Friday, November 14, 2014

यहाँ अस्थिरता का डेरा है ,जो सिर्फ मेरा है मेरा है मेरा है।

कोई क्यों कर बदले ,या न बदले, बदले तो ऐसे या वैसे ,या फिर उस तरह जैसे उस दिन कहा था ,उस दिन वाला याद नहीं तो, आज जो कहा वो पल्लेबांध कर बदलो ,लेकिन बदलो ,सवाल वही है ,की कैसे ?जब बदलने के लिए कुछ होगा तभी न बदलेगा ?दिमाग ,में २४ घंटे साला एक ही धुन बजेगी तो दिमाग कैसे बदलने की सोचेगा ?ये करो वो करो, करो तो कैसे करो ?जो करना है , हमको हीन करना है . तुम बस बोलते जाओ हम सुनते जाए, ये सुनना वहाँ ऐसा करना है ?उसको ऐसा बोला ,इसको वैसा बोला ,दिमाग को जब एक की आदत सी हो जाए तो समझ लो डूबने की आखिरी घड़ी नज़दीक है। दिमाग का सन्नाटा और मन की अस्थिरता को काबू में लाने में समय लगता है। समय ये भी एक कहानी है ,जिसको जरुरत है उसके लिए होता नहीं जहा कोई मोल नहीं वहा अपार है। हम तो जैसे थे ,वैसे ही रहेंगे ,ऐसा सोचा नहीं है ठाना नहीं है। कुछ बंधा हुआ है ,कहा पता नहीं ,क्यों पता नहीं ,उस बंधन से मुक्ति चाहिए नहीं ,चाहिए है जो वो मिलेगा नहीं ,रोके गाके हँसके जो करना है कर लो ,जानते हुए भी चाहिए तो वही ,बस एक वही यही जो चाहिए मन का मीट कह लो या एक सपना हक़ीक़त में बदलनेवाला नहीं कभी नहीं कभी नहीं कभी नहीं। लेकिन उसको पाने के लालसा अब नहीं ,फिर भी एक उम्मीद है कीशायद मिलेगा कभी मुझे वो बस यही यही यही। वह री मन की विडम्बना तू जा कही और कही किसी और के दिल घूम के आ। अभी यहाँ अस्थिरता का डेरा है ,जो सिर्फ मेरा है मेरा है मेरा है।
जो भी आदमी या औरत खुद को हर मामले में डेमोक्रेटिक, लिबरल, एथीस्ट, फेमिनिस्ट, प्रोग्रेसिव वगैरह वगैरह क्लेम कर रहा या रही है उससे उसके घर का हाल पूछ लीजिए। सारी क्रांति धरी की धरी रह जाएगी। 
जो व्यक्ति, लड़कियों को खुद के बनाए खांचे में फिट बैठने वाली प्रगतिशीलता, स्वतंत्रता आदी का घनघोर पक्षधर है उससे बस एक बार उसकी ही पीढ़ी के और उसके अपने रिश्तेदारों का हाल ले लीजिए। ज्यादा कुछ मत कीजिए।
कहने और करने में बहुत फर्क होता है ,इसलिए जो कह रहे है करने की हिम्मत भी करे। कहने वालो का कुछ नहीं जाता करने वाले कमाल करते है। जो कर लिया तो गुरु हो गए। वरना धूनी जमाये अपने तिये पे। 
आज कुछ भी लिखा है की धुन सवार है अकल मिली है थोड़ी सी ,यु तो हम कुछ लिखते नहीं ,बोलते नहीं ,लेकिन जब बोलते है तब मिर्ची लगती है सबको। इस लिए हम एक झटके में नेगेटिव हो जाते है।

Monday, October 27, 2014

ये एक भरम था।

तुम्हारा अनदेखा सा  अनमना सा वो मुट्ठी भर दिल ,
और उसकी वो धक धक करती धड़कन  की आवाज़ ,
आज भी मेरे कानो को ,उस पल  का अहसास कराती है ,
इसको सुनने की प्रबल इक्शा शक्ति  ने मुझे ,
अनहोने मोह की आंच में तापा दिया।
उस कमरे की सनसनाहट  और तुम्हारे बकबक की आवाज़ ,
बहार का  मौसम ,अजीब सी निडरता ,और साहस का वो अहसास ,
मुझे कही भी ले  जा सकता था ,तुम भी बंधे थे ,अधमने से ,
उस पल में बंद मेरी आँखे ,तुम्हारी खुली आँखों से उस याद को जी रही थी ,
जो तुम्हारे दिल और दिमाग को दबोचे हुए थी ,पागल थी में ,उस पल को जीना चाहती थी ,
दिल की दो धड़कनो के बीच कोई एक जगह थी ,जहा कोई पागल नहीं होता ,
मेरा पागल दिल कुछ  सोचना ही नहीं चाह रहा था ,वो सिर्फ कमरे की  दीवाल ,
को निहार रहा था ,एक टक टकटक ,बोल अलग थे ,दिल कुछ और बोल रहा था ,
कंधे के नीचे माथा टेकी मासूम ,पागल  सी वो लड़की उसको रुक रुक के देखती ,
उसका गठा   बदन जिसमे कोई रवानी नहीं थी ,जो था वो दिल और दिमाग में चल रही कश्मकश।
वो कब दबे पाँव इसके दिल में घर कर गया पगली  को पता नहीं चला ,
उस दिन उन अधूरी सी धड़कनो को सुनके उसको लगा की वो उसके लिए नहीं धड़क रहा  है।
वो होले  से उठी ,और उसको अधूरे आलिंगन की बजाये पूरा भींच लिया।
उसने कुछ बहुत ही धीरे से निडरता से कुछ कहा जैसे वो सुन ही न रहा हो।
उसने सुन लिया था ,और आगे बाहो को जकड़ते हुए उस सुकून को जताया जिसको
दोनों ने अनमने ,शायद किसी एक ने महसूस किया,मानो  दोनों के लिए ये एक भरम था। 

Saturday, October 11, 2014

तुम ...और तुम्हारा प्रेम ...



गिराए हुए पर्दो के बीच से झांकना
उठाए हुए दंभ की दीवार लांघना
शक की सिलवटें पोंछ आना
विश्वास की चादर ओढ़ आना

कभी..जब भर जाए मन
तुम्हारे गढ़े कठोर दायरों से
तो उसके पार आना तुम....

फिर
कहीं...
किसी मोड़ पर मिलना मुझसे
जब ढली हो शाम
महक रही हो रात
तारे टिमटिमा रहे हों
पसर रहा हो सन्नाटा...
अपने गुस्से को चकमा देकर
छिपते-छिपाते चले आना तुम
उन लम्हों के मंज़र पर
जहां बनाकर अधूरा छोड़ आए थे
खूबसूरत अहसासों का घरौंदा...
जहां से हमने शुरू किया था
अद्भुत अध्याय को गढ़ना....

और...
तब बुलाना मुझे
यथार्थ के उस जज़ीरे पर
जहां मेरा ख्वा ब मसल गए थे तुम....

