा के आपने कोई बहुत बड़ा काम नहीं कर लिया है ,उनको यूँ ही भगा कर आप भी पीठ पीछे हंसी का पात्र बने हैं,मेरे इस बात को अन्यथा न लेते हुए,आप इस पर गौर करें,और सबसे पहले जब तक सड़कों के लिए बने नियमों का,पालन नहीं करवाएंगे तब तक आपकी मेहनत बेकार है.इसके लिए आम जनता को भी साथ में लीजिये.उनको भी जरा कड़ा डोज दीजिये,तभी वो सही रास्ते पर आएंगे.आपको जनता के साथ उन बाज़ार वालों को भी अपने साथ लेना होगा,जो सड़को को नज़रंदाज़ करते हुए सिर्फ अपनी सोचते हैं,आप ये सब कर सकते हैं ,सिर्फ एक शिद्दत के साथ सब को अपने साथ ले लीजिये,शायद इस बहाने पुलिस का डर आम जनता के मन से जाये और वो आपको भी अपना समझे ...वैसे ये बात आप जल्दी समझ जायेंगे ,क्योंकि आप खुद आकलन करें कि लूटेरो के भूमिगत होने के बाद ,आपके हाथ क्या लगा .

Saturday, June 29, 2013

प्यार से नहीं...बाबू.. इन सड़कों से डर लगता है 
एक मित्र ने कहा- और सुनाओ, क्या चल रहा है? मेरा जवाब था कुछ ख़ास नहीं, बारिश का मजा चल रहा है, सामने से सवाल आया, कहाँ हो? घर पे या बाहर? कहीं लॉन्ग ड्राइव पे? मैंने कहा कहीं नहीं घर पे? अरे? क्यों भई? ऐसे में तो भींगने का मजा लो, क्या घर की चाहरदीवारी में कैद हो? मैंने कहा, यहाँ की सड़कों का मत पूछो, बहुत गन्दा हाल है. कहीं भी जाने मतलब, आने के बाद सारे मूड की मटिया पलीद, अरे! मित्र बोल पड़े... तुम तो बारिश का सोचो, बस ये सब बकवास है ये सब ऐसे ही चलेगा, कुछ नहीं हो सकता हर साल का रोना है.
बारिश का मजा लूं तो कैसे लूँ? मेरे शहर की सड़कों, में इतने गड्डे हैं, कि साला समझ नहीं आता, गाडी निकालूं तो.. कहाँ से.. इधर से निकालूं या उधर से, मेरे शहर की सड़कें इन दिनों अपने ऊपर हुए सरकारी बलात्कार के जख्मों की गवाह बनी है, और वो रोज अपने पे छिडके जाने वाले नमक की जलन से झल्ली होकर, उस दर्द को सड़कें चिल्ला चिल्ला के कह रही है, सुन रहा है न तू, रो रही हूँ मैं... लेकिन हमारे नगर का प्रशासन उसके कानों में तो हैडफ़ोन लगे हुए है, कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा है, इसलिए अब अगर कोई कहे, या कहीं से ये सुनाई दे, की बाबूजी मुझे आपके प्यार से नहीं अपने यहाँ की सड़कों से डर लगता है, तो उसकी इस पीड़ा को समझना... इस बारिश का मजा लेने से पहले जरा उस सड़क की तरफ भी एक नज़र देखना, की कहीं आपकी गाडी के पहिये उसके उन जख्मों को और न कुरेदे, आप तो चले जायेंगे, बारिश का मजा चार चके पे लेने, लेकिन किसी की सीने को रौंदना अच्छी बात नहीं है.
दोस्त की एक बात बिलकुल सही लगी की हर साल का रोना है, लेकिन क्या हम लोगों का खून पानी हो गया है, की दिन भर मेहनत करके हम कमाते हैं किसलिए? घर के साथ अपनी उन जरूरतों को पूरा करे, जिसके लिए हमें अपनी कमाई से टैक्स इस निकम्मी सरकार को देना होता है, क्यों क्योंकि वो हमारे लिए सड़क और अन्य सुविधाओं को मुहैया कराए, लेकिन इस तरह की काला बाजारी की अब तो शर्म से डूबने का भी समय निकल गया, प्रदेश का मुखिया जिस दिन यहाँ तशरीफ लाएगा उस दिन रातों-रात उस सड़क को नए कपड़ो के साथ सजा-धजा के या कहूँ चिथड़ो को लगा कर, उस लड़की की तरह सजा दिया जाता है जिससे साथ एक रात बिताने कोठे पे नामुराद जाते हैं, रात के अंधेरो में, मुखिया की रात बीती, सब चापलूस अपने-अपने घर को घुस जाते है, और फिर वही रोज का आना-जाना चालु, न जाने कितनी दफा, वो सड़क अपने चिथड़ो को, बनते, मिटते देखती है, और हम जैसे कई लोग, रोज अपने दो पहिये, या चार पहियों से उसे रौंदते है, हम कर भी कुछ नहीं सकते ?
