Thursday, November 14, 2013

दिल-दिमाग ने की तौबा

 इश्क़ में हम तुम्हें क्या बताएं किस कदर चोट खाये हुए हैं...… इस गाने कि लाइन को अब कुछ इस तरह गाया जा सकता है....,  राजनीति में हम  तुम्हें क्या बताएं किस कदर चोट खाये हुए हैं. आलाकमान की एक ना से जान तक गवां चुके है….
इन दिनों आम लोगो के साथ साथ नेताओं की जान भी सस्ती हो चली है, आज काफी देर तक दिमाग में खलबली मची हुयी थी कि एक टिकट मिलने या न मिलने के कारण, जिन लोगो ने बड़ी ही आसानी से अपनी जान गंवा दी, फिर वो टिकट मिलने के बाद का टेंशन  रहा हो? या फिर न मिलने का दुख, या फिर नहीं मिलने के बाद की आत्मग्लानि. जो भी कहें, एक बड़ा सवाल  सामने आया है, क्या राजनीति जान से भी बड़ी हो गयी है?
एक नेता की मौत इसलिए हो जाती है क्योंकि उनको पार्टी ने टिकट दे दिया है, लेकिन चुनाव जीतने का टेंशन, इतना ज्यादा कि दिल ने धड़कने से मना  कर दिया. एक नेता ऐसे कि टिकट नहीं मिली तो खुदखुशी कर ली, एक ऐसे कि टिकट नहीं मिली तो टेंशन में ब्रेन हेमरेज का शिकार हो गए, वहीं कईयो ने पार्टी की अनदेखी से पार्टी में ही बगावत कर दी.
इन नेताओ से जब राजनीति होती नहीं है तो ये करते क्यों है??? इस सवाल के साथ-साथ एक सवाल ये भी, कि पार्टी ने जो भी नियम कानून बनाये थे, उनको दरकिनार कर दिया गया है जब ये बात समझ आ गयी थी तब क्यों टिकट के लिए इतनी माथापच्ची की. मुझे ये कहने में जरा भी अफ़सोस नहीं है, कि जो नेता अपनी पार्टी का नहीं हुआ, अरे यहाँ तक कि अपने परिवार का भी नहीं हुआ, जान देने से पहले, परिवार के लोगो का नहीं सोचा, इतना सेल्फिश कोई कैसे हो सकता है?
ये वही लोग है आपके परिवार के जिन्होंने आपकी नेतागिरी के चक्कर में न जाने कितने लोगो से दुआएं कम, बददुआएं फ्री में ली है. और आप नेताजी, टिकट नहीं मिला और एक झटके में चलते बने!
मरने वाले के लिए यहाँ मुझे भाषा का इस्तमाल सही करना चाहिए, या थोड़ा नम्र होके लिखना चाहिए था शायद. लेकिन मैं आपकी इस तरह की हरकत को कतई सही नहीं कहूँगी, जो इंसान अपने परिवार का न हुआ, वो इन आम जनता के लिए क्या करेगा.
आज मेरे जबलपुर के एक नेता की चुनावी टेंशन के कारण हुई मौत का खामियाज़ा उस क्षेत्र की जनता को भुगतना पड़ेगा. कारण उनके बेटे को बिना कुछ किये, पिता की जगह अनुकम्पा नियुक्ति की तरह  पार्टी ने फ्री का टिकट दे दिया है. इस बार उसका जीतना तय है, पिताजी की मौत का फ़ायदा उसको सहानुभूति में मिले वोटो से जो होने वाला है. अभी भी क्षेत्र की जनता का रुझान उस परिवार के लिए ज्यादा है, बाप के नाम पे बेटा फ्री वोट पाके बन जायेगा नेता! यहाँ नेताजी की मौत का फ़ायदा हुआ है परिवार को. इसे अपवाद कहा जा सकता है अन्य की अपेक्षा, लेकिन उनका क्या जहां न टिकट मिला, न कोई घर से दावेदार है.
अभी तक ये सुना था, कि राजनीति में अपना खून भी साथ नहीं देता, ये तो देखने मिल रहा है. लेकिन अब इस जुमले को बदलने का वक़्त आ गया है कि राजनीती में अब अपना दिल और दिमाग दोनों कब साथ छोड़ दें, भरोसा नहीं. परिवर्तन की बेला शायद यही है, जिसका इंतज़ार न जाने कब से था. इस बार पार्टियों ने जिस तरह नियम कानून को दरकिनार किया है दावों के साथ, ये होना लाज़मी था. और एक तरह से अच्छा भी है, इस तरह अब भविष्य में नयी सोच के साथ नए ऊर्जा के साथ लोग इस हवन में अपनी आहुति देंगे.

