कहने वालों का कुछ नहीं जाता, सहने वाले कमाल करते हैं। कौन ढूंढे जवाब ज़ख्मों के, लोग तो बस सवाल करते हैं!
Wednesday, May 7, 2014
Thursday, March 13, 2014
मेरी नज़र से "कवीन "
जिस किसी ने भी ये कहा कि ये बहुत अच्छी पिक्चर है जाओ ?उन्होंने असल में क्यों कहा ?मुझे अब समझ में आ रहा है ?फ़िल्म क्रिटिकस ने कहा अच्छी है लड़कियो जाके देख आओ ??दोस्तों पिक्चर देखने जानी है तो जाओ देख आओ "कवीन ". .... लेकिन भूल के भी कवीन बनने कि जरुरत नहीं है। मुझे ये फ़िल्म बिना हाथ पैर कि बकवास से ज्यादा नहीं लगी। इसके कई कारण है ,जो मुझे समझ आया वो में लिख रही हु ,पहली बात कि ये फ़िल्म सिर्फ लड़कियो के देखने कि नहीं है ,बल्कि सबसे पहले इसे अपने पेरेंट्स के साथ देखो। उन्हें दिखाओ क्या पता वो तुम सब को रानी बनने दे या न दे ?क्युकी भारत के मध्यम परिवार में कोई भी माता पिता अपनी बेटी को इस तरह देश के बहार नहीं जाने देंगे। पहले उनसे पूछ लेना कि मॉल या चौपाटी अकेले जाने देंगे कि नहीं अपने ही सिटी में ??? उसके बाद दिल्ली ,मुम्बई ,गोआ ,केरल ,कश्मीर अगर अकेले जाने मिल गया तो कुछ बात है वरना पेरिस और लंदन तो मिया के साथ ही जाना ,उसका खर्च वो नहीं देंगे वो मिया के ज़िम्मे है ?
चलो कोई नहीं शादी ही टूटी थी न ,तो उसी समय मना कर देती ?क्या जरुरत थी अकेले हनीमून में जाने कि ?वो भी दिल्ली कि लड़की ?हज़म नहीं हुयी ये बात ?चली गयी वहा छोटे कपडे पहनते नहीं बने ?कंडोम बैग में नहीं रखा ?स्मोक नहीं किया ?दारु एक बारी पी ,एक बार फ्रेंच kiss करने को बोला ,तो लिप करके आ गयी। सेक्सी कैप पहन तो ली लेकिन कौन सी ये नहीं पता ?खिलोने ले लिए। किसके लिए पापा के और भाई के लिए ?क्या लिया मसाजर ?खुद ही हसी उड़वाई ?साथ ही भारत कि भी लो जी लाजपत नगर कि बाज़ार में सब मिलता है ,ये पता है ,लेकिन वो क्या है ये नहीं पता ?कोई नहीं ,लड़को के साथ रह लिया ,लेकिन घर में नहीं बताया ?तो रानी पेरिस जाके कवीन कैसे बन गयी ?सिर्फ इसलिए क्युकी उसके पास विजय को न बोलने कि हिम्मत आ गयी। और उसने उसको मना कर दिया।
लड़कियो को बेवक़ूफ़ बनाने का नया तरीका है। और तो और आप सब को ये सब सिखाने ,दिखाने के लिए है कि आप जाइये ,इसे देखे और हिम्मत करिये ये बोलने कि। "आई हेट ब्रा ",आई वांट कंडोम्स " वांट तो ड्रिंक, . ।
जो लड़की विदेश जाके भी ये सब नहीं कर पायी ,तुम लोगो को क्या लगता है तुम सब कर लोगी ???
भैया ,I WANT DRINK...I HATE BRA ...I LOVE TRAVEL...I WANT TO SMOOCH ...कंडोम। या अल्लाह लड़की बोरा गयी है ,कैसे शब्द बोल रही है लाज़ रही नहीं इसको ,चरित्र खराब है ,तभी तो ऐसा लिख रही है।
जो ये सब सुन के पली बड़ी हो ,उसको ये सब शोभा नहीं देता।
हॉल में लड़के सिसकिया ले रहे थे ,जब रानी कि सहेली ने उसकी ब्रेस्ट को दबाया ये कहते हुए कि इससे हटाओ। तुममे से ऐसे कितनी लड़किया है ,जिन्हे अपनी सहेलियो का इस तरह का टच अच्छा लगेगा ?