मेरे बातों को कई लोग फ़िल्मी कहेंगे, कहीं कहेंगे इसमें नया क्या है? सही भी है इसमे नया क्या है? आज इंसान के पास वैसे ही ज़िन्दगी कम है जीने के लिए, ऊपर से इस तरह की हालत में कोई कैसे निकले? हम बड़ी बड़ी बात नहीं करेंगे की मौत से डर नहीं लगता या मौत कब कहाँ आ सकती है, लेकिन ये सोचने वाली बात है, जिसको सोचने का आज हमारे पास वक़्त नहीं है, आपमें से किसी ने सोचा है की विधायक के घर के सामने की सड़क पक्की है, विधानसभा अध्यक्ष के घर के सामने की सड़क पक्की है, लेकिन जिस जगह आप में से कई लोग दुर्घटना ग्रस्त हो कर भर्ती होते हों वहां की सड़क पक्की नहीं है, क्यों? ये सवाल कभी आया किसी के दिमाग में, या जिस कॉलोनी में आपने लोन ले के अपना सपनों का घर बनाया है, उसके बिल्डर ने पहले आपको वहां की सड़क क्यों नहीं बनवा के दी? कचनार सिटी के वाशिन्दों से जा के मिलो? मुस्कान हाइट्स के लोगों से मिलो? क्यों? आपने तो अपने घरों की क़िस्त उनको दी है, आप तो निगम को टैक्स दे रहे हैं? फिर क्यों? जब तक ये सवाल किसी के दिमाग में नहीं आएगा, ये सब ऐसे ही चलेगा? आपके रुपयों से बंगला बनेगा, लेकिन वो उस अध्यक्ष का बनेगा जो वोट के नाम पे आम जनता के दिलों से, भावनाओं से खेल रहा है, क्योंकि जिस अस्पताल के सामने की सड़क नहीं बनी है, उसके करता-धर्ता का बंगला सिविल लाइन में बन रहा है, वहां की सड़कें जा के देखो, लेकिन किसी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि आज हम सब सिर्फ अपना देखते हैं, लेकिन जिस दिन हमारा कोई अपना पानी से भरे गड्डो की बलि चढ़ेगा, हमने तो तब रोना-धोना मचाना है, अब हम सब इस काम में माहिर हो चुके हैं, हमारी कमाई का माल खाए कोई और हमें क्या? हमारे हिस्से का सुख भोगे कोई और हमें क्या? हम जिस दिन इस धज्जियों भरी सड़को, और इस पे चल रहे वाहनों की नीचे आयेंगे, तब हम सोचेंगे की हमें क्या करना है? बहुत ही कम अकाल का है इंसान कभी कभी लगता है, अपने किसी को रूपये देने के बात आती है तो पहले लेने की बात करता है कि कब इसका ब्याज दोगे, लेकिन वहीँ दूसरी तरफ मेहनत की कमाई का कोई और घर भर रहा है, तो उसके आगे नतमस्तक हो जाता है, वाह रे इंसान तू और तेरे रूप?
आज दिमाग में बहुत गालियाँ है, बहुत कडवापन है, सिर्फ इसलिए नहीं की मुझे इस सुहाने मौसम का लुफ्त उठाने नहीं मिल रहा, बल्कि इसलिए कि जिनको मिलना चाहिए, उनको नहीं मिल रहा, वे घिसट रहे हैं, रेंग रहे हैं, और जिनका इससे दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं, वो मुफ्त खोरी का मजा ले रहे हैं. बात गहरी है.. समझोगे तो आपका भला... नहीं तो दो अपनी मेहनत की कमाई का हिस्सा.. इन जैसे मुफ्त खोरों को, जो आपको ज़िन्दगी को यूँ ही निचोड लेंगे...

