Wednesday, August 12, 2015

सामाजिक संसार की फंतासी का जादूगर

ज्ञान जी का नाम बहुत सुना था , उनका गुस्सा, उनका हड़काना, उनका ये उनका वो, लेकिन सच कहूँ तो उनको आज तक पढ़ा कभी नहीं, पहल का नाम सुना था, कभी ऐसी कोशिश नहीं की ,पहल को  पढूं। मुझे कहानीयों का कविताओ का कभी शौक नहीं रहा ,जब तक फील्ड में थी। सिर्फ हक़ीक़त को बयान करना ही आया। उसमे कभी कमी नहीं की और अगर कोई ने कह दिया की ये तुम्हारे बस का नहीं तो फिर ज़मीन आसमान एक कर देना ये फितूर रहा है। शायद यही फितूर था जिसकी बदौलत मुझे ज्ञान जी से मिलने का मौका मिला, नौकरी से इस्तीफे के बाद जब ऑनलाइन खबरों की दुनिया में आई तब साहित्य जगत का कोई ज्ञान नहीं था, लेकिन कुछ अलग करने की चाहत में सोचा जबलपुर के सभी जाने माने लोगो का इंटरव्यू करना है, लिस्ट में ज्ञान जी का नाम भी था, लेकिन कोई कांटेक्ट नहीं, पत्रकारिता में मेरे गुरु से मैंने कहा मुझे ज्ञान जी को इंटरव्यू करना है, "पागल हो गयी हो क्या " सोचना भी नहीं, क्या जानती हो उनके बारे में, कभी पढ़ा है उनको, आज तक हम लोग कभी इंटरव्यू नहीं लिए तुम कल की उनका इंटरव्यू करोगी ? साहित्य, कहानी कभी पढ़ी है। अच्छे अच्छो की सवाल की हिम्मत नहीं उनके सामने। 

फिर  क्या था उस समय जो मुद्दा चल रहा था, उस  पे सवाल तैयार  किये और परेश तिवारी के साथ उनके घर सुबह सुबह मोबाइल लेके पहुंच गयी। ज्ञान जी ने इतनी आत्मीयता के साथ मेरे से बात की, लगा ही नहीं की इस इंसान के बारे में लोगो ने क्या क्या फैलाया हुआ था ? उन्होंने मेरा परिचय लिया अपना मोबाइल नंबर दिया और उस इंटरव्यू  की कॉपी मुझे देने का आदेश  भी। उसके बाद मैं उनसे जब भी मिलती दुआ सलाम होने लगी, लेकिन अब तक भी मैंने उनको नहीं पढ़ा था। आज जब पहल को ४० साल हुए, १००वां अंक आने को है तब फिर फितूर चढ़ा की मुझे उनके लिए लिखना है क्योंकि अब तक कहानियाँ कई पढ़ चुकी हूँ, कविता समझ आने लगी है, साहित्य में रूचि बढ़ रही है, तो दोबारा ज्ञान जी के व्यक्तित्व ने मुझे  आकर्षित किया।

एक बात जो अब भी ख़ास थी मैंने अब तक  ज्ञान जी का लिखा  नहीं पढ़ा था , इस बार न जाने कितनो से बात की। कुछ लोगो ने साफ़ मना  कर दिया, माफ़ी मांगते हुए की हम उनके बारे में नहीं लिखेंगे, कुछ उनको जानते नहीं। कुछ ने कहा कभी पढ़ा नहीं ?आश्चार्य  ये हुआ की ये सब लोग साहित्य के लोग थे, जिन्होंने मुझे अजीबो गरीब परिस्थिति में डाल  दिया था। एक बार लगा, जब ये दिग्गज कुछ नहीं बोल रहे, पढ़ा नहीं, कह रहे तो मैं कैसे उनके बारे में लिखूंगी। 



फिर क्या था ज्ञान जी की कहानियाँ ऑनलाइन   खोजी और एक रात में २  कहानियाँ  दो दिन में उनकी प्रतिनिधि कहानियाँ पढ़ डाली। अब समझ आया की वो आखिर है क्या ? एक ऐसे कहानीकार जो अपने पढ़ने वाले को इस तरह अपने शब्दों की भूलभुलैय्या  में घुसने को मजबूर कर देता है, जिसमे जो एक बार फँस  गया वो या तो खुद को वहीँ का मान लेता है या वहां से बहार आने के बाद दोबारा बार बार उसमे पनाह लेना चाहता है। जो हाल मेरा हुआ। उनकी सिंपल सी योजना बध तरीके से गढ़ी गयी कहानी गजब जादू ढा  देती है पाठक के मन मस्तिस्क पे। 

ये कला आज तक कोई कहानीकार नहीं सीख पाया होगा न ही कोई कर पायेगा। उनको उनकी कहानियों ने मेरे करीब ला दिया। सामाजिक संसार के अनुभव को अपनी फंतासी से पाठक को बांधे रखने की कला का जादूगर।ये कहना अतिस्योक्ति नहीं होगी। उनकी कहानियो में वो घटनाये ,और बाते है जो आज वर्तमान में घटित हो रही है। 


अब मुझे समझ आया है की क्यों लोगो ने मना किया उनके बारे में कुछ कहने से। साहित्य जगत में राजनीति  आज अपने चरम पर है। कोई किसी को आगे नहीं आने देना चाहता। ऐसे में 70 के  दशक में ज्ञान जी ने सभी नए लोगो को 'पहल' में छापने का काम कर, उस मनु  विचारधारा को तोड़ा   था। आज भी वो युवाओ को जिस तरह से प्रोत्साहित करते है, वो काबिले तारीफ़ है। आज के साहित्य में वो झटके या जलवा वाली बात ही नहीं। कोई भी कहानी याद नहीं रह पाती। जबकि ज्ञानजी के कहानी के पात्र आज भी याद है। ज्ञान जी में आज भी एक छटपटाहट   है किस की कहानी और कविता में क्या नया है, ये स्वभाव  उनको सबसे अलग रखता है। 


