Wednesday, October 1, 2014

मेरी टीस

मुझे पता है वो तुम हो ही नहीं ,तुम जो हो वो मुझसे बेहतर कोई जानता नहीं ,
पर वो  शब्‍द ,जिसने मुझे सर से लेकर पाँव के खुर तक निचोड़ डाला। 
उसकी गंध ,उसकी तीखी धार ने अंदर तक भिगो दिया इस बार ,
विश्वास था की कुछ है ,जो अब भी है ,और रहेगा ,छुपा दिया है ,
उस... है, ..को कही अब मैंने ,अपने अंदर ,सपने की चादर के साथ ,
दुबक के किसी कोने में अब वो ,जो तुम ने मुझे दिया संवाद स्वरुप ,
वो वही पलेगा ,लेकिन बढ़ेगा नहीं ,उसकी नियति नहीं है बढ़ना ,
एक खाली जगह थी ,जिसे  भरा हुआ समझने की ग़लतफ़हमी में ,
अब मन, दिल जो चाहो कहो सब भीग चूका है ,
इस कदर की डूबने से पहले तैरना जरुरी हो गया है। 
झुकने की आदत ने मुझसे मेरी पहचान ले ली ,
रीढ़ की हड्डी अभी इतनी भी कमजोर नहीं हुयी,
ज़हर की पोटली पहले भी अंदर भरी थी ,आज भी है और मरते दम  तक रहेगी। 
तुम नीलकंठ नहीं बन सकते ,कोई बात नहीं ,समंदर का ज़हर पीना हर किसी के बस का नहीं। 


Monday, August 25, 2014

ओह रे बंधू..

ओह रे बंधू........................
तुमसे प्यार करना न तो मेरी मज़बूरी है ,
न ही मेरे ख्वाईश ,ये मेरी किस्मत है। 
ये प्यार कमबख्त अहसास ही कुछ ऐसा है ,
जो न चाहते हुए जकड़ता है पकड़ता है। 
इसे रोकना चाहा ,चाहकर भी नहीं रोका ,
इसमें डूबने का आनंद मुझे रास आया। 
ये रास अब आनंद बन गया है ,
ये जानते हुए की तू सिर्फ मेरा नहीं। 
तुझे चाहना मेरे फितरत बन चुकी है ,
दिन हो या रात ,या कोई और पल ,
दिमाग की कोशिकाओ में तेरे होने का ,
नशा कुछ ऐसे रेंगता है ,जैसे मेरे जिस्म में रक्तवाहिनियां। 
प्रयास जारी है ,इसे रोकू इसे थामु ,
पर ये थमता ही नहीं ,उम्र के साथ बढ़ते यौवन ,
यौवन की उन जटिलताओं को ढोते हुए ,
आज आखिर दिमाग ने कह दिया ,अब बस। 
सिर्फ और सिर्फ तुम्हे अताह प्यार करना , 
मेरी ज़िन्दगी है!!!!!!!!

Saturday, August 23, 2014

शादी प्यार या समझोता ? भाग १

ज़िन्दगी के १८ साल एक ऐसे इंसान के साथ रहके गुज़ारे जिसको नैना ने बहुत प्याररिश्ता  तोड़ लिया। नैना अपनी एक शौक  को पूरा करने के खातिर उस समय आशीष के साथ भागी, जब उसके घर वाले उसको भोपाल ले जा रहे थे ,किसी करीबी मित्र के बेटे से पापा ने नैना की शादी की बात चलायी थी ,बात पक्की हो गयी थी , नैना बेखबर थी ,जब उसको पता चला तो उसने आशीष को कहा की शादी करोगे मुझसे ?आशीष इससे पहले उसको अपना निवेदन कर चूका था ,तब नैना ने भाव नहीं दिया था। आज जब शादी की बात निकली ,नैना से रहा नहीं गया , आशीष को बुलाया ,शाम को भोपाल में सगाई की तैयारी में परिवार बिजी था ,नैना पार्लर जाने के नाम से निकली ,और आशीष के साथ बहुत दूर निकल गयी। 
आशीष आज जब घर आया तब उसने नैना की सहेलियों से बात नहीं की ,जो की उसके घर उससे मिलने १८ साल बाद आई थी ,सहेलियों को ड्राइंग रूम में छोड़ नैना किचन में गयी ,आशीष को खाना दिया ,इस दौरान दोनों ने शायद ही कोई बात की होगी ,जो घर पहले नैना की खिलखिलाहट से गूँज रहा था ,वहाँ मरघट सा सन्नाटा छा गया था। वो आया खाना खाया और निकल गया। इस खिलखिलाहट को सन्नाटे में बदलते हुए जब मैंने देखा तो दिमाग हिल गया था। लाज़मी था। ख़ास कर मुझ जैसे के लिए ,जिसके लिए प्यार और शादी के मायने ही अलग है। खासकर जब कोई कहे की लव मैरिज है। आज न मुझे लव  कही समझ आया , न ही कही मैरिज ?