मालूम है तुम्हें
तब से अब तक
न जाने कितने मौसम गुज़र गए
हम जले भी... सूखे भी... बिखरे भी
किन्तु
प्रतीक्षा के इस विशाल सागर में
आशाओं को भिगोए रखा

आना तुम जब एकांकी
मेरे लिए विलाप करने लगे
और
तब छूना मेरी धड़कनों को
अपनी मौजूदगी की शिनाख्त के लिए
उसमें मच रहे शोर से
जान जाओगे तुम....
कि मेरे लिए सदा से ही
कितना अनमोल रहा है
तुम... और तुम्हारा प्रेम !!

Wednesday, October 1, 2014

मेरी टीस

मुझे पता है वो तुम हो ही नहीं ,तुम जो हो वो मुझसे बेहतर कोई जानता नहीं ,
पर वो  शब्‍द ,जिसने मुझे सर से लेकर पाँव के खुर तक निचोड़ डाला। 
उसकी गंध ,उसकी तीखी धार ने अंदर तक भिगो दिया इस बार ,
विश्वास था की कुछ है ,जो अब भी है ,और रहेगा ,छुपा दिया है ,
उस... है, ..को कही अब मैंने ,अपने अंदर ,सपने की चादर के साथ ,
दुबक के किसी कोने में अब वो ,जो तुम ने मुझे दिया संवाद स्वरुप ,
वो वही पलेगा ,लेकिन बढ़ेगा नहीं ,उसकी नियति नहीं है बढ़ना ,
एक खाली जगह थी ,जिसे  भरा हुआ समझने की ग़लतफ़हमी में ,
अब मन, दिल जो चाहो कहो सब भीग चूका है ,
इस कदर की डूबने से पहले तैरना जरुरी हो गया है। 
झुकने की आदत ने मुझसे मेरी पहचान ले ली ,
रीढ़ की हड्डी अभी इतनी भी कमजोर नहीं हुयी,
ज़हर की पोटली पहले भी अंदर भरी थी ,आज भी है और मरते दम  तक रहेगी। 
तुम नीलकंठ नहीं बन सकते ,कोई बात नहीं ,समंदर का ज़हर पीना हर किसी के बस का नहीं। 


Monday, August 25, 2014

ओह रे बंधू..

ओह रे बंधू........................
तुमसे प्यार करना न तो मेरी मज़बूरी है ,
न ही मेरे ख्वाईश ,ये मेरी किस्मत है। 
ये प्यार कमबख्त अहसास ही कुछ ऐसा है ,
जो न चाहते हुए जकड़ता है पकड़ता है। 
इसे रोकना चाहा ,चाहकर भी नहीं रोका ,
इसमें डूबने का आनंद मुझे रास आया। 
ये रास अब आनंद बन गया है ,
ये जानते हुए की तू सिर्फ मेरा नहीं। 
तुझे चाहना मेरे फितरत बन चुकी है ,
दिन हो या रात ,या कोई और पल ,
दिमाग की कोशिकाओ में तेरे होने का ,
नशा कुछ ऐसे रेंगता है ,जैसे मेरे जिस्म में रक्तवाहिनियां। 
प्रयास जारी है ,इसे रोकू इसे थामु ,
पर ये थमता ही नहीं ,उम्र के साथ बढ़ते यौवन ,
यौवन की उन जटिलताओं को ढोते हुए ,
आज आखिर दिमाग ने कह दिया ,अब बस। 
सिर्फ और सिर्फ तुम्हे अताह प्यार करना , 
मेरी ज़िन्दगी है!!!!!!!!

Saturday, August 23, 2014

शादी प्यार या समझोता ? भाग १

ज़िन्दगी के १८ साल एक ऐसे इंसान के साथ रहके गुज़ारे जिसको नैना ने बहुत प्याररिश्ता  तोड़ लिया। नैना अपनी एक शौक  को पूरा करने के खातिर उस समय आशीष के साथ भागी, जब उसके घर वाले उसको भोपाल ले जा रहे थे ,किसी करीबी मित्र के बेटे से पापा ने नैना की शादी की बात चलायी थी ,बात पक्की हो गयी थी , नैना बेखबर थी ,जब उसको पता चला तो उसने आशीष को कहा की शादी करोगे मुझसे ?आशीष इससे पहले उसको अपना निवेदन कर चूका था ,तब नैना ने भाव नहीं दिया था। आज जब शादी की बात निकली ,नैना से रहा नहीं गया , आशीष को बुलाया ,शाम को भोपाल में सगाई की तैयारी में परिवार बिजी था ,नैना पार्लर जाने के नाम से निकली ,और आशीष के साथ बहुत दूर निकल गयी। 
आशीष आज जब घर आया तब उसने नैना की सहेलियों से बात नहीं की ,जो की उसके घर उससे मिलने १८ साल बाद आई थी ,सहेलियों को ड्राइंग रूम में छोड़ नैना किचन में गयी ,आशीष को खाना दिया ,इस दौरान दोनों ने शायद ही कोई बात की होगी ,जो घर पहले नैना की खिलखिलाहट से गूँज रहा था ,वहाँ मरघट सा सन्नाटा छा गया था। वो आया खाना खाया और निकल गया। इस खिलखिलाहट को सन्नाटे में बदलते हुए जब मैंने देखा तो दिमाग हिल गया था। लाज़मी था। ख़ास कर मुझ जैसे के लिए ,जिसके लिए प्यार और शादी के मायने ही अलग है। खासकर जब कोई कहे की लव मैरिज है। आज न मुझे लव  कही समझ आया , न ही कही मैरिज ?