ये तो हुयी मेरी बात जो मैंने समझी जानी पहल और ज्ञानजी के बारे में। लेकिन कई ऐसे भी मिले  जो  ज्ञान जी को नहीं जानते या उनके बारे में ज्यादा नही जानते,या सिर्फ सुना है ,या तो पढ़ा है लेकिन  कुछ कहना नहीं चाहते ,कईयों को पहल  की  जानकारी  ही नहीं ,कईयों ने  पहल  को पढ़ा  ही नही। 


पहल एक मात्र ऐसी  पत्रिका रही है जो देश के विभिन्न  प्रदेशो की   जेल तक  में पहुंची है कई कैदियों ने इसे  पढ़ा , इसमें छपने  का सपना हर लिखने वाले को होता है, ये कहना है जबलपुर के युवा रंगकर्मी आशीष पाठक  का, जो ज्ञान जी को ज्यादा नहीं जानते सिर्फ इतना  की उनके लिखित नाटक रेड फ्रॉक को देखने के बाद ज्ञान जी ने कहा था, आशीष तुमने रंगमंच की दिशा बदल दी। 

ज्ञानपीठ पुरूस्कार से सम्मानित कवित्री  बाबुषा के लिए ज्ञानरंजन उस बरगद की तरह मालूम पड़ते हैं जिसके तले बैठ कर छाँव भी मिलती है और मिट्टी का खुरदुरापन भी महसूस होता रहता है। उनकी आँखों की चमक क़ाबिले-ग़ौर है। ये सच्चाई की चमक है।

 चित्रकार विनय अम्बर  के अनुसार पहल इस महा देश की वैज्ञानिक पत्रिका है यानी वैज्ञानिक  तरीके से जीवन जीने के लिए प्रेरित करने वाली साहित्यिक पत्रिका है। वैचारिक प्रतिबद्धता  को समर्पित, यह सब ज्ञान जी के विचार और विज्ञानं के साथ साहित्य के संलगनता का परिचायक है। पिछले ४० सालो में किसी साहित्यकार ने एक संपादक  के रूप में इतना काम नहीं  किया। खोज खोजकर कहानीकार, कवियों को अवसर दिए। पहल ने विश्व को अनेक भारतीय साहित्यकार दिए। उनको सलाम है। 
अरुण पाण्डेय वरिष्ठ नाट्य कर्मी होने के साथ  कहानीकार भी है। हाल ही में पहल के ९९वे अंक में अरुण जी की कहानी छपी, उन्होंने बताया  की ज्ञान जी की  चुनौती  को पार किया उस हौसले  के दम पे जिसके लिए ज्ञान जी ने कहा था की हौसला हो तो आगे आओ वरना मैं रास्ता बदल रहा हूँ। अपने मन को मारते हुए आज तक किसी प्रसिद्धि के चरम पर पहुंचे इंसान को नहीं देखा, उनकी ये अदा अजीब रही। यथार्त और आगत यथार्त को सूंघ कर उस पर रणनीति बना कर लोगो को बताना हिंदी के रचनाकारो की आदत नहीं रही है। बदले ग्रामीण परिवेश, पूंजीवाद का विकास, नव उदारवाद बाजार का चरित्र माफिया , आंदोलन, आरक्षण और भी  कितने मुद्दो का पूरा सच समय से पहले पहल ने ही बताया। ज्ञान जी शहर की हाय तौबा आपसी पीठ थपथपाउ संस्कृति के कभी हिस्सा नहीं रहे। जो अच्छा लगा, उसका साथ दिया जो बुरा लगा उसे बगैर देर किये छोड़ दिया। उनको देख के जीवन और संघर्ष के मायने न केवल समझ में आते है बल्कि उन रास्तो में बेधड़क चलने का मन बनता है। हौसला अफजाई और निराशा के गर्त से उबारने की कला को जताने वाला शहर का एक मात्र महाविद्यालय  वे स्वयं है। पहल अब पत्रिका नहीं रही वो अब परिवार हो गयी है बस ये परिवार यूँही बढ़ता रहे।  

वही उनके हमप्याला दोस्त साहित्यकार  राजेंद्र दानी जी पहल और ज्ञान जी को अलग नहीं मानते, उनके हिसाब से पहल ने २५ साल पहले जो संघर्ष किया, इस मुकाम में लाने के लिए, उसके वो गवाह हैं। उनमे जो रचना शीलता है, जिसकी बदौलत वो हर रचना में से उसका बेस्ट निकालने का काम करवाती है। 

लेखक अमृतलाल वेगड़ के शब्दों में जो स्थान जनसत्ता का अखबारों में है वही स्थान पहल का साहित्य में है। ज्ञान रंजन को पहल से अलग नहीं किया जा सकता। अपने लेखक पद से पहल के संपादक के लिए दिया गया बलिदान वेगड़ जी बड़े गर्व से बताते है, उनके हिसाब से पहल को ज्ञान जी के इस बलिदान की जरुरत थी।