क्या बिना ब्रा के अपने घर में घूमने कि हिम्मत दिखा सकोगी ?या अपने देश में घूमने कि अपने मोहल्ले में ,अरे यहाँ तक कि पति या पुरुष मित्र के साथ भी ,शायद कभी नहीं ,शादी शुदा पति कहते थक जाए कि अपना रूम है यहाँ क्या शर्माना ,लेकिन क्या करे इन लड़कियो को १३ साल कि उम्र से बता दिया जाता है कि ये बहुत जरुरी है। शादी के पहले माँ कि पसंद कि ,शादी के बाद पति के पसंद कि ,और खुद लेने में शर्म आये तो वो भी कह देना पति ले आएगा सब।
शराब का नाम मत लेना ,वो लड़कियो के लिए नहीं है। सेक्स शादी के बाद उसकी चर्चा भी गुनाह है ,लिप किस्स या स्मूच या फ्रेंच किस क्या होती है ,मिया बता देगा। अगर उससे पता हुयी तो।
कंडोम का कैसे यूज़ करते है ,ये पता है ,लेकिन तुम इसे खरीद नहीं पाओगी ,वो क्या है ,कि दुकानदार कि नज़र ,दस लोगो कि नज़रे तुम कैसे कर सकोगी। यहाँ तो किसी वाशरूम में भी नहीं मिलता। ये एम्स्टडम कौन न है जहा सेक्स लीगल है। खुलेआम आप सेक्स कर सकते है। इससे कमा सकते है। तो यहाँ तो तुम लड़किया कवीन नहीं बन सकती ?सॉरी टू से।
और जिन मर्दो कि बुराई करते मुह नहीं थकता ,उनके बिना क्या सेक्स या स्मूच का मजा ले सकोगी ???
अगर मर्द न हो तो क्या ज़िन्दगी खुशनुमा हो जाएँगी। दुनिया पे फ़तेह मिल जायेगी ,रानी बन के। तो जिनको इस तरह कि रानी बनने का शौक है ,वो बेसक इस मूवी को देखने जाए।
असल में इस तरह कि मूवी सिर्फ मुंगरेलाल के हसीं सपने टाइप है ,जागती आँखों से देखा गया एक ऐसा सपना जो हक़ीक़त में कभी मुमकिन नहीं। यकीन न हो तो उन लोगो से पूछ लो ,जो बढ़ावा दे रहे है। इस सपने कि शुरुआत जिस दिन उनके घर से हुयी ,मैं मान जाओंगी।
कहने के लिए सिर्फ एक मूवी है ,लेकिन किसी ने कहा था कि मूवी ज़िंदगियाँ बदलने में अहम् भूमिका अदा करती है।
आज का युवा कब कौन सी बात दिमाग पे लेले कहा नहीं जा सकता। इसलिए कवीन बनने के लिए शिक्षा ,हिम्मत ,और जस्बे कि जरुरत है ,जिस दिन ये जस्बा और हिम्मत ले आओ उस दिन हवा में उड़ के जाने कि जरुरत नहीं पड़ेगी। इसी ज़मी में ज़न्नत मिलेगी। अपनों के बीच ,मर्दो के साथ ,और दोस्तों के दिल में। एक बार शुरुआत अपने घर से करके देखो।
Saturday, February 1, 2014
स्त्रीलेखन कि पीड़ा बनाम अंतर्द्वंद
गीताश्री की एक कहानी ‘प्रगतिशील इरावती’ मार्च, 2013 के महिला विशेषांक में छपी है- ताप. एक युवा पुत्री की मां अपने बूढ़े पति की शारीरिक भूख से त्रस्त है. वह अपनी व्यथा पुत्री को बताती है. एक आधुनिक युवा पुत्री पिता को समझाने, किसी सलाहकार के पास भेजने या उनके आगे कोई अन्य विकल्प रखने के बजाय खुद उनके लिये एक युवा वेश्या खरीद लाती है जो घर पर ही आकर पिता को होमसर्विस देकर उनकी भूख शांत कर दे. यानी एक युवा स्त्री अपने वृद्ध पिता के लिए दूसरी युवा स्त्री को यौनदासी बनाती है. स्त्री सशक्तीकरण की चरम अवस्था को प्राप्त कर चुकी इस लेखिका की कहानी में एक ट्विस्ट है. कहानी के अंत में युवा वेश्या युवा पुत्री से कहती है- ‘ये किसी काम का नहीं है. तुम बेकार अपने पैसे बर्बाद कर रही हो. मैं ठरकी बुड्ढों को खूब जानती हूं. अंग्रेज़ी मुहावरा याद है न- ‘द डिजायर इज हाइ बट द फ़्लेश इज वीक.’ बोल्ड लेखिका के रूप में एक विशेष समूह द्वारा अति प्रशंसित गीताश्री इससे पूर्व ‘इंद्रधनुष के उस पार’ कहानी में दिखा चुकी हैं कि कॉरपोरेट दफ्तर में काम करने वाली युवती परेशान है कि उसका बॉस उसके कपडे-लत्तों पर हरदम रोक-टोक करवाता रहता है. युवती की चिंता सही भी है क्योंकि सभ्य समाज यही मानता है कि स्त्री को अपने वस्त्र स्वयं चुनने और पहनने का पूरा हक है . मगर इस कहानी में भी ट्विस्ट है. लड़की अपनी पोशाक स्वयं तय करने के अधिकार का प्रयोग करते हुए पूर्णतया निर्वस्त्र होकर न्यूड पार्टी में जाती है जहां पर सभी लोग निर्वस्त्र आए हैं, वह बॉस भी जो उसे स्लीवलेस टॉप पहनने पर टोकता था. ऐसी पार्टियां हमारे समाज में होती हैं या ‘इंद्रधनुष के उस पार’ यह कह पाना कठिन है.