उत्तर-मध्य में मच के रहेगी उथल-पुथल!

विधान सभा चुनाव के लिए जबलपुर उत्तर-मध्य क्षेत्र इस बार अपने आप में लोगो की नज़र में चर्चा का विषय बना हुआ है. वैसे देखा जाये तो, यहाँ कोई नया चेहरा नहीं है. दोनों बड़ी पार्टियों ने वही पुराने चेहरों को मैदान में उतारा है. इस बार ख़ास यह है कि यहाँ से स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने वालों की अधिकता है, जिसमे एक महिला पार्षद भी है. इसके साथ ही इस इलाके से किन्नर हीराबाई भी मैदान  में है. ये दोनों पहले भी चुनाव लड़ चुकी हैं.
इस बार इस इलाके के कई वोट इधर उधर होने कि गुंजाइश बनी है. बड़ा कारण ये है कि बीजेपी के प्रत्याशी खिलाफ पार्टी में बगावत के स्वर सुनने मिल रहे है, वही कांग्रेस के प्रत्याशी के खिलाफ भी क्षेत्र की जनता के मन में काफी रोष है. इसके साथ ही स्वतंत्र महिला प्रत्याशी ने अपने इलाके में अपनी एक अलग पहचान  बनाई हुई है, वही किन्नर समुदाय के वोट का फ़ायदा हीराबाई को मिलेगा. उनके पार्षद रहते किये गए कामो का फ़ायदा उन्हें इस समय मिल सकता है.
बीजेपी के प्रत्याशी को भले ही पार्टी ने चुनाव का टिकट दे दिया है लेकिन उन्होंने अपने 10 साल के कार्यकाल में अपनी जनता के लिए ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे जनता उन्हें वोट दे. लोगों से हुई बातचीत में जनता की राय यह है कि -अब नहीं. इस शराबी को इस बार वोट नहीं देना, इसने सिर्फ अपना भला किया है जनता को बेवक़ूफ़ बनाया है. वहीं कांग्रेस के उम्मीदवार ने भी कुछ ख़ास नहीं किया. उनके भी अपनी पार्टी के साथ मनमुटाव शुरू से रहे हैं. जो अपनी पार्टी का नहीं हुआ वो हम जनता का क्या होगा. 10 साल में इनके तो दर्शन भी दुर्लभ थे, ये तो ये, जो विधायक बने उनके भी.
तो अब बचे स्वतंत्र उमीदवार, इनमें से भी कुछ की छंटनी सोमवार को हो जायेगी, तब कहीं जा कर पूरा समीकरण सही तरीके से समझ में आएगा. अन्य पार्टियो के उम्मीदवारों के हिस्से में जो वोट जायेंगे उससे भी इस बार दोनों बड़ी पार्टियों को फर्क पड़ेगा. इस इलाके में अधिकांश लोगों का इरादा नोटा बटन दबाने का बन रहा है.
एक नज़र इस इलाके पर
ये इलाका मुस्लिम, जैन और सभी समुदायो के साथ व्यापार का मुख्य केंद्र है. इस इलाके में 10 साल में आज तक कोई भी तरक्की नहीं हुई. यहाँ न तो पार्किंग की व्यवस्था है, न ही  चौड़ी सड़को का जाल. आये दिन यहाँ ट्रैफिक की समस्या मूंह खोले रहती है. व्यापारिक इलाका होते हुए यहाँ सुरक्षा के कोई इंतज़ाम नहीं है. बाज़ार में एक भी सुलभ शौचालय नहीं है, जनता को परेशानी का सामना करना पड़ता है. विधायक मद का इस्तेमाल नहीं हुआ, कारण इलाका नगर निगम के अंतर्गत आता है. ये सब बहाने पर्याप्त है जनता के पास और उनके पास एक बड़ा सवाल ये भी है कि इनको वोट हम क्यों दें?
विधायक का बातचीत का अंदाज़ भी यहाँ के लोगों के गले नहीं उतरता. कुल जमा बात कि इस बार इस सीट पे भी मुकाबला देने के लिए दोनों उम्मीदवारों के सामने जहां नए लोग हैं, वही नोटा का असर भी देखने मिलेगा.

