Saturday, October 11, 2014

तुम ...और तुम्हारा प्रेम ...



गिराए हुए पर्दो के बीच से झांकना
उठाए हुए दंभ की दीवार लांघना
शक की सिलवटें पोंछ आना
विश्वास की चादर ओढ़ आना

कभी..जब भर जाए मन
तुम्हारे गढ़े कठोर दायरों से
तो उसके पार आना तुम....

फिर
कहीं...
किसी मोड़ पर मिलना मुझसे
जब ढली हो शाम
महक रही हो रात
तारे टिमटिमा रहे हों
पसर रहा हो सन्नाटा...
अपने गुस्से को चकमा देकर
छिपते-छिपाते चले आना तुम
उन लम्हों के मंज़र पर
जहां बनाकर अधूरा छोड़ आए थे
खूबसूरत अहसासों का घरौंदा...
जहां से हमने शुरू किया था
अद्भुत अध्याय को गढ़ना....

और...
तब बुलाना मुझे
यथार्थ के उस जज़ीरे पर
जहां मेरा ख्वा ब मसल गए थे तुम....

मालूम है तुम्हें
तब से अब तक
न जाने कितने मौसम गुज़र गए
हम जले भी... सूखे भी... बिखरे भी
किन्तु
प्रतीक्षा के इस विशाल सागर में
आशाओं को भिगोए रखा

आना तुम जब एकांकी
मेरे लिए विलाप करने लगे
और
तब छूना मेरी धड़कनों को
अपनी मौजूदगी की शिनाख्त के लिए
उसमें मच रहे शोर से
जान जाओगे तुम....
कि मेरे लिए सदा से ही
कितना अनमोल रहा है
तुम... और तुम्हारा प्रेम !!

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