Wednesday, December 19, 2012

अदावत: मजे के बहाने...

अदावत: मजे के बहाने...: हरजीत आज शाम मजे के मूड में घर से निकला था। पापा की होंडा कार उठाई, रास्‍ते में बियर के पांच कैन खरीदे और निकल पड़ा दिल्‍ली के सुनसान रास्‍...

अदावत: बीमारी दूर होगी तो बीमार भी कम होंगे

अदावत: बीमारी दूर होगी तो बीमार भी कम होंगे: आंध्रप्रदेश के खम्‍मम जिले में 2007 की घटना। नौ दरिंदे 15 साल की एक लड़की को घर से अगवा कर कोथागुडेम शहर के बाहर ले गए। उसका सामूहिक बलात्...

Tuesday, December 18, 2012

Bas Ek Chup Si Lagi Hai (H) - Sannata (1966)

    बड़ा सवाल ? क्या लड़की  का जिस्म हर किसी  की बपौती  है ....................... जरा सोचो .....और जवाब दो  अपने आप को                                                                                                                                                                                       सन्डे   की शाम को जो घटना हुई वो शर्मसार करने वाली थी ..इस घटना को जिस तरह से  नेताओ ने  लिया और हमारी  मीडिया ने , इससे दिखाया उससे ये साफ़ हुआ की इन सब के लिए ये सिर्फ एक  घटना है .उस लड़की के बारे मै  कोई बात नहीं करना चाह  रहा।। । उसके माँ बाप के उपर  क्या गुजरी  किसी  को कोई लेना देना नहीं। दो दिन बाद दोनों सदनों मै  इस्पे बहस हुई ....इस बहस को करके सब नेताओ नै सोचा की उनने  अपनी  तरफ से उन्होंने खाना पूर्ति कर ली है, देश को दिखा दिया की वो भी दुखी ,है इस घटना से ....क्या किस्सी  नै ये सोचा की इस तरह कीघटना की   पुरावात्ति न हो इसके लिए क्या कदम  लेने    होंगे
 आज किसी   नै फ़ास्ट कोर्ट की डिमांड की ,तो  कुछ  लोग बलात्कारी को फ़ासी देने की मांग कर रहे है ......जिस देश मै  रोज महिलाओ के साथ बलात्कार होता है वहा  फ़ासी देना कहा तक सही है ...इस मुद्दे की तरफ किसी  का ध्यान नहीं जा रहा है ......डेल्ही की इस एक घटना से देश के कई सिटी  के आकडे सामने ल दिए .....जनाब ये तो वो है जो कागज़ मै  दर्ज है ...लेकिन उनका क्या जिनके बारे मै  कही कोई चर्चा ही नहीं                    ..सभी महिला संघठनो  नै आज दो दिन बाद इस मुद्दे पे अपना प्रदर्शन किया ....और अब वो सब   सिल्क के 5 मीटर  की साड़ी मै  लिपटी  मेक उप किये हुए  अपने फोटो खिच्वाके अपने घरो मै  धुबुक गयी है ......जिसमे महिला आयोग की सदस्य  , महिला सांसद ,और न जाने कितने महिलाए  है।   हमारे देश की ये  विडम्बना है  की  यहाँ किसी  भी जुर्म के लिए सजा का जो प्रावधान है उसका खोफ  आम आदमी मै नहीं रहा ...यहाँ की कानून पे किसी  का विश्वास नहीं रहा ,कानून  अब मजाक बन के रह गया   है।

बलात्कार हुआ ...या जिसने किया वो क्यों किया क्या कभी इस तरफ किसी  नै सोचा ...और जो रोज  बलात्कार होते है वो क्यों होते है।।।नहीं।।।। हम लोगो की आदत बन गयी है की हम किसी  भी बात की जड़ मै  जाना  नही  चाहते  ..वे वांट इंस्टेंट  सलूशन इन 1 min  ....नो डिस्कशन अत आल .लेकिन जब तक दर्द के जड़ नहीं पकड़ेंगे हम इस समस्या  से पीछा नहीं छुड़ा   सकते ....इसका एक ही हल है की हमें अपने बच्चो को सेक्स एजुकेशन प्रोवाइड करनी होगी ....16 साल के बाद से उनको फिर चाहे वो लड़का हो या लड़की  सेक्स की जान कारी होनी चाहिए ...उनको जेंडर की जानकारी होनी चहिये ... हर लड़के को अपने अंगो के अलावा एक लड़की के अंगो  की भी जानकारी होनी चाहिए ..उसको ये पता होना चाहिए की जिस तरह उसके नाजुक  अंग है एक लड़की के भी उससे ज्यादा नाजुक अंग है जिसकी प्रति उसकी भी जिम्मेदारी है ...जब तक हम बड़े अपने बच्चो को इस तरह से सही एजुकेशन नहीं देंगे हमें ये सोचने का कोई हक नहीं है की कल को हमारे घरमै ऐसे कोई  घटना नहीं  होगी . जिसके साथ ये घिनोना हादसा होता है वो किस तरह तिल तिल  मरती है, कभी इसकी कल्पना कर के देखो।।।।।आज उस लड़की की हालत जैसे भी है पर उसके मन के अंदर जो घाव लगे  है  उससे कोई नहीं ठीक कर सकता ...न  समाज ,न सांसद ,न ही कोई महिला संघठन ,न ही मीडिया ....और न ही कानून ....कानून भी अपना पक्ष कुछ ऐसे रखेगा की बलात्कारी ने शराब पी  हुई थी उसकी मनोदशा ऐसे नहीं थी इसलिए उससे सजा कम होगी ...उसने ये कृत होसो हवास मई नहीं किया ...और अगर उम्र कम हुयी तो उसकी ये गलती मान के उससे कुछ सालो की उम्र कद दे के छोड़ दिया जायेगा ...

Wednesday, November 14, 2012

अदावत: नेहरू : आज तुम खूब याद आए

अदावत: नेहरू : आज तुम खूब याद आए: जब बच्‍चे थे तो 14 नवंबर, यानी बाल दिवस पर स्‍कूल में खास आयोजन होते थे, लड्डू, समोसे मिलते थे। लगता था मानों जवाहर लाल नेहरू (सारे बच्‍चों...

