Thursday, September 27, 2012

  ज़िन्दगी दोबारा चांस  नहीं देती .......................                                                     .                                                      
                                                                                                   दुनिया  में लोगो को प्यार का मतलब  नहीं मालूम या वो प्यार को सिर्फ एक ही नज़र से देखते है। प्यार के कई रूप है ,ये आप पे  निर्भर करता है की आप उस प्यार को, जस्बात को, किस तरह  जाहिर करना चाहते है। आला तो लोग इस बेहद ही नाजुक मामलो  में  इज़हार करना नहीं जानते या उनको न जाने किस तरह के डर  ने  घेरा हुआ  है, अगर दहसत के साए है तो प्यार जैसे भावना को पनपने  ही न दो न , प्यार करना भी है,जाताना भी नहीं है ,या उसको किसी  और भावना में  बदल के जाहिर करना ,बेहद ही नादानी भरा काम है, इसमे न सिर्फ प्यार करने वाला  खुद को धोका देता है, बल्कि  उस इंसान को भी आसमंजस में  डाल देता है, जो प्यार करता है, जताता है और बाद में  अपने को ठगा सा महसूस करता है, उस डोर  को कैसे बांदना  है पहले ये शिकना  बहुत जरुरी है ,कोई भी रिश्ता बनाए रखा जाए उसके लिए पहले खुद को मजबूत होना होगा ।                                                                                                         जब  हमें कोई अपनाता है तब हम उससे कुछ ऐसे धुत्कारते है, जैसे हमसे ज्यादा अच्छा कोई नहीं।लेकिन हम ये क्यों भूल जाते है की ऐसा ही कुछ कभी हमारे साथ भी हो सकता है।कभी कभी बात बनते बनते बिगड़ जाती है ,और जब बात समझ आती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है, इसलिए  समय  के साथ अपने मन की बातो को साफ़ करते चलना ,जरुरी हो गया है,जबरन को कोई गाठ किस्से के मन में  रह जाए ,क्या फ़ायदा ,दोस्तों आप सोच रहे होगे की आज इससे क्या हुआ ये प्यार पे lecture  क्यों दे रही है।आजकल के नए बच्चे सिर्फ इंसान के उपरी सुन्दरता देखते ,है न की दिल की सोम्यता या,सुन्दरता, उम्र ,और कमी, अरे दोस्तों ये सब देखके अगर प्यार करना है तो वो प्यार नहीं होता वो बहुत ही छोटे समय के लिए लिया गया आपका adjustment  है जो आप खुद के दिल को धोका  देके करते है,वेल मुझे बहुत दुःख  होता है जब किस्से को प्यार में   तड़पता देखती हु ख़ास कर के उन  दोस्तों को, जो जिससे प्यार करते है, उसको इज़हार भी करते है ,लेकिन बदले में  मिलता है, एक नस्तर चुबोता दर्द ,जिसकी  चुबन आहे बाह गाहे,  कभी न कभी इंसान को अंदर से हिला देती है।वो खुद से दूर हो जाता है।इसलिए अगर इस आग में  जलने की हिम्मत ,,है तो इज़हार करने की हिम्मत करो वरना फ़ालतू का समय इस इम्ह्तिहान में  देने का कोई मतलब नहीं। जलोगे तो सोने के निखर के  बहार आओगे वरना ,अकेले पन की  दुनिया में   अकेले ही रह जाओगे।
तो अब समय है सच को स्वीकार करो , जो मन में  है उसको बोलो ,साफ़ बोलो,इज़हार करो ,सीधे सीधे ,कोई न  नुकुर नहीं,कोई दिखावा नहीं,लेकिन एक जवाब हमेशा अपने साथ लेते हुए की ,जरुरी नहीं की हाँ ही सुनने मिले न सुनने की हिम्मत भी होनी चाहिए ..  प्यार  नाम ही है ,साफ़ ,सरल ,शब्दों   का  दिल की आवाज़ का जो बहुत ही पाक है।।।।।।।
एक बार हिम्मत करो ,ज़िन्दगी दोबारा चांस  नहीं देगी ............................

Wednesday, September 26, 2012



तेरा मेरा नाता है क्या?
तुम देती हो... मै लेता हूं
तुम लेती हो... मै देता हूं
घडी़ घडी़ में रूप है बदलता
समय का पहिया सदा है चलता
हम दोनों में फर्क है कैसा
आपस में एक जैसा है क्या?

मुझे पता है उसे नींद न आई होगी
सपने चल रहें होंगे आंखों में
करवट बदलेगी.. तन्‍हाई होगी
मुझे पता है उसे नींद आई होगी
उसके सामने वही बादल.. जो मेरे सामने
उसके सामने वही कोहरा.. जो मेरे सामने
उसके-मेरे अर्धविराम भी वही, पूर्णविराम भी
तभी तो मै जब यहां बेचैन हूं
उसकी पलकें भी ना झपकी होंगी
मुझे पता है उसे नींद न आई होगी

सुख-दुख बरसे हम पर जब भी
हंस दिए, कभी रो लिए हम भी
राहें अपनी संग चलतीं हैं
जब चाहे नजरें मिलती हैं
ये किस जनम से लेकर चलें हैं
ये रिश्तों का राज है क्या?
तेरा मेरा नाता है क्या?

ना रिश्ते को हो कोई नाम
दिल से मिलना दिल का काम
अलग-अलग हैं सफर हमारे
फिर भी एक दूजे के हैं सहारे
जब भी मुझको कांटा चुभता है
तेरे दिल में ये दर्द है क्या?
तेरा मेरा नाता है क्या?