Wednesday, July 30, 2014

सेठजी ,मेरे नज़र से।

सेठजी ,
जी हाँ, मै  बात कर  रही हु ,  शोभा डे की कहानी की ,वैसे तो मुझे इस तरह की किताबो को पढ्ने का   मौका नहीं मिला ,लेकिन जब ये किताब का मुख्य पृष्ट्य देखा तो लगा पता नहीं ,पॉलिटिक्स की कहानी है,और इन दिनों राजनीति  में बड़ा मज़ा आ रहा है ,तो किताब पढ़ने  की हिम्मत करी ,वरना में बहुत मूडी हु ,कहो साल लगा दू ,या एक दिन ,या एक हफ्ता या कुछ महीने ,किताब पढ़ने में। सेठजी की कहानी जिस जगह  से शुरू होती है ,उसको पढ़के  लगा बकवास कहानी होगी ,फ़ालतू की राजनीती ,लेकिन सेठजी की बहु का किरदार बहुत ही अच्छे से गढ़ा  गया है,मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं की इस किताब को मैंने शायद उस बहु ,बीबी ,बेटी ,और प्रेमिका के साथ एक अधूरी औरत के लिए ही पढ़ा। और दो दिन में आश्चर्य जनक तरीके से पूरा पढ़ डाला ,जो मेरे लिए भी  यकीन करने वाली बात नहीं है ,दिमाग इस कद्र  सोच में पड़ गया है ,की इस तरह की कहानी शोभा जैसी महिला ने लिखी ,और क्या सोच के लिखा होगा ?
राजनीती के हिसाब से देखा जाए जो कहानी में सेठजी के बेटे सूरज द्वारा पहाड़ी लड़की का बलात्कार और उसको छुपाने की जदोजहद में ,सेठजी का अपनी बहु को इस्तेमाल करना ,करवाना ,और करता हुआ देखना ,जहा अजीब है ,वही उस औरत की अपनी कहानी ,जहा वो बेटी थी ,फिर बहु बनी ,एक ऐसे ससुर की बहु जिसके लिए मरते दम  तक सिर्फ उसका शरीर जरूरी था ,उसकी भावनाओ ,और समर्पण की कोई कदर नहीं। 
पति भी बहु अमृता को ऐसा मिला ,जिसने उससे उसके सुखो से कोशों दूर रखा ,पति नहीं बन पाया ,बहु के शरीर का भोग ससुर ने किया ,बेटो को पता था लेकिन सब चुप ,किसी की सेठजी के आगे नहीं चलती थी  ,राजनीती के गुण अमृता ने साथ रह के जो सीखे ,वो बेटे नहीं सिख पाये। राजनीती में साथियो ,के साथ दुश्मनो का भी मान पान होता है ,फिर उसके लिए चाहे किसी भी हद तक क्यों न जाना पड़े। सेठजी का अमृता को अरुण के पास बेजना ,फिर उसके पूर्व प्रेमी के साथ,,सूरज को बचाने के लिए छोड़ देना , अकेले सारा इंतज़ाम करने की अमृता की परिपक्वता ,अगर उसके चरित्र को मजबूती देती है ,तो उस समय उसका आपा खो जाना ,जब प्रेमी उसको जकड़ता है ,बिस्तर पे ले जाता है ,और एक बार नहीं दो बार अधूरा छोड़ जाता है ,उसको इतना मजबूर बना देता है ,की वो अफ़सोस भी नहीं कर पाती ,ये जानते हुए की उसके आस पास के जितने भी मर्द है ,वो सब उससे सिर्फ उसका शरीर चाहते है ,बाकी किसी को अमृता की कोई जरुरत नहीं है ,कई सवाल पैदा करता है ?आखिर क्यों कोई औरत इतनी मजबूर है की वो अपने शरीर का सुख खुद अपनी मर्ज़ी से  नहीं भोग सकती?  
इस पूरी किताब में शोभा ने बहुत ही नायाब तरीके से औरत को रंडी ,और कुतिया जैसे श्ब्दों से नवाज़ा है ,घर की लक्ष्मी कहे जाने वाली बहु को ससुर ,देवर बहार के लोग बड़े ही आराम से गालिया देते है ,और अमृता सुनती है ?हाई प्रोफाइल मुंबई में जिस भाऊ  का चरित्र शोभा ने बताया है ,वो बाला साहेब जैसा लगता है। उनके बेटो का किरदार भी। 
अमृता का हमबिस्तर होना ,फिर वो ससुर के साथ हो ,या प्रेमी  के साथ ,या मीडिया के ऑफिस में एंकर का एक नज़र में उसका शरीर नाप लेना। और अपना कार्ड देना ,कही न कही समाज की उस बातो की तरफ सीधा इशारा है ,की औरत तुम अपने कामो से कम बल्कि तुम्हारी शरीर की बनावट ,कसावट ,और उत्तेजना से  ज्यादा पहचानी जाओगी। 
शोभा  की एक बात अच्छी लगी ,की सेठजी के बहाने उन्होंने उस दुनिया की असली तस्वीर लोगो के सामने लायी ,जो बहुत छुपी हुयी है ,या जिसे  लोग जानते है ,लेकिन कहने से डरते है ,या शरमाते है ,और जब एक कमरे के भीतर दो जिस्म के मिलने या  रगड़न की भाषा कोई औरत कहती है ,तो लोग उस भाषा को एक झटके से नकार देते है ,उनके हिसाब से बहुत ही वाहियात कहानी का लेखन किया जाना ,यु कह दिया जाता है ,जैसे कोई बात या कोई खाने का कौर गले में अटग गया है। 
मैंने जो सोच के कहानी पढ़ी थी ,उसमे मुझे उतना मजा नहीं आया ,राजनीती की तिकड़म होगी कुछ कूटनीति। 
ये पूरी कहानी अमृता के शरीर की कहानी थी ,उसका आज़ाद पहनावा ,जिसमे ब्रा की बंदिश नहीं थी ,उसका सुडोल जिस्म जिसको हर भूखी नज़र कैद कर लेना चाहती है ,और कहानी का अंत ,अमृता का पूरा जीवन उसके शरीर के अहसानो तले कही खो गया ,दब गया मर गया.
शोभा को कहानी के लिए मैं शायद 5  में से  2 दू। लेकिन उनकी बेबाक ,गालियो ,औरत की मनोदशा,कल्पनायें ,खुद से प्यार ,अपनी इक्षाओ की मांग  का चित्रण करने के लिए ,पूरे 4 दूंगी।  
मैंने ये पहली फिक्शन पढ़ी है ,हो सकता है की  , इस तरह की खुली बाते 
आपको असहज लगे ,मुझे भी पहले पहल लगी ,लेकिन सोचने के बाद ऐसा लगा की आज हम सब जिस माहौल में रह रहे है वहाँ  इसे  हर किसी को पढ़ना चाहिए। खासकर महिलाओ को ,जिन्हे आज भी अपनी मर्ज़ी ,अपने शरीर की इम्पोर्टेंस नहीं पता। यहाँ तक उनको खुद की पसंद को कबूल करने में भी हीच कि चाहट होती है। औरत वाकई एक मर्तबान की तरह होती है ,जिससे जैसे चाहो वैसे उपयोग में लाओ ,ये बात अलग है की जब घर में मेहमान आये ,तब उनको उन बर्तनो ,मर्तबानो की तरह सजाया जाता है ,जैसे आज ही बड़े सलीके से उस अलमारी से निकला है ,जहा बरसो से उससे सजा के रख दिया जाता हो नाजुक मर्तबान। और फिर कुछ मर्तबान आये दिन की आजमाइश के साथ इतने रगड़ जाते है की उसको भी आदत हो जाती है ,मालूम है यही खाना इसमें बनेगा ,आज कुछ उबाला जाना है ,या आज कुछ में सिर्फ छौक लगेगा। 
मर्तबान की तरह इस कहानी में भी अमृता को सब ने यूज़  किया ,लेकिन उसे  अब सेठजी की आदत हो गयी थी। और आखिर कार सब कुछ मिलने के बाद दिल्ली का सपना जब पूरा हो रहा हो ,तब ये शरीर क्या है ,न पहले कुछ था ,न अब कुछ है। 