कवि व लेखक  राजेश्वर वशिष्ठ ने ज्ञान जी को कुछ इस तरह अपने शब्दों में बयान किया पहल आज हिन्दी कहानी का पर्याय है। इस पत्रिका का प्रकाशन साठोत्तरी कहानी के अग्रणी कहानीकार श्री ज्ञानरंजन ने  1973 में बहुत सीमित साधनों के साथ किया था। भले ही ज्ञान रंजन जी के साधन बेशक बहुत सीमित थे, पर उनकी दृष्टि बहुत व्यापक थी। एक समय आया जब यह पत्रिका साहित्य के क्षेत्र में क्रांति का बिगुल बन गई। इस पत्रिका में कहानी का प्रकाशन ही किसी को कहानीकार के रूप में स्थापित करता था।  
पहल ने कहानियों का चयन कभी भी सम्पर्क और सौजन्य के आधार पर नहीं किया। पहल की कहानियों मे सामाजिकता का निरूपण, पीड़ित, दबे-कुचले की व्यथा सहित सदैव यथार्थपरक ही रहा। विचार धारा के स्तर पर यह पत्रिका सदा जनवादी मूल्यों की पोषक रही। इस पत्रिका में नए चलन के नाम पर कभी भी यौन स्वच्छन्दता को नहीं परोसा गया जबकि इसकी प्रतिस्पर्धी पत्रिकाओं ने ऐसा खुल कर किया। ज्ञानरंजन आज हिन्दी कहानी के सम्माननीय प्रतीक हैं और यह जान कर अच्छा लग रहा है कि पहल का सौवाँ अंक शीग्र ही आने वाला है। हार्दिक शुभकामनाएं।


पत्रकार ,संपादक राजीव मित्तल के शब्दों में ज्ञान जी से अपनापा बहुत रहा  लेकिन जान-पहचान शून्य …… अड़तालीस साल पहले खुर्जा में चाचा प्रभात मित्तल की शादी में ज्ञान जी सुभाष परिहार के साथ आये थे … तो जनवासे में खुसुर-पुसुर होने लगी....कौन आये हैं ये देखने हम भी उस छोटी सी भीड़ में शामिल हो गए … काली दाढ़ी और बड़े बाल वाले ज्ञान जी काफी हंसमुख लगे …… बस, अगले   कई साल इस परिचित नाम के गुजर  गए … पहल ने ज्ञान जी को कभी भूलने ही नहीं दिया … जबकि पढ़े या देखे दो-चार अंक ही होंगे.... 
फिर 1995 में ज्ञान जी  और परिहार जी से मेरठ में मुलाकात …दोनों अपने स्वर्गीय मित्र  की शादी में आये थे … अगली सुबह दिल्ली तक का साथ और  समय एक छोटी सी नमस्ते.... अगली दो मुलाकातें जैसे आपस में टकराना जाना …

फिर तो दस साल गुजर गए....अब अपना मक़ाम था मुजफ्फरपुर .... अखबार जम कर लेखन हो रहा था … तभी रश्मि रेखा ने राग छेड़ा कि आप पहल  नहीं लिखते …… उसी दिन छपा कुछ भी ज्ञान जी को भेज दिया …साथ में उन मुलाकातों का जिक्र भी … कुछ ही दिन में ज्ञान का जवाब … पिछला कुछ याद नहीं....प्रभात की याद है....तुम्हारा लेखन काफी अलग हट कर है....  पहल के लिए शहरनामा लिख कर भेजो … भेज दिया और पहल में छप  भी गया....फिर क्या …  मैं  विषय बताता और वो पहल में  छापने का ऐलान …सुयोग से जबलपुर ने अपने पास  बुला लिया …वहां पहुँचते ही ज्ञान जी  खोजा … पता चला अपनी बेटी के पास यूएस गए हुए हैं … मायूस हो गया … एक दिन किन्ही पंकज स्वामी का फ़ोन आया की ज्ञान जी आपको तलाश रहे हैं आप उन्हें फ़ोन कर लीजिये …फ़ोन पर उन्होंने बेहद खुशी जताई और घर आने को कहा … तुरंत किसी को पकड़ उनके घर गया....खूब सारी बातें हुईं .... अगली बार घर गया तो अपना एक लेख भी ले गया ....देख कर बोले कि पिछली बार लेकर क्यों नहीं आये इस अंक में छाप जाता....कुछ दिन बाद उनका फ़ोन आया ये लेख तो  भयंकर है दंगा हो जाएगा....…  ज्ञान जी से मुलाक़ात होती रही  .... अचानक जबलपुर छूट गया … तीन  साल बाद  जबलपुर जाने और ज्ञान जी  का सिलसिला शुरू हो गया … पर  यही कहूँगा कि  अपनापा तो बहुत है पर जान-पहचान बहुत कम.

युवा चित्रकार ,पत्रकार सुप्रिया अम्बर  के अनुसार ज्ञान जी से जब भी मिलना होता है किसी ना किसी महत्वपूर्ण विषय पर बहस छिड़  जाती है ,चर्चा परिचर्चा आलोचना सभी कुछ ,और जब हम विसर्जित होते है तो हर बार एक नई तरह की ऊर्जा सभी में प्रसारित हो चुकी होती है। ज्ञानजी और पहल हर पृष्ट पर नया उल्लेख हर मुलाकात में नई ऊर्जा। 
इन लोगो से बात करते हुए मुझे लगा की कुछ कमी है, ठीक वैसे है जैसे दारु की बोतल सामने है, गिलास में डाल  लिया, एक घूंट पीने के बाद भी दिमाग को शान्ति नहीं होती। तब तक जब तक उसका हल्का हल्का सुरूर न चढ़ने लगे। 

साहित्यकार विमल कुमार के अनुसार पहल    ने पिछले चालीस सालों में हिन्दी साहित्य और हिन्दी पट्टी के वैचारिक जगत में बौधिक खुराक तो दी है बल्कि जरूरी सवालों में हस्तक्षेप भी किया है और खलबली भी मचाई है .पहल के बंद होने पर भास्कर में मैंने एक पेज लिखा भी था जिसमे उसके योगदान की सविस्तार चर्चा भी की थी. पहल के टक्कर में आज कोई पत्रिका नहीं है उसकी तुलना केवल तद्भव से हो सकती है पर पहल में जो धार और तीखापन है वो अखिलेश की पत्रिका में नहीं है .पहल का इंतज़ार सभी करते हैं .पहल और ज्ञानरंजन एक दूसरे के पर्याय  बन गए हैं.जबल पुर पहले परसाई जी के कारण जाना जाता था अब वह ज्ञानरंजन के कारण भी  जाना जाता है .ये बड़ी बात है कि एक पत्रिका से एक शहर की पहचान बन जाये .लेकिन ये भी सच है कि ज्ञान जी साहित्य के सात्ता केंद्र के धुरी भी बने .उनके प्रशंसकों का एक क्लब भी है .लेकिन ये क्लब राजेंद्र यादव नामवर सिंह और अशोक वाजपेयी के क्लब से अलग है .इस क्लब के सदस्यों से ज्ञान जी घिर भी गए हैं और कई कमजोर रचनाएँ भी छपी हैं लेकिन इसके बाद भी पहल ने सरस्वती हंस मतवाला और प्रताप जैसी  भूमिका निभायी है.