शालिनी माथुर के एक लेख का एक अंश मात्र है ये ,जिससे पढ़ के मै विचलित हो गयी थी।
शालिनी माथुर के एक लेख का एक अंश मात्र है ये ,जिससे पढ़ के मै विचलित हो गयी थी।
इस को पढ़ के में सोच में पढ़ गयी थी कि ऐसा कैसे हुआ होगा ,रात भर सो नहीं सकी ,फिर इस कहानी को खोज मारा और जब इससे पूरा पढ़ा ,तब लगा कि ये घटना तो मेरे आस पास कई बार घटित हुयी है ,इसमें नया क्या है ,और गलत भी कुछ नहीं ,इसलिए मैंने शालिनी माथुर के लेख को दोबारा पढ़ा ,उसमे बाकी जिस जिस महिला लेखिकाओ का नाम था और कहानिया ,उसके कई अंश को बार बार पड़ने के बाद लगा कि ये सब ऐसा नहीं है कि हमें नहीं पता ,हम सब ,यहाँ तक कि आप सब भी न जाने कितनी बार देखते है ,और सुनते है ,उसके बाद भी या तो उसको दरकिनार कर देते है ,या शुतुरमुर्ग कि तरह अपनी गर्दन को रेत में डाल के कुछ और ही बताना चाहते है ,आखिर क्यों ?और क्या ,गलत है इस कहानी में ,एक औरत ने आखिर कार जो हिम्मत दिखायी वो क्या मर्द कर सकता है ?
बात यहाँ ये नहीं है ,बात ये है कि अभी तो पूरे लेख को पढ़के जिस तरह मेरे एक रात सवालो के मकड़ जाल में बीती क्या ऐसा किसी और के साथ नहीं हुआ होगा। मैंने बाकी कि कहानियो के कोट को अभी नहीं खोला है ,सच कहु तो अब हिम्मत नहीं है ,क्युकी जब कभी भी इस तरह कि बाते ,खासकर औरत के देह को लेकर सुनती हु ,दिमाग वाकई में किसी काम का नहीं रहता ,और क्यों हमेशा औरत और औरत का देह ,क्या हम औरते इतनी भावना हीन हो चुकी है कि आज भी सिर्फ औरत कि देह को ही मुद्दा बना के रहना चाहती है।
इससे कभी ऊपर उठता जा सकता है ?
शालिनी ने अपने लेख में जो मुद्दा या जो सवाल किया ??असल मुद्दा वो है ??स्त्री लेखन होता क्या है? क्या वह, जो कुछ भी स्त्री लिख दे, या वह, जो स्त्री के विषय में हो, या वह, जो स्त्रीवादी हो, या वह, जो स्त्री समर्थक हो? स्त्री लेखन के नाम पर आज जो कुछ परोसा जा रहा है, आखिर वह है क्या?