Friday, September 28, 2012


I found this conversation between the pencil and the eraser very inspirational.

Parents are like the eraser whereas their children are the pencil.

They're always there for their children, cleaning up their mistakes.

Sometimes along the way, they get hurt, and become smaller / older, and eventually pass on.

Though their children will eventually find someone new (spouse),

But parents are still happy with what they do for their children,

And will always hate seeing their precious ones worrying, or sad.

All my life, I've been the pencil.

And it pains me to see the eraser that is my parents getting smaller and smaller each day.

For I know that one day,

All that I'm left with would be eraser shavings and memories of what I used to have.
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"We never know the love of our parents for us 
Until we have became parents"


                                         


Pencil and Eraser Story-very very real-

So true.......... Some of us have already lost either one or both of our "Erasers" But it's still nice to be reminded of them!
 
                     

Thursday, September 27, 2012

  ज़िन्दगी दोबारा चांस  नहीं देती .......................                                                     .                                                      
                                                                                                   दुनिया  में लोगो को प्यार का मतलब  नहीं मालूम या वो प्यार को सिर्फ एक ही नज़र से देखते है। प्यार के कई रूप है ,ये आप पे  निर्भर करता है की आप उस प्यार को, जस्बात को, किस तरह  जाहिर करना चाहते है। आला तो लोग इस बेहद ही नाजुक मामलो  में  इज़हार करना नहीं जानते या उनको न जाने किस तरह के डर  ने  घेरा हुआ  है, अगर दहसत के साए है तो प्यार जैसे भावना को पनपने  ही न दो न , प्यार करना भी है,जाताना भी नहीं है ,या उसको किसी  और भावना में  बदल के जाहिर करना ,बेहद ही नादानी भरा काम है, इसमे न सिर्फ प्यार करने वाला  खुद को धोका देता है, बल्कि  उस इंसान को भी आसमंजस में  डाल देता है, जो प्यार करता है, जताता है और बाद में  अपने को ठगा सा महसूस करता है, उस डोर  को कैसे बांदना  है पहले ये शिकना  बहुत जरुरी है ,कोई भी रिश्ता बनाए रखा जाए उसके लिए पहले खुद को मजबूत होना होगा ।                                                                                                         जब  हमें कोई अपनाता है तब हम उससे कुछ ऐसे धुत्कारते है, जैसे हमसे ज्यादा अच्छा कोई नहीं।लेकिन हम ये क्यों भूल जाते है की ऐसा ही कुछ कभी हमारे साथ भी हो सकता है।कभी कभी बात बनते बनते बिगड़ जाती है ,और जब बात समझ आती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है, इसलिए  समय  के साथ अपने मन की बातो को साफ़ करते चलना ,जरुरी हो गया है,जबरन को कोई गाठ किस्से के मन में  रह जाए ,क्या फ़ायदा ,दोस्तों आप सोच रहे होगे की आज इससे क्या हुआ ये प्यार पे lecture  क्यों दे रही है।आजकल के नए बच्चे सिर्फ इंसान के उपरी सुन्दरता देखते ,है न की दिल की सोम्यता या,सुन्दरता, उम्र ,और कमी, अरे दोस्तों ये सब देखके अगर प्यार करना है तो वो प्यार नहीं होता वो बहुत ही छोटे समय के लिए लिया गया आपका adjustment  है जो आप खुद के दिल को धोका  देके करते है,वेल मुझे बहुत दुःख  होता है जब किस्से को प्यार में   तड़पता देखती हु ख़ास कर के उन  दोस्तों को, जो जिससे प्यार करते है, उसको इज़हार भी करते है ,लेकिन बदले में  मिलता है, एक नस्तर चुबोता दर्द ,जिसकी  चुबन आहे बाह गाहे,  कभी न कभी इंसान को अंदर से हिला देती है।वो खुद से दूर हो जाता है।इसलिए अगर इस आग में  जलने की हिम्मत ,,है तो इज़हार करने की हिम्मत करो वरना फ़ालतू का समय इस इम्ह्तिहान में  देने का कोई मतलब नहीं। जलोगे तो सोने के निखर के  बहार आओगे वरना ,अकेले पन की  दुनिया में   अकेले ही रह जाओगे।
तो अब समय है सच को स्वीकार करो , जो मन में  है उसको बोलो ,साफ़ बोलो,इज़हार करो ,सीधे सीधे ,कोई न  नुकुर नहीं,कोई दिखावा नहीं,लेकिन एक जवाब हमेशा अपने साथ लेते हुए की ,जरुरी नहीं की हाँ ही सुनने मिले न सुनने की हिम्मत भी होनी चाहिए ..  प्यार  नाम ही है ,साफ़ ,सरल ,शब्दों   का  दिल की आवाज़ का जो बहुत ही पाक है।।।।।।।
एक बार हिम्मत करो ,ज़िन्दगी दोबारा चांस  नहीं देगी ............................

Wednesday, September 26, 2012



तेरा मेरा नाता है क्या?
तुम देती हो... मै लेता हूं
तुम लेती हो... मै देता हूं
घडी़ घडी़ में रूप है बदलता
समय का पहिया सदा है चलता
हम दोनों में फर्क है कैसा
आपस में एक जैसा है क्या?

मुझे पता है उसे नींद न आई होगी
सपने चल रहें होंगे आंखों में
करवट बदलेगी.. तन्‍हाई होगी
मुझे पता है उसे नींद आई होगी
उसके सामने वही बादल.. जो मेरे सामने
उसके सामने वही कोहरा.. जो मेरे सामने
उसके-मेरे अर्धविराम भी वही, पूर्णविराम भी
तभी तो मै जब यहां बेचैन हूं
उसकी पलकें भी ना झपकी होंगी
मुझे पता है उसे नींद न आई होगी

सुख-दुख बरसे हम पर जब भी
हंस दिए, कभी रो लिए हम भी
राहें अपनी संग चलतीं हैं
जब चाहे नजरें मिलती हैं
ये किस जनम से लेकर चलें हैं
ये रिश्तों का राज है क्या?
तेरा मेरा नाता है क्या?