कोई जोर से तो कोई होश में, बिक रहा है सब कुछ यहां, बेमोल राजनीति

 चुनाव में जीतने के लिए जो न करो वो कम हैं. देश से अगर चंदा नहीं मिल रहा तो विदेशो से मंगवाए जा रहे हैं. जितना बड़ा आसामी, मतलब उमीदवार उतने बड़े चोंचले. इसी तरह का हाल हमारे जबलपुर का भी है.
एक नेता जी ने चुनाव की टिकट मिलने से पहले ही इलाके में गांधी जी के कागज़ बटवा दिए और टिकट मिलने के बाद टेंशन में जान चली गयी. पिता कि मृत्यु का फ़ायदा बेटे को हुआ. पार्टी ने टिकट भी दिया और जनता को पिता जी पहले ही खुश कर गए, तो अब उनको कोई चिंता नहीं. पर जनाब एक्टिंग है बेटे की, उसको जब ये कहते हुए सुनो कि दादा के जैसे ही जनता का ख्याल रखूँगा.
वहीं एक निर्दलीय महिला नेत्री का MMS  चुनाव प्रचार के पहले ही चर्चा का विषय बना हुआ है. इसके साथ ही उसके त्रिया चरित्र को लेकर भी विपक्ष और जनता में माहौल गरम है. आज नाम वापस लेने के आखिर दिन सुबह से बाज़ार गरम रहा कि पति ने अभी तक पत्नी के नाम पे बहुत ऐश  किये है, उसका कोई भरोसा नहीं कि शाम तक वो बिक जाये और बीबी का नाम वापस ले ले. कहने वालों का ये भी कहना है कि पति और पत्नी दोनों का चरित्र कोई साफ़ नहीं है.
महिलाओं के लिए जो महिला कल तक एक उम्मीद बनी हुयी थी, आज उसको लेकर महिलाओं में भी गुटरगूं शुरू हो गयी है. इस महिला प्रत्याशी  ने अपना नाम वापस ले लिया है खबर लिखे जाने के पहले ही. अभी अभी आयी ताज़ा खबर के अनुसार पति ने लाखों रुपए लेके बीबी का नाम वापस ले लिया है.
वही पश्चिम इलाके में दारु के साथ कम्बल पिछले चुनाव में मिली थी इस बार तो उसकी आस  में गरीब जनता उम्मीद की चादर लिए बेरहम ठण्ड से दो चार हो रही है. उम्मीद पर दुनिया कायम है. उनको इससे कोई मतलब नहीं कि कौन जीतेगा या कौन हारेगा. उनको ठण्ड से राहत इस चुनाव के बहाने मिल जायेगी और नेता जी की तो वैसे ही वाट लगने वाली है. इस बार वहां से दूसरी पार्टी के उम्मीदवार का परचा अभी से दमदार है. इस बार जनता ने सोच लिया है, न रेत न डम्पर और न चलेगा अब कोई बम्पर. हमको चाहिए बस एक सज्जन सा नेता, जिसका हाथ हमारे साथ, उसको देंगे अपना साथ.
चुनाव आयोग की नज़र बचा के सब जगह नोटों की दीवाली हो चुकी है. कुछ खेल शुरू में खेले जा चुके हैं कुछ सीधे-सीधे नज़रो के सामने खेले जा रहे है. यहाँ हर कोई बिक रहा है, ये खेल वाकई में अब बहुत रोचक बन चला है. आने वाले दिनों में देखना यह है कि अब जो बचे हुए है उनमे से कौन अपना गेम किस दिशा में ले जायेगा.

