शिक्षा मंत्री को दोष दूँ या उस स्कूल को ,या उन पेरेंट्स को ,या उन
बुद्धिजीवी को या खुद की जमात को याने पत्रकारों को ?
आज दिन भर कुछ सवालो ने मेरा दिमाग गरम कर दिया ,उस समय तो बहुत जोर से
झल्लाहट हुयी जब मेरी बातो पे मुझे मर्यादा में रहने को कहा गया। जबकि दो
दिन भी नहीं हुए महिला दिवस के गान को गाये ?
जबलपुर के एक अंग्रेजी स्कूल की प्रिंसिपल ने किसी बच्चे को 11th क्लास में पास का रिजल्ट के साथ टीसी देके स्कूल से निकालने की बात उसके पेरेंट्स से की ,स्वाभाविक है प्रेशर
होगा उस बच्चे पे भी ,उसके माता पिता पे भी ,मुझे जैसे बात पता चली मैंने
उस मुद्दे को लेके कई बुद्धिजीवियों से बात की ,मामला सीरियस इसलिए भी
लगा क्युकी कुछ दिन पहले उस स्कूल में एक बच्चे ने टीचर के प्रेसर में
आत्महत्या कर ली थी। वो लड़का था ,अब मामला उसी स्कूल की लड़की का है।
बच्चो पे प्रेसर न सिर्फ टीचर्स का होता है ,बल्कि उनके अभिभावकों का भी
होता है। कुछ जो बच्चो को संभाल लेते है ,लेकिन कुछ झूठी दिखावट के
चलते बच्चे के भविष्य की वाट लगा देते है। स्कूल मैनेजमेंट के पास नियमो
की लिस्ट है ,या तो आप उसको मानो या बच्चे को निकाल लो। कोई जिम्मेदारी
लेने तैयार नहीं ,हाँ साल के लाखो रुपैये फीस के रूप में लेने की
जिम्मेदारी उनकी है जो वो बाकायदा समय से निभाते है।
सवाल ये की यहाँ गलती किसकी ? उस माता पिता की ?बच्चे की ?या स्कूल की ?
इस मुद्दे को लेके हम परेशान हुए ,हमने अपने सोशल ग्रुप में मैटर शेयर
किया ,सभी से पूछा की क्या किया जा सकता है ,कुछ बुद्धिजीवियों ने बड़े ही
विनम्रता से बात की ,सहयोग लेके आगे आने की बात की ,मुद्दे को तवज़्ज़ो
मिला। कुछ ने लीगल एक्शन की बात की ,सामाजिक मुद्दे को समझा। मुझे एक
उम्मीद बंधी की चलो कुछ अच्छा किया जाए ,और सब मिलके प्रयास होगा तो
रिजल्ट अच्छा आएगा ?
लेकिन तुरंत कुछ देर में हमारी जमात के ग्रुप में मेरी बात को ये कहके
समझाइश दी गयी की "कोई भी बात को रखते समय उचित शब्दों का इस्तेमाल करे
,उतनी ही बात रखे जितनी हमारी क्षमता है ,हमें ग्रुप की मर्यादा बनायीं
रखनी चाहिए ," यहाँ तक कहा गया की उस ग्रुप का मजाक बना दिया गया है। कई
लोग लेफ्ट हो गए ,जो की रात होते होते वापस वही थे।
जब वहा ये बताया गया की जिस बच्ची की बात हो रही है वो इसी ग्रुप के
मेंबर की बिटिया है ,उसके बाद कोई कुछ नहीं बोला ?