Wednesday, July 30, 2014

सेठजी ,मेरे नज़र से।

सेठजी ,
जी हाँ, मै  बात कर  रही हु ,  शोभा डे की कहानी की ,वैसे तो मुझे इस तरह की किताबो को पढ्ने का   मौका नहीं मिला ,लेकिन जब ये किताब का मुख्य पृष्ट्य देखा तो लगा पता नहीं ,पॉलिटिक्स की कहानी है,और इन दिनों राजनीति  में बड़ा मज़ा आ रहा है ,तो किताब पढ़ने  की हिम्मत करी ,वरना में बहुत मूडी हु ,कहो साल लगा दू ,या एक दिन ,या एक हफ्ता या कुछ महीने ,किताब पढ़ने में। सेठजी की कहानी जिस जगह  से शुरू होती है ,उसको पढ़के  लगा बकवास कहानी होगी ,फ़ालतू की राजनीती ,लेकिन सेठजी की बहु का किरदार बहुत ही अच्छे से गढ़ा  गया है,मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं की इस किताब को मैंने शायद उस बहु ,बीबी ,बेटी ,और प्रेमिका के साथ एक अधूरी औरत के लिए ही पढ़ा। और दो दिन में आश्चर्य जनक तरीके से पूरा पढ़ डाला ,जो मेरे लिए भी  यकीन करने वाली बात नहीं है ,दिमाग इस कद्र  सोच में पड़ गया है ,की इस तरह की कहानी शोभा जैसी महिला ने लिखी ,और क्या सोच के लिखा होगा ?
राजनीती के हिसाब से देखा जाए जो कहानी में सेठजी के बेटे सूरज द्वारा पहाड़ी लड़की का बलात्कार और उसको छुपाने की जदोजहद में ,सेठजी का अपनी बहु को इस्तेमाल करना ,करवाना ,और करता हुआ देखना ,जहा अजीब है ,वही उस औरत की अपनी कहानी ,जहा वो बेटी थी ,फिर बहु बनी ,एक ऐसे ससुर की बहु जिसके लिए मरते दम  तक सिर्फ उसका शरीर जरूरी था ,उसकी भावनाओ ,और समर्पण की कोई कदर नहीं। 
पति भी बहु अमृता को ऐसा मिला ,जिसने उससे उसके सुखो से कोशों दूर रखा ,पति नहीं बन पाया ,बहु के शरीर का भोग ससुर ने किया ,बेटो को पता था लेकिन सब चुप ,किसी की सेठजी के आगे नहीं चलती थी  ,राजनीती के गुण अमृता ने साथ रह के जो सीखे ,वो बेटे नहीं सिख पाये। राजनीती में साथियो ,के साथ दुश्मनो का भी मान पान होता है ,फिर उसके लिए चाहे किसी भी हद तक क्यों न जाना पड़े। सेठजी का अमृता को अरुण के पास बेजना ,फिर उसके पूर्व प्रेमी के साथ,,सूरज को बचाने के लिए छोड़ देना , अकेले सारा इंतज़ाम करने की अमृता की परिपक्वता ,अगर उसके चरित्र को मजबूती देती है ,तो उस समय उसका आपा खो जाना ,जब प्रेमी उसको जकड़ता है ,बिस्तर पे ले जाता है ,और एक बार नहीं दो बार अधूरा छोड़ जाता है ,उसको इतना मजबूर बना देता है ,की वो अफ़सोस भी नहीं कर पाती ,ये जानते हुए की उसके आस पास के जितने भी मर्द है ,वो सब उससे सिर्फ उसका शरीर चाहते है ,बाकी किसी को अमृता की कोई जरुरत नहीं है ,कई सवाल पैदा करता है ?आखिर क्यों कोई औरत इतनी मजबूर है की वो अपने शरीर का सुख खुद अपनी मर्ज़ी से  नहीं भोग सकती?  