अति हमेशा नुकसानदायी रहे है ,समय है संभल जाओ।

अति हमेशा नुकसानदायी रहे है ,समय है संभल जाओ।


''enjoy the  rape ''वाले सीबीआई डायरेक्टर के बयान को बिना पढ़े गलत बताने में भारतीये जनता पार्टी कि महिला नेता सुषमा स्वराज को एक मिनिट का वक़्त नहीं लगा। लेकिन  उनसे मध्य प्रदेश में महिला अत्याचारो ,और बलात्कारो के बारे में सवाल किया ,तो वो इस तरह मुकर गयी ,कि उनके लिए ये आकड़े कोई मायेने नहीं रखते। और तो और प्रदेश में बलात्कार के मामले में तुरंत फ़ासी कि है  उन्होंने इस तरह किया  उनकी सरकार कि बहुत बड़ी उपलब्धि है ,उनके अनुसार सारे आकड़े गलत है ,मनगढ़त है। ,सुषमा जी से मेरा सवाल ,क्या आपको ये नहीं लगता कि विपक्षी दल कि एक मात्र सशक्त  महिला नेता होने के बाद आपका इस तरह का रवैया ,वो भी ऐसे वक़्त पे जब आप जनता के पास अपनी सरकार को दोबारा जीतने के लिए  वोट मांगने जा रही है ,आपको शोभा देता है???। चलिए माना  कि राजनीती में ऐसे बयान दिए जाते है ,लेकिन एक महिला होने के बाद आपका महिलाओ के प्रति ये रवैया कहा तक सही है ,आज आपसे हुयी मुलाकात में एक बात और समझ आयी कि महिला नेता होने का फ़ायदा आपके द्वारा आपकी पार्टी कि महिलाओ को नहीं मिला है ,जब आप किसी मंच से इस तरह का सफ़ेद झूठ इतनी आसानी से कह जाती है ,तो हम सब आधी आबादी के लोग आप जैसे लोगो पे क्यों भरोसा करे ???
मुझे आपकी पार्टी कि एक बुजुर्ग महिला ने आके कहा कि आपने हम लोगो  के लिए सवाल किया ,अच्छा किया। 
सुषमा जी बात यहाँ सिर्फ महिलाओ पे हो रहे अत्याचारो कि नहीं है ,बात है आपकी पार्टी के दावो कि जो खोखले साबित हुए है , 
एक तरफ आपकी पार्टी महिलाओ कि रक्षा का दावा करती है वही उसका मजाक बनाने से भी पीछे नहीं है ,महिला का मंगलसुत्र  उसके सुहाग कि निशानी होता है आपने तो उसको तक नहीं बक्शा। चुनाव प्रचार के नाम पे मंगल सूत्र को हीदाव  पे लगा दिया। इन सब बातो को दरकिनार कर भी दिया जाये तो आपकी पार्टी ने महिलाओ को टिकट देने में जो कंजूसी दिखायी है उसका क्या ?आपके  कथनी और करनी के इस फर्क का नतीज़ा आपको चुनाव परिणाम में देखने मिलेगा ,इस बात को भी आपने सिरे से नकार दिया ,अगर इन सारे बातो को आप के साथ आपकी पार्टी के लोग इस तरह से नकार रहे है ,तो क्या ये समझा जाए कि ,१० सालो में जो कुछ भी किया वो यही हुआ ,कि मकान बनाया किसी ने उसको पुतवा के किसी ने वाहवाही लूट ली ,क्युकी अगर आप और आपकी पार्टी के सभी नेता अपने कामो कि वजह से तीसरी बार सरकार में आने वाले है ,जैसा कि आपका दवा ही नहीं पूर्ण विश्वास है ,तो सिर्फ ये बताइये कि इस बार के आपके मैनिफेस्टो  में महिलाओ कि सुरक्षा कि बात पे आप का निरुतर होना ,और अभी तक सभी नेताओ का सिर्फ एक बात को कहना कि चाँद दिन में सब सही हो जायेगा। आप लोग ऐसा क्या करने वाले है किसी खरीद फरोख्त होने वाली है जो सारे समीकरण अचानक से बदल जायेंगे। अंधे इंसान का ये विश्वास कि वो बिना सहारे के चल लेगा ,समझ आता है ,लेकिन दिमाग के अन्धो का क्या ,जिनके पल्ले आप नेताओ कि दोगली बाते  पल्ले नहीं पड़ती |  

आपका ये विश्वास कही अति उत्साहित  बयान तो नहीं ,कि इस बार फिर आप सरकार बना रही है। 

Wednesday, September 25, 2013

THE LUNCH BOX.......

सुन्दर,अनमोल पलों की कहानी है लंच बॉक्स

प्रेषित समय :13:14:09 PM / Wed, Sep 25th, 2013 palpalindia.com mai mere sabdo mai lunch box ka swaad..... 