Monday, April 22, 2013

मां मुझे इस दिल्ली से दूर ले जा
और ले जा उस बड़े दिलवाली दिल्ली में
जिसके दिल में जिस्म की भूख ना हो
सीने में वासना की आग ना हो
और बलात्कार का वो काला दाग ना हो
बस माँ मुझे ले चल
मैं ही नहीं तू भी बच जाएगी
ये दिल्ली हमें नोंच नोंच के नहीं खाएगी

मैं तो अभी बहुत छोटी हूं
मुझे छुपा ले अपने आंचल में
कहीं इस दिल्ली की गन्दी नज़र मुझपे ना पड़ जाये
कहीं मेरा आने वाला कल आने से पहले ही ना सड़ जाये
माँ तुम उठती क्यों नहीं?
क्या बड़े दिलवाली दिल्ली बहुत दूर है?
या वो दिल्ली भी इतनी ही क्रूर है?
क्या इस दिल्ली के लोग भी उस दिल्ली में रहने लगे
मां अब तेरी आंखों से आंसू क्यों बहने लगे? 

मां ये तू क्या कह रही
बड़े दिलवाली दिल्ली कहीं है ही नहीं
दिलवाली बस एक छवि ही रह गई
अब दिल्ली का दिल आवारा हो गया
और इसे लगता है हर लड़की का जिस्म हमारा हो गया
मां तुझे पता था दिल्ली अब हैवान है
यहाँ कोई इंसान नहीं सब शैतान हैं
फिर भी तूने मुझे पैदा किया
अपनी ममता का क्यों सौदा किया
अपनी दिल्ली को मैंने इन सभ्य बलात्कारियो को हार दिया
मां तूने मुझे कोख में ही क्यों न मार दिया?