कहानी में सेठजी ही थे जिसने उसके शरीर को शायद चाहा था ,ये बात अलग थी की अमृता के लिए वो कभी चाहत या पसंद नहीं रहे ,सिर्फ एक सामान या जरिया  की तरह  ,मर्तबान  की तरह उसको भी अब ससुर की  आदत हो गयी थी।  
नारीवादियों को एक बार इससे पढ़ना चाहिए ,मुझे अचम्बा है की इस पे किसी ने कुछ कहा क्यों नहीं। जबकि इस तरह की कहानी में एक औरत को किस तरह मजबूर दिखाया है। 
या यु कहु की उस दुनिया की हकीकत यही है। इसलिए सब मौन है। दो तीन मर्दो ने इससे बेकार कह दिया ,तो किसी ने पढ़ा ही नहीं। 
पॉलिटिक्स के लिए नहीं तो महिलाओ को उस महिला की उस खुली सोच के लिए एक बार पढ़ना  चाहिए। 



Thursday, July 10, 2014

ग़ालियो का समाज शास्त्र।

किसी महिला के लिए दूसरी महिला को बिच कह देना कितना आसान है।यह एक शब्‍द पूरी पुरुष बिरादरी को हिंसक बलात्‍कारी और स्‍त्री को पीड़ित बना देता है। फिर स्‍त्री इस काले दाग के साथ पुरुष हिंसा के खिलाफ कितनी दृढ़ता से लड़ पाती होगी।क्‍योंकि यह बिच शब्‍द तो औरतों को बांट देता है। मोहल्‍ले की कुतिया सबकी होती हैकोई भी कुत्‍ता अपनी धाक जमाकर उसके साथ मैथुन कर सकता है। यानी वह रंडी बन जाती है।तो अगर औरत दूसरी औरत के लिए रंडी है तो वह रेप पर इतना हाय हाय क्‍यों करती है। यू बिच। एक औरत दूसरी से जुदा तो हो ही गई।एकता की कड़ी टूट गई।एक औरत को बड़ा ओहदा मिलता है। बॉस उसकी तारीफ करता है तो वह बिच बन जाती है।यहां बात अलग है। औरत कुतिया बनने पर बाकी औरतों से अलग हो जाती है।यानी हाशिए पर चली जाती है।पर आदमी कुत्‍ता बनकर गर्व महसूस करता है।अगर एक औरत आधुनिक कपड़ों में फोटो खिंचवाकर डाल दे और मर्द उसकी तरफ दोस्‍ती का हाथ बढ़ाए तो पत्‍नी फौरन बोलेगी, कौन है वह कुतिया ?अब अगर पति उस औरत से सैक्‍स करे तो पत्‍नी बोलेगी कि मेरा पति कुत्‍ता है। किसी के भी साथ सो जाता है।उधर वह औरत सोचेगी कि इसकी पत्‍नी तो ऐसी कुतिया है कि इसका पति मेरे पास चला आया सोने।औरत और औरत के बीच भेदकारी शब्‍द है बिच यानी कुतिया।यह औरतों को बांट देती है।औरतों की कथित एकजुटता की पोल खोल देती है।कल तक बहन, भाभी और सखी कहलाने वाली औरत एक झटके में कुतिया बन जाती है।और यह ओहदा देने वाली औरत ही है।किसी भी स्‍त्री की गरिमा को पूरी तरह से नष्‍ट करना हो तो कह दो उसे कुतिया।
यही तो है गालियों का समाजशास्‍त्र...
....दुनिया की हर गाली के केंद्र में है औरत... बास्‍टर्ड यानी हरामी। यह गाली महिलाएं पुरुषों को देती है। बड़े शान से।पर असल में वो खुद को गाली देती हैं, क्‍योंकि अगर पुरुष हराम का जना है, यानी नाजायज है तो उसे जन्‍म देने वाली औरत भी तो कलंकित हुई।इसी तरह मदर फकर भी स्‍त्री को ही संबोधित है।किसी भी समाज की पहचान खत्‍म कर उसे गुलाम बनाना है तो पहले स्‍त्री के वजूद को मिटाया जाता है।उसे कुतिया बनाया जाता है।ताकि समाज में कुत्‍ते ही पैदा हों।अमेरिका ने थाईलैंड में, कोरिया में, जापान और जर्मनी में यही किया।जब समाज में कुत्‍ते यानी दूसरी नस्‍ल के इंसान पैदा होंगे तो उन्‍हें अपनी पहचान, अपनी संस्‍कृति, अपने देश पर गर्व नहीं होगा।वे वैचारिक रूप से दूसरों के नस्‍ली गुलाम बन जाएंगे।असल में गाली देने वाला हमारा समाज इसी दिशा की ओर जा रहा है।मीडिया में गाली देना आम बात हैं। बॉस हो या रिपोर्टर बिना ग़ाली दिए कोइ एक अच्छा पत्रकार नहीं बन सकता। ऐसा मैंने सुना था ,देखा ,उस समय गालियो के इस समाजशास्त्र का ज्ञान नहीं था। ऑफिस में सुन लेती थी किसी क़ो गाली देतें तो उससे डाट समझ की हलके मे लें लेतीं।आज कुछ पढ़ा तो वही सवाल दिमाग में कौंध गए। आखिर क्यों ,आता है मजा ?फेसबुक के एक मित्र की वाल पे इसे पढ़ा।
आज संसद परिसर में एक मजेदार वाकया हुआ, दो बड़े अंग्रेजी चैनलों की महिला रिपोर्टर आपस में एक बाईट के मुद्दे पर लड़ पड़ीं। मुंह सिकोड़कर वो एक दूसरे को 'बिच' (जानने वाले लोग हिन्दी अनुवाद करे लें) कह रही थीं। हमको गांव याद आ गया, गांव की गालियों का भी समाजशास्त्र होता है।---- Mukesh Kaushik, की इस पोस्ट को पढ़के रहा नहीं गया। और लिख डाला।                     आजतक ये लगता था की ये पुरुष गालिया कितनी सहजता से देते है ,छोटी छोटी बात पे ,जिससे अगर मैं  देना भी चाहू तो मुह से नहीं निकलती। कुछ लड़कियों को देते हुए देखा ,तब लगा शायद जरूरी है ,अब लड़कियों को भी देना चाहिए ,लेकिन आज अपने मन की ये बात जब एक मित्र से जाननी चाही ,तो जो बात सामने आई ,वो जानके शर्म नहीं ,बल्कि लगा की मैं  भी उन औरतो की जमात का हिस्सा हु ,जिसके मुह से बिच सुनके मर्दो को मजा आया। और बात भी बनी  होगी। या यु भी तो वो लोग बोलते होंगे। लेकिन जब औरत ही औरत को हासिये पे ले जाने का काम कर रही हो  तो   किसे ?क्या ?कहा जाए ? गालिया देने का अलग ही आनंद है ,तुम नहीं समझोगी ?क्यों भला ?अरे तुमने कभी दी नहीं ना।  आज सुबह सुबह का वाक़या है ,पडोसी के यहाँ जवान बेटे को बाप ने घर की बुजूर्ग ओर ,अपनी माँ के साथ बीबी के सामने इतनि गालिया दीं ,मैं  दंग रह गयी। मारता जा रहा था वो बेटे को ओर गालिया थीं  कई बन्द ही नही हो रही थी ,किसी ने उसे  रोका भी नहीं। जवान लड़की है घर में ,शायद ये औरत और लड़की मुझे ही समझ आये क्यूँकि मैंने गालियों का समाजशास्त्र कॉल समझा था। तभी सोच लिया था की हो सकता है लोगो को इनका शास्त्र नही पता ,या शायद महिलाओ को जो बडे ही सुन्दर और धैर्य से इससे सुनती भी है ,और अब उनको देने में भी अब कोई हिचक नहीं होती। शाम होते होते मोबाइल मे एक विडिओ आ  गया। जिसमे लड़की गालिया इसलिए दें रही हैं क्यूँकि उससे टीवी की किसी शो मे जाना  है। आजकल ये फैशन और स्टैण्डर्ड की बात हो गयी है। लेकिन मुझे ऐसे समाज की कोइ दरकार नही जंहा  इतनी  बुरी तरह से हासिये पे लें  जानें के काम अपनी ही ज़मात के लाग करती हैं। ये वो सब दोगले इंसान ही हैं ,जो मतलबपरस्त है समय के हिसाब से अपने अंदर का उबाल निकालनी की लिए इन गालियों क़ो साहारा  लेतें हैँ। मैं चाहती तो सभी श्ब्दों   अर्थ  लिखती ,लेकिन लिखते नहीं बना। इसलिए एक के जरिये कोशिश की है क़ि औरतो को ए बात समझ ऑ जाएं। और मर्दो को भी जिन्हे बहुत मज़ा आता है।     
https://www.youtube.com/watch?v=NtvIQQ3alW8 
ये वो लिंक है जिसमे लड़की ने बरसात की गलियो क़ी। 