ना रिश्ते को हो कोई नाम
दिल से मिलना दिल का काम
अलग-अलग हैं सफर हमारे
फिर भी एक दूजे के हैं सहारे
जब भी मुझको कांटा चुभता है
तेरे दिल में ये दर्द है क्या?
तेरा मेरा नाता है क्या?


Saturday, September 15, 2012

मीडिया का इंद्रजाल और आंदोलनों का तिलिस्‍म


जादूगर के तमाशे और सड़क पर भीख मांगती किसी महिला और उसकी गोद में एक बीमार बच्‍चे में क्‍या फर्क है। कहीं न कहीं दोनों ही आंखों का धोखा हैं। ये इंद्रजाल है। इसका तिलिस्‍म टूटता है तो लोग खुद को कोसते हैं। मध्‍यप्रदेश में ओंकारेश्‍वर बांध का जलसत्‍याग्रह और भोपाल में इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शन का तमाशा दोनों इसकी जीती-जागती मिसाल हैं। दोनों को मीडिया ने एक इंद्रजाल की तरह पेश किया। यह दिखाने की कोशिश की कि लोग अब सड़कों पर लड़ाई लड़ने को आगे आ रहे हैं। लेकिन इनका तिलिस्‍म जल्‍द ही टूट गया। टाइम्‍स ऑफ इंडिया की एक खबर में पत्रकार ने लिखा है कि जल सत्‍याग्रही टीवी कवरेज के लिए 20 फुट के गहरे गड्ढे में बैठे थे। सरकार के झुकने से जब पानी उतरा तो यह तिलिस्‍म भी टूट गया। इस खबर पर नर्मदा बचाओ आंदोलन की कथित नेता चित्‍तरूपा पालित का वह पत्र भी हास्‍यास्‍पद है, जिसमें उसने आंदोलन के नेता आलोक अग्रवाल का बयान न छापे जाने की निंदा की है। उन्‍हें पत्रकार को यह सीख देने का कोई हक नहीं है कि वह किसका बयान छापे और किसका नहीं। पत्रकार ने (भले ही पानी उतरने के चार दिन बाद ही सही) मौके पर जाकर जो देखा वही लिखा। गड्ढा तो 20 फुट का ही है, उसे नकारने वाला कोई नहीं। उसमें कोई डूब नहीं सकता। नाक तक पानी आने की असलियत भी उजागर हो गई है। समूचा तिलिस्‍म ही टूट गया है। मेरे अपने शहर जबलपुर में भी यही तमाशा कुछ स्‍वयंसेवी संगठनों ने जलसत्‍याग्रह के नाम से किया और मीडिया का कवरेज भी लूटा। भोपाल में भी ज्‍योति टॉकीज चौराहे पर कुछ युवाओं ने पानी की टंकी में डूबकर ऐसा ही तमाशा किया था। ऐसे लोग अपने पीछे कुछ समर्थकों को छोड़कर आते हैं, जो असल में प्रचारक हैं। वे फोटो को बार बार फेसबुक पर लगाते हैं, ताकि ज्‍यादा से ज्‍यादा संवेदनाएं जुटाई जा सकें। दूसरा वर्ग इनके प्रशंसकों का है, जो हां में हां मिलाने का काम करते हैं।
तिलिस्‍म टूटता है तो मुझ जैसे आम नागरिकों को बहुत दर्द होता है, जो सही मायनों में इंसाफ चाहते हैं। इंसाफ उस कौम के लिए जो बरगी, सरदार सरोवर, इंदिरा सागर और महेश्‍वर जैसे बांधों से प्रभावित है। जिन्‍हें अब तक जमीन नहीं मिली। मेधा पाटकर ने इनके लिए लंबी जमीनी लड़ाई लड़ी। लेकिन इन दोनों लड़ाइयों में उन्‍हें बिल्‍कुल अलग-थलग रखा गया। लगता है (?) नर्मदा बचाओ आंदोलन का नेतृत्‍व अब चित्‍तरूपा पालित उर्फ सिल्‍वी जैसी सनसनी पैदा कर जंग जीतने का इरादा रखने वाली नेताओं के हाथ में आ गया है। ठीक वैसे ही, जैसे अन्‍ना को परे रखकर राजनीति में कूदने की घोषणा करते ही इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शन का तिलिस्‍म टूट गया। भोपाल में मनीष सिसोदिया के सामने इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शन के कार्यकर्ताओं ने एक-दूसरे को मां-बहन की गालियों और मर्डर, घोटाले के आरोपों से नवाज दिया। असल में यही असलियत है जमीनी आंदोलन के नाम पर तिलिस्‍म का चोगा पहनकर घूमने वाले युवाओं की। इनमें से कुछ तो अपने नाम के साथ एक्‍टिविस्‍ट की पट्टी लगाकर भी घूमते हैं।
असल में सरकार और जनता के बीच खड़ी है सिविल सोसायटी। दोनों के बीच मीडिया भी खड़ी है। जब कभी मीडिया आगे बढ़कर आंदोलनों के तिलिस्‍म में उलझकर सिविल सोसायटी से हाथ मिला लेती है तो जनता का पलड़ा वजनदार हो जाता है। यह सिविल सोसायटी के हाथों इस्‍तेमाल होने जैसी बात है और मुझे नहीं लगता कि किसी छोटे से बड़े पत्रकार को यह गवारा होगा। टाइम्‍स की खबर से यह साफ जाहिर हो गया है कि मीडिया अपनी इस कोशिश में एक इंद्रजाल बुनती है। लोगों को धीरे-धीरे समझ आने लगा है कि यह एक धोखा है। इस धोखेबाजी में सबसे ज्‍यादा फायदा सिविल सोसायटी के उन लोगों का हो रहा है, जिनका एकमात्र मकसद सिर्फ प्रचार पाना है। दुर्गति के शिकार ओंकारेश्‍वर बांध से विस्‍थापित वे लोग हुए हैं और होंगे, जिन्‍होंने ऐसे लोगों की बात सुनकर अपना जल सत्‍याग्रह छोड़ दिया। उनके इस कदम से इंदिरा सागर बांध के विस्‍थापितों का जल सत्‍याग्रह खत्‍म हो गया। चित्‍तरूपा पालित अगर वाकई प्रचार की भूखी नहीं थी तो उन्‍हें जमीन मिलने तक आंदोलन जारी रखना था। क्‍या मध्‍यप्रदेश सरकार दर्जनों मीडियाकर्मियों के सामने उनका आंदोलन खत्‍म करा सकती थी। लेकिन उन्‍होंने ऐसा नहीं किया और इंदिरा सागर बांध के विस्‍थापितों की आवाज बंद करने का विरोध भी नहीं हुआ। यहां तक कि जल सत्‍याग्रह को प्रचारित कर रहे भोपाल और दिल्‍ली में बैठे समर्थक 
भी महंगाई का रोना रोने लगे।
मेरे जैसे पत्रकार के लिए यह बेहद दुखद है कि जनांदोलनों का तिलिस्‍म कुछ इस कदर से टूट रहा है कि 
मीडिया के पास खुद को कोसने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं बचा। जब आंदोलन की जमीन मीडिया और फेसबुक बन जाए तो उसका तिलिस्‍म टूटने में देर नहीं लगती। भाइयों और बहनों, इस माह की तीनों बड़ी घटनाओं से सबक लो और जमीन के आंदोलनों को जमीन में ही लड़ो। तुम्‍हारी आवाज इतनी बुलंद होनी चाहिए कि बिना मीडिया और फेसबुक के वह दिल्‍ली तक गूंजे। 
मेरे जैसे पत्रकार के लिए यह बेहद दुखद है कि जनांदोलनों का तिलिस्‍म कुछ इस कदर से टूट रहा है कि मीडिया के पास खुद को कोसने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं बचा। जब आंदोलन की जमीन मीडिया और फेसबुक बन जाए तो उसका तिलिस्‍म टूटने में देर नहीं लगती। भाइयों और बहनों, इस माह की तीनों बड़ी घटनाओं से सबक लो और जमीन के आंदोलनों को जमीन में ही लड़ो। तुम्‍हारी आवाज इतनी बुलंद होनी चाहिए कि बिना मीडिया और फेसबुक के वह दिल्‍ली तक गूंजे। 




