Friday, June 15, 2012

 sache dosti ki shuruaat......................... एक मित्र ने कहा क्या बात है ...आज कल क्या चल रहा है ....मुझसे रहा नहीं गया कहा बस तुम्हारा  ही इंतज़ार कर रही थी ........की तुम आओ और मुझे कुछ ऐसा बता जाओ जिससे जानकार मै उसको बुनने मै उसको सुलझाने मै लग जाऊ ..अचानक एक ऐसा दोस्त आया जिसने अपनी ज़िन्दगी की किताब कुछ ऐसे खोल दी मेरे सामने ........जैसे जानता हो मेरे को बरसो ..........से पर हकीकत ये है की हम आज तक मिले ही नहीं .....उसकी ज़िन्दगी के पन्नो मै एक बचपन था प्यारा सा ...कुछ माँ की यादे कुछ बाबा की बाते ..........और बाकी सब कुछ उसकी अपनी कहानी .........मै यही सोचती रही की कोई ऐसे कैसे मुझे पर यकीन दिखा रहा है....यहाँ जिनसे यकीन की बरोसे की उम्मीद थी वो तो सब मतलबी निकले पर ये है की कुछ अजीब सा ही है......उसकी कहानी बहुत असहज थी ,मुस्किल नहीं कहूँगी पर दुखो से भरी
...........जिसने उसको इतना कठोर बना दिया    की  उसने अपने आस पास एक काटो भरा जाल बुन लिया था ..........जिसमे .न जाने कितने सारे नियम ,पाबंदिया और सवाल  और एक अजीब से बंदिश जो उसने खुद को दुनिया से लोगो से दूर रखने के लिए बना राखी थी.जब मैंने उस्सको सुना तब मेरे एक भ्रान्ति  दूर हो गए की लडको को भी रोना आता है ....उनको भी तकलीफ होती है जब कोई उनका दिल तोड़ता है.....कहानी मै उसके सब कुछ था ..........बहुत सारा बचपन .....जवानी की अल्हड़ता .....लड़कपन  की जल्दबाजी .....और सब कुछ पाने की जल्दी ...........वो अपनी कहानी मुझे कहता गया मै सुनती गए ...पर एक मोड़ ऐसा आया जब उसकी कहानी के पहिये एक मंजिल पर आके रुके जो शायद उसकी मंजिल न बन सखी ............और उस मंजिल को उसने अपनी रूह मै जगह दे दी ..........अब जब कहानी की मंजिल रूह पे अपना हक जमाये बेठी  थी तो उसका शांत होना  अस्वाभाविक  था ...........दिल दिमाग मै जबरदस्त अतिक्रमंड सारे रास्ते जाम ,न समझ सको की क्या हुआ न जान सखो की क्या चाहिए .......बस उस मंजिल के बारे मै सोचना ,और उसमे ही जीना ................उसकी हालत को मै समझ गयी ....मेरे अन्दर से आवाज़ आये की इससे दोस्त बना ले ...... इसको अभी जरुरत है .किस्से ऐसे की जो उसकी सुने ........और फिर मुझे तो बनना ही था .........उसने एक तरफ़ा मुझपर  विश्वास जो किया था ............प्यासे को क्या चाहिए दो बूंद पानी.......मेरे लिए उसका विश्वास कुछ ऐसा ही था ...........और हम दोस्त बन गए .............अब वो खुश रहने की कोशिश कर रहा है.....और मै इंतज़ार करती हु...........उसकी नए बातो को सुनने की .........समझने की............पर उसको बदलने मै मै अपना समय नहीं गवाउंगी .........क्युकी मुझे लगता है .....आदमी जिस परिवेश मै रहता है......वो अपने आस पास एक ऐसा कवच बना लेता है ..........जिसको तोडने की इज़ाज़त  उसकी पसंद के इंसान की ही होनी चाहिए..............मुझे यकीन है मेरे इस दोस्त को वो इंसान जल्द ही मिलेगा जो उसको इस . कवच रूपी दायेरो से बहार लाएगा ..........और मेरा ये दोस्त एक बार फिर........  ज़िन्दगी अपनी शर्तो पे जियेगा.........ये विराम है इस कहानी का अंत नहीं.    

7 comments:

  1. अच्छी शुरुआत.ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है.
    कृपया वर्ड वेरिफिकेशन को हटा दें इससे टिप्पणी करने में आसानी होगी.

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  2. Replies
    1. tomar ji aapko dhanyawaad mujhe protshahit karnai ke liye.........

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  3. बहुत अच्‍छी लिखी है। दिल से बधाई। ऐसे ही लिखते रहिए।

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    1. soumitra ji aapnai sahi kaha dil se likha hai dil ki baat hai........kabhi kabhi kuch baate dil ko touch karti hai ye aisa hi kuch hai....thanks

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