Sunday, July 6, 2014

पति चाहिए कि कुत्‍ता ?

आजकल ज्‍यादातर कामकाजी लड़कियों को स्‍त्रैण गुण वाला पति चाहिए, जो स्‍त्री की भावनाओं को समझे। सही है। पति को पत्‍नी के हर सुख दुख को समझना चाहिए, उसके व्‍यवहार के हर छोटे बड़े पहलू को जानना चाहिए। लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि स्‍त्री में भी पुरुष के गुण होने चाहिए।उसे भी पता होना चाहिए कि पति किस बात पर खुश होता है और किस बात पर नाराज। पति को भी बीमार होने पर, दुख में एक साथी की जरूरत पड़ती है। उसे भी अकेलापन महसूस हो सकता है। आंसू उसे भी आ सकते हैं, फिर भला उसकी आत्‍मा में कितना भी बल हो।जो हृदयवान होगा, वो जाहिर है अपनी बात सोच-समझकर कहेगा। लेकिन वह यह भी उम्‍मीद करेगा कि उसकी साथी भी सोच समझकर अपनी बात कहे। अगर नहीं कही गई तो उसके दिल को इस कदर ठेस लगेगी कि वह खुदकुशी भी कर सकता है।अगर पत्‍नी यह चाहती है कि उसके पति को पीरियड की तारीख पता हो या पत्‍नी के हिलने डुलने भर से यह समझे कि उसे बाथरूम जाना है तो पति भी अपनी पत्‍नी से एक छोटी सी उम्‍मीद कर ही सकता है कि किसी दिन दफ्तर से देरी से आने की बात को पत्‍नी समझे और जल्‍द घर आ जाए। उसके अकेलेपन को बांट ले। पत्‍नी को भी पता होना चाहिए कि उसका पति छुट्टी के दिन क्‍या प्‍लान कर रहा है और इसमें उसे कितनी मदद करनी चाहिए। लड़कियों को दुनिया का सबसे वफादार कुत्‍ता चाहिए।उसके कान इतने तेज होते हैं कि उसके हिलने डुलने भर से समझ जाएगा कि मैडम को कहीं जाना है।बीमार होने पर वह उसके पास ही बैठा रहेगा हां, हृदयवान और विचारवान नहीं मिलेगा, पर वह मालकिन को समझेगा और फिर भी इतना तो चाहेगा ही कि मालकिन भी उसे समझे।सिर्फ दो वक्‍त का खाना और दो वक्‍त वॉक पर ले जाने की जिम्‍मेदारी ही न निभाए।पति और पत्‍नी दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं। हम कुंडली में 32 गुण मिलाते हैं। यह गुण जातक की राशि के अनुसार होते हैं।उम्र के विभिन्‍न पड़ाव पर लड़का और लड़की के गुण कितने बदल गए, वो तो पंडित का बाप भी नहीं समझ सकता।असल बात नजरिए की है।हम औरत को किस नजरिए से देखते हैं। औरत पत्‍नी, मां, बहन, साथी कोई भी हो सकती है।अगर हम औरत को दासी के नजरिए से देखते हैं तो पति को एक नौकरानी, गुलाम, दासी चाहिए।लेकिन पति और पत्‍नी दोनों एक दूसरे को एक दूसरे के पूरक के रूप में देखें तो मदद का एक हाथ हमेशा खड़ा मिलेगा।और यह बिना कहे ही होता है। मिसाल के लिए अगर पत्‍नी देर से सोकर उठी है, पेट में दर्द या कमर में दर्द, सिर में भारीपन की शिकायत कर रही है तो पति को कहना चाहिए कि तुम आराम करो, मैं कुछ काम निपटा देता हूं।पति को समझना चाहिए कि पत्‍नी को पीरियड आने वाला है या आ चुका है।इसी तरह अगर पति घर पर देर रात तक काम करे या ऑफिस के काम में उलझा हो तो पत्‍नी को भी उसका सहारा बनना चाहिए।पत्‍नी को बुखार होने पर पति को छुट्टी लेनी चाहिए। इसलिए नहीं कि वह उसका हाथ पकड़े रहे, बल्‍कि इसलिए कि पत्‍नी को किसी भी चीज की जरूरत पड़ने पर पति उसके पास हो।पति-पत्‍नी का रिश्‍ता कठपुतली के उन दो धागों से बंधा होता है, जिनमें से किसी के भी खिंचने पर दर्द का आभास हो और दोनों मिलकर उस असंतुलन को संतुलित करें। लोग ऐसे वफ़ा नहीं करते। वे वफ़ा चाहते हैं। आप उनके साथ वफ़ा नहीं करेंगे तो वे भी वक्‍त आने पर बेवफाई में उतर आएंगे।ठीक वैसे ही जैसे बच्‍चे कभी गुनाह नहीं करते। परिवार, समाज उन्‍हें गुनाह का सबक सिखाते है। अगर उन्‍हें वो मासूमियत, वह बचपन नहीं मिलेगा तो वे गुनाह करेंगे ही। इसमें दोष उनका नहीं, हमारा है।असल में हम एरोगेंट हो गए हैं। हमें लगता है कि हम ही सही हैं। दूसरे का पक्ष हम सुनना ही नहीं चाहते। सड़क पर चलने वाले कार वाले की हमेशा यही चाहत रहती है कि उसके सामने की पूरी सड़क खाली हो।आधुनिक नारीवाद इसी का दूसरा रूप है, जो अतिश्‍योक्‍ति और अपवादों से भरा है। माना कि हम जैसी औरतें वर्षों से पुरुषप्रधान समाज के दमन को झेल रही हैं।लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि इन बेड़ियों से आजाद हुईं तमाम महिलाएं पुरुषों को गुलामी के चश्‍मे से देखने लगें।केवल बदलाव ही काफी नहीं होता। बदलाव के साथ व्‍यवस्‍था, प्रणाली और नजरिया भी बदलना चाहिए।इस तरह के एकपक्षीय रवैये से बदलाव संतुलित नहीं, बल्‍कि असंतुलित होता है।

Sunday, May 18, 2014

एक हज़ारो में मेरी बहना है!