मुझे अब भी इतना सब सुनके  पहल और ज्ञान जी के बारे में  संतुष्टि नहीं  हो  पा रही थी। कुछ अधूरा  सा, बेमानी सा लग रहा था, तभी एक दूसरे  फितूर  ने दस्तक दी की इनको पढ़ना है दोबारा । एक दिन में ज्ञान जी की ३   प्रमुख कहानियाँ  दोबारा पढ़  डाली।  छलांग,घंटा , पिता । वैसे सच कहु तो दोबारा पढ़ने  के बाद  अब जो नशा चढ़ा उसका आलम आज तक बरकरार है। इन कहानियों  में मैं खुद को  मुख्य चरित्र  समझ रही थी। उस गजब की फंतासी और अनेक विरूपताओ का खुलासा, पारिवारिक परिवेश की विकृतिया चाहे स्त्री के सन्दर्भ में हो या पुरुष के या उन संस्कारो के रूप में उनका प्रस्तुतीकरण, फिर उसमे प्रेम, किशोरावस्था के मनोभाव, प्रौढ़ परिणीति के चित्र आँखों के सामने एक चल चित्र की माफिक गुज़र गए और कहानी खत्म होने के बाद भी पाठक याने मैं, मुझे खुद को सामान्य करने में समय लगा। अब उस अविस्मरणीय  पल की मैं गवाह बन चुकी थी। 


ज्ञान जी और मेरे में एक समानता है ,आलसी पन , जैसा की उन्होंने कही लिखा है ,मुझे लिखने में आलस आता है ,खासकर जब आँखे गढ़ाके  कम्प्यूटर  पे  हिंदी लिखनी हो ,लेकिन इस खुमार के आलम में जो लिखने का काम शुरू हुआ ,परत दर परत  प्याज की माफिक ज्ञान जी का व्यक्तित्व से में अनजान नहीं रही। मै  दावे के साथ कह सकती हूँ की आज के साहित्य कारो ,कहानीकारों ने अगर उन २५ कहानियो को नहीं पढ़ा तो वो साहित्य जगत में उस ईरानी के जैसे है जो कहने को शिक्षा मंत्री है लेकिन डिग्री फ़र्ज़ी लिए हुए। 

बाकी अब ये बात भी समझ आई की लोग उनसे आतंकित और चुप्पी क्यों बनाये रहते है ,कोई कुछ कहना ही नहीं चाहता। जानते सब है लेकिन कोई जानता  भी नहीं ,मुझे वो कभी गुस्से वाले नहीं लगे, जैसा की लोगो ने बताया था ,आज उनके बारे में अपने शब्दों में लिखने की जुर्रत की है ,बाकी इस उम्मीद के साथ की साहित्य में कदम रख ही दिया है तो अब गुरु से क्या डरना। वैसे यहाँ एक बात कहना चाहूंगी ज्ञानजी ने मेरे पापा को कॉलेज में पढ़ाया था ,और अब वो मेरे भी गुरु है। 

कहने  को  ,ज्ञान  जी और पहल   के  लिए  अब इतना सारा है ,की समझ नहीं आ रहा  क्या लिखू ? सिर्फ इतना ही कहूँगी पहल ने उस आपातकाल में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी ,ठीक उसी तरह आज जब आपातकाल जैसे हालात दोबारा बनने की बात होती है तब एक उम्मीद इस पहल से भी की ये कल की याद को आज के बीच एक नए रंग ,रूप ,के साथ लाने में कामयाब हुयी है।


