Friday, November 14, 2014

यहाँ अस्थिरता का डेरा है ,जो सिर्फ मेरा है मेरा है मेरा है।

कोई क्यों कर बदले ,या न बदले, बदले तो ऐसे या वैसे ,या फिर उस तरह जैसे उस दिन कहा था ,उस दिन वाला याद नहीं तो, आज जो कहा वो पल्लेबांध कर बदलो ,लेकिन बदलो ,सवाल वही है ,की कैसे ?जब बदलने के लिए कुछ होगा तभी न बदलेगा ?दिमाग ,में २४ घंटे साला एक ही धुन बजेगी तो दिमाग कैसे बदलने की सोचेगा ?ये करो वो करो, करो तो कैसे करो ?जो करना है , हमको हीन करना है . तुम बस बोलते जाओ हम सुनते जाए, ये सुनना वहाँ ऐसा करना है ?उसको ऐसा बोला ,इसको वैसा बोला ,दिमाग को जब एक की आदत सी हो जाए तो समझ लो डूबने की आखिरी घड़ी नज़दीक है। दिमाग का सन्नाटा और मन की अस्थिरता को काबू में लाने में समय लगता है। समय ये भी एक कहानी है ,जिसको जरुरत है उसके लिए होता नहीं जहा कोई मोल नहीं वहा अपार है। हम तो जैसे थे ,वैसे ही रहेंगे ,ऐसा सोचा नहीं है ठाना नहीं है। कुछ बंधा हुआ है ,कहा पता नहीं ,क्यों पता नहीं ,उस बंधन से मुक्ति चाहिए नहीं ,चाहिए है जो वो मिलेगा नहीं ,रोके गाके हँसके जो करना है कर लो ,जानते हुए भी चाहिए तो वही ,बस एक वही यही जो चाहिए मन का मीट कह लो या एक सपना हक़ीक़त में बदलनेवाला नहीं कभी नहीं कभी नहीं कभी नहीं। लेकिन उसको पाने के लालसा अब नहीं ,फिर भी एक उम्मीद है कीशायद मिलेगा कभी मुझे वो बस यही यही यही। वह री मन की विडम्बना तू जा कही और कही किसी और के दिल घूम के आ। अभी यहाँ अस्थिरता का डेरा है ,जो सिर्फ मेरा है मेरा है मेरा है।
जो भी आदमी या औरत खुद को हर मामले में डेमोक्रेटिक, लिबरल, एथीस्ट, फेमिनिस्ट, प्रोग्रेसिव वगैरह वगैरह क्लेम कर रहा या रही है उससे उसके घर का हाल पूछ लीजिए। सारी क्रांति धरी की धरी रह जाएगी। 
जो व्यक्ति, लड़कियों को खुद के बनाए खांचे में फिट बैठने वाली प्रगतिशीलता, स्वतंत्रता आदी का घनघोर पक्षधर है उससे बस एक बार उसकी ही पीढ़ी के और उसके अपने रिश्तेदारों का हाल ले लीजिए। ज्यादा कुछ मत कीजिए।
कहने और करने में बहुत फर्क होता है ,इसलिए जो कह रहे है करने की हिम्मत भी करे। कहने वालो का कुछ नहीं जाता करने वाले कमाल करते है। जो कर लिया तो गुरु हो गए। वरना धूनी जमाये अपने तिये पे। 
आज कुछ भी लिखा है की धुन सवार है अकल मिली है थोड़ी सी ,यु तो हम कुछ लिखते नहीं ,बोलते नहीं ,लेकिन जब बोलते है तब मिर्ची लगती है सबको। इस लिए हम एक झटके में नेगेटिव हो जाते है।