खाना कब धीरे से किसी अकेले इंसान की ज़िन्दगी को एक नया रूप दे दे ,और कैसे खाने के बहाने एक औरत की ज़िन्दगी में नए सपनो के पंख लिए कोई इंसान नयी उमीदे भर देता है ,कुछ ऐसे ही सुन्दर ,अनमोल पलों की कहानी है लंच बॉक्स ,इला  को नहीं पता  की उसके हाथ का बना खाना  जिसे वो अपने पति को सोच के बड़े प्यार से बनाती  है, लेकिन वो गलती से किसी और को मिलता है ,जिसके लिए वो खाना उसकी नौकरी के अंतिम दिनों में एक नयी हवा के झोके की तरह आता है जो अकेले इंसान को उस अजनबी  के प्रति आकर्षित ही नहीं करता ,बल्कि उसके लिए प्यार का बीज भी बोता  है, इला के हाथ के खाने को धन्यवाद देने  के बहाने  पत्रों का सिलसिला ,कुछ इस तरह आगे बढता है की इला की पडोसी आंटी ,और उसके परिवार के सभी लोगो का परिचय एक अनजान इंसान साजन  से ,यहाँ तक की दर्शको से भी ,की लगता है जैसे वो इला को बहुत अच्छे से समझ रहे है ,ये उनके ही बीच की किसी एक की कहानी है , इरफ़ान का अभिनय जब वो लंच बॉक्स का इंतज़ार करते है और जब टेबल पे उसे खोलने की जल्दी के साथ आस पास को निहायत ही तरीके से देखना ,जबरदस्त ,
मुंबई के डिब्बावालो की दिनचर्या ,इला का भूटान जाने की बात ,और वहा  के रेडियो स्टेशन  में वहा  का गाना,वाकई सोचने पे मजबूर कर देता है की प्यार ,किस तरह से किसी के खाली जीवन को उमंगो से भर देता है ,इरफ़ान के दोस्त बने   नवाज़ुद्दीन ने शानदार  अभिनय किया है ,कुछ जगह वो हम दर्शको को हँसाने में सफल रहे है ,अभिनय  की होड़ में इला ,इरफ़ान ,दोनों बराबर रहे है ,  तय करना मुश्किल होगा कि कौन इक्कीस है,
 अच्छा साहित्य, अच्छी फिल्म और अच्छी कला तक कम ही लोग पहुँचते हैं।ठीक वैसा ही यहाँ भी हुआ है.आज हॉल में मात्र २५ लोग मिले ,जो इस शानदार प्रेम कहानी को देखने पहुचे.मुझे तकलीफ हुयी ,जहा बिना आइटम सोंग, और फाइट सीन ,के साथ उबाऊ वल्गर द्रश्य  नहीं थे.वह आज दर्शक भी नहीं थे. ये   फिल्म की खूबियों में इसका छायांकन और बैकग्राउंड म्यूजिक  भी है.फिल्म के रंग और ध्वनि में शहर की ऊब, भीड़ , खुशी और गम के साथ ही हर व्यक्ति  अकेलेपन को भी हम देख-सुन पाते हैं.
किसी अनाथ के साथ जब कुनबा मिलता है तब उसके अन्दर के भावनाए किस तरह मचलती है किसी को अपना बनाने के लिए उसका चित्रांकन भी जबरदस्त है ,मुंबई के डिब्बावालो की दिनचर्या ,इला का भूटान जाने की बात ,और वहा  के रेडियो स्टेशन  में वहा  का गाना,वाकई सोचने पे मजबूर कर देता है की प्यार ,किस तरह से किसी के खाली जीवन को उमंगो से भर देता है ,इरफ़ान के दोस्त बने   नवाज़ुद्दीन ने शानदार  अभिनय किया है ,कुछ जगह वो हम दर्शको को हँसाने में सफल रहे है ,अभिनय  की होड़ में इला ,इरफ़ान ,दोनों बराबर रहे है ,  तय करना मुश्किल होगा कि कौन इक्कीस है,
 अच्छा साहित्य, अच्छी फिल्म और अच्छी कला तक कम ही लोग पहुँचते हैं।ठीक वैसा ही यहाँ भी हुआ है.आज हॉल में मात्र २५ लोग मिले ,जो इस शानदार प्रेम कहानी को देखने पहुचे.मुझे तकलीफ हुयी ,जहा बिना आइटम सोंग, और फाइट सीन ,के साथ उबाऊ वल्गर द्रश्य  नहीं थे.वह आज दर्शक भी नहीं थे. ये   फिल्म की खूबियों में इसका छायांकन और बैकग्राउंड म्यूजिक  भी है.फिल्म के रंग और ध्वनि में शहर की ऊब, भीड़ , खुशी और गम के साथ ही हर व्यक्ति  अकेलेपन को भी हम देख-सुन पाते हैं.
किसी अनाथ के साथ जब कुनबा मिलता है तब उसके अन्दर के भावनाए किस तरह मचलती है किसी को अपना बनाने के लिए उसका चित्रांकन भी जबरदस्त है ,
रितेश बत्रा की द लंचबॉक्स. सुंदर, लजीज , संवेदनशील, रियलिस्टिक और दिव्य जायेको वाली  फिल्म है.हिंदी फिल्मों में मनोरंजन की भीड़  में ये कुछ दर्शकों के लिए खासकर वो जिन्हें ५ सितारा में खाना खाने का शौक है ,एक अच्छा स्वादिस्ट  व्यंजन के सामान है  .बाजारू मानशिकता को दरकिनार कर   यह फिल्म  लंच बॉक्स आत्मा को  सुकून देती है..

