Saturday, September 15, 2012

मीडिया का इंद्रजाल और आंदोलनों का तिलिस्‍म


जादूगर के तमाशे और सड़क पर भीख मांगती किसी महिला और उसकी गोद में एक बीमार बच्‍चे में क्‍या फर्क है। कहीं न कहीं दोनों ही आंखों का धोखा हैं। ये इंद्रजाल है। इसका तिलिस्‍म टूटता है तो लोग खुद को कोसते हैं। मध्‍यप्रदेश में ओंकारेश्‍वर बांध का जलसत्‍याग्रह और भोपाल में इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शन का तमाशा दोनों इसकी जीती-जागती मिसाल हैं। दोनों को मीडिया ने एक इंद्रजाल की तरह पेश किया। यह दिखाने की कोशिश की कि लोग अब सड़कों पर लड़ाई लड़ने को आगे आ रहे हैं। लेकिन इनका तिलिस्‍म जल्‍द ही टूट गया। टाइम्‍स ऑफ इंडिया की एक खबर में पत्रकार ने लिखा है कि जल सत्‍याग्रही टीवी कवरेज के लिए 20 फुट के गहरे गड्ढे में बैठे थे। सरकार के झुकने से जब पानी उतरा तो यह तिलिस्‍म भी टूट गया। इस खबर पर नर्मदा बचाओ आंदोलन की कथित नेता चित्‍तरूपा पालित का वह पत्र भी हास्‍यास्‍पद है, जिसमें उसने आंदोलन के नेता आलोक अग्रवाल का बयान न छापे जाने की निंदा की है। उन्‍हें पत्रकार को यह सीख देने का कोई हक नहीं है कि वह किसका बयान छापे और किसका नहीं। पत्रकार ने (भले ही पानी उतरने के चार दिन बाद ही सही) मौके पर जाकर जो देखा वही लिखा। गड्ढा तो 20 फुट का ही है, उसे नकारने वाला कोई नहीं। उसमें कोई डूब नहीं सकता। नाक तक पानी आने की असलियत भी उजागर हो गई है। समूचा तिलिस्‍म ही टूट गया है। मेरे अपने शहर जबलपुर में भी यही तमाशा कुछ स्‍वयंसेवी संगठनों ने जलसत्‍याग्रह के नाम से किया और मीडिया का कवरेज भी लूटा। भोपाल में भी ज्‍योति टॉकीज चौराहे पर कुछ युवाओं ने पानी की टंकी में डूबकर ऐसा ही तमाशा किया था। ऐसे लोग अपने पीछे कुछ समर्थकों को छोड़कर आते हैं, जो असल में प्रचारक हैं। वे फोटो को बार बार फेसबुक पर लगाते हैं, ताकि ज्‍यादा से ज्‍यादा संवेदनाएं जुटाई जा सकें। दूसरा वर्ग इनके प्रशंसकों का है, जो हां में हां मिलाने का काम करते हैं।
तिलिस्‍म टूटता है तो मुझ जैसे आम नागरिकों को बहुत दर्द होता है, जो सही मायनों में इंसाफ चाहते हैं। इंसाफ उस कौम के लिए जो बरगी, सरदार सरोवर, इंदिरा सागर और महेश्‍वर जैसे बांधों से प्रभावित है। जिन्‍हें अब तक जमीन नहीं मिली। मेधा पाटकर ने इनके लिए लंबी जमीनी लड़ाई लड़ी। लेकिन इन दोनों लड़ाइयों में उन्‍हें बिल्‍कुल अलग-थलग रखा गया। लगता है (?) नर्मदा बचाओ आंदोलन का नेतृत्‍व अब चित्‍तरूपा पालित उर्फ सिल्‍वी जैसी सनसनी पैदा कर जंग जीतने का इरादा रखने वाली नेताओं के हाथ में आ गया है। ठीक वैसे ही, जैसे अन्‍ना को परे रखकर राजनीति में कूदने की घोषणा करते ही इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शन का तिलिस्‍म टूट गया। भोपाल में मनीष सिसोदिया के सामने इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शन के कार्यकर्ताओं ने एक-दूसरे को मां-बहन की गालियों और मर्डर, घोटाले के आरोपों से नवाज दिया। असल में यही असलियत है जमीनी आंदोलन के नाम पर तिलिस्‍म का चोगा पहनकर घूमने वाले युवाओं की। इनमें से कुछ तो अपने नाम के साथ एक्‍टिविस्‍ट की पट्टी लगाकर भी घूमते हैं।