शालिनी ने लिखा अच्छा ,बहुत सारे कहानियो को ,उनके उन पहलू को कोट किया ,जिससे पढ़ के आम इंसान को लगता है, जैसा कि मुझे लगा कि ये सब क्या बकवास है ,या ये ही लेखन है तो मेरे तौबा ,मै तो कभी न लिखू इस तरह का , और अच्छा हुआ कि मैंने इस तरह के साहित्य को नहीं पढ़ा ,इसके लिए शालिनी का धन्यवाद कहूँगी ,कि मुझे नींद से जगा दिया ,लेकिन शालिनी ताप को पढ़ के मुझे लगा कि ये घटना घटी है ,इसलिए ये सच बात है ,इसे इस तरह सभी कहानियो के साथ लेना शायद गलत होगा। मै ये नहीं कह रही ,किबाकी सब मन से लिखी गयी है ,हो सकता है हाँ या नहीं भी ,पर जिस मुद्दे को यहाँ मैं मुद्दा होना चाहिए था वो भी तो कही जाके भटक गया।
मेरा सोचना ये है कि जब तक हम सब जब तक देह को पीछे किसी जगह पे छोड़ के कुछ नया नहीं लिखेंगे। तब तक हम कैसे ये उम्मीद करे कि हम अपनी नसलो को कुछ दे रहे है ,बिलकुल नही ,आज उन लेखिकाओ के कहानियो को आपने समेटा और अपनी बात कह दी ?क्यों ? क्या आपके पास आज कि किसी ऐसे नारी कि कोई अच्छी बात नहीं थी ,जो आपको इस लाइन में न खड़े करके ,एक ऐसे नयी लाइन बनाने को दुसरो को प्रेरित करती ,जहा वाकई कुछ नया होता ?
आपके एक एक शब्द दिल को भेदने वाले है ,और आपने उन बेकार के विषये को लिया ,और एक बार फिर साबित किया कि नारी नारी के देह के अलावा कुछ नहीं सोच सकती। पुरुष के खेल में नारी का नाच ,इसको नारी के खेल में पुरुष का नाच होना चाहिए था।
जिस दिन औरत इस तरह कि सोच के साथ लिखेगी उस दिन शायद वाकई वो स्त्रीलेखन होगा। लेकिन हम ये सोच के नयी इबारत नहीं लिखा चाहती ,क्युकी अगर इसकी शुरुआत हमारे घर से हो गयी तो ???
मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि हम इंसानो कि आदत है ,कि किसी और के घर कि आग हमे बहुत सुकून देती है। जब तक वाकई वह राख का ढेर न हो जाए। उसकी ताप सुकून दायी होती है ,लेकिन जब खुद के घर कि आग से ताप लेने का सुख भोगने को बोलो तब सब कि हालत बिगड़ जाती है।
शालिनी का शुक्रिया कहूँगी ,कि उसने मुझे गलत राय कायम करने से बचाया ,और इस गम्भीर मुद्दे पे अपने विचार रखने को प्रेरित किया। और एक सबक भी मिला कि किसी भी बात को बिना समझे राय बनाना ,आज के हिसाब से बहुत गलत है।
ये लाज़मी है कि हर औरत के लिए उसका शरीर शायद उतना जरुरी न हो ,कही सुना है ,जब औरत एक बार अपना सब कुछ किसी को दे देती है ,तो वो देह से परे भावनाओ के समंदर में गोते लगाती है ,पुरुष मानसिकता के विपरीत ,यही सबसे बड़ी विडम्बना है ,जिस दिन उसको उसके देह के साथ ,उसकी अनगिनित इक्षाओं कि पूर्ति करने के साथ एक सही सामंजस का हिसाब करना आ जायेगा ,वो कभी देह के लिए बेचारी नहीं रहेगी ,लेकिन होता इसके विपरीत है ,औरत सिर्फ देह के लिए ,उसकी सुरक्षा के लिए ,उसको सम्भालने के लिए ,उसको सवारने के लिए अपनी पूरी ज़िन्दगी लगा देती है।
आखिर तब तक ???अरे इससे बहार आओ ?दुनिया देखो ?फ़ालतू कि मोह माया से हट के सोचो। जिस दिन ऐसा हो गया यकीन जानो आधे स्त्री अपराध भी ख़तम हो जायेंगे। बात फिर घूम फिर के वहा आये उससे पहले। सिर्फ एक बात और कि सब को एक लाइन में मत लाया करो यार। जब उस ऊपर वाले ने हमें कोई चीज़े या कोई अंग एक सामान नहीं दिया है तो हम कौन होते है ??दो आँखे भी एक सी नहीं है। सोचो। मुझे मेरे नींद बहुत प्यारी है। उस एक रात कि जो नींद गयी है न ,ये सब उसी का नतीज़ा है। उफ्फ्फ्फ़।
Thursday, November 14, 2013
दिल-दिमाग ने की तौबा
इश्क़ में हम तुम्हें क्या बताएं किस कदर चोट खाये हुए हैं...… इस गाने कि लाइन को अब कुछ इस तरह गाया जा सकता है...., राजनीति में हम तुम्हें क्या बताएं किस कदर चोट खाये हुए हैं. आलाकमान की एक ना से जान तक गवां चुके है….