Monday, October 27, 2014

ये एक भरम था।

तुम्हारा अनदेखा सा  अनमना सा वो मुट्ठी भर दिल ,
और उसकी वो धक धक करती धड़कन  की आवाज़ ,
आज भी मेरे कानो को ,उस पल  का अहसास कराती है ,
इसको सुनने की प्रबल इक्शा शक्ति  ने मुझे ,
अनहोने मोह की आंच में तापा दिया।
उस कमरे की सनसनाहट  और तुम्हारे बकबक की आवाज़ ,
बहार का  मौसम ,अजीब सी निडरता ,और साहस का वो अहसास ,
मुझे कही भी ले  जा सकता था ,तुम भी बंधे थे ,अधमने से ,
उस पल में बंद मेरी आँखे ,तुम्हारी खुली आँखों से उस याद को जी रही थी ,
जो तुम्हारे दिल और दिमाग को दबोचे हुए थी ,पागल थी में ,उस पल को जीना चाहती थी ,
दिल की दो धड़कनो के बीच कोई एक जगह थी ,जहा कोई पागल नहीं होता ,
मेरा पागल दिल कुछ  सोचना ही नहीं चाह रहा था ,वो सिर्फ कमरे की  दीवाल ,
को निहार रहा था ,एक टक टकटक ,बोल अलग थे ,दिल कुछ और बोल रहा था ,
कंधे के नीचे माथा टेकी मासूम ,पागल  सी वो लड़की उसको रुक रुक के देखती ,
उसका गठा   बदन जिसमे कोई रवानी नहीं थी ,जो था वो दिल और दिमाग में चल रही कश्मकश।
वो कब दबे पाँव इसके दिल में घर कर गया पगली  को पता नहीं चला ,
उस दिन उन अधूरी सी धड़कनो को सुनके उसको लगा की वो उसके लिए नहीं धड़क रहा  है।
वो होले  से उठी ,और उसको अधूरे आलिंगन की बजाये पूरा भींच लिया।
उसने कुछ बहुत ही धीरे से निडरता से कुछ कहा जैसे वो सुन ही न रहा हो।
उसने सुन लिया था ,और आगे बाहो को जकड़ते हुए उस सुकून को जताया जिसको
दोनों ने अनमने ,शायद किसी एक ने महसूस किया,मानो  दोनों के लिए ये एक भरम था। 

Saturday, October 11, 2014

तुम ...और तुम्हारा प्रेम ...



गिराए हुए पर्दो के बीच से झांकना
उठाए हुए दंभ की दीवार लांघना
शक की सिलवटें पोंछ आना
विश्वास की चादर ओढ़ आना

कभी..जब भर जाए मन
तुम्हारे गढ़े कठोर दायरों से
तो उसके पार आना तुम....

फिर
कहीं...
किसी मोड़ पर मिलना मुझसे
जब ढली हो शाम
महक रही हो रात
तारे टिमटिमा रहे हों
पसर रहा हो सन्नाटा...
अपने गुस्से को चकमा देकर
छिपते-छिपाते चले आना तुम
उन लम्हों के मंज़र पर
जहां बनाकर अधूरा छोड़ आए थे
खूबसूरत अहसासों का घरौंदा...
जहां से हमने शुरू किया था
अद्भुत अध्याय को गढ़ना....

और...
तब बुलाना मुझे
यथार्थ के उस जज़ीरे पर
जहां मेरा ख्वा ब मसल गए थे तुम....

मालूम है तुम्हें
तब से अब तक
न जाने कितने मौसम गुज़र गए
हम जले भी... सूखे भी... बिखरे भी
किन्तु
प्रतीक्षा के इस विशाल सागर में
आशाओं को भिगोए रखा

आना तुम जब एकांकी
मेरे लिए विलाप करने लगे
और
तब छूना मेरी धड़कनों को
अपनी मौजूदगी की शिनाख्त के लिए
उसमें मच रहे शोर से
जान जाओगे तुम....
कि मेरे लिए सदा से ही
कितना अनमोल रहा है
तुम... और तुम्हारा प्रेम !!

Wednesday, October 1, 2014

मेरी टीस

मुझे पता है वो तुम हो ही नहीं ,तुम जो हो वो मुझसे बेहतर कोई जानता नहीं ,
पर वो  शब्‍द ,जिसने मुझे सर से लेकर पाँव के खुर तक निचोड़ डाला। 
उसकी गंध ,उसकी तीखी धार ने अंदर तक भिगो दिया इस बार ,
विश्वास था की कुछ है ,जो अब भी है ,और रहेगा ,छुपा दिया है ,
उस... है, ..को कही अब मैंने ,अपने अंदर ,सपने की चादर के साथ ,
दुबक के किसी कोने में अब वो ,जो तुम ने मुझे दिया संवाद स्वरुप ,
वो वही पलेगा ,लेकिन बढ़ेगा नहीं ,उसकी नियति नहीं है बढ़ना ,
एक खाली जगह थी ,जिसे  भरा हुआ समझने की ग़लतफ़हमी में ,
अब मन, दिल जो चाहो कहो सब भीग चूका है ,
इस कदर की डूबने से पहले तैरना जरुरी हो गया है। 
झुकने की आदत ने मुझसे मेरी पहचान ले ली ,
रीढ़ की हड्डी अभी इतनी भी कमजोर नहीं हुयी,
ज़हर की पोटली पहले भी अंदर भरी थी ,आज भी है और मरते दम  तक रहेगी। 
तुम नीलकंठ नहीं बन सकते ,कोई बात नहीं ,समंदर का ज़हर पीना हर किसी के बस का नहीं। 


Monday, August 25, 2014

ओह रे बंधू..

