Wednesday, October 1, 2014

मेरी टीस

मुझे पता है वो तुम हो ही नहीं ,तुम जो हो वो मुझसे बेहतर कोई जानता नहीं ,
पर वो  शब्‍द ,जिसने मुझे सर से लेकर पाँव के खुर तक निचोड़ डाला। 
उसकी गंध ,उसकी तीखी धार ने अंदर तक भिगो दिया इस बार ,
विश्वास था की कुछ है ,जो अब भी है ,और रहेगा ,छुपा दिया है ,
उस... है, ..को कही अब मैंने ,अपने अंदर ,सपने की चादर के साथ ,
दुबक के किसी कोने में अब वो ,जो तुम ने मुझे दिया संवाद स्वरुप ,
वो वही पलेगा ,लेकिन बढ़ेगा नहीं ,उसकी नियति नहीं है बढ़ना ,
एक खाली जगह थी ,जिसे  भरा हुआ समझने की ग़लतफ़हमी में ,
अब मन, दिल जो चाहो कहो सब भीग चूका है ,
इस कदर की डूबने से पहले तैरना जरुरी हो गया है। 
झुकने की आदत ने मुझसे मेरी पहचान ले ली ,
रीढ़ की हड्डी अभी इतनी भी कमजोर नहीं हुयी,
ज़हर की पोटली पहले भी अंदर भरी थी ,आज भी है और मरते दम  तक रहेगी। 
तुम नीलकंठ नहीं बन सकते ,कोई बात नहीं ,समंदर का ज़हर पीना हर किसी के बस का नहीं। 


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