इन दिनों आम लोगो के साथ साथ नेताओं की जान भी सस्ती हो चली है, आज काफी देर तक दिमाग में खलबली मची हुयी थी कि एक टिकट मिलने या न मिलने के कारण, जिन लोगो ने बड़ी ही आसानी से अपनी जान गंवा दी, फिर वो टिकट मिलने के बाद का टेंशन रहा हो? या फिर न मिलने का दुख, या फिर नहीं मिलने के बाद की आत्मग्लानि. जो भी कहें, एक बड़ा सवाल सामने आया है, क्या राजनीति जान से भी बड़ी हो गयी है?
एक नेता की मौत इसलिए हो जाती है क्योंकि उनको पार्टी ने टिकट दे दिया है, लेकिन चुनाव जीतने का टेंशन, इतना ज्यादा कि दिल ने धड़कने से मना कर दिया. एक नेता ऐसे कि टिकट नहीं मिली तो खुदखुशी कर ली, एक ऐसे कि टिकट नहीं मिली तो टेंशन में ब्रेन हेमरेज का शिकार हो गए, वहीं कईयो ने पार्टी की अनदेखी से पार्टी में ही बगावत कर दी.
इन नेताओ से जब राजनीति होती नहीं है तो ये करते क्यों है??? इस सवाल के साथ-साथ एक सवाल ये भी, कि पार्टी ने जो भी नियम कानून बनाये थे, उनको दरकिनार कर दिया गया है जब ये बात समझ आ गयी थी तब क्यों टिकट के लिए इतनी माथापच्ची की. मुझे ये कहने में जरा भी अफ़सोस नहीं है, कि जो नेता अपनी पार्टी का नहीं हुआ, अरे यहाँ तक कि अपने परिवार का भी नहीं हुआ, जान देने से पहले, परिवार के लोगो का नहीं सोचा, इतना सेल्फिश कोई कैसे हो सकता है?
ये वही लोग है आपके परिवार के जिन्होंने आपकी नेतागिरी के चक्कर में न जाने कितने लोगो से दुआएं कम, बददुआएं फ्री में ली है. और आप नेताजी, टिकट नहीं मिला और एक झटके में चलते बने!
मरने वाले के लिए यहाँ मुझे भाषा का इस्तमाल सही करना चाहिए, या थोड़ा नम्र होके लिखना चाहिए था शायद. लेकिन मैं आपकी इस तरह की हरकत को कतई सही नहीं कहूँगी, जो इंसान अपने परिवार का न हुआ, वो इन आम जनता के लिए क्या करेगा.
आज मेरे जबलपुर के एक नेता की चुनावी टेंशन के कारण हुई मौत का खामियाज़ा उस क्षेत्र की जनता को भुगतना पड़ेगा. कारण उनके बेटे को बिना कुछ किये, पिता की जगह अनुकम्पा नियुक्ति की तरह पार्टी ने फ्री का टिकट दे दिया है. इस बार उसका जीतना तय है, पिताजी की मौत का फ़ायदा उसको सहानुभूति में मिले वोटो से जो होने वाला है. अभी भी क्षेत्र की जनता का रुझान उस परिवार के लिए ज्यादा है, बाप के नाम पे बेटा फ्री वोट पाके बन जायेगा नेता! यहाँ नेताजी की मौत का फ़ायदा हुआ है परिवार को. इसे अपवाद कहा जा सकता है अन्य की अपेक्षा, लेकिन उनका क्या जहां न टिकट मिला, न कोई घर से दावेदार है.
अभी तक ये सुना था, कि राजनीति में अपना खून भी साथ नहीं देता, ये तो देखने मिल रहा है. लेकिन अब इस जुमले को बदलने का वक़्त आ गया है कि राजनीती में अब अपना दिल और दिमाग दोनों कब साथ छोड़ दें, भरोसा नहीं. परिवर्तन की बेला शायद यही है, जिसका इंतज़ार न जाने कब से था. इस बार पार्टियों ने जिस तरह नियम कानून को दरकिनार किया है दावों के साथ, ये होना लाज़मी था. और एक तरह से अच्छा भी है, इस तरह अब भविष्य में नयी सोच के साथ नए ऊर्जा के साथ लोग इस हवन में अपनी आहुति देंगे.
उत्तर-मध्य में मच के रहेगी उथल-पुथल!