इस पूरी किताब में शोभा ने बहुत ही नायाब तरीके से औरत को रंडी ,और कुतिया जैसे श्ब्दों से नवाज़ा है ,घर की लक्ष्मी कहे जाने वाली बहु को ससुर ,देवर बहार के लोग बड़े ही आराम से गालिया देते है ,और अमृता सुनती है ?हाई प्रोफाइल मुंबई में जिस भाऊ  का चरित्र शोभा ने बताया है ,वो बाला साहेब जैसा लगता है। उनके बेटो का किरदार भी। 
अमृता का हमबिस्तर होना ,फिर वो ससुर के साथ हो ,या प्रेमी  के साथ ,या मीडिया के ऑफिस में एंकर का एक नज़र में उसका शरीर नाप लेना। और अपना कार्ड देना ,कही न कही समाज की उस बातो की तरफ सीधा इशारा है ,की औरत तुम अपने कामो से कम बल्कि तुम्हारी शरीर की बनावट ,कसावट ,और उत्तेजना से  ज्यादा पहचानी जाओगी। 
शोभा  की एक बात अच्छी लगी ,की सेठजी के बहाने उन्होंने उस दुनिया की असली तस्वीर लोगो के सामने लायी ,जो बहुत छुपी हुयी है ,या जिसे  लोग जानते है ,लेकिन कहने से डरते है ,या शरमाते है ,और जब एक कमरे के भीतर दो जिस्म के मिलने या  रगड़न की भाषा कोई औरत कहती है ,तो लोग उस भाषा को एक झटके से नकार देते है ,उनके हिसाब से बहुत ही वाहियात कहानी का लेखन किया जाना ,यु कह दिया जाता है ,जैसे कोई बात या कोई खाने का कौर गले में अटग गया है। 
मैंने जो सोच के कहानी पढ़ी थी ,उसमे मुझे उतना मजा नहीं आया ,राजनीती की तिकड़म होगी कुछ कूटनीति। 
ये पूरी कहानी अमृता के शरीर की कहानी थी ,उसका आज़ाद पहनावा ,जिसमे ब्रा की बंदिश नहीं थी ,उसका सुडोल जिस्म जिसको हर भूखी नज़र कैद कर लेना चाहती है ,और कहानी का अंत ,अमृता का पूरा जीवन उसके शरीर के अहसानो तले कही खो गया ,दब गया मर गया.
शोभा को कहानी के लिए मैं शायद 5  में से  2 दू। लेकिन उनकी बेबाक ,गालियो ,औरत की मनोदशा,कल्पनायें ,खुद से प्यार ,अपनी इक्षाओ की मांग  का चित्रण करने के लिए ,पूरे 4 दूंगी।  
मैंने ये पहली फिक्शन पढ़ी है ,हो सकता है की  , इस तरह की खुली बाते 
आपको असहज लगे ,मुझे भी पहले पहल लगी ,लेकिन सोचने के बाद ऐसा लगा की आज हम सब जिस माहौल में रह रहे है वहाँ  इसे  हर किसी को पढ़ना चाहिए। खासकर महिलाओ को ,जिन्हे आज भी अपनी मर्ज़ी ,अपने शरीर की इम्पोर्टेंस नहीं पता। यहाँ तक उनको खुद की पसंद को कबूल करने में भी हीच कि चाहट होती है। औरत वाकई एक मर्तबान की तरह होती है ,जिससे जैसे चाहो वैसे उपयोग में लाओ ,ये बात अलग है की जब घर में मेहमान आये ,तब उनको उन बर्तनो ,मर्तबानो की तरह सजाया जाता है ,जैसे आज ही बड़े सलीके से उस अलमारी से निकला है ,जहा बरसो से उससे सजा के रख दिया जाता हो नाजुक मर्तबान। और फिर कुछ मर्तबान आये दिन की आजमाइश के साथ इतने रगड़ जाते है की उसको भी आदत हो जाती है ,मालूम है यही खाना इसमें बनेगा ,आज कुछ उबाला जाना है ,या आज कुछ में सिर्फ छौक लगेगा। 
मर्तबान की तरह इस कहानी में भी अमृता को सब ने यूज़  किया ,लेकिन उसे  अब सेठजी की आदत हो गयी थी। और आखिर कार सब कुछ मिलने के बाद दिल्ली का सपना जब पूरा हो रहा हो ,तब ये शरीर क्या है ,न पहले कुछ था ,न अब कुछ है। 