Friday, April 19, 2013


हर औरत रेप की हकदार है ?
रेप होते नहीं कराए जाते हैं। दिल्‍ली के गांधीनगर इलाके में रेप और अप्राकृतिक कृत्‍य की शिकार पांच साल की बच्‍ची के पिता से पुलिस ने यही कहा। थाने में रिपोर्ट कराने गए बचची के पिता से कहा गया, ‘शुक्र करो कि तुम्‍हारी बेटी जिंदा है। चाय-नाश्‍ते के लिए 2000 रुपए रखो और घर जाकर बच्‍ची का इलाज करवाओ।’
मीडिया में इस शर्मनाक बयान को पढ़ने वाले किस भी सजग व्‍यक्‍ति के जेहन में तहलका का वह स्‍टिंग ऑपरेशन आएगा, जिसमें रेप के मामलों को लेकर दिल्‍ली पुलिस की अलिखित गाइडलाइन सामने आई थी। सिर्फ दिल्‍ली पुलिस ही नहीं, देश के तकरीबन हर राज्‍य की पुलिस दुष्‍कर्म के मामलों पर इसी तरह की शर्मनाक दलीलें पेश करती है। इन दलीलों को सुनकर सभ्‍य, सुसंस्‍कृत समाज का कोई भी व्‍यक्‍ति यही कहेगा कि ऐसे में देश की हर स्‍त्री के साथ दुष्‍कर्म होना चाहिए। हर औरत जन्‍म से ही रेप की हकदार है, देखिए क्‍यों ?
1.       वह हमेशा सलवार-कमीज, साड़ी, दुपट्टे में नहीं रहती
लड़कियों को ‘यहां तक, नहीं यहां तक....’ इस यहां की कोई हद नहीं है। यह तालिबानी नैतिकता आजादी के बाद की तीसरी पीढ़ी के हर व्‍यक्‍ति के दिमाग में छाई रहती है। पुलिस ही नहीं, अधिकांश लोग मानते हैं ‘लो कट’ दिखावा है, पुरुषों को रेप के लिए उकसाने का जरिया है। स्‍कर्ट पहनना भी इसी तरह की उकसाने वाली हरकत है। यानी औरत बाहर न जाए। काम न करे। वह सलवार-कमीज, साड़ी, दुपट्टे में घर पर बैठी रहे। औरत खुद को जितना दिखाएगी, भेड़िए उसकी ओर ज्‍यादा लपकेंगे। यानी घर, सड़क, स्‍कूल-कॉलेज हर जगह भेड़िए बैठे हैं। अपने शिकार की खोज में। उन पर कोई रोक नहीं है। कोई रोक नहीं लगा सकता, क्‍योंकि रोक लगाने वाले भी वही भेड़िए हैं। इन भेड़ियों के पक्ष में बहुसंख्‍यक पुरुष आबादी है। कानून भी इनके सामने बेबस है। आप पुलिस में शिकायत कीजिए। रिपोर्ट नहीं लिखी जाएगी। रिपोर्ट लिख ली गई तो कोर्ट में कमजोर केस पेश किया जाएगा। भेड़िया छूट जाएगा। पहले से और मजबूत। मीडिया के लिए रेप एक मसालेदार फिल्‍म की तरह है। उससे भी ज्‍यादा चीर-फाड़ दिखाने वाला, जो कि अदालत में जिरह के दौरान होना है। रेप के बाद औरत का जीवन इस्‍तेमाल की गई चीज बनकर रह जाता है। भेड़ियों की विरासत बन जाता है। लेकिन पांच साल की बच्‍ची वह भी तो चारा बन रही है ?इस पर पुलिस और भेड़िया समुदाय का क्‍या जवाब है ?
2.       10 लड़कों के साथ, यानी बदनाम !
अगर किसी लड़की को सरेराह सड़क चलते एक गाड़ी में बैठे 10 लड़के उठाकर ले जाते हैं। बारी-बारी से रेप करके सड़क पर फेंक देते हैं। इस पर सबसे पहले पुलिस कहेगी, ‘जरूर उनमें से किसी लड़के के साथ वह सोई होगी। वरना कोई यूं थोड़े ही किसी लड़की को उठाता है।’ मीडिया भी चीख-चीखकर इस बयान को दोहराएगी। समाज इसे सच मान लेगा। आरोपी पकड़े जाएंगे। छूट भी जाएंगे। औरत ‘इस्‍तेमाल’ जो हो चुकी है। उस पर सबका हक है। वह मासूम नहीं है। नादान भी नहीं। उसे ‘संबंध’ के बारे में सब पता है। वह बदनाम है। कोठे पर बैठने लायक है। कोई भी उसके साथ कुछ भी कर सकता है। तो फिर हर लड़की, हर बच्‍ची बदनाम है। सबको कोठे पर बिठा दो।
3.       दारू पी, यानी रेप तो होगा ही