Thursday, July 26, 2012


सुनो जानेमन ,
जरुरी नहीं की मेरे कहने पे तुम इतराओ ,
यु लजाओ  जरा फिर से एक बार मेरे पहले वाली प्रियेतामा बना जाओ ....
सुनो जानेमन ,
बरस बीते  कुछ अच्छा सुने ,तेरे सुन्दर मुख से,
सुनो फिर से कुछ वैसे  ही आके कुछ धीरे से  होले से ,
मेरे कानो मै कुछ गुनगुना जाओ ,
जरा फिर से मेरे पहले वाली प्रियतमा बन जाओ ....
सुनो जाने मन ,
वो पहले जैसे कहती थी तुम्हारी आँखे मुझसे ,
कुछ अपनी ,कुछ घर की,कुछ सब की,
जरुरी नहीं मेरे कहने पे तुम कहो ,
फिर एक बार आँखों से अपनी कुछ अपनी आप बीती कह जाओ ,
सुनो जाने मन  
जरा एक बार फिर मेरे पहले वाली प्रियतमा बन जाओ .....

Wednesday, July 25, 2012

mera alhad bachpan


सर्दी की गुनगुनी धुप में ,
धीरे धीरे सिकता मेरा मन ,
कुछ इस तरह गर्माता है ,
जैसे ४० के बाद १६ की याद ,
तेरे पहलू मै आके गुनगुनी धुप का ,
वो अहसास सिमटता है कुछ ऐसे ,
जैसे उन   की बुनावट  मै ठण्ड ,
ये गर्माहट  भी सजी सावरी है ,
कुछ याद दिलाती बचपन की,
चाहे दादा की गोदी हो.
या पापा का प्यार,
माँ की डाट रुला देते थी 
दादी के बाहों की गर्मी मुझको चुप करा देते थी,
उम्र दर उम्र की गुनगुनाती धुप .,
न जाने कब ,कैसे , आज इस मोड़ पे ले आयी ,
जहा एक बार फिर मन चाहता है ,
सिमटना ,गुदगुदाना ,चुलबुलाना ,उस गोद की गर्मी मै ,
वो प्यार भरा मेरा अल्हड बचपन ,ढूंढ रहा है , 
मेरी वो पुरानी ठण्ड की गुनगुनाती धुप और उसकी गर्माहट ..........?