Friday, August 30, 2013

mere pahali film samiksha



बाज़ार में बिकने वाली नींद की एक अलग सी कहानी, सोना स्पा

प्रेषित समय :20:51:46 PM / Fri, Aug 30th, 2013Share this on Facebook
स्नेहा चौहान. अनिद्रा एक ऐसे बीमारी है जिसकी चपेट में न जाने कितने लोग है. खास कर वो जिनकी जिज्ञासाएं, महत्वकांक्षाएं इतनी ज्यादा है कि वो इस सुकून भरी नींद का आनंद नहीं ले पाते और फिर अनचाही बीमारियां उनके शरीर को अपना घर बना लेती हैं. लेकिन अगर आपको कोई कहे कि आपको आपकी नींद बाज़ार में खरीदने से मिल जाएगी तो क्या आप उसे खरीदना चाहेंगे? सुनने में ये जितना अटपटा है उतना ही मजेदार भी. ये कितना आसान होगा आप सोच के देखें? आपके लिए कोई और सोयेगा और आप बिलकुल फ्रेश फील करेंगे!
ये सब्जेक्ट जरा नहीं, बहुत अलग है, बोले तो हट के है. ये असल में एक मूवी की कहानी है, सोना स्पा जिसे देख के मुझे ये समझ आया कि, देश की कई समस्याओं का समाधान इस तरीके से किया जा सकता है? क्यूँकि जिस दिमाग में शान्ति नहीं है, सुकून नहीं है, वही कहीं न कहीं जाके न जाने कितनी सारी घटनाओ को अंजाम देता है!
तो सोचें, उन इंसानों को जिनके दिमाग को सुकून नहीं है, अगर उनके लिए कोई सोये और वो तरोताजा हो जाये. सारी खुराफात  को भुलाया जा सकता है तो इस तरह की नींद देने में कोई आपति किसी को नहीं होगी.
SONA SPA की कहानी कुछ ऐसी ही है. इस नींद से लोगो को न जाने कितनी बातों से निजात मिल जाएगी. मुझे ये कहानी अच्छी लगी. मकरंद देशपांडे की कहानी में दम है, इसको अगर किसी तरह इस  भासी दुनिया में सच में कारगर कर दिया जाये, तो वाकई न जाने कितने लोगो का भविष्य सुधर जायेगा. लीक से हट के एक उम्दा सोच के साथ, सामाजिक दायरों को कहीं न कहीं गलत साबित करती फिल्म. एक बार देखा जा सकता है. मुझे स्टार देने की परंपरा को नहीं निभाना, क्यूँकि जब किसी बोल्ड सब्जेक्ट पर कोई कलाकार एक्टिंग करता है, तो उसको समझने के लिए एक कलाकार की आत्मा काफी है.