ओह रे बंधू........................
तुमसे प्यार करना न तो मेरी मज़बूरी है ,
न ही मेरे ख्वाईश ,ये मेरी किस्मत है। 
ये प्यार कमबख्त अहसास ही कुछ ऐसा है ,
जो न चाहते हुए जकड़ता है पकड़ता है। 
इसे रोकना चाहा ,चाहकर भी नहीं रोका ,
इसमें डूबने का आनंद मुझे रास आया। 
ये रास अब आनंद बन गया है ,
ये जानते हुए की तू सिर्फ मेरा नहीं। 
तुझे चाहना मेरे फितरत बन चुकी है ,
दिन हो या रात ,या कोई और पल ,
दिमाग की कोशिकाओ में तेरे होने का ,
नशा कुछ ऐसे रेंगता है ,जैसे मेरे जिस्म में रक्तवाहिनियां। 
प्रयास जारी है ,इसे रोकू इसे थामु ,
पर ये थमता ही नहीं ,उम्र के साथ बढ़ते यौवन ,
यौवन की उन जटिलताओं को ढोते हुए ,
आज आखिर दिमाग ने कह दिया ,अब बस। 
सिर्फ और सिर्फ तुम्हे अताह प्यार करना , 
मेरी ज़िन्दगी है!!!!!!!!

Saturday, August 23, 2014

शादी प्यार या समझोता ? भाग १

ज़िन्दगी के १८ साल एक ऐसे इंसान के साथ रहके गुज़ारे जिसको नैना ने बहुत प्याररिश्ता  तोड़ लिया। नैना अपनी एक शौक  को पूरा करने के खातिर उस समय आशीष के साथ भागी, जब उसके घर वाले उसको भोपाल ले जा रहे थे ,किसी करीबी मित्र के बेटे से पापा ने नैना की शादी की बात चलायी थी ,बात पक्की हो गयी थी , नैना बेखबर थी ,जब उसको पता चला तो उसने आशीष को कहा की शादी करोगे मुझसे ?आशीष इससे पहले उसको अपना निवेदन कर चूका था ,तब नैना ने भाव नहीं दिया था। आज जब शादी की बात निकली ,नैना से रहा नहीं गया , आशीष को बुलाया ,शाम को भोपाल में सगाई की तैयारी में परिवार बिजी था ,नैना पार्लर जाने के नाम से निकली ,और आशीष के साथ बहुत दूर निकल गयी। 
आशीष आज जब घर आया तब उसने नैना की सहेलियों से बात नहीं की ,जो की उसके घर उससे मिलने १८ साल बाद आई थी ,सहेलियों को ड्राइंग रूम में छोड़ नैना किचन में गयी ,आशीष को खाना दिया ,इस दौरान दोनों ने शायद ही कोई बात की होगी ,जो घर पहले नैना की खिलखिलाहट से गूँज रहा था ,वहाँ मरघट सा सन्नाटा छा गया था। वो आया खाना खाया और निकल गया। इस खिलखिलाहट को सन्नाटे में बदलते हुए जब मैंने देखा तो दिमाग हिल गया था। लाज़मी था। ख़ास कर मुझ जैसे के लिए ,जिसके लिए प्यार और शादी के मायने ही अलग है। खासकर जब कोई कहे की लव मैरिज है। आज न मुझे लव  कही समझ आया , न ही कही मैरिज ?