digital india ki asli tasveer


अनोखे तारो से मुलाकात

संडे की सुबह कुछ ख़ास रही ,वैसे तो मै कई बार बीच गयी थी ,आज के पहले अपनी पत्रकारिता की नौकरी के दौरान तब वैसा कभी महसूस नहीं किया था ,जो बात आज महसूस की या कह लो ,तन मन आत्मा सब भर गयी ,आँशु भी झलक पड़े ,आलम ये है की अभी तक खुद को नार्मल नहीं कर पा रही हूँ। आज मेरे से या हम में से किसी से कोई पूछ ले कोई दिक्कत या तकलीफ बुक्का फुला के रो लेंगे ,सब बता देंगे ,इसने ये किया उसने ये किया , न जाने कितना सब कुछ ,लेकिन जब इन बच्चियों से मैंने ये सवाल किया ,तो वो खिलखिला के हँसी और कहा कुछ नहीं दीदी बस सर दर्द देता है , ये दर्द इनको होगा क्युकी ये बच्चियां देख नहीं सकती। आज मुझे ऐसा भी लगा की कितना अच्छा है की ये दुनिया के बदरंगो से पर है ? हम लोगो से लाख गुना सुखी ,जिनके पास ईश्वर ने सब कुछ दिया है फिर भी दो पल का सुकून नहीं ,हाय ये ,हाय वो, हाय इसका ,हाय उसका ,उसने ऐसा ,तो उसने वैसा में ही सारी ज़िन्दगी निकाल देते है ? उनकी आवाज़ में वो खनक थी ,जो अंदर तक हिला गयी ,सुनी तो पहले भी थी तब शायद कानो से टकरा के चली गयी होगी ,आज कान के रस्ते दिल के अंदर गयी और तांडव सा मचा दिया मन में।
सब लडकिया है ,पढ़ने में जोरदार ,गायन जबरदस्त , डिसीप्लेन छोटी उम्र से बड़ी उम्र तक का जबरदस्त ,कितने कदम में क्या है ,किसको क्या कब देना देना है , किससे कब कैसे बात करनी है , बिना टकराये भीड़ में से खुद को कैसे निकालना है ,हम और आप आँख वाले क्या करेंगे जो आज इन बच्चियों को मैंने करते देखा ? ये है जबलपुर की नेत्रहीन कन्या विद्यालय की बच्चियां ,मौका था वात्सल्य एक्यु हीलर कैंप का जो आज यहाँ लगाया गया था। बड़े बड़े लोग जाते है ,उनके गीत सुनते है ,कुछ दान देते है और आ जाते है। इनको दान की कोई जरुरत नहीं है असल ज्ञान का दान हमको इनसे लेना चाहिए ?बाकियो का मुझे पता नहीं ,अब से ,आज से ,लेकिन मैंने आज जो पाया है वो बहुमूल्य है इनको सहानुभूति नहीं चाहिए ,इनको ज्ञान और सम्मान चाहिए ,रोजगार चाहिए ,महीने की तकलीफ से गुजरने वाली इन लड़कियों को आज जैसे ही पेट दर्द का इलाज़ बताया ,जैसे ही माथे के रोज के दर्द का इलाज़ बताया ,उनके चेहरे खिल उठे ? वो हँसी वो ख़ुशी देख के लगा की आज बहुत कुछ पा लिया।
"किसी का दर्द जो मिल सके तो ले उधार जीना इसी का नाम है ",सही मायनो में आज समझ आया। अब कोई कमी की शिकायत नहीं करुँगी आज से ,जो है, जैसा है, जितना है ,बहुत है।
शुक्रिया वात्सल्य एक्यु हीलर से मेरी गुरु प्रतिमा भाभी और गोल्डी भैया का ,जिनके कारण मुझे आज ये अनुभव हुआ। हर रविवार अब हम ने सोच लिया है की कुछ अनोखे तारो से मुलाकात करेंगे।





Wednesday, May 27, 2015

आनंद अनुभूति सेवा लाया बुधवार।

इंसान से दो बोल मीठे बोलने वाला कोई नहीं है ,और सबसे बड़ी बात उसको सुनने वाला भी नहीं है ,फुर्सत ही नहीं किसी के पास की जरा हाल चाल जान ले। ये हम सब के साथ उन विशेष लोगो की भी आप बीती है जो अपराध की दुनिया की सजा काट रहे है ,आज अपने पेशे अलग जब उनसे मिलना हुआ तो ये अनुभव हुआ। कैमरा लेके सेंट्रल जेल बहुत बार गयी। लेकिन तब सिर्फ स्टोरी या न्यूज़  मकसद होता था। आज मकसद कुछ नहीं था बस जाना था और जो खुद सीखा है उससे उनको अवगत करना था। बात यही खत्म हो जानी थी ,लेकिन नहीं ऐसा नहीं है ,जब जेल गए हम ३ लोग प्रतिमा भाभी ,दक्षा मासी ,और वहा  महिला कारागार में उनको एक्सूप्रेसर  की जानकारी दी साथ ही कई बीमारियो से पीड़ित महिलाओ का उपचार पॉइंट्स दबा के किया ,उसका अनुभव अद्भुत रहा। अपराधी बनते नहीं है उनको बना दिया जाता है ,या घोषित कर दिया जाता है ,कुछ नोट की माया से बहार आ जाते है , नोट नहीं वो सज़ायाफ्ता बन जाते है। महिलाओ के साथ उनके छोटे बच्चे जो सजा काट रहे है ,या  बचपन जेल की चार दीवारो के बीच  उनको देख के कई सवाल आये।  आज मेरे दिमाग ने मना  कर दिया की कोई जवाब नहीं खोजना। बस आज सिर्फ सेवा करनीहै। फिर क्या था हम तीनो के पास एक के बाद एक सब अपनी तकलीफो के साथ आने लगी। कुछ महिलाये ऐसे रही की मेरे पॉइंट्स  दवाब से उनको दर्द  तुरंत आराम लगा ,और उन्होंने बहुत दुआये  दी। मन की चंचलता लिए ,कुछ गंभीर सोच  के साथ ,तो कुछ अपने भविष्य की चिंता में दर्दो से दोस्ती किये हुयी है।  आज उनमे कुछ नयी जानकारी जानने की उत्सुकता दिखी। और हम सबने ये तह किया की इनको ये थेरेपी सिखाई जायेगी। मैं सिरिन  आंटी के साथ प्रतिमा भाभी की भी आभारी हूँ जिन्होंने मुझे इस सेवा का मौका दिया। इंसान बुरा नहीं होता परिस्थिति बना देती है। या कह लो हमारे कर्म  है जो हमसे वो सब करवाते है जो भाग्य  है। आज के इस  आनंद  अनुभति को दोस्तों से शेयर किये बिना रहा नहीं गया।  