Wednesday, August 7, 2013

mera article palpalindai.com mai



इंटरनेट मीडिया का विकृत रुप पोर्न पत्रकारिता
 
प्रेषित समय : 7 अगस्त, 2013
अखबार की खबर पर पाठक प्रतिक्रिया नहीं कर सकता, लेकिन मित्रों..इन्टरनेट मीडिया में त्वरित टिप्पणी की सुविधा मौजूद है. कहने का मतलब इन्टरनेट इंटरेक्टिव मीडिया है. न्यूज़ साईट हो या सोशल साईट, जिसमें विचारों का आदान-प्रदान होता रहता है. यदि किसी ने भी अश्लील सामान परोसा या इसी आशय का कोई विचार रखा तो पढ़ने वालो को पूरा अधिकार रहता है कि वह तुरंत अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करा कर सभी को अवगत करा सकता है. वो फिर चाहे अच्छी हो या बुरी. स्पष्ट है कि आपको उसकी जवाबदेही स्वीकार करनी होती है.
इंसान जितनी तेजी से हर मुकाम को हासिल करने की जद्दोजहद में आज अपने उसूलो को हर रोज दरकिनार कर रहा है ये कहीं न कहीं उसको ऐसे गर्त की तरफ ले जा रहा है की अभी तो इसके परिणाम से ये अनभिज्ञ हैं.
दो-तीन दिन से एक सोशल साइट पर, हमारे मित्रों को एक गंभीर मुद्दे के लिए धमकियां मिल रही हैं. जी हाँ मैं बात कर रही हूँ, पोर्न पत्रकारिता के जनकों की. आज एक मित्र की पोस्ट पढ़ी. … उसमे ऑनलाइन न्यूज़ साईट भास्कर डॉट कॉम की एक खबर को लेकर बात प्रतिक्रिया दी गयी थी. इस खबर की प्रतिक्रिया व्यक्त किये जाने पर पर फेस बुक के मित्रों को वहां काम करने वाले ने फ़ोन करके धमकी पर धमकी दिए जा रहे हैं. कारण उनकी न्यूज़ पेश करने का तरीका अश्लील से ओतप्रोत था. पोर्न पत्रकारिता को बढावा देने के बहाने अपनी न्यूज़ साईट की हिट्स बढ़ाने के हथकंडे के बारे में इस हरकत के बारे में किसी ने कुछ भी पोस्ट नहीं किया, क्योंकि किसी पत्रकार मित्र की हिम्मत ही नहीं हुयी ,उल्टा जिन मित्रों ने इनकी न्यूज़पर गरियाया उनकी एक भी पोस्टर को शेयर करने की हिम्मीत भी आज तक किसी की नहीं हुई.सबसे तेज दौड़ने वाले मीडिया के खिलाफ ऐसे बोलने के लिए जिगरा चाहिए, जो आजकल आप सब या मेरे जैसों के पास शायद नहीं है ,क्योंकि ये बड़े लोग हैं,इनको कोई फर्क नहीं पड़ता .यह हमलोग मान कर चलते हैं . जिगरा आजकल पत्रकारों के पास भी नहीं है.उनका खून सफेद हो गया है ,अब पत्रकारों पर से यकीन उठ गया.सब दलाल ही हैं.कोई सामने है तो कोई परदे के पीछे. ये कहना जितना आसान है ,उतना ही सोचने वाली बात ,ये है की जो इंसान धमकी दे रहा है ,कभी उसकी मानसिक स्थिति की तो सोचो,उसको भी ऊपर से आर्डर होंगे कि जो बोल रहे हैं उनको पहले धमकी दो .फिर बाद में हरे नोटों के दर्शन करा के अपनी तरफ कर लो ,छोटे लोग हैं- कब तक चिल्लायेंगे ,और इसमें गलत भी नहीं है ,जो बेचारा धमकी दे रहा है ,उसकी भी कमाई होगी ,मेरे जिन मित्रों को ,भास्कर कॉम .की तरफ से धमकी मिली है ,मुझे उनपर गर्व है ,इसलिए नहीं कि वो मेरे मित्र हैं,बल्कि इसलिए कि इन जैसे लोग ,आज के बाद आपसे डरेंगे ,आपने अपने आप को साबित कर दिया है ,ये वो लोग हैं जो शायद ,इन बनियों की दूकान को सजाने के लिए दिन भर ,नौकरी करते है ,और जो समय मिलता है ,उस समय में इनसे फ्रीफंड में ऑनलाइन न्यूज़ का काम. पत्रकारों की गलती नहीं है ,इन्होनें अपनी ऐसे हालत प्रबंधन के सामने खुद ही बनायीं है ,आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए ,इस बात को लेकर की ये पोर्न पत्रकारिता इस तरह कर रहे हैं ,सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता कि इनके ऑफिस का माहौल किस तरह का होगा . सिर्फ नाम बड़े है ,दर्शन खोटे हैं ,खुद लोग सब अन्दर से बिके हुए हैं ,ये अखबार नहीं चला रहे ,इनके मालिकों के ऊपर भी नेताओ का हाथ है.,ये सब बातें नयी नहीं है,पुरानी है.