Monday, August 25, 2014

ओह रे बंधू..

ओह रे बंधू........................
तुमसे प्यार करना न तो मेरी मज़बूरी है ,
न ही मेरे ख्वाईश ,ये मेरी किस्मत है। 
ये प्यार कमबख्त अहसास ही कुछ ऐसा है ,
जो न चाहते हुए जकड़ता है पकड़ता है। 
इसे रोकना चाहा ,चाहकर भी नहीं रोका ,
इसमें डूबने का आनंद मुझे रास आया। 
ये रास अब आनंद बन गया है ,
ये जानते हुए की तू सिर्फ मेरा नहीं। 
तुझे चाहना मेरे फितरत बन चुकी है ,
दिन हो या रात ,या कोई और पल ,
दिमाग की कोशिकाओ में तेरे होने का ,
नशा कुछ ऐसे रेंगता है ,जैसे मेरे जिस्म में रक्तवाहिनियां। 
प्रयास जारी है ,इसे रोकू इसे थामु ,
पर ये थमता ही नहीं ,उम्र के साथ बढ़ते यौवन ,
यौवन की उन जटिलताओं को ढोते हुए ,
आज आखिर दिमाग ने कह दिया ,अब बस। 
सिर्फ और सिर्फ तुम्हे अताह प्यार करना , 
मेरी ज़िन्दगी है!!!!!!!!

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