मां मुझे इस दिल्ली से दूर ले जा
और ले जा उस बड़े दिलवाली दिल्ली में
जिसके दिल में जिस्म की भूख ना हो
सीने में वासना की आग ना हो
और बलात्कार का वो काला दाग ना हो
बस माँ मुझे ले चल
मैं ही नहीं तू भी बच जाएगी
ये दिल्ली हमें नोंच नोंच के नहीं खाएगी
मैं तो अभी बहुत छोटी हूं
मुझे छुपा ले अपने आंचल में
कहीं इस दिल्ली की गन्दी नज़र मुझपे ना पड़ जाये
कहीं मेरा आने वाला कल आने से पहले ही ना सड़ जाये
माँ तुम उठती क्यों नहीं?
क्या बड़े दिलवाली दिल्ली बहुत दूर है?
या वो दिल्ली भी इतनी ही क्रूर है?
क्या इस दिल्ली के लोग भी उस दिल्ली में रहने लगे
मां अब तेरी आंखों से आंसू क्यों बहने लगे?
मां ये तू क्या कह रही
बड़े दिलवाली दिल्ली कहीं है ही नहीं
दिलवाली बस एक छवि ही रह गई
अब दिल्ली का दिल आवारा हो गया
और इसे लगता है हर लड़की का जिस्म हमारा हो गया
मां तुझे पता था दिल्ली अब हैवान है
यहाँ कोई इंसान नहीं सब शैतान हैं
फिर भी तूने मुझे पैदा किया
अपनी ममता का क्यों सौदा किया
अपनी दिल्ली को मैंने इन सभ्य बलात्कारियो को हार दिया
मां तूने मुझे कोख में ही क्यों न मार दिया?
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