 daksha masi mahilao ko heal karti



 jailer sahaab ko heal karti pratima bhabhi

Sunday, May 17, 2015

जबलपुर का नाम किया रोशन डॉ यादव ने।

जबलपुर के लिए बहुत गर्व की बात है ,लेकिन मुझे अफ़सोस हुआ इस बात पे की इस तरह की न्यूज़ को आजकल कोई तवाजो नहीं दी जाती  मुझे  जानकारी मिली सोचा कोई छापेगा  या नहीं मुझे इस पर  लिखना है। उस देश की महिला जहा का माहौल इन दिनों बहुत खराब है , वहा  से कोई हमारे यहाँ आता है ,डॉ कमर की बीमारी  से हमारे देश में भी लोग ग्रसित है ,लेकिन उनको विदेश की याद आती है ,और कमर जैसे डॉ   अपने डॉ की खोज को भारत में आके पूरा करते है ,तो क्या हुआ जो जबलपुर आज भी एक छोटा सा गाव  कहा जाने वाला शहर है।  ,डॉ कमर के पति  होशमा 
अफगानिस्तान से आई नेत्र रोग सर्जन डॉ कमर जबलपुर के  मेडिकल अस्पताल   के विश्व  प्रसिद्ध न्यूरो सर्जन  डॉ वाए. आर. यादव से ट्राई जेमिनल न्यूरल्जिया नामक  बीमारी का इलाज़ करने जबलपुर आई है। महिला  डॉ कमर  के पति होशमा ने बताया की डॉ यादव एशिया के एक मात्र न्यूरो सर्जन  है जो दूरबीन पद्दति  से सर्जरी करते है। इस तरह से सर्जरी करने वाले मात्र ३ डॉ है जिसमे एक अमेरिका ,दूसरा जर्मनी और तीसरे भारत से डॉ यादव है। जिसमे विश्व में दूरबीन से सर्जरी सबसे ज्यादा डॉ यादव ने की है। इसलिए अफगानिस्तान से  दिल्ली  और फिर जबलपुर मेडिकल अस्पताल आये है। 

क्या है ट्राई जेमिनल न्यूरल्जिया  ?
 डॉ यादव के अनुसार ये एक ऐसे बीमारी है जिसमे दिमाग की नस का कनेक्शन रक्त की नस से हो जाता है इसमें मरीज़ को बोलने ,खाने पीने में ,और चेहरे को छूने  से भी बिजली के करंट जैसा दर्द  होता है। दर्द इतना तेज होता है की बात  मुश्किल हो जाता है। इसका ऑपरेशन दो तरह से होता है ,एक माइक्रोस्कोप से दूजा दूरबीन से 

कैसे मिली जानकारी ?
डॉ कमर को जर्मनी की  एक मैगज़ीन में छपे लेख से डॉ यादव की जानकारी मिली ,और वो अपने इलाज़ के लिए ,इंटरनेट से जानकारी लेके जबलपुर आई।   

जबलपुर मेडिकल अस्पताल के लिए ये एक गौरव की बात है ,साथ ही भारत  के  लिए भी। इस तरह की बीमारी सलमान भाई को भी है ,साथ ही आशा राम को भी। 

Friday, May 8, 2015

चाँद तेरे रूप अनेक।

इस हफ्ते दो खड्डे के चाँद लिए दोस्तों से पाला  पड़ा। एक का चाँद इतना अस्थिर है की आगे बढ़ने नहीं दे रहा ,एक का चाँद  ग्रहण योग में होने से वो उसका शिकार हुयी पड़ी है। इन दोनों के मामलो में जो ख़ास बात है वो है बेखुदी खुद से ,दोस्तों से ,अपनी ज़िन्दगी से। इनके लिए अपनी लिमिट से बहार तक गयी लेकिन नतीजा ०/० ही रहा। समझ ये आया की चाँद की  ये दशा  लिए वाले ही मेरे पल्ले क्यों पड़ते है।  इनको  समझाया की नशे  दूर रहो नहीं माने। नशा केवल शराब का नहीं होता ,कई प्रकार का होता है।  

नशे में सल्लू भी था ,कार चलायी ,उड़ा दिया गरीब को ,लेकिन उसके पास उसका  तोड़ था पैसा । जो मेरे दोस्तों के पास नहीं है ,उनको यही समझाया की इसके बिना दावे अधूरे है। आज भाईजान रिहा हो गया क्युकी उसको लोगो ने दिया है ,लोगो ने उसपे दाव लगाया है ,न सिर्फ फिल्म उद्योग ,बल्कि सरकार ने भी सजा न दिलवाके अपने आने वाले चुनाव में एक वोट बैंक को सेफ किया है ,ये बात वो गरीब या वो आदमी नहीं समझेगा जो आज खुश है की सितारा जेल जाने से  बच गया। कल से कोर्ट २ महीने की छुट्टी पे है ,उसके पहले जिस तरह से ताबड़तोड़  तरीके से कार को सडको में भगा के बहन और भाई ने सजा को रुकवाया है ,वो कबीले तारीफ़ है लेकिन आने वाले समय में उनको इसकी भरपाई उन लोगो के लिए करनी होगी जो इन दिनों कोर्ट आये , घर आये  फिर वो मीडिया हो या कोई और। 

मेरी दोस्तों को कोर्ट में अपील करने है लेकिन वकील उनको गुमराह कर रहा है ,उनको मालूम है की छुट्टिया पड़  जायेगी ,इसमें आराम बनता है ना की  दिमाग  की मत्था पची। कहने को दोनों पढ़ी लिखी है ,लेकिन दिमाग स्थिर नहीं है ,जो काम के लिए  मना  किया वही किया। अब उनकी किस्मत सल्लू टाइप नहीं है की उनको राहत  मिले 
बाकी दिमाग पे चाँद का हावी होना वो भी नीच के चाँद का और गड्ढे के चाँद का बहुत सारी  बातो को पलटने की ताकत रखता है। 
तीनो मामलो में एक बात कॉमन है वो है शराब। तो चाँद की इन दशा वाले लोगो को नशा लिमिट में करना चाहिए। शराब हमेशा अपने के साथ ,या फिर जिसपे पूरा भरोसा हो उसके साथ पीनी चाहिए ,जो आपको संभाल सके। अगर ऐसा कोई न हो तो अकेले में पीयो लेकिन सिर्फ इतनी की दूसरे दिन खुद उठ सको निम्बू पानी के लिए। बाकी शराब पीने के बाद इंसान को होश नहीं रहता की वो क्या कर रहा है। या उसके  साथ  क्या हुआ ?