असल में सरकार और जनता के बीच खड़ी है सिविल सोसायटी। दोनों के बीच मीडिया भी खड़ी है। जब कभी मीडिया आगे बढ़कर आंदोलनों के तिलिस्‍म में उलझकर सिविल सोसायटी से हाथ मिला लेती है तो जनता का पलड़ा वजनदार हो जाता है। यह सिविल सोसायटी के हाथों इस्‍तेमाल होने जैसी बात है और मुझे नहीं लगता कि किसी छोटे से बड़े पत्रकार को यह गवारा होगा। टाइम्‍स की खबर से यह साफ जाहिर हो गया है कि मीडिया अपनी इस कोशिश में एक इंद्रजाल बुनती है। लोगों को धीरे-धीरे समझ आने लगा है कि यह एक धोखा है। इस धोखेबाजी में सबसे ज्‍यादा फायदा सिविल सोसायटी के उन लोगों का हो रहा है, जिनका एकमात्र मकसद सिर्फ प्रचार पाना है। दुर्गति के शिकार ओंकारेश्‍वर बांध से विस्‍थापित वे लोग हुए हैं और होंगे, जिन्‍होंने ऐसे लोगों की बात सुनकर अपना जल सत्‍याग्रह छोड़ दिया। उनके इस कदम से इंदिरा सागर बांध के विस्‍थापितों का जल सत्‍याग्रह खत्‍म हो गया। चित्‍तरूपा पालित अगर वाकई प्रचार की भूखी नहीं थी तो उन्‍हें जमीन मिलने तक आंदोलन जारी रखना था। क्‍या मध्‍यप्रदेश सरकार दर्जनों मीडियाकर्मियों के सामने उनका आंदोलन खत्‍म करा सकती थी। लेकिन उन्‍होंने ऐसा नहीं किया और इंदिरा सागर बांध के विस्‍थापितों की आवाज बंद करने का विरोध भी नहीं हुआ। यहां तक कि जल सत्‍याग्रह को प्रचारित कर रहे भोपाल और दिल्‍ली में बैठे समर्थक 
भी महंगाई का रोना रोने लगे।
मेरे जैसे पत्रकार के लिए यह बेहद दुखद है कि जनांदोलनों का तिलिस्‍म कुछ इस कदर से टूट रहा है कि 
मीडिया के पास खुद को कोसने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं बचा। जब आंदोलन की जमीन मीडिया और फेसबुक बन जाए तो उसका तिलिस्‍म टूटने में देर नहीं लगती। भाइयों और बहनों, इस माह की तीनों बड़ी घटनाओं से सबक लो और जमीन के आंदोलनों को जमीन में ही लड़ो। तुम्‍हारी आवाज इतनी बुलंद होनी चाहिए कि बिना मीडिया और फेसबुक के वह दिल्‍ली तक गूंजे। 
मेरे जैसे पत्रकार के लिए यह बेहद दुखद है कि जनांदोलनों का तिलिस्‍म कुछ इस कदर से टूट रहा है कि मीडिया के पास खुद को कोसने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं बचा। जब आंदोलन की जमीन मीडिया और फेसबुक बन जाए तो उसका तिलिस्‍म टूटने में देर नहीं लगती। भाइयों और बहनों, इस माह की तीनों बड़ी घटनाओं से सबक लो और जमीन के आंदोलनों को जमीन में ही लड़ो। तुम्‍हारी आवाज इतनी बुलंद होनी चाहिए कि बिना मीडिया और फेसबुक के वह दिल्‍ली तक गूंजे। 




No comments:

Post a Comment