. विधान सभा चुनाव के लिए जबलपुर उत्तर-मध्य क्षेत्र इस बार अपने आप में लोगो की नज़र में चर्चा का विषय बना हुआ है. वैसे देखा जाये तो, यहाँ कोई नया चेहरा नहीं है. दोनों बड़ी पार्टियों ने वही पुराने चेहरों को मैदान में उतारा है. इस बार ख़ास यह है कि यहाँ से स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने वालों की अधिकता है, जिसमे एक महिला पार्षद भी है. इसके साथ ही इस इलाके से किन्नर हीराबाई भी मैदान में है. ये दोनों पहले भी चुनाव लड़ चुकी हैं.
इस बार इस इलाके के कई वोट इधर उधर होने कि गुंजाइश बनी है. बड़ा कारण ये है कि बीजेपी के प्रत्याशी खिलाफ पार्टी में बगावत के स्वर सुनने मिल रहे है, वही कांग्रेस के प्रत्याशी के खिलाफ भी क्षेत्र की जनता के मन में काफी रोष है. इसके साथ ही स्वतंत्र महिला प्रत्याशी ने अपने इलाके में अपनी एक अलग पहचान बनाई हुई है, वही किन्नर समुदाय के वोट का फ़ायदा हीराबाई को मिलेगा. उनके पार्षद रहते किये गए कामो का फ़ायदा उन्हें इस समय मिल सकता है.
बीजेपी के प्रत्याशी को भले ही पार्टी ने चुनाव का टिकट दे दिया है लेकिन उन्होंने अपने 10 साल के कार्यकाल में अपनी जनता के लिए ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे जनता उन्हें वोट दे. लोगों से हुई बातचीत में जनता की राय यह है कि -अब नहीं. इस शराबी को इस बार वोट नहीं देना, इसने सिर्फ अपना भला किया है जनता को बेवक़ूफ़ बनाया है. वहीं कांग्रेस के उम्मीदवार ने भी कुछ ख़ास नहीं किया. उनके भी अपनी पार्टी के साथ मनमुटाव शुरू से रहे हैं. जो अपनी पार्टी का नहीं हुआ वो हम जनता का क्या होगा. 10 साल में इनके तो दर्शन भी दुर्लभ थे, ये तो ये, जो विधायक बने उनके भी.
तो अब बचे स्वतंत्र उमीदवार, इनमें से भी कुछ की छंटनी सोमवार को हो जायेगी, तब कहीं जा कर पूरा समीकरण सही तरीके से समझ में आएगा. अन्य पार्टियो के उम्मीदवारों के हिस्से में जो वोट जायेंगे उससे भी इस बार दोनों बड़ी पार्टियों को फर्क पड़ेगा. इस इलाके में अधिकांश लोगों का इरादा नोटा बटन दबाने का बन रहा है.
एक नज़र इस इलाके पर
ये इलाका मुस्लिम, जैन और सभी समुदायो के साथ व्यापार का मुख्य केंद्र है. इस इलाके में 10 साल में आज तक कोई भी तरक्की नहीं हुई. यहाँ न तो पार्किंग की व्यवस्था है, न ही चौड़ी सड़को का जाल. आये दिन यहाँ ट्रैफिक की समस्या मूंह खोले रहती है. व्यापारिक इलाका होते हुए यहाँ सुरक्षा के कोई इंतज़ाम नहीं है. बाज़ार में एक भी सुलभ शौचालय नहीं है, जनता को परेशानी का सामना करना पड़ता है. विधायक मद का इस्तेमाल नहीं हुआ, कारण इलाका नगर निगम के अंतर्गत आता है. ये सब बहाने पर्याप्त है जनता के पास और उनके पास एक बड़ा सवाल ये भी है कि इनको वोट हम क्यों दें?
विधायक का बातचीत का अंदाज़ भी यहाँ के लोगों के गले नहीं उतरता. कुल जमा बात कि इस बार इस सीट पे भी मुकाबला देने के लिए दोनों उम्मीदवारों के सामने जहां नए लोग हैं, वही नोटा का असर भी देखने मिलेगा.
कोई जोर से तो कोई होश में, बिक रहा है सब कुछ यहां, बेमोल राजनीति
चुनाव में जीतने के लिए जो न करो वो कम हैं. देश से अगर चंदा नहीं मिल रहा तो विदेशो से मंगवाए जा रहे हैं. जितना बड़ा आसामी, मतलब उमीदवार उतने बड़े चोंचले. इसी तरह का हाल हमारे जबलपुर का भी है.