Sunday, July 15, 2012


पुरुषवादी नैतिकता के जहर बुझे बादल
मध्‍यप्रदेश के खंडवा की रहने वाली सुनीता अपने एक रिश्‍तेदार के साथ चार साल पहले जब दिल्‍ली आई थी, तो आंखों में ढेर सारे सपने थे। बंगले में काम करेगी। अच्‍छा खाना, कपड़े और साथ में हर माह पांच हजार रुपए मिलेंगे। उसे ये सारे सपने उसी रिश्‍तेदार ने दिखाए, जो उसे इस महानगर तक लेकर आया। लेकिन जल्‍द ही सुनीता के सारे सपने टूट गए। रिश्‍तेदार ने उसे जिस्‍मफरोशी के अड्डे पर बेच दिया था। रोज कई-कई बार मरना और अगले दिन फिर जिंदा रहने के लिए जी उठना। आखिर दो साल के बेटे के साथ भाग आई 21 वर्षीय सुनीता। हकीकत में जीने लगी, पर जमाने को यह मंजूर नहीं था। जब भी वह काम के लिए घर से निकलती, छेड़छाड़ के साथ अश्‍लील फब्‍तियां उसका इंतजार करती।
गुवाहाटी की सड़क पर पिछले सोमवार को एक स्‍कूली छात्रा के साथ बदसलूकी और सुनीता के मामले में ज्‍यादा अंतर नहीं है। सुनीता बाजार में बेची गई, जबकि उस बदनसीब स्‍कूली छात्रा की गलती यही थी कि उसने अपने दोस्‍तों के साथ एक बार में जाने की गुस्‍ताखी की। पब, डिस्‍को थेक, बार जैसी महानगरीय सुविधाएं समाज के आधे हिस्‍से के लिए नैतिकता की कसौटी पर पाक साफ तरीके से नहीं उभर पाई हैं। इसे यूं भी देख सकते हैं कि भूमंडलीकरण ने समाज को मौज-मस्‍ती और मनोरंजन के बहुतेरे साधन तो दिए हैं, पर इसमें महिलाओं का बढ़-चढ़कर हिस्‍सा लेना एक बड़े हिस्‍से को रास नहीं आ रहा है। गुवाहाटी की घटना को कवर करने वाले स्‍थानीय असमिया चैनल के प्रमुख अतनु भुयां लेट नाइट क्‍लबों और बार में जाने वाली अधिकांश लड़कियों को वेश्‍या करार देते हैं। ट्विटर पर वे लिखते हैं कि महिलाओं के साथ बदतमीजी की घटनाएं सबसे ज्‍यादा ऐसे क्‍लबों, बार के बाहर होती हैं। सवाल यह है कि क्‍या वे इसी बात को साबित करना चाहते थे ? अतनु अपने बचाव में यह ट्वीट भी करते हैं कि उनके चैनल के रिपोर्टरों ने कोई ‘अनर्थ’ होने से पहले ही पुलिस बुला ली थी। वे तो सिर्फ इस घटना की वीडियो शूटिंग कर अहम सुबूत इकट्ठा कर रहे थे। लेकिन उनका असली मकसद अगले दो ट्वीट से साफ हो जाता है, जिसमें उन्‍होंने यू-ट्यूब पर डाले वीडियो के लिंक भेजे, साथ ही अपने ही चैनल की बढ़ी हुई टीआरपी भी बताई। आखिर में अतनु ये भी लिखते हैं कि बम ब्‍लास्‍ट होने पर उनके चैनल के रिपोर्टर पीड़ितों को रक्‍तदान करने के बजाय घटना को शूट करना ज्‍यादा जरूरी समझेंगे। साफ है कि ऐसी घटनाओं के पीछे मीडिया की मानसिकता भी कहीं न कहीं ज्‍यादा से ज्‍यादा व्‍यावसायिक फायदा उठाने की रहती है।
कुछ दिन पहले ही असम में ही एक गर्भवती महिला विधायक की भीड़ ने बेरहमी से सिर्फ इसलिए पिटाई कर दी, क्‍योंकि उसने अपने पति को छोड़कर एक मुस्‍लिम युवक के साथ रहने का फैसला कर लिया। हमारा समाज प्रतिगामी, पितृ सत्‍तात्‍मक है। वह आज भी औरत को सदियों पुराने पितृसत्‍तात्‍मक बंधनों में देखता है। पर यहां इस समाज के दो चेहरे भी उभरते हैं। एक वह संपन्‍न तबका, जो भूमंडलीकरण के दौर में बाजारवादी विकास के साथ कदम मिलाकर चलना चाहता है और दूसरा वह जो इस चकाचौंध से खुद को बहिष्‍कृत पाता है। दरअसल पितृ सत्‍तात्‍मक बंदिशों की जड़ें इसी तबके में अभी भी गहरे जमी हुई हैं। सिनेमाई संस्‍कृति से लेकर मॉल और पब कल्‍चर के रूप में पनप रही आधुनिकता की गति को रोकने की न तो इस वर्ग की मंशा है और न ही सामर्थ्‍य। परोक्ष रूप से यह नव उपभोक्‍तावाद का समर्थन भी करता है, पर इसकी आजादी सिर्फ पुरुषों तक ही सीमित है। चार साल पहले मुंबई के एक पांच सितारा होटल से बाहर निकलीं दो महिलाओं के ऊपर हमला करने वाले अधिकांश आरोपी इसी वर्ग से थे। उनके कृत्‍य को भले ही यौन हिंसा की श्रेणी में डालकर देखा गया, लेकिन इस तरह की घटनाओं के पीछे छिपे सामाजिक कारणों को न तो तब उजागर करने की कोशिश हुई और न ही अब हो रही है। ऐसी घटनाओं के खिलाफ व्‍यापक शिक्षित, जागरूक समाज गुस्‍सा जताता है, सिस्‍टम को कोसता है, महिलाओं के प्रति नजरिया बदलने की हिदायत देता है। लेकिन मसले का हल उसके पास भी नहीं है, क्‍योंकि हमारा बाजारवादी आर्थिक विकास सबको साथ लेकर चल पाने में नाकाम रहा है।
इस समस्‍या का एक राजनीतिक पक्ष भी है। आधुनिकता से अछूता पितृसत्‍तात्‍मक समाज का वर्ग भले ही नवउपभोक्‍तावादी विकास में हिस्‍सेदार न हो, पर राजनीतिक रूप से काफी सक्रिय है। यही वह वर्ग है, जो राजनीतिक रैलियों, चुनाव सभाओं और प्रचार में भीड़ का हिस्‍सा बनता है। यह वोट बैंक है। एक ऐसा वोट बैंक जिसे राजनीतिक फायदे के लिए मोड़ा जा सकता है। यह भीड़ है और हमारे देश में भीड़ ही रास्‍ता बनाती रही है। शिक्षित मध्‍यमवर्ग इस भीड़ में शामिल नहीं होना चाहता, क्‍योंकि वह खुद को विकसित मानता है, बाकियों से अलग समझता है। भीड़ ही सत्‍ता तक पहुंचने का रास्‍ता साफ करती है और जब यह अपनी मनमानी पर उतर आती है तो इसका कोई चेहरा नहीं होता। हमारा कानून भी भीड़ को व्‍यक्‍ति विशेष के रूप में पहचानने से इनकार कर देता है। ऐसे में आरोपी सुबूतों के अभाव में छूट जाते हैं। भीड़ का यह चरित्र पहले गांवों में अक्‍सर दिखाई देता था, जो अब शहरों में नजर आ रहा है। यह हमारे लोकतंत्र के भीड़तंत्र में तब्‍दील होने की परिणति है।
सुनीता की कहानी अंतिम नहीं है और न ही गुवाहाटी की घटना के बाद देशभर में जताया जा रहा आक्रोश हमारे समाज की पितृसत्‍तात्‍मक तस्‍वीर को बदलने के लिए काफी है। लगातार ऐसी घटनाओं का सामने आना समाज में महिलाओं के प्रति असुरक्षा का माहौल पैदा करता है। ऐसा होने देने के पीछे कुछ राजनीतिक स्‍वार्थ भी हैं। समाज के विकसित, शिक्षित वर्ग को इन्‍हें समझना होगा और तभी ऐसी घटनाओं को रोकने का कोई रास्‍ता निकल सकेगा।
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Tuesday, July 10, 2012