अगर किसी लड़की ने पार्टी या डिस्‍को में कुछ अजनबियों के साथ शराब पी ली तो फिर उसका रेप होना तय है। शराब पीने के बाद पुरुष भेड़िया हो जाता है। लड़की देखते ही पागल। नहीं सोचता कि वह क्‍या करने जा रहा है। गलती लड़की की है। पुलिस भी यही कहेगी, मीडिया और समाज भी। वह बदचलन है। क्‍यों दारू पी उसने यह तो भेड़ियों का काम है। यह कोई नहीं देखेगा कि शराब या नशीली वस्‍तु उसे धोखे से या जबर्दस्‍ती पिलाई भी जा सकती है। पुलिस यह मानकर कोर्ट में केस पेश करेगी कि लड़की तो आदतन अजनबियों के साथ शराब पीने की आदी है। वह ऐसे ही किसी मौके पर ‘संबंध’ भी बना चुकी होगी। यानी ‘इस्‍तेमाल’ हो चुकी होगी। तो फिर भेड़िए की क्‍या गलती ? वह तो रेप करेगा ही ना ? औरत को दारू नहीं पीनी चाहिए। उसे ऐसी किसी जगह नहीं होना चाहिए, जहां भेड़िए दारू पीकर टल्‍ली हो रहे हों।
4.       जब मां ही ऐसी हो तो...
हुजूर, मां की उम्र 40 पार है। पति ने उसे छोड़ दिया है।  अकेली  बेटियों के साथ रहती है। घर पर एक खास व्‍यक्‍ति का आना जाना है। वह व्‍यक्‍ति रात को भी घर पर रह जाता है। औरत है। उसकी भी अपनी इच्‍छाएं हैं। क्‍या करे ? मोहल्‍ले में पांच गवाह (असल में ये भेड़िए हैं, जिन्‍हें शिकार नहीं मिल सका) कोर्ट में इसे दोहराने को तैयार हैं कि औरत बदनाम है। ऐसे में दोनों बच्‍चियां भी मां के रास्‍ते पर चली गईं। उनके साथ रेप होना ही था। दोषी मां है। उसने बेटियों को जन्‍म क्‍यों दिया ?
5.       उसने रेप करवाया होगा
भेड़िया समुदाय जिसमें पुलिस भी शामिल है, सोचती है कि बड़े घरों की औरतें आजाद ख्‍याल होती हैं। वहां फ्री सैक्‍स होता है। कुछ भी पहनो, कहीं भी आओ-जाओ, कितनी भी देर तक घूमो। घर पर बच्‍चे भी आजाद ख्‍याल बन जाते हैं। उन्‍हें ‘मुंह मारने’ की आदत पड़ जाती है। भेड़िया समुदाय तो मासूम है। उसकी भी अपनी इच्‍छाएं हैं। इधर पल्‍लू सरका कि भेड़िया होश खो बैठेगा। फिर तो रेप होना तय है। अगर औरत निम्‍न परिवार की हो तो भी उसे बन-ठनकर निकलने का हक नहीं है। वह तो खुद को दिखा रही है। कोई आए और उसे लूटकर चला जाए। बदले में नोट की गड्डी थमा जाए। गरीबी रेप भी करवाती है। अगर किसी ने कम पैसे दिए तो रेप की रिपोर्ट लिखवा दो। कोर्ट में केस नहीं टिकेगा, क्‍योंकि पुलिस खुद भेड़िया बिरादरी की है। इतना सजकर तू रात को क्‍या करने गई थी? घर पर पति, बाप, भाई क्‍या काम करते हैं ? ये जवाब अनजाने में खुद भेड़ियों को बचाने वाले साबित होते हैं।
6.       रिपोर्ट झूठी है
लड़की ने रेप की रिपोर्ट लिखवाई ? उसे शर्म नहीं आती ? क्‍या उसे पता नहीं कि कोर्ट में उसकी इज्‍ज्‍त तार-तार होने वाली है ? क्‍या उसे पता नहीं कि समाज उसे ‘इस्‍तेमाल’ की चीज बना देगा ? वह भेड़ियों का आसान शिकार बनेगी ? उसे सबकी ‘भूख’ मिटानी होगी ? इतना सब जानने-समझने के बाद भी रिपोर्ट करवाई है तो मकसद पैसा कमाना ही होगा। वह अपना सौदा करना चाहती है। आरोपी मालदार है। रसूखवाला है। औरत ही बदचलन है। ‘सोना’ तो उसका पेशा है। वह वैश्‍या है। खामख्‍वाह एक ‘मासूम’ (भेड़िए) पर झूठा आरोप लगा रही है। कोर्ट में साबित किया जाए इस झूठ को। मीडिया बार-बार दोहराएगी इसे। झूठ सच साबित हो जाएगा। औरत ‘सार्वजनिक रूप से उपलब्‍ध’ हो जाएगी।
तो महिलाओ   – तैयार हो जाओ रेप के लिए। आपका रेप होना तय है, क्‍योंकि भेड़िया समुदाय यही चाहता है।
पढ़ें तहलका की 14 अप्रैल 2012 की स्‍टिंग : http://archive.tehelka.com/story_main52.asp?filename=Ne140412Coverstory.asp 