कहानी में सेठजी ही थे जिसने उसके शरीर को शायद चाहा था ,ये बात अलग थी की अमृता के लिए वो कभी चाहत या पसंद नहीं रहे ,सिर्फ एक सामान या जरिया  की तरह  ,मर्तबान  की तरह उसको भी अब ससुर की  आदत हो गयी थी।  
नारीवादियों को एक बार इससे पढ़ना चाहिए ,मुझे अचम्बा है की इस पे किसी ने कुछ कहा क्यों नहीं। जबकि इस तरह की कहानी में एक औरत को किस तरह मजबूर दिखाया है। 
या यु कहु की उस दुनिया की हकीकत यही है। इसलिए सब मौन है। दो तीन मर्दो ने इससे बेकार कह दिया ,तो किसी ने पढ़ा ही नहीं। 
पॉलिटिक्स के लिए नहीं तो महिलाओ को उस महिला की उस खुली सोच के लिए एक बार पढ़ना  चाहिए। 



Thursday, July 10, 2014

ग़ालियो का समाज शास्त्र।

किसी महिला के लिए दूसरी महिला को बिच कह देना कितना आसान है।यह एक शब्‍द पूरी पुरुष बिरादरी को हिंसक बलात्‍कारी और स्‍त्री को पीड़ित बना देता है। फिर स्‍त्री इस काले दाग के साथ पुरुष हिंसा के खिलाफ कितनी दृढ़ता से लड़ पाती होगी।क्‍योंकि यह बिच शब्‍द तो औरतों को बांट देता है। मोहल्‍ले की कुतिया सबकी होती हैकोई भी कुत्‍ता अपनी धाक जमाकर उसके साथ मैथुन कर सकता है। यानी वह रंडी बन जाती है।तो अगर औरत दूसरी औरत के लिए रंडी है तो वह रेप पर इतना हाय हाय क्‍यों करती है। यू बिच। एक औरत दूसरी से जुदा तो हो ही गई।एकता की कड़ी टूट गई।एक औरत को बड़ा ओहदा मिलता है। बॉस उसकी तारीफ करता है तो वह बिच बन जाती है।यहां बात अलग है। औरत कुतिया बनने पर बाकी औरतों से अलग हो जाती है।यानी हाशिए पर चली जाती है।पर आदमी कुत्‍ता बनकर गर्व महसूस करता है।अगर एक औरत आधुनिक कपड़ों में फोटो खिंचवाकर डाल दे और मर्द उसकी तरफ दोस्‍ती का हाथ बढ़ाए तो पत्‍नी फौरन बोलेगी, कौन है वह कुतिया ?अब अगर पति उस औरत से सैक्‍स करे तो पत्‍नी बोलेगी कि मेरा पति कुत्‍ता है। किसी के भी साथ सो जाता है।उधर वह औरत सोचेगी कि इसकी पत्‍नी तो ऐसी कुतिया है कि इसका पति मेरे पास चला आया सोने।औरत और औरत के बीच भेदकारी शब्‍द है बिच यानी कुतिया।यह औरतों को बांट देती है।औरतों की कथित एकजुटता की पोल खोल देती है।कल तक बहन, भाभी और सखी कहलाने वाली औरत एक झटके में कुतिया बन जाती है।और यह ओहदा देने वाली औरत ही है।किसी भी स्‍त्री की गरिमा को पूरी तरह से नष्‍ट करना हो तो कह दो उसे कुतिया।
यही तो है गालियों का समाजशास्‍त्र...
....दुनिया की हर गाली के केंद्र में है औरत... बास्‍टर्ड यानी हरामी। यह गाली महिलाएं पुरुषों को देती है। बड़े शान से।पर असल में वो खुद को गाली देती हैं, क्‍योंकि अगर पुरुष हराम का जना है, यानी नाजायज है तो उसे जन्‍म देने वाली औरत भी तो कलंकित हुई।इसी तरह मदर फकर भी स्‍त्री को ही संबोधित है।किसी भी समाज की पहचान खत्‍म कर उसे गुलाम बनाना है तो पहले स्‍त्री के वजूद को मिटाया जाता है।उसे कुतिया बनाया जाता है।ताकि समाज में कुत्‍ते ही पैदा हों।अमेरिका ने थाईलैंड में, कोरिया में, जापान और जर्मनी में यही किया।जब समाज में कुत्‍ते यानी दूसरी नस्‍ल के इंसान पैदा होंगे तो उन्‍हें अपनी पहचान, अपनी संस्‍कृति, अपने देश पर गर्व नहीं होगा।