 कभी कभी हम ये नहीं समझ पाते की क्या अच्छा है और क्या गलत ,क्युकी हमारे पास सब्र नाम की कोई  चीज़ नहीं है ,हो भी कैसे हर चीज़ को पाने की जल्दी ,के चलते उस बात से होने वाले नुक्सान को हम भुला बैठते है ,लेकिन अगर थोडा सा सब्र रख के किया गया काम बहुत ही इन्मेनान के साथ संपन होता है ,इसकी अनुभूति उस समय हुई जब मेरे  किये गए काम का मुझे कोई पारितोषक नहीं मिला जबकि में  उसकी हकदार थी,मुझे बहुत दुख हुआ।तब मुझे मेरे गुरु नै कहा शायद आज का दिन तुम्हारे लिए नहीं था .तुमने बहुत उत्सुकता पूर्वक काम किया ,बिना ये सोचे की इसका अंजाम क्या होगा ,जबकि कोई भी काम बिना उसके परिणाम को सोचे नहीं किया जाना चाहिए ,बस फिर क्या था ,मेरा पारा  चड़ा हुआ था दिमाग गरम ,लेकिन जैसे ही ये बाते कानो में गूंजी ,मन शांत हुआ ,और हम जुट गए फिर से नए सिरे से काम में ,वो दिन है और आज का दिन जब कभी भी ऐसे परिस्थिति आती है,मुझे वो गुरु की बात याद आती है और में  रस बस के पुरे तन मन के साथ लग जाती हु उस काम को पूरा करने में ।और अब मेरे सारे काम बहुत ही अच्छे से पुरे होते है ।

Tuesday, June 19, 2012

dear pranav

Tumhara pass na hona ,tumhara mujhe samjhana ,tumhara wo pyaar se mujhe    babu    kahana ,ab mere roj ki aadat mai shumaar ho gaya hai na jaane kyu.tum mere dincharya ka ek abhin ang banchuke ho.subah need mai hoti hu to ye ahsaas hota hai ki abhi msg aayega mujhe gdmg ka tabhi aanke kholungi....msg dekh ke mo ko apne pass rakh ke fir sukoon se uttnai par jo taazgi or apnepan ka ahasaas hota hai wo mai bayaan nahi kar sakti...mere zindagi mai bahut dino ke baad kuch aisa hua hai jisko mahsoos karke mai khush rahati hu.or is mai bahne ka man karta hai...ye pyaar nahi kuch or hai...pyaar mai log paane ki iksha karte hai roj milte hai..mujhe tumse milne ki koi jaldi nahi hai par tumko sunne ke tamanna har pal hoti hai .tumse baat karne ka bahana khojti hu.kab ek baar fir se baat karu.or sunno tumhari awaaz ke kasish mujhe kisse alag hi duniya mai le jaati hai waise mai sunne waalo mai nahi hu par jab tumko sunti hu to aisa lagta hai..kaas mai tumhare pass hoti,or shaanti se tumko sambhalti.tumse pyaar karna bahut asaan hai par us pyaar ka izhaar karna muskil... ye pyaar hai ya nahi kabhi kabhi ye bhi kah pana muskil hota hai ye dosti hai tuhare liye mere liye dosti wala pyaar...tumhara mujhe samjhana mujhe blank kar deta hai mai shaant ho jaati hu....lagta hai jaise kisse bache ko koi samjhata  .ye rista ajeeb hai ,na pass aana hai , na dur jana hai,par mujhe tum chahiye mere zindagi mai hamesha bas yuhi batiyate ...mere soye huye ahsaas ko jagate .ek mariyaada ke andar... tumpe pyaar aata hai  par gussa bhi jab tum mujhse mere man ki sunke uska jawaab nahi dete.koi chahat nahi ki tum mujhe chaho.tum mujhe pyaar karo ye bhi nahi chahiye tum mujhe apna touch do iski bhi chahat nahi.bas sirf itna ki mujhe waise hi apnao ek dost ki tarah ,jiske saath mai hasu mai ro saku,mai apni sab tarah ki baat karu bas ye jo.bahut ha pranav  mujhe ye kahane mai koi dar nahi ki mujhe tere aadat ho gaye hai........... bahut kam samy mai.ye aadat mai nasha wo nasha hai jo bayaan nahi kiya ja sakta ....ismai bahut apna pan hai...mere liye ye kaafi hai ..tera mere zindagi mai hona mere hone ka saboot hai bas itna hi .ye love letter hai ya nahi ye tum samjho mujhe jo kahana tha  maine apne man ki kah di..bas agar ye pyaar hai to hai.ha mujhe tumse pyaar hai. tumhe na ho to koi baat nahi...mujhe pyaar karne ki aadat hai.tumhe na kahane ki..tumhe tuhari aadat mubarak mujhe mere.. par ek baat bolu bahut accha lagta hai.jab aap kisse ek ke baare mai din bhar socho...or uske liye har wo cheeze karna chaho jo namumkin hai........shayad yahi pyar hai.  pranav I LOVE U    N    MISS U LOT....

ALWAYS URS
BABU
ye prem patra ek kalpana maatra hai ....shayad mai kuch aise hi likhti agar mera koi pranav hota jo mujhe babu kahata....sapne bahut sundar hote hai....aaj tak love letter ka majoom nahi jaana par shayad yaha majoom ki jarurat nahi..........ye dil ki baat hai dil se kahi jaati hai...khambhakhat pyaar bhi kya bala hai...jaisa bhi hai accha hi hota hoga ...........