इसके बारे में जो लिखू वो मेरे लिए कम होगा। टीना ,हमारी हक्कू मेरी छोटी  बहन ,जिसने मुझे न सिर्फ बड़े होने का मान दिया बल्कि अपनी उपलब्धियों से भी हम सब का मान बढ़ाया है। नर्सरी क्लास से जो क्लास में फर्स्ट आने का सिलसिला शुरू हुआ। वो आज तक जारी है ,हर एग्जाम को पास किया  ,फिर वो कम्पेटेटिवे ही क्यों न हो। जो बात  सबसे ज्यादा मान कराती है वो ये की आज तक किसी भी टूशन का सहारा नहीं लिया। फिर वो P . E.T  ही क्यों  हो। वेटिंग सीट में एडमिशन नहीं लिया क्युकी डोनेशन मांग रहा था कॉलेज। उसने अपना सब्जेक्ट बदल लिया। लडकिया वाकई समझदार होती है ,लेकिन इतनी ज्यादा ये नहीं पता था। जिस राज्य में गयी वहाँ के कॉलेज ,और यूनिवर्सिटी टोपर रही। गोवा में जॉब किया। अब पीएचडी की स्कालरशिप मिली है नॉर्वे में   ,जिसको पूरा करने में रात दिन एक कर दिए है।  

ये सब लिखने का शायद कोई मतलब नहीं होता ,लेकिन आज रहा नहीं गया। जब मेरे मोबाइल में आये एक मैसेज ने मुझे और प्राउड फील कराया। हमारी समाज के महा सभा ने टीना को सम्मानित करने के निर्णय  किया है ,जो हम सब के लिए बहुत ख़ुशी का पल है। उसने इस सम्मान को लेने के लिए मुझे मनोनीत कर ,आज मुझे बहुत बड़ा बना दिया ,बड़ी बहन होना और ये बड़ापन दोनों में  फर्क है..मम्मी की ख़ुशी अपनी जगह है ,इससे ज्यादा ये की जिन जिन को पता चल  है ,वो ज्यादा खुश है ,कई रिस्तेदार ऐसे भी है जिनको उसके इस अचीवमेंट की जानकारी नहीं थी ,वो आश्चार्य कर रहे है की हमे बताया क्यों नहीं। हम लोगो ने कभी इस को उस तरह लिया नहीं ,या कहे की फुर्सत ही नहीं मिली ,रोजमर्रा की ज़िंदगी के तामझाम से। माँ और मैं आपस में उसकी हर उपलप्द्धि को एन्जॉय कर लेते है ,आज पापा होते तो उनका सीना न जाने किता चोडा हो जाता। उनको अपनी दोनों बेटियो पे नाज़ था है और हमेशा रहेगा। ये जो कुछ भी हम दोनों है आज उनकी ही बदौलत,उन्होंने कभी हम दोनों को बोझ नहीं समझा ,बल्कि हमें अपने रास्ते चुनने की आज़ादी दी। शायद यही कारण है ,की आज टीना और में अपनी ज़िन्दगी को अपनी तरह से ज़ी  रहे है। टीना की इस उपलब्धि के लिए मेरी तरफ से बहुत बहुत बधाई ,और शुभ कामनाये। माँ का बहुत सारा प्यार और आशीर्वाद। युही तरक्की करो ,खूब पढ़ो  आगे बड़ो ,मस्त रहो।हमेशा खुश रहो।    

एक हज़ारो में मेरी बहना है!
,

Friday, May 16, 2014

जशोदा बेन का मोदी के नाम खुला पत्र



प्रि‍य नरेद्र,

इस अभागि‍न का चरण स्‍पर्श,

आपको प्रधानमंत्री बनने की कोटि‍श : बधाई। बीते 46 साल में आपने मुझे भले ही पत्‍नी का दर्जा नहीं दि‍या, लेकि‍न मैंने आपको इस शि‍खर पर देखने के लि‍ए 40 साल से चावल और इससे बनी चीजों का परि‍त्‍याग कि‍या है। आपकी सफलता के लि‍ए मैंने मन्‍नत मांगी थी, जो आज पूरी हो गई। मुझे खुशी है कि‍ आपने अपने जीवन में पहली बार मुझे पत्‍नी के रूप में स्‍वीकार कि‍या।
अब मैं आपके साथ प्रधानमंत्री की पत्‍नी के रूप में रहना चाहती हूं। सुना है दि‍ल्‍ली में सात रेसकोर्स रोड पर प्रधानमंत्री का बंगला बहुत खूबसूरत है आप मुझे अपने साथ रखेंगे न ? आप हिंदूवाद की बात करते हैं। राजनीति‍ तो परि‍वारवाद की भी बात करती है। गांधी, नेहरू से लेकर तमाम राजनेताओं ने सत्‍ता की चाबी परि‍वार में ही सौंपी। यहां तक कि‍ अटलजी भी इसके अपवाद नहीं हैं। तो फि‍र आप क्‍यों अकेले चलने पर आमादा हैं ?
आपकी इस जि‍द पर मेरे मन में कई तरह के शक उभरते हैं। मीडि‍या वाले कहते हैं कि‍ आपने एक लड़की की जासूसी करवाई। पहले मुझे अपने भरोसे पर अवि‍श्‍वास नहीं होता था। लेकि‍न जब से मीडि‍या में ति‍वारी जी की कहानी सुनी है, डर लगने लगता है। कहीं आपके कदम भी तो फि‍सल नहीं रहे ? देखि‍ए तो, 88 साल की उम्र में भी उन्‍होंने उज्‍जवला बहन से शादी की। वे भी कई साल आपकी तरह ना-नुकुर करते रहे। लेकि‍न आखि‍र में उन्‍हें शादी करनी ही पड़ी। कि‍तनी बेइज्‍जती हुई उनकी।
आप एक बार ति‍वारी जी से बात कीजि‍ए। मुझे वि‍श्‍वास है कि‍ आपको उनसे बात करने पर जरूर हौसला मि‍लेगा। लेकि‍न दि‍ग्‍वि‍जय जी से बात नहीं कीजि‍एगा। मुझे उन पर जरा भी यकीन नहीं। देखि‍ए तो कैसे उन्‍होंने इस उम्र में एक पत्रकार से अपने रि‍श्‍ते की बात कबूली ? ऐसी खबरें पढ़कर मुझे डर लगता है कि‍ कहीं आप भी ....
इतने बड़े प्रधानमंत्री नि‍वास में आप अकेले रहेंगे, यह भी मेरे लि‍ए फि‍क्र की बात है। मैंने मन्‍नत मांगी थी कि‍ आपके प्रधानमंत्री बनने के बाद हम दोनों एक साथ अंबाजी के मंदि‍र जाएंगे।
मुझे पूरा यकीन है कि‍ जि‍स 56 इंच के सीने को चौड़ा कर आपने मुझे सार्वजनि‍क रूप से पत्‍नी स्‍वीकार कि‍या है, उतनी ही दि‍लेरी से आप मेरी मन्‍नत जरूर पूरी करेंगे और भारत के प्रधानमंत्री की पत्‍नी होने का पूरा हक देंगे।

