स्नेहा चौहान. अनिद्रा एक ऐसे बीमारी है जिसकी चपेट में न जाने कितने लोग है. खास कर वो जिनकी जिज्ञासाएं, महत्वकांक्षाएं इतनी ज्यादा है कि वो इस सुकून भरी नींद का आनंद नहीं ले पाते और फिर अनचाही बीमारियां उनके शरीर को अपना घर बना लेती हैं. लेकिन अगर आपको कोई कहे कि आपको आपकी नींद बाज़ार में खरीदने से मिल जाएगी तो क्या आप उसे खरीदना चाहेंगे? सुनने में ये जितना अटपटा है उतना ही मजेदार भी. ये कितना आसान होगा आप सोच के देखें? आपके लिए कोई और सोयेगा और आप बिलकुल फ्रेश फील करेंगे!
ये सब्जेक्ट जरा नहीं, बहुत अलग है, बोले तो हट के है. ये असल में एक मूवी की कहानी है, सोना स्पा जिसे देख के मुझे ये समझ आया कि, देश की कई समस्याओं का समाधान इस तरीके से किया जा सकता है? क्यूँकि जिस दिमाग में शान्ति नहीं है, सुकून नहीं है, वही कहीं न कहीं जाके न जाने कितनी सारी घटनाओ को अंजाम देता है!
तो सोचें, उन इंसानों को जिनके दिमाग को सुकून नहीं है, अगर उनके लिए कोई सोये और वो तरोताजा हो जाये. सारी खुराफात  को भुलाया जा सकता है तो इस तरह की नींद देने में कोई आपति किसी को नहीं होगी.
SONA SPA की कहानी कुछ ऐसी ही है. इस नींद से लोगो को न जाने कितनी बातों से निजात मिल जाएगी. मुझे ये कहानी अच्छी लगी. मकरंद देशपांडे की कहानी में दम है, इसको अगर किसी तरह इस  भासी दुनिया में सच में कारगर कर दिया जाये, तो वाकई न जाने कितने लोगो का भविष्य सुधर जायेगा. लीक से हट के एक उम्दा सोच के साथ, सामाजिक दायरों को कहीं न कहीं गलत साबित करती फिल्म. एक बार देखा जा सकता है. मुझे स्टार देने की परंपरा को नहीं निभाना, क्यूँकि जब किसी बोल्ड सब्जेक्ट पर कोई कलाकार एक्टिंग करता है, तो उसको समझने के लिए एक कलाकार की आत्मा काफी है.