वे वैचारिक रूप से दूसरों के नस्‍ली गुलाम बन जाएंगे।असल में गाली देने वाला हमारा समाज इसी दिशा की ओर जा रहा है।मीडिया में गाली देना आम बात हैं। बॉस हो या रिपोर्टर बिना ग़ाली दिए कोइ एक अच्छा पत्रकार नहीं बन सकता। ऐसा मैंने सुना था ,देखा ,उस समय गालियो के इस समाजशास्त्र का ज्ञान नहीं था। ऑफिस में सुन लेती थी किसी क़ो गाली देतें तो उससे डाट समझ की हलके मे लें लेतीं।आज कुछ पढ़ा तो वही सवाल दिमाग में कौंध गए। आखिर क्यों ,आता है मजा ?फेसबुक के एक मित्र की वाल पे इसे पढ़ा।
आज संसद परिसर में एक मजेदार वाकया हुआ, दो बड़े अंग्रेजी चैनलों की महिला रिपोर्टर आपस में एक बाईट के मुद्दे पर लड़ पड़ीं। मुंह सिकोड़कर वो एक दूसरे को 'बिच' (जानने वाले लोग हिन्दी अनुवाद करे लें) कह रही थीं। हमको गांव याद आ गया, गांव की गालियों का भी समाजशास्त्र होता है।---- Mukesh Kaushik, की इस पोस्ट को पढ़के रहा नहीं गया। और लिख डाला।                     आजतक ये लगता था की ये पुरुष गालिया कितनी सहजता से देते है ,छोटी छोटी बात पे ,जिससे अगर मैं  देना भी चाहू तो मुह से नहीं निकलती। कुछ लड़कियों को देते हुए देखा ,तब लगा शायद जरूरी है ,अब लड़कियों को भी देना चाहिए ,लेकिन आज अपने मन की ये बात जब एक मित्र से जाननी चाही ,तो जो बात सामने आई ,वो जानके शर्म नहीं ,बल्कि लगा की मैं  भी उन औरतो की जमात का हिस्सा हु ,जिसके मुह से बिच सुनके मर्दो को मजा आया। और बात भी बनी  होगी। या यु भी तो वो लोग बोलते होंगे। लेकिन जब औरत ही औरत को हासिये पे ले जाने का काम कर रही हो  तो   किसे ?क्या ?कहा जाए ? गालिया देने का अलग ही आनंद है ,तुम नहीं समझोगी ?क्यों भला ?अरे तुमने कभी दी नहीं ना।  आज सुबह सुबह का वाक़या है ,पडोसी के यहाँ जवान बेटे को बाप ने घर की बुजूर्ग ओर ,अपनी माँ के साथ बीबी के सामने इतनि गालिया दीं ,मैं  दंग रह गयी। मारता जा रहा था वो बेटे को ओर गालिया थीं  कई बन्द ही नही हो रही थी ,किसी ने उसे  रोका भी नहीं। जवान लड़की है घर में ,शायद ये औरत और लड़की मुझे ही समझ आये क्यूँकि मैंने गालियों का समाजशास्त्र कॉल समझा था। तभी सोच लिया था की हो सकता है लोगो को इनका शास्त्र नही पता ,या शायद महिलाओ को जो बडे ही सुन्दर और धैर्य से इससे सुनती भी है ,और अब उनको देने में भी अब कोई हिचक नहीं होती। शाम होते होते मोबाइल मे एक विडिओ आ  गया। जिसमे लड़की गालिया इसलिए दें रही हैं क्यूँकि उससे टीवी की किसी शो मे जाना  है। आजकल ये फैशन और स्टैण्डर्ड की बात हो गयी है। लेकिन मुझे ऐसे समाज की कोइ दरकार नही जंहा  इतनी  बुरी तरह से हासिये पे लें  जानें के काम अपनी ही ज़मात के लाग करती हैं। ये वो सब दोगले इंसान ही हैं ,जो मतलबपरस्त है समय के हिसाब से अपने अंदर का उबाल निकालनी की लिए इन गालियों क़ो साहारा  लेतें हैँ। मैं चाहती तो सभी श्ब्दों   अर्थ  लिखती ,लेकिन लिखते नहीं बना। इसलिए एक के जरिये कोशिश की है क़ि औरतो को ए बात समझ ऑ जाएं। और मर्दो को भी जिन्हे बहुत मज़ा आता है।     
https://www.youtube.com/watch?v=NtvIQQ3alW8 
ये वो लिंक है जिसमे लड़की ने बरसात की गलियो क़ी। 