अखबार की आड़ में कितने धंधे चल रहे है ,पता लगाने जाओ ,तब पता चलेगा .असल बात यह है कि इस तरह की कई झंझटो से हर कोई गुजर रहा है.किसी पत्रकार के घर जाके देखोगे ,तब पता चलेगा, वो जब सड़क पर कैमरा लिए होता है ,तो शेर नजर आता है .उसका रुतबा ,उसका गुरूर ,उसका काम जिसके लिए उसको आखिर तक एक झूठा चोला चढ़ाये रखना पड़ता है.उसने अपनी खबर बनायीं.अगर दिन भर में मिल गयी तो ,वरना ऑफिस में आके गूगल बाबा की जय ,और काम किया निकले ,और जब बहुत दिन तक एक-सा भोजन मिले और कभी कोई ख़ास खबर मिल जाये तब वो अचानक जोश से भर जाता है ,और अच्छा करने के चक्कर में एक ऐसे गलती कर जाता है,जिसका खामियाजा सारी जमात को भुगतना पड़ता है.इसमें वो सब आ जाते हैं ,जो पत्रकार हैं या कभी थे ,या जिन्होंने उस अखबार को रामराम कह दिया है वो सब ,हम सब सिर्फ आपस में दोषारोपण करते हैं कि तुम ऐसे हम ऐसे .लेकिन हकीक़त क्या है असल में हम सब जानते हैं , फिर वो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पत्रकार हो या कोई और.लेकिन अगर पत्रकारों को चौथा स्तम्भ कहा गया है ,तो हमारी भी कहीं न कही जिम्मेदारी बनती है कि जो खबर हमने बनायीं है उसके प्रति हम कितने ईमानदार हैं ,
मेरे जो मित्र इस तरह की पोर्न पत्रकारिता को बढावा दे रहे हैं-क्या कभी सोचा है कि आपके घर में बच्चे हैं ,वो भी उस न्यूज़ को देखेंगे व पढेंगे .अगर तो आपमें इतनी हिम्मत है कि आप उनसे सेक्स पर खुली चर्चा कर सकते हो ,तो आपकी न्यूज़ की हैडलाइन सही है ,आप जो कर रहे हैं ,वही करें,उस दोयम दर्जे की कमाई को खा पी के जो चाहे वो करें ,लेकिन यदि आप के पास पोर्न सब्जेक्ट पर या सेक्स पर बात करने की हिम्मत अपने घर में नहीं है तो आपको कोई हक नहीं बनता कि आप नई नसल को इस तरह से गर्त के रास्ते धकेलें . अपने ही मित्रों को धमकी दे के भी आप लोग कोई महान काम नहीं कर रहे.आप लोगों की उन्नति कभी नहीं हो सकती क्योंकि आप लोगों को आपस में ही एक दूसरों की टाँगे खीचने से फुरसत नहीं मिल रही. कभी खुद के मतलब के लिए ,कभी मालिकों की चापलूसी के लिए ,और वो जनाब लोग जो खुद को बड़ा एडिटर समझते हैं ,उनको अगर एडिटर का काम नहीं मालूम तो ऐसे एडिटर होने से अच्छा है की आप अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दें .आप लोगों को एक रूम में बैठ के खैनी खाने के लिए नोट नहीं मिलते ,इस तरह की बातों के लिए आपकी भी ज़िम्मेदारी है ,जैसा आप लोग कर रहे हैं वही नयी पीढ़ी कर रही है .दूसरों की खबर बनाने से पहले अपने अन्दर भी देखें . मेरी इन बातों से लोगो को मिर्ची लगेगी . हो सकता है कई मेरे दुश्मन बन जाये .कुछ लोग मुझे भी बहुत गन्दा कहेंगे ,मुझे कोई फरक नहीं पड़ने वाला . क्योंकि मैं भी आपकी ही ज़मात से निकल के आई हूं ,लेकिन जब इस तरह की बातें सुनती हूँ या पढ़ती हूँ ,तब बहुत शर्म महसूस होती है और कहीं न कहीं एक गर्व भी , कि अच्छा हुआ ,सही समय में उस कीचड़ से निकल आई.पर आज जब आपस में अपने ही मित्रो को इस तरह धमकी देते ,और न जाने कितनी बातों ,कितनों के मुंह से सुना ,तो अपने को रोक नहीं पायी और सोचा अपने अन्दर को, अपने शब्दों में, अपनों से व्यक्त कर दूं,