बाकी शौकीन तो ऐसे  भी है जो बोतल खाली करके मस्त ड्राइविंग भी करते है। इसलिए चाँद की सौम्यता जितनी अच्छी है उसकी असल दशा बचपन से लेकर प्रौढ़  तक की ज़िन्दगी को उलट पलट कर देती है। 


अर्जित ज्ञान चाँद जैसा दिखता  है वैसा है नहीं। बाकी दिल दिमाग को हिला देने की जबरदस्त शक्ति है इसमें। 
सुनो चाँद तुम ज़मीन पे आओ बैठेंगे बाते करेंगे। 

Wednesday, April 29, 2015

खतरनाक है औरत।


आज तक सिर्फ लड़की होने के अहसास को जिया था ,उस लड़की को जिसको बचपन से न जाने कितने सारे नियम कानून की पढ़ाई उसकी माँ देती है,आते जाते रिस्तेदार भी दे जाते मनो अपना फ़र्ज़ निभा दिया। उसके बाद स्कूल कॉलेज के संगी साथियो के बीच एक नयी ज़िन्दगी जीने का मौका मिलता है ,उसके बाद जब किसी लड़के की संगत मिलती है तब उसके दिमाग के हिसाब से लड़की खुद को ढालती है ,फिर उसके परिवार के हिसाब से ,फिर जब बच्चे हुए तब उनके हिसाब से ,वो बड़े हुए तब ज़िन्दगी का एक दौर ऐसा आता है जब लगता है की खुद के लिए सोचे लेकिन तब कोई बीमारी आ जकड़ती है ,और फिर एक दिन ये लड़की की इह लीला  खत्म हो जाती है।
लेकिन ऐसा है नहीं ,ये लडकिया ही असल में सब झंझटो की जड़ है ,मैं  लड़की हु ,और बोल रही हु ,की हाँ हम लडकिया बहुत खतरनाक है ,दिक्कत ये है की हम खुद को आज तक जान ही नहीं पाये। हमे जिसने जिस रूप में ढाला  हम ढल गयी। लडकिया नहीं बल्कि उनका दिमाग जो ,जो की लड़को से ज्यादा तेज है ,लेकिन सिर्फ भावुकता के मसले  में वो अपने को निढाल कर देती है ,सौप देती है खुद को किसी के हवाले ,ये सोचके की वो इन्हे संभालेगा ?भैया क्यों ? क्या तुम कभी ये जाना की की आखिर तुम्हारे लिए क्यों पगलाए फिरते है मर्द ?
इनको इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की औरत की भावनाए क्या है ,क्यों वो एक बार में खुद को समर्पित कर देती है। उनको सिर्फ तुमको निहारने से तुमको उल्ल जलूल  कहने से ,तुमको हर बार पे नीचा  दिखाने  में  मजा आता है ,ये वो मर्द है जो दिन भर जब तक औरत सूचक गालिया न दे दे उनको कॉन्फिडेंस नहीं आता ,लेकिन अगर यही गालिया किसी औरत ने दे दी तो इनकी मर्दानगी को चोट लग जाती है। और ये वो मौका होता है जब हम सब लडकिया औरते घटिया ,औरत  के नाम पे  कलंक , और बेहूदा साबित हो जाती है। यहाँ तक की सारी  घटना ,की जिम्मेदार हम हो जाती है ,और तो और हमको गलत साबित करने के लिए ये मर्द हम औरतो का ही सहारा    लेते है। मतलब बहुत ही सोची समझी चाल के तहत खुद को साबित कर किसी के अपने बने रहो और किसी को बदनाम कर दो। वैसे वो गलत भी नहीं है क्युकी हम औरतो को उनकी लत पड़  चुकी  होती है। उनको ये पता है की किस तरह उनको झंझट से निकलना है ,वो गाली गलोच कर के निकल जाते है ,एक दूसरे पे आरोप लगा के पाक साफ़ ,और  दोबारा जिसको गलत कहा उसके साथ नार्मल भी हो जाते है। ये उनकी बहुत बड़ी खासियत है। जो हम औरतो को नहीं आती ,हमे तो कोई कह भर दे की फलानी ने तेरे बारे में ऐसा कहा  फिर देख लो हमारी पूरी एनर्जी लगा देंगे घर रिश्ते एक हो जाते है ,लेकिन साला तब भी मुह से गलत शब्द नहीं निकलते। अब इसे  हार्ड डिस्क का प्रॉब्लम कहो या सॉफ्ट का ,कुछ नहीं हो सकता।
तो जब कुछ हो ही नहीं सकता तो जैसा है वैसा ही रहे। खतरनाक होना ,कहलाना ,और  असली में खतरनाक बनना बहुत फर्क है ,बाकी लोगो का मुझे नहीं पता लेकिन अब एक बात  समझ आ गयी है मुझे की आप लाख कोशिश कर लो कुत्ते की पूछ की तरह किसी की सोच को ,और औरत के औरतपन को नहीं बदल सकते ,हाँ उसका इस्तमाल अपने हिसाब से कर सकते है। 