Friday, March 15, 2013


16 साल की बाली उम्र को सलाम

सरकार तेरे नए नियम को मेरा लाल   सलाम...। इस कानून को लेकर पता नहीं कोई सीरियस है या नहीं। किसी और का तो मुझे नहीं मालूम, पर मै  चिंता मे हूं। न जाने कितने सवालों और उसके जवाब के  मकड़जाल मे जब मै उलझ रही हूं, तो सरकार या वो माता पिता खामोश क्यों हैं?                                                           

सेक्‍स एजुकेशन किस वजह से और जेंडर एजुकेशन किसके लिए ?  सरकार तो मान रही है कि 16 की लड़की बालिग हो गईआम पक गएपके पकाए को क्‍या सिखानाक्‍या बिगड़ेगी। रेप नहींसहमति से सैक्‍स कहा जाएगा,मतलब 16 की उम्र में लड़की सेक्‍स के लिए सहमति दे सकती है। यहां सहमति अहम है। अगर सहमति है तो गलती कहां आती है। जब सही गलत का अहसास हो तो फिर जिम्‍मेदारी भी उसी कीजिसने फैसला लिया तोअलग सैक्‍स को बेडरूम से बाहर ला दें तो सब समझदार हो जाएंगी। फिर तो कोई दिक्‍कत नहीं है ना ? हां। अगर लड़की इस पर सफाई दे सकती हो तो कोई बात नहीं।

स्‍त्री की यौनिकता परिवार की मर्जी या समाज के पुरातन नियमों से क्‍यों नीलाम हो। वह अपनी मर्जी से जहां पसंद होअपने विवेक से इस्‍तेमाल कर सकती है।जैसे धर्म हमारा निजी मामला हैवैसे ही यौनिकता भी स्‍त्री का निजी मामला है।धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा, पर यहां सहमति शब्‍द बहुत ही नाजुक है इस शब्‍द का तत्‍कालीन परिस्‍थिति में कोई गवाह नहीं हो सकता लड़की बेहद उत्‍तेजना में सहमत हुई लड़की को किसी नशीली वस्‍तु खिलाकर सहमत किया गया या लड़की दबाव में सहमत हो गई। रेप में प्रमाण होते हैं लड़की के भीतरी और बाहरी अंगों पर चोट के निशान जो प्रतिरोध के होते हैं। अगर उत्‍तेजनावश सहमति हुई तो प्रतिरोध नहीं होगा सिर्फ कौमार्य भंग या वेजाइनल रैप्‍चर होगा, दबाव और नशे में भी यही बात होगी तो वह साबित कैसे करेगी अपनी असहमति लेकिन अगर हम उसे पढ़ाकर विवेकशील बनाएंगे तो यह भी दबाव बनाना होगा, उसके हकों पसंद,च्‍वॉइस को नकारने जैसा होगा। समाज को ही खुलना पड़ेगा, हम चंडीगढ़दिल्‍लीमुंबई जैसे समाज में नहीं रहते। हम गांवों में रहते हैं। वहां अभी भी शादी से पहले असहमति ही होती है। चाहे 16 में या 18 में, लेकिन कानून की नजर में सब बराबर हैं। यही इस कानून की सबसे बड़ी खामी है। 16 साल की उम्र शिक्षित समाज के हिसाब से ठीक है । लड़की पांचवीं तक पढ़कर बाहर आ जाए तो वह शिक्षित नहीं है।स्‍त्री अभी भी अपने फैसले खुद नहीं ले सकती। स्‍त्री को अपनी यौनिकता का अहसास पहले मासिक में ही हो जाता है। तब से लेकर पूरे 16 साल तक वह इस बात से चिढ़ी रहती है कि सिर्फ उसे ही खून क्‍यों आता है ? भाई को क्‍यों नहीं? 16 साल की उम्र में उसे पता चलता है कि वह एक लड़की है। जिसे लड़के पसंद करते हैं। उससे दोस्‍ती करना चाहते हैं। क्‍यों क्‍योंकि वह एकलड़की है। लड़के उसे छूना चाहते हैंक्‍योंकि वह मुलायम है। उसके शरीर पर बाल कम हैं। वह लड़कों से अलग बनावट की है। उसमें सैक्‍स हैक्‍योंकि उसे भी विपरीत लिंग की तरफ जाने की चाह होती है। यहां रुकावट समाज,परिवार के नियम हैं। जो उसे पहले बताए जाते हैं। यानी वर्जनाओं की बात पहले की जाती है। यानी वर्जनाओं की बात पहले की जाती है। विवेक से फैसला लेने की नहीं। क्‍या नहीं करना हैक्‍यों नहीं करना हैकहां नहीं जाना है वगैरह। यह बात शहरों में पांच साल की बच्‍चियों को भी बताई जाती है कि कौन सा स्‍पर्श क्‍या अर्थ रखता है।यानी लड़की के भेजे में भरा रहता है नो-नो नी वर्जनाओं की बात पहले की जाती है।विवेक से फैसला लेने की नहीं।क्‍या नहीं करना हैक्‍यों नहीं करना हैकहां नहीं जाना है वगैरह। यह बात शहरों में पांच साल की बच्‍चियों को भी बताई जाती है कि कौन सा स्‍पर्श क्‍या अर्थ रखता है।यानी लड़की के भेजे में भरा रहता है नो-नो जेंडर और सैक्‍स एजुकेशन बाद में इसे यस-नो के बीच के फासले को समझाने के लिए है। पर क्‍या यह बात समझ आएगी ?