Wednesday, July 30, 2014

सेठजी ,मेरे नज़र से।

सेठजी ,
जी हाँ, मै  बात कर  रही हु ,  शोभा डे की कहानी की ,वैसे तो मुझे इस तरह की किताबो को पढ्ने का   मौका नहीं मिला ,लेकिन जब ये किताब का मुख्य पृष्ट्य देखा तो लगा पता नहीं ,पॉलिटिक्स की कहानी है,और इन दिनों राजनीति  में बड़ा मज़ा आ रहा है ,तो किताब पढ़ने  की हिम्मत करी ,वरना में बहुत मूडी हु ,कहो साल लगा दू ,या एक दिन ,या एक हफ्ता या कुछ महीने ,किताब पढ़ने में। सेठजी की कहानी जिस जगह  से शुरू होती है ,उसको पढ़के  लगा बकवास कहानी होगी ,फ़ालतू की राजनीती ,लेकिन सेठजी की बहु का किरदार बहुत ही अच्छे से गढ़ा  गया है,मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं की इस किताब को मैंने शायद उस बहु ,बीबी ,बेटी ,और प्रेमिका के साथ एक अधूरी औरत के लिए ही पढ़ा। और दो दिन में आश्चर्य जनक तरीके से पूरा पढ़ डाला ,जो मेरे लिए भी  यकीन करने वाली बात नहीं है ,दिमाग इस कद्र  सोच में पड़ गया है ,की इस तरह की कहानी शोभा जैसी महिला ने लिखी ,और क्या सोच के लिखा होगा ?
राजनीती के हिसाब से देखा जाए जो कहानी में सेठजी के बेटे सूरज द्वारा पहाड़ी लड़की का बलात्कार और उसको छुपाने की जदोजहद में ,सेठजी का अपनी बहु को इस्तेमाल करना ,करवाना ,और करता हुआ देखना ,जहा अजीब है ,वही उस औरत की अपनी कहानी ,जहा वो बेटी थी ,फिर बहु बनी ,एक ऐसे ससुर की बहु जिसके लिए मरते दम  तक सिर्फ उसका शरीर जरूरी था ,उसकी भावनाओ ,और समर्पण की कोई कदर नहीं। 
पति भी बहु अमृता को ऐसा मिला ,जिसने उससे उसके सुखो से कोशों दूर रखा ,पति नहीं बन पाया ,बहु के शरीर का भोग ससुर ने किया ,बेटो को पता था लेकिन सब चुप ,किसी की सेठजी के आगे नहीं चलती थी  ,राजनीती के गुण अमृता ने साथ रह के जो सीखे ,वो बेटे नहीं सिख पाये। राजनीती में साथियो ,के साथ दुश्मनो का भी मान पान होता है ,फिर उसके लिए चाहे किसी भी हद तक क्यों न जाना पड़े। सेठजी का अमृता को अरुण के पास बेजना ,फिर उसके पूर्व प्रेमी के साथ,,सूरज को बचाने के लिए छोड़ देना , अकेले सारा इंतज़ाम करने की अमृता की परिपक्वता ,अगर उसके चरित्र को मजबूती देती है ,तो उस समय उसका आपा खो जाना ,जब प्रेमी उसको जकड़ता है ,बिस्तर पे ले जाता है ,और एक बार नहीं दो बार अधूरा छोड़ जाता है ,उसको इतना मजबूर बना देता है ,की वो अफ़सोस भी नहीं कर पाती ,ये जानते हुए की उसके आस पास के जितने भी मर्द है ,वो सब उससे सिर्फ उसका शरीर चाहते है ,बाकी किसी को अमृता की कोई जरुरत नहीं है ,कई सवाल पैदा करता है ?आखिर क्यों कोई औरत इतनी मजबूर है की वो अपने शरीर का सुख खुद अपनी मर्ज़ी से  नहीं भोग सकती?  
इस पूरी किताब में शोभा ने बहुत ही नायाब तरीके से औरत को रंडी ,और कुतिया जैसे श्ब्दों से नवाज़ा है ,घर की लक्ष्मी कहे जाने वाली बहु को ससुर ,देवर बहार के लोग बड़े ही आराम से गालिया देते है ,और अमृता सुनती है ?हाई प्रोफाइल मुंबई में जिस भाऊ  का चरित्र शोभा ने बताया है ,वो बाला साहेब जैसा लगता है। उनके बेटो का किरदार भी। 