आज भी जब  हम किसी  से अपने दिल की कोई बात नहीं कह पाते तो अन्दर ही अन्दर घुटे चले जाते है ........या ये सोचने लगते है की मेरा वो दोस्त या मेरा वो हमसफ़र अपने आप मेरे वो बात समझ जाए जो हम उससे कह नहीं पा  रहे ......पर क्यों वो उसको समझे .....आप की भावनाए है ....आपका बयां करने का तरीका ,कुछ अलग हो सकता है।......शायद वो इतना अच्छा हो की वो उसको इतना पसंद आये की जो आप उससे  चाह रहे थे उससे कई ज्यादा आपको वो देदे .....पर नहीं यहाँ...........  मे बात कर रही हु हम औरतो की .....जो ज़िन्दगी भर इस  कसमकस   मे  रहती  है की उनका हमसफ़र आगे से आये उसकी तारीफ करे या उसको प्रेम करता है वो कुछ अलग अंदाज़  मे बयान करे ...........पर तुम क्या चाह  रही हो वो मत कहो .........तो ऐसा नहीं होना चाहिए ..............अगर   किसी से कुछ लेना है तो पहले देना आना चाहिए ....जो हम नहीं करते .........बस लेने मे  माहिर है .....फिर भले ही वो कुछ भी क्यों न हो ....मेरी बहुत ही अच्छी सहेली मनु  से मेरे युही चर्चा चली की और बताओ लाइफ कैसे चल रही  है ...उसने बताया बहुत बढ़िया ....मैंने कहा सच मे  या युही कह दिया मेरा मन रखने के लिए। बोली नही ....सच बता रही हु ..........मेरा सुमित बहुत ही समझदार है ..वो मुझे और मेरे बेटी को इतने अच्छे से संभालता है की मैंने कभी यार शादी के पहले सोचा नहीं था ....स्नेहा  जब हमने प्यार किया था तब हम दोनों एक दुश्रे के साथ बहुत ज्यादा समय निकालते है .....फिर उसमे मुझे शादी के लिए कहा तो मुझे नहीं पता था की मे इसके साथ निभा पाउंगी की नहीं ...पर मैंने हा कहा .और शादी की .......तब उसकी कमाए भी ज्यादा नहीं थी ....पर आज वो जैसा भी कम रहा है ...हम दोनों को खुश रखता है ...अभी हाल ही मे मै  उससे कुछ नाराज़ हो गए थी .....उसको समझ मे आया ...पर पहले उसने मुझसे मेरा मूड जाना और कहा मनु तुझे क्या हुआ है .....तू मेरे से इस तरह क्यों पेश आ रही है न बात न चीत  जब तक तुम मुझे बोलोगी नहीं तब तक मई कैसे समझ सकूँगा की आख़िर  क्या हुआ है ...तब मनु  नै कहा.... .तुम्हारे पास मेरे लिए समय नहीं है ....सुमित  बोला   ...नहीं ऐसा नहीं है ... तुम ही बताओ  रोज ऑफिस  किसके  लिए जाता  हूँ ...मेरे बेटी और तेरे लिए ही न .....आज मे  नहीं कमाऊंगा तो तेरे को कैसे खुश रख पाउँगा ...फिर सन्डे तो अपना है ही ....तेर बिना मई कही जाता भी नहीं ....जब भी जाता हु अपन तीनो साथ होते है .....ये समय देना नहीं है क्या ......मुझे भी लगता है की तुम मुझे समय नहीं देती जब देखो तब बेटी के साथ तो क्या मई भी मुह फुला के बेथ जाओ ......नहीं मे समझता  हु ....की तुम्हारे लिए पहले अपनी बेटी है फिर मे ....तो अब गुस्सा छोड़ो और हसो ......मनु नै अपनी बात ख़तम की और मैंने उससे कहा यार ये बात तो तुझे समझ नहीं आयी .....तू पागल है क्या जो इतनी से बात पर उससे गुस्सा हो गए थी     ........तब जो मनु नए मुझेसे कहा  वो शानदार था ........स्नेहा  तुझे क्या लगता है ...मुझे नहीं पता की ये मे नहीं समझी नहीं मुझे ये पता था पर मे   ये सब उसके मुह से सुनना चाह  रही थी ....की वो मुझे मिस करता  है ......बस सुमित नै कहा और मैंने उसे अपने गले लगा लिया ...................यार मतलब ये सब सिर्फ उसके मुह से सुनने के लिए ..................omg 

Saturday, June 16, 2012

यहाँ आज बात मेरे और बारिश की तो है साथ ही उस जीव की भी है .................जो रंग बदलती है अपना ठीक वैसे जैसे इंसान बदलता है अपने परिवेश  की तरह......................................................... .......................................................................मौसम की पहली  बारिश मे भीगने का मजा ही कुछ  और है।और वो भी कुछ ऐसे जीवो के साथ जो आपके घर रोज आते है।आपके साथी जी हा यहाँ मे  बात कर रही हु....एक गिर्गितान की जो आज मेरे साथ भीगी ...उसको इतना  मजा आ रहा था की मैंने भी जोश मे  आके उसके साथ हर बूंदों का मजा लिया ......जबरदस्त गर्मी के बाद पानी की झमाझम नै जैसे मेरे मन को भिगो दिया .....वैसे ही वो उस तपती धरती को भिगोती होगी .......जिसके सीने मे  न जाने कितनो का भार है .....और उस पे ये गर्मी की तपन जो  उसको अन्दर से पूरा निचोड़ चुकी  होती है।आज तन के साथ मन भी भीगा ,और घर भी ,मेरा आँगन भी ,और बहुत सारे अरमान भी ,जिन्हें मैंने संजोया था ,वो भी उस गरज बरस के साथ शांत हो गए ....हमेशा की तरह अपने आप को समझाते हुए की ,नहीं अभी समय नहीं आया है ,इन्हें उस धरती के तरह अपने अन्दर दफ़न कर दो ......जब अति हो  जाएगी ....तब ये भी ऐसे कम्पन के साथ बहार आएगा की सब कुछ हिल जायेगा ..कभी  कभी काफी कुछ अनकही  बातो को सहेजना .....दिल को सुकून दे जाता है .........इन बातो के सहारे ,हमारे चंद   लम्हों के सहारे , हम अपनी पूरी ज़िन्दगी जी लेते है ...............यही कुछ मैंने भी किया है अपने दिल के साथ ...................शुक्रगुज़ार हु अपने दिल की जिसने मुझे होसला दिया......मजबूती दी ..........यही कारण है की आज मे उन्मुक्त होके इस बारिश की बूंदों को महसूस कर रही हु....... उसमे खुद से बाते करती मे...... अपने आप को भीगोती मे ......और ये बुँदे अपने मे छुपा लेते है मेरे आंसुओ के पानी को .....घोल लेते है कुछ ऐसे जैसे नमक मे पानी ....................शुक्रिया बारिश ,और शुक्रिया मेरी प्यारी सहेली  गिर्गितान .....बारिश की तरह और तुम्हारी तरह मे भी अब समय पर ही अपना रंग दिखाउंगी .................जिसको भीगना होगा ..........वो भीगेगा वरना मे तो भीग चुकी ..........