जब नो का दायरा यस से बड़ा हो ? यह भी एक सर्वव्‍यापी सत्‍य है कि 16 साल की उम्र से ही स्‍त्री की यौनिकता बेकाबू होने लगती है। उसके दिमाग में भरे नो के चलते वह कई बातें दिल में छिपाने लगती है, क्‍योंकि बेकाबू होती इस यौनिकता को वह किसी को समझाकर नो को यस में नहीं बदल पाएगी। वह प्रेमप्‍यारचाहत और दोस्‍ती के अजीब से बंधनों में उलझती है। पढ़ाई और अच्‍छे नंबरों का सफर भी उसे तय करना है। सो वह ठान लेती है कि अभी नहीं। कुछ बन जाएं फिर देखेंगे। अभी थोड़े मजे कर लेंगे। बाकी कॉलेज में। यहां मजे से मतलब है थोड़ा घूमना फिरनाहंसी मजाकपार्टीआउटिंग या मूवीज। थोड़ी थोड़ी जिस्‍मानी छुअन और घर आकर तकिए को दोनों पैरों के नीचे डालकर सो जाना।लड़के इसी उम्र में नाइट फॉल और लड़कियां हॉट लैप्‍सेस की शिकार होती हैं। अगर मां को पता चले तो नो का दायरा फैलकर गर्दन पर फांस बना देता है।पर यौनिकता तो बेकाबू हो चुकी है। अब कुछ नहीं हो सकता।लड़के हनुमानजी के मंदिर में नजर आते हैं तो लड़कियां व्रत करती हैं। पढ़ाई में मन लगाने की कोशिश करती हैं।लड़कियों को हमेशा लगता है कि कोई उसे चाहेसराहेतोहफे दे। एक अजीब सी गुदगुदी होती है ऐसी वैसी बातों को सोचकर। केंद्र सरकार इसी उतावलेपन को सहमति मानती है। बाली उमर की इस दीवानगी को परिपक्‍वता की निशानी मानती है। 12वीं में लड़के लड़कियों के कॅरियर का एक अहम पायदान होता है।

यहां लुढ़केमतलब अच्‍छे कॉलेज और कोर्स से गएतो पूरा जोर इस पढ़ाई में लगता है। नोट्स के बहाने चिट्ठी पत्री बंटती है। कैंटीन मेंकभी लाइब्रेरी में मिलना हो जाता है।गुदगुदी ज्‍यादा हो तो ज्‍वॉइंट स्‍टडीज और कोचिंग अच्‍छा बहाना है। पर मुझे पढ़ना हैयही मंत्र दिमाग में छाया रहता है। एक साल का संयम और फिर कॉलेज में खुलेपन की छूट का लालच दोनों से यह सब करवा देता है। कॉलेज असल में हमारे शिक्षा तंत्र की मूल भावनायानीविवेकशील होने की पहली सीढ़ी है। यहां सारे चेहरों से परदा हट जाता है, क्‍योंकि सब खुले हैं। कोई कुछ भी कहसकता हैबोल-समझ और जान सकता है। मां-बाप के बंधन काफी खुल जाते हैं। उन्‍हें मालूम है कि बिटिया अब शादी के लायक हो गई है। परिवार का यह अतिरिक्‍त समर्थन ही लड़की को अंदर से मजबूत बनाता है। यहां पैर फिसलते नहीं। जो फिसला वो जानबूझकर गया।बचकाने प्‍यार को ज्‍यादातर लड़कियां यहीं पर बाय बोल देती हैं। वे आगे बढ़ती हैं। उन्‍हें लड़के में स्‍मार्टनेसकरियरफ्यूचर दिखना चाहिए। बोल्‍डनेसबॉडी आदि गुणों के बाद आता है लुक का मसला।                                         यहां दौलत और शोहरत मायने नहीं रखती।

तो कॉलेज में यानी 18 की उम्र आपको सहमति के लिहाज से ज्‍यादा मैच्‍योर लगती है या 16की?