अमृता का हमबिस्तर होना ,फिर वो ससुर के साथ हो ,या प्रेमी  के साथ ,या मीडिया के ऑफिस में एंकर का एक नज़र में उसका शरीर नाप लेना। और अपना कार्ड देना ,कही न कही समाज की उस बातो की तरफ सीधा इशारा है ,की औरत तुम अपने कामो से कम बल्कि तुम्हारी शरीर की बनावट ,कसावट ,और उत्तेजना से  ज्यादा पहचानी जाओगी। 
शोभा  की एक बात अच्छी लगी ,की सेठजी के बहाने उन्होंने उस दुनिया की असली तस्वीर लोगो के सामने लायी ,जो बहुत छुपी हुयी है ,या जिसे  लोग जानते है ,लेकिन कहने से डरते है ,या शरमाते है ,और जब एक कमरे के भीतर दो जिस्म के मिलने या  रगड़न की भाषा कोई औरत कहती है ,तो लोग उस भाषा को एक झटके से नकार देते है ,उनके हिसाब से बहुत ही वाहियात कहानी का लेखन किया जाना ,यु कह दिया जाता है ,जैसे कोई बात या कोई खाने का कौर गले में अटग गया है। 
मैंने जो सोच के कहानी पढ़ी थी ,उसमे मुझे उतना मजा नहीं आया ,राजनीती की तिकड़म होगी कुछ कूटनीति। 
ये पूरी कहानी अमृता के शरीर की कहानी थी ,उसका आज़ाद पहनावा ,जिसमे ब्रा की बंदिश नहीं थी ,उसका सुडोल जिस्म जिसको हर भूखी नज़र कैद कर लेना चाहती है ,और कहानी का अंत ,अमृता का पूरा जीवन उसके शरीर के अहसानो तले कही खो गया ,दब गया मर गया.
शोभा को कहानी के लिए मैं शायद 5  में से  2 दू। लेकिन उनकी बेबाक ,गालियो ,औरत की मनोदशा,कल्पनायें ,खुद से प्यार ,अपनी इक्षाओ की मांग  का चित्रण करने के लिए ,पूरे 4 दूंगी।  
मैंने ये पहली फिक्शन पढ़ी है ,हो सकता है की  , इस तरह की खुली बाते 
आपको असहज लगे ,मुझे भी पहले पहल लगी ,लेकिन सोचने के बाद ऐसा लगा की आज हम सब जिस माहौल में रह रहे है वहाँ  इसे  हर किसी को पढ़ना चाहिए। खासकर महिलाओ को ,जिन्हे आज भी अपनी मर्ज़ी ,अपने शरीर की इम्पोर्टेंस नहीं पता। यहाँ तक उनको खुद की पसंद को कबूल करने में भी हीच कि चाहट होती है। औरत वाकई एक मर्तबान की तरह होती है ,जिससे जैसे चाहो वैसे उपयोग में लाओ ,ये बात अलग है की जब घर में मेहमान आये ,तब उनको उन बर्तनो ,मर्तबानो की तरह सजाया जाता है ,जैसे आज ही बड़े सलीके से उस अलमारी से निकला है ,जहा बरसो से उससे सजा के रख दिया जाता हो नाजुक मर्तबान। और फिर कुछ मर्तबान आये दिन की आजमाइश के साथ इतने रगड़ जाते है की उसको भी आदत हो जाती है ,मालूम है यही खाना इसमें बनेगा ,आज कुछ उबाला जाना है ,या आज कुछ में सिर्फ छौक लगेगा। 
मर्तबान की तरह इस कहानी में भी अमृता को सब ने यूज़  किया ,लेकिन उसे  अब सेठजी की आदत हो गयी थी। और आखिर कार सब कुछ मिलने के बाद दिल्ली का सपना जब पूरा हो रहा हो ,तब ये शरीर क्या है ,न पहले कुछ था ,न अब कुछ है। 

कहानी में सेठजी ही थे जिसने उसके शरीर को शायद चाहा था ,ये बात अलग थी की अमृता के लिए वो कभी चाहत या पसंद नहीं रहे ,सिर्फ एक सामान या जरिया  की तरह  ,मर्तबान  की तरह उसको भी अब ससुर की  आदत हो गयी थी।  
नारीवादियों को एक बार इससे पढ़ना चाहिए ,मुझे अचम्बा है की इस पे किसी ने कुछ कहा क्यों नहीं। जबकि इस तरह की कहानी में एक औरत को किस तरह मजबूर दिखाया है। 
या यु कहु की उस दुनिया की हकीकत यही है। इसलिए सब मौन है। दो तीन मर्दो ने इससे बेकार कह दिया ,तो किसी ने पढ़ा ही नहीं। 
पॉलिटिक्स के लिए नहीं तो महिलाओ को उस महिला की उस खुली सोच के लिए एक बार पढ़ना  चाहिए।