Friday, June 15, 2012

दोस्तों  ....हिंदी मै  पहले पोस्ट है ........गलतिया सुधार कर  पढ़े ..............एक दोस्त के कमेन्ट के लिए हिंदी  मै  लिख ही डाला .............आज कुछ ज्यादा ही लिख डाला ..........
 sache dosti ki shuruaat......................... एक मित्र ने कहा क्या बात है ...आज कल क्या चल रहा है ....मुझसे रहा नहीं गया कहा बस तुम्हारा  ही इंतज़ार कर रही थी ........की तुम आओ और मुझे कुछ ऐसा बता जाओ जिससे जानकार मै उसको बुनने मै उसको सुलझाने मै लग जाऊ ..अचानक एक ऐसा दोस्त आया जिसने अपनी ज़िन्दगी की किताब कुछ ऐसे खोल दी मेरे सामने ........जैसे जानता हो मेरे को बरसो ..........से पर हकीकत ये है की हम आज तक मिले ही नहीं .....उसकी ज़िन्दगी के पन्नो मै एक बचपन था प्यारा सा ...कुछ माँ की यादे कुछ बाबा की बाते ..........और बाकी सब कुछ उसकी अपनी कहानी .........मै यही सोचती रही की कोई ऐसे कैसे मुझे पर यकीन दिखा रहा है....यहाँ जिनसे यकीन की बरोसे की उम्मीद थी वो तो सब मतलबी निकले पर ये है की कुछ अजीब सा ही है......उसकी कहानी बहुत असहज थी ,मुस्किल नहीं कहूँगी पर दुखो से भरी
...........जिसने उसको इतना कठोर बना दिया    की  उसने अपने आस पास एक काटो भरा जाल बुन लिया था ..........जिसमे .न जाने कितने सारे नियम ,पाबंदिया और सवाल  और एक अजीब से बंदिश जो उसने खुद को दुनिया से लोगो से दूर रखने के लिए बना राखी थी.जब मैंने उस्सको सुना तब मेरे एक भ्रान्ति  दूर हो गए की लडको को भी रोना आता है ....उनको भी तकलीफ होती है जब कोई उनका दिल तोड़ता है.....कहानी मै उसके सब कुछ था ..........बहुत सारा बचपन .....जवानी की अल्हड़ता .....लड़कपन  की जल्दबाजी .....और सब कुछ पाने की जल्दी ...........वो अपनी कहानी मुझे कहता गया मै सुनती गए ...पर एक मोड़ ऐसा आया जब उसकी कहानी के पहिये एक मंजिल पर आके रुके जो शायद उसकी मंजिल न बन सखी ............और उस मंजिल को उसने अपनी रूह मै जगह दे दी ..........अब जब कहानी की मंजिल रूह पे अपना हक जमाये बेठी  थी तो उसका शांत होना  अस्वाभाविक  था ...........दिल दिमाग मै जबरदस्त अतिक्रमंड सारे रास्ते जाम ,न समझ सको की क्या हुआ न जान सखो की क्या चाहिए .......बस उस मंजिल के बारे मै सोचना ,और उसमे ही जीना ................उसकी हालत को मै समझ गयी ....मेरे अन्दर से आवाज़ आये की इससे दोस्त बना ले ...... इसको अभी जरुरत है .किस्से ऐसे की जो उसकी सुने ........और फिर मुझे तो बनना ही था .........उसने एक तरफ़ा मुझपर  विश्वास जो किया था ............प्यासे को क्या चाहिए दो बूंद पानी.......मेरे लिए उसका विश्वास कुछ ऐसा ही था ...........और हम दोस्त बन गए .............अब वो खुश रहने की कोशिश कर रहा है.....और मै इंतज़ार करती हु...........उसकी नए बातो को सुनने की .........समझने की............पर उसको बदलने मै मै अपना समय नहीं गवाउंगी .........क्युकी मुझे लगता है .....आदमी जिस परिवेश मै रहता है......वो अपने आस पास एक ऐसा कवच बना लेता है ..........जिसको तोडने की इज़ाज़त  उसकी पसंद के इंसान की ही होनी चाहिए..............मुझे यकीन है मेरे इस दोस्त को वो इंसान जल्द ही मिलेगा जो उसको इस . कवच रूपी दायेरो से बहार लाएगा ..........और मेरा ये दोस्त एक बार फिर........  ज़िन्दगी अपनी शर्तो पे जियेगा.........ये विराम है इस कहानी का अंत नहीं.    
zindagi bahut ajeeb hai yaha kab koi mil jaye pata nahi ........waise to life ke har mod pe kai log aaye kai gaye .apni baat kahate ,mai sunti or patli gali se nikal lete aaj tak koi aisa nahi aaya jisnai kabhi mujhe bhi sunne ki iksha jataye.........mujhe jarurat bhi nahi lagi ki mai bhi kisse ko sunaao par koi nahi ab sunne ke aadat se ho gaye ahi.saala jab tak sunnu nahi khana hazam nahi hota ..............accha bhi hai..........dimaag mai kaye tarh se kai chemical milte hai or ek naya locha suru hota hai.................kabhi butterfly udnai lagte hai kabhi rone ka man hota ahi ,kabhi khub khaane ka man hota hai...... kabhi khana banane ka man hota hai..........kabhi lagta ahi apni dhanno ko lo or long drive par nikal jaao ............thaks to all lochaas inmy mind jinki wajah se mai itna sab kuch kar rahi hu or apni life mai mast hu                ..................bindaas mast sneh se bharpoor sneha or uski ajab gajab se duniya or ajab gajab se kahaniya ..............soch rahi hu ami bhi suru se sab likh maarti hu.............