Sunday, July 6, 2014

पति चाहिए कि कुत्‍ता ?

आजकल ज्‍यादातर कामकाजी लड़कियों को स्‍त्रैण गुण वाला पति चाहिए, जो स्‍त्री की भावनाओं को समझे। सही है। पति को पत्‍नी के हर सुख दुख को समझना चाहिए, उसके व्‍यवहार के हर छोटे बड़े पहलू को जानना चाहिए। लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि स्‍त्री में भी पुरुष के गुण होने चाहिए।उसे भी पता होना चाहिए कि पति किस बात पर खुश होता है और किस बात पर नाराज। पति को भी बीमार होने पर, दुख में एक साथी की जरूरत पड़ती है। उसे भी अकेलापन महसूस हो सकता है। आंसू उसे भी आ सकते हैं, फिर भला उसकी आत्‍मा में कितना भी बल हो।जो हृदयवान होगा, वो जाहिर है अपनी बात सोच-समझकर कहेगा। लेकिन वह यह भी उम्‍मीद करेगा कि उसकी साथी भी सोच समझकर अपनी बात कहे। अगर नहीं कही गई तो उसके दिल को इस कदर ठेस लगेगी कि वह खुदकुशी भी कर सकता है।अगर पत्‍नी यह चाहती है कि उसके पति को पीरियड की तारीख पता हो या पत्‍नी के हिलने डुलने भर से यह समझे कि उसे बाथरूम जाना है तो पति भी अपनी पत्‍नी से एक छोटी सी उम्‍मीद कर ही सकता है कि किसी दिन दफ्तर से देरी से आने की बात को पत्‍नी समझे और जल्‍द घर आ जाए। उसके अकेलेपन को बांट ले। पत्‍नी को भी पता होना चाहिए कि उसका पति छुट्टी के दिन क्‍या प्‍लान कर रहा है और इसमें उसे कितनी मदद करनी चाहिए। लड़कियों को दुनिया का सबसे वफादार कुत्‍ता चाहिए।उसके कान इतने तेज होते हैं कि उसके हिलने डुलने भर से समझ जाएगा कि मैडम को कहीं जाना है।बीमार होने पर वह उसके पास ही बैठा रहेगा हां, हृदयवान और विचारवान नहीं मिलेगा, पर वह मालकिन को समझेगा और फिर भी इतना तो चाहेगा ही कि मालकिन भी उसे समझे।सिर्फ दो वक्‍त का खाना और दो वक्‍त वॉक पर ले जाने की जिम्‍मेदारी ही न निभाए।पति और पत्‍नी दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं। हम कुंडली में 32 गुण मिलाते हैं। यह गुण जातक की राशि के अनुसार होते हैं।उम्र के विभिन्‍न पड़ाव पर लड़का और लड़की के गुण कितने बदल गए, वो तो पंडित का बाप भी नहीं समझ सकता।असल बात नजरिए की है।हम औरत को किस नजरिए से देखते हैं। औरत पत्‍नी, मां, बहन, साथी कोई भी हो सकती है।