सुनो जानेमन ,
जरुरी नहीं की मेरे कहने पे तुम इतराओ ,
यु लजाओ जरा फिर से एक बार मेरे पहले वाली प्रियेतामा बना जाओ ....
सुनो जानेमन ,
बरस बीते कुछ अच्छा सुने ,तेरे सुन्दर मुख से,
सुनो फिर से कुछ वैसे ही आके कुछ धीरे से होले से ,
मेरे कानो मै कुछ गुनगुना जाओ ,
जरा फिर से मेरे पहले वाली प्रियतमा बन जाओ ....
सुनो जाने मन ,
वो पहले जैसे कहती थी तुम्हारी आँखे मुझसे ,
कुछ अपनी ,कुछ घर की,कुछ सब की,
जरुरी नहीं मेरे कहने पे तुम कहो ,
फिर एक बार आँखों से अपनी कुछ अपनी आप बीती कह जाओ ,
सुनो जाने मन
जरा एक बार फिर मेरे पहले वाली प्रियतमा बन जाओ .....
बढिया
ReplyDeleteअच्छी रचना
वाह...
ReplyDeleteबहुत सुन्दर रचना...
हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!
अनु
बेहतरीन ........सुनो जानेमन ....बधाई
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