बात ये समझ नहीं आई की ऐसे कौन से शब्द थे मेरे जिससे मर्यादा भंग हो
गयी। खुद को कलम का सिपाही कहते है ,और स्कूल की एक फोटो ,एक न्यूज़ एक
ऐड पे अपना ज़मीर बेच देते है ,खुद पत्रकार है लेकिन हिम्मत नहीं की खुद
आगे आके लड़े ,किसी का कन्धा लिया , उसको शब्दों से चढ़ाया और तीर निशाने
पे लगा दिया ,जब मामला फ़ैल गया ,तब अपने कदम पीछे लेलो। या उस सामने
वाली पार्टी से हाथ मिला के खुद का उल्लू सीधा कर लो। मुझे ये कहने में
कोई डर या शर्म नहीं की ऐसे समय में लड़कियों का कन्धा बड़ा काम आता है।
आज शायद मेरा मिल गया था।
मुझे कोई दिक्कत नहीं न ही डर है ये कहने में मेरी जमात के ही लोग है
,जो मालिको के डर से ,खुद की नौकरी के जाने की डर से ,घर बार चलाने के
खातिर आज किस तरह से खुद के ज़मीर को मार के जी रहे है। कई ऐसे भी है जो
एक बोतल दारू ,और न जाने कैसे कैसे गिफ्ट के भरोसे अपने बीबी बच्चो को
पाल रहे है ? विदेश घूमने जाते है ,क्युकी किसी ख़ास न्यूज़ को रोक लिया था
छपने से ,किसी ने न्यूज़ इसलिए रोक ली क्युकी उस जगह उनका ठेका लगा है।
आप सबकी मर्यादा उस समय कहाँ जाती है जब आप अपने ज़मीर से समझोता करते है
? उस महिला को मर्यादा बताई जाती है ,लेकिन खुद के ऑफिस में काम कर ने
वाली महिला पत्रकार को जब अजीब से शब्दों से नवाज़ते है तब ? उस समय
मर्यादा कहाँ जाती है ?शब्दों के चयन में तब सावधानी क्यों नहीं बरती
जाती ? उस समय मर्यादा या शब्दों का चयन गायब हो जाता है जब संपादक महिला पत्रकार को गालियो से सम्बोधित करता है ?
तब मर्यादा कहाँ जाती है जब सोशल मीडिया में ग्रुप में फब्तियां कसी जाती है ?
अफ़सोस होता है ये देखके की चंद इस तरह के लोगो के कारण एक मुद्दा ,बच्चे
की ज़िन्दगी का उसके भविष्य का मजाक बन जाता है ?
किसी अफसर के बारे में हमारे पत्रकार गलत नहीं सुन सकते ?क्यों? क्युकी
रोज वहा हाज़िरी देनी है। कईओ के काम करवाने है। आप काम करवाईये ,लेकिन
खुद की कोई सेल्फरेस्पेक्ट नाम की चीज़ होती है या नहीं ?
शायद यही कारण है की माल्या जैसा आदमी हमारी जमात को एक झटके में नंगा कर
देता है ये कहके की किसने कितनी मौज उड़ाई है उसका हिसाब किताब है उसके
पास ?
बेचारी शिक्षामंत्री जी आज बच गयी ,गलती उसकी भी नहीं है ,सारे नियमकानून
बनाये कोई और भुगते कोई और मलाई खाए कोई और ? ऐसे में यही ख्याल आया एक
बार मरने दो ,जिसको मरना है ,किसी के अच्छे के लिए सोचने का या कुछ करने
का समय ही नहीं है ? सच बोलो तो दिक्कत झूठ बोलो तो दिक्कत। बस सुनो
सबकी आज इसका जनम दिन कल उसकी सालगिराह। उसने शायरी सुना दी इसने वाहवाह
कर दिया। कोई ने गलती से अपने विचार रख क्या दिए ,वो तो बड़ा द्रोह हो गया
?
सोचती हूँ मेरे जैसे कितनेहोंगे जिनको गलत बर्दाश नहीं होता होगा ?क्या
सब लिखने लगते है ,या सब मौन हो जाते है ? मौन होना भी कोई सोलुशन नहीं
है ,गलत को गलत और सही को सही भी न कह सको तो लानत है ऐसे ज़िन्दगी पे।
बाकी सबक मिला आज की कन्धा मत बनो ,समय आ गया है कंधे खोजो और निशाना
लगाओ ?
यही है असल आज़ादी ,असल ज़िन्दगी।
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