२७ अप्रैल से २७ अप्रैल तक का का हिसाब किताब।

एडवोकेट  नेमा  जी ने रिटर्न  फाइल किया और जैसे ही कॉपी के आखिरी पेज पे सिग्नेचर किये,  बोल पड़े आज काफी दिनों के बाद २७ अप्रैल आई है ?मैं सामने बैठी हुयी जवाब में बोल गयी उस दिन भी २७ ही थी ? नेमा  जी ने मुझे देखा उस   दिन ? सेल्स टैक्स की कॉपी के आखिरी पेज  से लेके, मैंने कॉपी के सारे  पेजो को पलटाया और कॉपी के शुरुआत के  ४ क़्वार्टली के उस पेज पे गयी  ., जिसमे पापा ने २००७ का लास्ट रिटर्न  फाइल किया था। फिर नेमा जी बोले आपको याद है आज भी ? उनका बोलना था और आँखों ने भीग के सारी  कहानी बयान कर दी। इस कॉपी का २७ अप्रैल को शुरू होना एक चैप्टर का क्लोज होना था ,और आज जो कॉपी खत्म हुयी वो एक नए चैप्टर की शुरुआत।
२७ अप्रैल २००७ को उस रिटर्न  को पापा ने फाइल किया उसके बाद आज की तारीख  याने २८ अप्रैल २००७ को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा। नेमा जी को जब बात समझ आई तो उदास वो भी हुए और बोल पड़े। "ये होती है लडकिया "पापा की बेटी " उनका इतना कहना था और उस २७ अप्रैल  ने मुझे इन  बीते ९ सालो  की एक एक घटना को जैसे रिवाइंड  करा के दिखा दिया।
आज २९ अप्रैल माँ पापा की सालगिराह थी और आज के ही दिन बिना किसी बीमारी के अचानक पापा का जाना  ,जैसे नीव को हिला गया ,ये भूकम्प का झटका नहीं था लेकिन उससे कई गुना बड़ा ऐसा  नुक्सान देने वाला झटका साबित होगा ये नहीं सोचा था ?भूकम्प एक बार में  या तो सब तबाह कर देता है या कुछ ऐसा बचा जाता है जिसके सहारे ज़िन्दगी शुरू कर कुछ नया हासिल हो  जाता है। इन ९ सालो में मैं बहुत बदल गयी ,अपने आस पास के बदलते चेहरों ,मतलबी लोगो ,रिश्तेदारो ,सब को पहचान करना सिख गयी। किस किस ने मुझे सौम्य स्वाभाव से कठोर में बदल दिया ,आज सोचती हूँ तो यकीन नहीं होता। अपने में  रहने वाली मैं  अब लड़ाका बन चुकी हूँ। और कोई मरे या जिए मेरी बला  से  .,वाली सोच इस कदर भर गयी है की किसी की मौत से भी दुःख नहीं होता।
इस २७ अप्रैल को न सिर्फ यादे रिवाइंड  हुयी बल्कि एक और सबक भी मिला  मेरे अजीज  दोस्त ने सिर्फ इसलिए दोस्ती खत्म करने का बोल दिया क्युकी उसको मेरी कोई    हरकत  बहुत  दुखी कर गयी है ,मुझे अभी तक बात समझ नहीं आई ,आखिर ऐसा क्या हुआ ? अब मैं सोचना भी नहीं चाहती क्युकी मेरे पास इसका समय नहीं है की मैं ये सोच के अपने दोस्त को खो दू ,और न ही ईगो बचा है  जो शायद कभी था भी नहीं ,जिसके लिए मैं अपने उन सालो की दोस्ती और उसके मुझ पर किये अहसान भूल जाऊ। अहसान ये की वो मेरा इकलौता ऐसा दोस्त बना  है जिससे मैं  अपने मन की ऐसे,, वैसे कैसी भी ,कुछ भी कह देती   हूँ ,… ये अलग बात है की वो सुने या अनसुना कर देता है ,ये उसपे है ,लेकिन मैंने खुद से वादा  किया है की दोस्ती नहीं तोड़ूँगी कभी ,मतलब कभी नहीं ,उसको आज़ादी दी है वो जो चाहे करे ,गुस्सा होता है ,डाट देता है ,समझाता है ,लेकिन मन का बच्चा है ,कई बाते उससे सिखने मिली है जिसने मुझे मजबूत बनाया है , कहते है संगत  का असर पड़ता है ,वाकई पड़ा है ,और २७ अप्रैल २०१५ का दिन मुझे याद रहेगा अब दो कारणों से , एक पापा की बेटी का मान मिला दूसरा किसी अपने को खोने का जो डर  था वो अब नहीं रहा। बाकी आज पापा की तिथि है ,माँ घर पे नहीं मायके गयी है ,इसलिए कुछ पल  अपने यादो और उन ९ सालो में क्या पाया क्या खोया का हिसाब किताब करने का मन है ,
खोया जो था वो आज भी साथ है पापा का आशीर्वाद है ,पाया उनकी बदौलत बहुत कुछ ,उन्होंने एक पत्रकार को बिज़नेस वुमन बना दिया ,ये अहसास तब हुआ जब उस कॉपी का आखिरी पन्ना भर रही थी ,इस साल पापा की शॉप का रेनोवेशन भी हुआ , तो पापा की दूकान को नए रूप में लाने का सपना पूरा करने में जुटी हूँ ,इस बीच कई अपनों को समय नहीं दे पा रही हूँ ,कईयों से दुश्मनी फ़ोकट में मौल  ले ली है ,मजा आ रहा है लड़ने में , दिमाग शॉप पे होता है ,और घर आने के बाद कही और  तो सब गडमड हो जाता है ,कईयों से बहस हो जाती है ,इस दुनिया  में हो या आभासी दुनिया में , ये अप्रैल का महीना हर साल कुछ ना कुछ ले जाता है ,या दे जाता है।

इस बार 27  अप्रैल से लेके 30 अप्रैल  तक खुद को सबसे दूर कर लिया है। न किसी से मिलना न कही जाना ,बस सिर्फ खुद के साथ रहना चाहती हूँ ,बाकी छिपने या भागने जैसी हरकत मेरे से ना होगी। बोलना बंद नहीं कर सकती ,लिखना  जारी है ,कही और न  सही खुद के ब्लॉग में सही ,

इस अप्रैल ने मुझे  पापा की बेटी का  मान दिया , साथ ही मेरी पदवी बड़ाई देव की बुआ बनाके , शॉप का काम पूरा हुआ ,दोस्ती में प्यार और हक़ बढ़ा  दिया। तो सुनो अप्रैल तुम्हारा शुक्रिया ,जो दिया जो लिया उन सबके लिए।