आपकी अर्धांगि‍नी,
जशोदा बेन
महेसाणा, 16 मई 2014 

Wednesday, May 7, 2014

Goma

माँ तेरे जस्बे और हिम्मत को सलाम।

 गोमा की कहानी उतनी दिलचस्ब नहीं लेकिन उनके जस्बे ,और हुनर की कहानी  बहुत ही दिलचस्ब है ,८५ साल की उम्र में तमाम दिक्कतों के बाबजूद चेहरे पे हसी ,और एक अलग ही नूर ,उनकी संघर्ष शील जीवन की कहानी खुद ही बयान करता है। माँ के पास पड़ोस की आंटी आई की भाभी जी चिप्स और पापड़ चाहिए कोई पहचान का है क्या जो बनाता हो ?माँ ने कहा पता करना होगा ?मेरी माँ की आदत है ,किसी को कुछ कहा है तो उसका काम करवाने की लास्ट मूवमेंट तक कोशिश करती है ,उनके लिए यही मानव सेवा है। जिसको लेकर कभी कभी मुझे गुस्सा जरूर आता है ,की क्या है आप ऐसे लोगो की काम क्यों करवाती है जो सक्षम है ,कर सकते है। लेकिन नहीं ,शायद कुछ काम करने के लिए कुछ विशेष लोगो को जरिया बनाया जाता है।
बहुत सकरी गली में छोटा सा मकान जिसमे अपने १० बच्चो का बचपना देखा और अब उनके पोतो ,पोतियों के साथ रह रही यही गोमा। जी हाँ गोमा पाकिस्तान से यहाँ आई थी ,शादी हुयी मिया के साथ जब तक रही ,दिक्कत ही रही काम काज  नहीं था ,तो बच्चो को  पालने के लिए चिप्स पापड़ बनाना शुरू किया। वो दिन है और आज का दिन, गोमा तब से अपने परिवार को पाल रही है। अपनी ७ लड़कियों की शादी की ,अकेले, फिर बेटो की ,और अब बहुए जो आई है  ,तो साँस के देखभाल करने वाला कोई नहीं। आज भी खुद कमाती है ,पहले बेटे माँ के साथ थे ,बहु के आने के बाद अलग हो गए ,बड़ा बेटा अपने परिवार से अलग हो गया ,छोटा साथ है लेकिन किसी काम का नहीं ,दारु और बुरी आदतो ने बिगाड़ा हुआ है ,बहु रोज लड़ती है ,साँस की देखा देखी शुरू किया पापड़ का काम , लेकिन वो प्यार और जस्बा कहा से लाएगी वो सासुमा के हाथो में है। प्यार की बोली से दिल जीतने की कला कहा ?
गोमा जबलपुर के प्रतिश्ठित  सिंधी परिवार की लड़की है ,लेकिन आज तक इस लड़की ने अपने मायके के लोगो से कोई मद्दत नहीं ली। आज भी माँ के यहाँ जाती है ,और आ जाती है ,उनका काम किये बिना दिन नहीं गुज़रता। जब मैंने उनसे बात की तो बोली ,उसने जीवन दिया है , तो वो पालेगा भी।भरा पूरा परिवार दिया है काहे का अकेलापन ?बच्चे है ,नाती पोतो ,को देख के खुश हो जाती हु ,लड़कियों ने मेरा नाम रोशन किया है सभी अच्छे घरो में है ,आज मुझे उससे ही ख़ुशी मिलती है ,तो क्या हुआ जो आज भी अपना पेट खुद ही पालना पड़ता है। कर्म है ,जो भोग रहे है। 
बस एक बात हमेशा याद रखो बेटा ,काम से जी नहीं चुराना ,और कोई काम छोटा नहीं होता। बस विश्वास रखो ,खुद पे खुद की हिम्मत और जस्बे बे। हुनर  कैसा भी हो उसको कभी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।

ये सीख हर माँ देती है ,लेकिन बच्चे ही नहीं मानते ,काम से जी चुराना ,बड़ो की इज़्ज़त न करना ,खासकर बुजुर्गो की ,आज के समय में इतना ज्यादा हो गया है ,समझ नहीं आता की की युवा पीड़ी कहा जा रही है।
माँ और माँ की सहनशीलता को मेरा सलाम। गोमा को मैंने पूछ ही लिया १० बच्चे कर लिए लेकिन आज भी आपकी ताकत गजब की है। हँसते हुए बोली उस समय पाकिस्तान में थे शुद्ध खाते थे ,पीते थे दूध ,आजकल की लड़कियों को देख लो ,पीसड्डी से है ,उनमे वो ताकत कहा। मैंने पूछा आपका हाथ पैर दर्द नहीं देता इस उम्र में ऊपर नीचे पापड़ डालने जाना ,नहीं अरे तुम जितना काम करना है करा लो। तुम थक जाओगी पर हम नहीं। बेटे जस्बा हो तो थकान  नहीं आती।  सुन के वाकई मुझमे जस्बा जागा की आज ये कहानी लिखनी ही है ,चाहे कुछ भी हो जाए। और लो कहानी हो गयी। एक माँ के अटूट विश्वास ,और जस्बे की कहानी ,अपने बच्चो कीबेरुखी  को हँसते  हुए सहने की कहानी। और सबसे बड़ी बात जो मुझे अच्छी लगी वो ,ये की खुद को अकेला मत समझना। काम करते रहो तो अकेलापन भी डर  के भाग जाता है। गोमा को मेरा सलाम।

इस किरदार से मिलवाने की ज़िद अगर माँ ने न की होती तो आज मुझे जो हिम्मत मिली वो नहीं मिलती। इसलिए मेरी माँ को भी मेरा सलाम।

मदर डे पे इससे ज्यादा ख़ुशी का पल और क्या हो सकता है ,की फुर्सत निकाल के कुछ लिखा एक माँ के लिए।


Thursday, March 13, 2014

मेरी नज़र से "कवीन "