एक नेता जी ने चुनाव की टिकट मिलने से पहले ही इलाके में गांधी जी के कागज़ बटवा दिए और टिकट मिलने के बाद टेंशन में जान चली गयी. पिता कि मृत्यु का फ़ायदा बेटे को हुआ. पार्टी ने टिकट भी दिया और जनता को पिता जी पहले ही खुश कर गए, तो अब उनको कोई चिंता नहीं. पर जनाब एक्टिंग है बेटे की, उसको जब ये कहते हुए सुनो कि दादा के जैसे ही जनता का ख्याल रखूँगा.
वहीं एक निर्दलीय महिला नेत्री का MMS चुनाव प्रचार के पहले ही चर्चा का विषय बना हुआ है. इसके साथ ही उसके त्रिया चरित्र को लेकर भी विपक्ष और जनता में माहौल गरम है. आज नाम वापस लेने के आखिर दिन सुबह से बाज़ार गरम रहा कि पति ने अभी तक पत्नी के नाम पे बहुत ऐश किये है, उसका कोई भरोसा नहीं कि शाम तक वो बिक जाये और बीबी का नाम वापस ले ले. कहने वालों का ये भी कहना है कि पति और पत्नी दोनों का चरित्र कोई साफ़ नहीं है.
महिलाओं के लिए जो महिला कल तक एक उम्मीद बनी हुयी थी, आज उसको लेकर महिलाओं में भी गुटरगूं शुरू हो गयी है. इस महिला प्रत्याशी ने अपना नाम वापस ले लिया है खबर लिखे जाने के पहले ही. अभी अभी आयी ताज़ा खबर के अनुसार पति ने लाखों रुपए लेके बीबी का नाम वापस ले लिया है.
वही पश्चिम इलाके में दारु के साथ कम्बल पिछले चुनाव में मिली थी इस बार तो उसकी आस में गरीब जनता उम्मीद की चादर लिए बेरहम ठण्ड से दो चार हो रही है. उम्मीद पर दुनिया कायम है. उनको इससे कोई मतलब नहीं कि कौन जीतेगा या कौन हारेगा. उनको ठण्ड से राहत इस चुनाव के बहाने मिल जायेगी और नेता जी की तो वैसे ही वाट लगने वाली है. इस बार वहां से दूसरी पार्टी के उम्मीदवार का परचा अभी से दमदार है. इस बार जनता ने सोच लिया है, न रेत न डम्पर और न चलेगा अब कोई बम्पर. हमको चाहिए बस एक सज्जन सा नेता, जिसका हाथ हमारे साथ, उसको देंगे अपना साथ.
चुनाव आयोग की नज़र बचा के सब जगह नोटों की दीवाली हो चुकी है. कुछ खेल शुरू में खेले जा चुके हैं कुछ सीधे-सीधे नज़रो के सामने खेले जा रहे है. यहाँ हर कोई बिक रहा है, ये खेल वाकई में अब बहुत रोचक बन चला है. आने वाले दिनों में देखना यह है कि अब जो बचे हुए है उनमे से कौन अपना गेम किस दिशा में ले जायेगा.
अति हमेशा नुकसानदायी रहे है ,समय है संभल जाओ।
अति हमेशा नुकसानदायी रहे है ,समय है संभल जाओ।
''enjoy the rape ''वाले सीबीआई डायरेक्टर के बयान को बिना पढ़े गलत बताने में भारतीये जनता पार्टी कि महिला नेता सुषमा स्वराज को एक मिनिट का वक़्त नहीं लगा। लेकिन उनसे मध्य प्रदेश में महिला अत्याचारो ,और बलात्कारो के बारे में सवाल किया ,तो वो इस तरह मुकर गयी ,कि उनके लिए ये आकड़े कोई मायेने नहीं रखते। और तो और प्रदेश में बलात्कार के मामले में तुरंत फ़ासी कि है उन्होंने इस तरह किया उनकी सरकार कि बहुत बड़ी उपलब्धि है ,उनके अनुसार सारे आकड़े गलत है ,मनगढ़त है। ,सुषमा जी से मेरा सवाल ,क्या आपको ये नहीं लगता कि विपक्षी दल कि एक मात्र सशक्त महिला नेता होने के बाद आपका इस तरह का रवैया ,वो भी ऐसे वक़्त पे जब आप जनता के पास अपनी सरकार को दोबारा जीतने के लिए वोट मांगने जा रही है ,आपको शोभा देता है???। चलिए माना कि राजनीती में ऐसे बयान दिए जाते है ,लेकिन एक महिला होने के बाद आपका महिलाओ के प्रति ये रवैया कहा तक सही है ,आज आपसे हुयी मुलाकात में एक बात और समझ आयी कि महिला नेता होने का फ़ायदा आपके द्वारा आपकी पार्टी कि महिलाओ को नहीं मिला है ,जब आप किसी मंच से इस तरह का सफ़ेद झूठ इतनी आसानी से कह जाती है ,तो हम सब आधी आबादी के लोग आप जैसे लोगो पे क्यों भरोसा करे ???