अगर हम औरत को दासी के नजरिए से देखते हैं तो पति को एक नौकरानी, गुलाम, दासी चाहिए।लेकिन पति और पत्‍नी दोनों एक दूसरे को एक दूसरे के पूरक के रूप में देखें तो मदद का एक हाथ हमेशा खड़ा मिलेगा।और यह बिना कहे ही होता है। मिसाल के लिए अगर पत्‍नी देर से सोकर उठी है, पेट में दर्द या कमर में दर्द, सिर में भारीपन की शिकायत कर रही है तो पति को कहना चाहिए कि तुम आराम करो, मैं कुछ काम निपटा देता हूं।पति को समझना चाहिए कि पत्‍नी को पीरियड आने वाला है या आ चुका है।इसी तरह अगर पति घर पर देर रात तक काम करे या ऑफिस के काम में उलझा हो तो पत्‍नी को भी उसका सहारा बनना चाहिए।पत्‍नी को बुखार होने पर पति को छुट्टी लेनी चाहिए। इसलिए नहीं कि वह उसका हाथ पकड़े रहे, बल्‍कि इसलिए कि पत्‍नी को किसी भी चीज की जरूरत पड़ने पर पति उसके पास हो।पति-पत्‍नी का रिश्‍ता कठपुतली के उन दो धागों से बंधा होता है, जिनमें से किसी के भी खिंचने पर दर्द का आभास हो और दोनों मिलकर उस असंतुलन को संतुलित करें। लोग ऐसे वफ़ा नहीं करते। वे वफ़ा चाहते हैं। आप उनके साथ वफ़ा नहीं करेंगे तो वे भी वक्‍त आने पर बेवफाई में उतर आएंगे।ठीक वैसे ही जैसे बच्‍चे कभी गुनाह नहीं करते। परिवार, समाज उन्‍हें गुनाह का सबक सिखाते है। अगर उन्‍हें वो मासूमियत, वह बचपन नहीं मिलेगा तो वे गुनाह करेंगे ही। इसमें दोष उनका नहीं, हमारा है।असल में हम एरोगेंट हो गए हैं। हमें लगता है कि हम ही सही हैं। दूसरे का पक्ष हम सुनना ही नहीं चाहते। सड़क पर चलने वाले कार वाले की हमेशा यही चाहत रहती है कि उसके सामने की पूरी सड़क खाली हो।आधुनिक नारीवाद इसी का दूसरा रूप है, जो अतिश्‍योक्‍ति और अपवादों से भरा है। माना कि हम जैसी औरतें वर्षों से पुरुषप्रधान समाज के दमन को झेल रही हैं।लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि इन बेड़ियों से आजाद हुईं तमाम महिलाएं पुरुषों को गुलामी के चश्‍मे से देखने लगें।केवल बदलाव ही काफी नहीं होता। बदलाव के साथ व्‍यवस्‍था, प्रणाली और नजरिया भी बदलना चाहिए।इस तरह के एकपक्षीय रवैये से बदलाव संतुलित नहीं, बल्‍कि असंतुलित होता है।