  जिस किसी ने भी ये कहा कि ये बहुत अच्छी पिक्चर  है जाओ ?उन्होंने असल में क्यों कहा ?मुझे अब समझ में आ रहा है ?फ़िल्म क्रिटिकस  ने कहा अच्छी है लड़कियो जाके देख आओ ??दोस्तों  पिक्चर देखने जानी है तो जाओ देख आओ "कवीन ". .... लेकिन भूल के   भी  कवीन बनने  कि जरुरत नहीं है। मुझे ये फ़िल्म बिना हाथ पैर कि बकवास से ज्यादा नहीं लगी। इसके कई कारण है ,जो मुझे समझ आया वो में लिख रही हु ,पहली बात कि ये फ़िल्म सिर्फ लड़कियो के देखने कि नहीं है ,बल्कि सबसे पहले इसे अपने पेरेंट्स के साथ देखो। उन्हें दिखाओ क्या पता वो  तुम सब को रानी बनने  दे या न दे ?क्युकी भारत के मध्यम परिवार में कोई भी माता पिता अपनी बेटी को इस तरह देश के बहार नहीं जाने देंगे। पहले उनसे पूछ लेना कि मॉल या चौपाटी अकेले जाने देंगे कि नहीं अपने ही सिटी में   ??? उसके बाद दिल्ली ,मुम्बई ,गोआ ,केरल ,कश्मीर अगर अकेले जाने मिल गया तो कुछ बात है वरना  पेरिस और लंदन तो मिया के साथ ही जाना ,उसका खर्च वो नहीं देंगे वो मिया के ज़िम्मे है ?
चलो कोई नहीं शादी ही टूटी थी न ,तो उसी समय मना कर देती ?क्या जरुरत थी अकेले हनीमून में जाने कि ?वो भी दिल्ली कि लड़की ?हज़म नहीं हुयी ये बात ?चली गयी वहा छोटे कपडे पहनते नहीं बने ?कंडोम बैग में नहीं रखा ?स्मोक नहीं किया ?दारु एक बारी पी ,एक बार फ्रेंच kiss करने को बोला ,तो लिप करके आ गयी। सेक्सी कैप पहन तो ली लेकिन कौन सी ये नहीं पता ?खिलोने ले लिए। किसके लिए पापा के और भाई के लिए ?क्या लिया मसाजर ?खुद ही हसी उड़वाई ?साथ ही भारत कि भी लो जी लाजपत नगर कि बाज़ार में सब मिलता है ,ये पता है ,लेकिन वो क्या है ये नहीं पता ?कोई नहीं ,लड़को के साथ रह लिया ,लेकिन घर में नहीं बताया ?तो रानी पेरिस जाके कवीन कैसे बन गयी ?सिर्फ इसलिए क्युकी उसके पास विजय को न बोलने कि हिम्मत आ गयी। और उसने उसको मना कर दिया। 
लड़कियो को बेवक़ूफ़ बनाने का नया तरीका है। और तो और आप सब को ये सब सिखाने ,दिखाने    के लिए  है कि आप जाइये  ,इसे देखे और हिम्मत करिये ये बोलने कि। "आई  हेट ब्रा ",आई  वांट कंडोम्स " वांट तो ड्रिंक, . ।  
जो लड़की विदेश जाके भी ये सब नहीं कर पायी ,तुम लोगो को क्या लगता है तुम सब कर लोगी ???
भैया ,I WANT DRINK...I HATE BRA ...I LOVE TRAVEL...I WANT TO SMOOCH ...कंडोम। या अल्लाह लड़की बोरा गयी है ,कैसे शब्द बोल रही है लाज़ रही नहीं इसको ,चरित्र खराब है ,तभी तो ऐसा लिख रही है। 
जो ये सब सुन के पली बड़ी हो ,उसको ये सब शोभा नहीं देता। 
हॉल में लड़के सिसकिया ले रहे थे ,जब रानी कि सहेली ने उसकी ब्रेस्ट को दबाया ये कहते हुए कि इससे हटाओ। तुममे से ऐसे कितनी लड़किया है ,जिन्हे अपनी सहेलियो का इस तरह का टच अच्छा लगेगा ?
क्या बिना ब्रा के अपने घर में घूमने कि हिम्मत दिखा सकोगी ?या अपने देश में घूमने कि अपने मोहल्ले में ,अरे यहाँ तक कि पति या पुरुष मित्र के साथ भी ,शायद कभी नहीं ,शादी शुदा पति कहते थक जाए कि अपना रूम है यहाँ क्या शर्माना ,लेकिन क्या करे इन लड़कियो को १३ साल कि उम्र से बता दिया जाता है कि ये बहुत जरुरी है। शादी के पहले माँ कि पसंद कि ,शादी के बाद पति के पसंद कि ,और खुद लेने में शर्म आये तो वो भी कह देना पति ले आएगा सब। 
शराब का नाम मत लेना ,वो लड़कियो के लिए नहीं है। सेक्स शादी के बाद उसकी चर्चा भी गुनाह है ,लिप किस्स या स्मूच या फ्रेंच किस  क्या होती है ,मिया बता देगा। अगर उससे पता हुयी तो। 
कंडोम का कैसे यूज़ करते है ,ये पता है ,लेकिन तुम इसे खरीद नहीं पाओगी ,वो क्या है ,कि दुकानदार कि नज़र ,दस लोगो कि नज़रे तुम कैसे कर सकोगी। यहाँ तो किसी वाशरूम में भी नहीं मिलता। ये एम्स्टडम कौन न है जहा सेक्स लीगल है। खुलेआम आप सेक्स कर सकते है। इससे कमा सकते है। तो यहाँ तो तुम लड़किया कवीन नहीं बन सकती ?सॉरी टू  से। 
और जिन मर्दो कि बुराई करते मुह नहीं थकता ,उनके बिना क्या सेक्स या स्मूच का मजा ले सकोगी ??? 
अगर मर्द न हो तो क्या ज़िन्दगी खुशनुमा हो जाएँगी। दुनिया पे फ़तेह मिल जायेगी ,रानी बन के। तो जिनको इस तरह कि रानी बनने  का शौक है ,वो बेसक इस मूवी को देखने जाए। 
असल में इस तरह कि मूवी सिर्फ मुंगरेलाल के हसीं सपने टाइप है ,जागती आँखों से देखा गया एक ऐसा सपना जो हक़ीक़त में कभी मुमकिन नहीं। यकीन न हो तो उन लोगो से पूछ लो ,जो बढ़ावा दे रहे है। इस सपने कि शुरुआत जिस दिन उनके घर से हुयी ,मैं मान जाओंगी।  
कहने के लिए सिर्फ एक मूवी है ,लेकिन किसी ने कहा था कि मूवी ज़िंदगियाँ  बदलने में अहम् भूमिका  अदा  करती है। 
आज का युवा कब कौन सी बात दिमाग पे लेले कहा नहीं जा सकता। इसलिए कवीन बनने  के लिए शिक्षा ,हिम्मत ,और जस्बे कि जरुरत है ,जिस दिन ये जस्बा और हिम्मत ले आओ उस दिन हवा में उड़ के जाने कि जरुरत नहीं पड़ेगी। इसी ज़मी में ज़न्नत मिलेगी। अपनों के बीच ,मर्दो के साथ ,और दोस्तों के दिल में। एक बार शुरुआत अपने घर से करके देखो।