''enjoy the rape ''वाले सीबीआई डायरेक्टर के बयान को बिना पढ़े गलत बताने में भारतीये जनता पार्टी कि महिला नेता सुषमा स्वराज को एक मिनिट का वक़्त नहीं लगा। लेकिन उनसे मध्य प्रदेश में महिला अत्याचारो ,और बलात्कारो के बारे में सवाल किया ,तो वो इस तरह मुकर गयी ,कि उनके लिए ये आकड़े कोई मायेने नहीं रखते। और तो और प्रदेश में बलात्कार के मामले में तुरंत फ़ासी कि है उन्होंने इस तरह किया उनकी सरकार कि बहुत बड़ी उपलब्धि है ,उनके अनुसार सारे आकड़े गलत है ,मनगढ़त है। ,सुषमा जी से मेरा सवाल ,क्या आपको ये नहीं लगता कि विपक्षी दल कि एक मात्र सशक्त महिला नेता होने के बाद आपका इस तरह का रवैया ,वो भी ऐसे वक़्त पे जब आप जनता के पास अपनी सरकार को दोबारा जीतने के लिए वोट मांगने जा रही है ,आपको शोभा देता है???। चलिए माना कि राजनीती में ऐसे बयान दिए जाते है ,लेकिन एक महिला होने के बाद आपका महिलाओ के प्रति ये रवैया कहा तक सही है ,आज आपसे हुयी मुलाकात में एक बात और समझ आयी कि महिला नेता होने का फ़ायदा आपके द्वारा आपकी पार्टी कि महिलाओ को नहीं मिला है ,जब आप किसी मंच से इस तरह का सफ़ेद झूठ इतनी आसानी से कह जाती है ,तो हम सब आधी आबादी के लोग आप जैसे लोगो पे क्यों भरोसा करे ???
मुझे आपकी पार्टी कि एक बुजुर्ग महिला ने आके कहा कि आपने हम लोगो के लिए सवाल किया ,अच्छा किया।
सुषमा जी बात यहाँ सिर्फ महिलाओ पे हो रहे अत्याचारो कि नहीं है ,बात है आपकी पार्टी के दावो कि जो खोखले साबित हुए है ,
एक तरफ आपकी पार्टी महिलाओ कि रक्षा का दावा करती है वही उसका मजाक बनाने से भी पीछे नहीं है ,महिला का मंगलसुत्र उसके सुहाग कि निशानी होता है आपने तो उसको तक नहीं बक्शा। चुनाव प्रचार के नाम पे मंगल सूत्र को हीदाव पे लगा दिया। इन सब बातो को दरकिनार कर भी दिया जाये तो आपकी पार्टी ने महिलाओ को टिकट देने में जो कंजूसी दिखायी है उसका क्या ?आपके कथनी और करनी के इस फर्क का नतीज़ा आपको चुनाव परिणाम में देखने मिलेगा ,इस बात को भी आपने सिरे से नकार दिया ,अगर इन सारे बातो को आप के साथ आपकी पार्टी के लोग इस तरह से नकार रहे है ,तो क्या ये समझा जाए कि ,१० सालो में जो कुछ भी किया वो यही हुआ ,कि मकान बनाया किसी ने उसको पुतवा के किसी ने वाहवाही लूट ली ,क्युकी अगर आप और आपकी पार्टी के सभी नेता अपने कामो कि वजह से तीसरी बार सरकार में आने वाले है ,जैसा कि आपका दवा ही नहीं पूर्ण विश्वास है ,तो सिर्फ ये बताइये कि इस बार के आपके मैनिफेस्टो में महिलाओ कि सुरक्षा कि बात पे आप का निरुतर होना ,और अभी तक सभी नेताओ का सिर्फ एक बात को कहना कि चाँद दिन में सब सही हो जायेगा। आप लोग ऐसा क्या करने वाले है किसी खरीद फरोख्त होने वाली है जो सारे समीकरण अचानक से बदल जायेंगे। अंधे इंसान का ये विश्वास कि वो बिना सहारे के चल लेगा ,समझ आता है ,लेकिन दिमाग के अन्धो का क्या ,जिनके पल्ले आप नेताओ कि दोगली बाते पल्ले नहीं पड़ती |
आपका ये विश्वास कही अति उत्साहित बयान तो नहीं ,कि इस बार फिर आप सरकार बना रही है।
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