Saturday, September 15, 2012

मीडिया का इंद्रजाल और आंदोलनों का तिलिस्‍म


जादूगर के तमाशे और सड़क पर भीख मांगती किसी महिला और उसकी गोद में एक बीमार बच्‍चे में क्‍या फर्क है। कहीं न कहीं दोनों ही आंखों का धोखा हैं। ये इंद्रजाल है। इसका तिलिस्‍म टूटता है तो लोग खुद को कोसते हैं। मध्‍यप्रदेश में ओंकारेश्‍वर बांध का जलसत्‍याग्रह और भोपाल में इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शन का तमाशा दोनों इसकी जीती-जागती मिसाल हैं। दोनों को मीडिया ने एक इंद्रजाल की तरह पेश किया। यह दिखाने की कोशिश की कि लोग अब सड़कों पर लड़ाई लड़ने को आगे आ रहे हैं। लेकिन इनका तिलिस्‍म जल्‍द ही टूट गया। टाइम्‍स ऑफ इंडिया की एक खबर में पत्रकार ने लिखा है कि जल सत्‍याग्रही टीवी कवरेज के लिए 20 फुट के गहरे गड्ढे में बैठे थे। सरकार के झुकने से जब पानी उतरा तो यह तिलिस्‍म भी टूट गया। इस खबर पर नर्मदा बचाओ आंदोलन की कथित नेता चित्‍तरूपा पालित का वह पत्र भी हास्‍यास्‍पद है, जिसमें उसने आंदोलन के नेता आलोक अग्रवाल का बयान न छापे जाने की निंदा की है। उन्‍हें पत्रकार को यह सीख देने का कोई हक नहीं है कि वह किसका बयान छापे और किसका नहीं। पत्रकार ने (भले ही पानी उतरने के चार दिन बाद ही सही) मौके पर जाकर जो देखा वही लिखा। गड्ढा तो 20 फुट का ही है, उसे नकारने वाला कोई नहीं। उसमें कोई डूब नहीं सकता। नाक तक पानी आने की असलियत भी उजागर हो गई है। समूचा तिलिस्‍म ही टूट गया है। मेरे अपने शहर जबलपुर में भी यही तमाशा कुछ स्‍वयंसेवी संगठनों ने जलसत्‍याग्रह के नाम से किया और मीडिया का कवरेज भी लूटा। भोपाल में भी ज्‍योति टॉकीज चौराहे पर कुछ युवाओं ने पानी की टंकी में डूबकर ऐसा ही तमाशा किया था। ऐसे लोग अपने पीछे कुछ समर्थकों को छोड़कर आते हैं, जो असल में प्रचारक हैं। वे फोटो को बार बार फेसबुक पर लगाते हैं, ताकि ज्‍यादा से ज्‍यादा संवेदनाएं जुटाई जा सकें। दूसरा वर्ग इनके प्रशंसकों का है, जो हां में हां मिलाने का काम करते हैं।
तिलिस्‍म टूटता है तो मुझ जैसे आम नागरिकों को बहुत दर्द होता है, जो सही मायनों में इंसाफ चाहते हैं। इंसाफ उस कौम के लिए जो बरगी, सरदार सरोवर, इंदिरा सागर और महेश्‍वर जैसे बांधों से प्रभावित है। जिन्‍हें अब तक जमीन नहीं मिली। मेधा पाटकर ने इनके लिए लंबी जमीनी लड़ाई लड़ी। लेकिन इन दोनों लड़ाइयों में उन्‍हें बिल्‍कुल अलग-थलग रखा गया। लगता है (?) नर्मदा बचाओ आंदोलन का नेतृत्‍व अब चित्‍तरूपा पालित उर्फ सिल्‍वी जैसी सनसनी पैदा कर जंग जीतने का इरादा रखने वाली नेताओं के हाथ में आ गया है। ठीक वैसे ही, जैसे अन्‍ना को परे रखकर राजनीति में कूदने की घोषणा करते ही इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शन का तिलिस्‍म टूट गया। भोपाल में मनीष सिसोदिया के सामने इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शन के कार्यकर्ताओं ने एक-दूसरे को मां-बहन की गालियों और मर्डर, घोटाले के आरोपों से नवाज दिया। असल में यही असलियत है जमीनी आंदोलन के नाम पर तिलिस्‍म का चोगा पहनकर घूमने वाले युवाओं की। इनमें से कुछ तो अपने नाम के साथ एक्‍टिविस्‍ट की पट्टी लगाकर भी घूमते हैं।
असल में सरकार और जनता के बीच खड़ी है सिविल सोसायटी। दोनों के बीच मीडिया भी खड़ी है। जब कभी मीडिया आगे बढ़कर आंदोलनों के तिलिस्‍म में उलझकर सिविल सोसायटी से हाथ मिला लेती है तो जनता का पलड़ा वजनदार हो जाता है। यह सिविल सोसायटी के हाथों इस्‍तेमाल होने जैसी बात है और मुझे नहीं लगता कि किसी छोटे से बड़े पत्रकार को यह गवारा होगा। टाइम्‍स की खबर से यह साफ जाहिर हो गया है कि मीडिया अपनी इस कोशिश में एक इंद्रजाल बुनती है। लोगों को धीरे-धीरे समझ आने लगा है कि यह एक धोखा है। इस धोखेबाजी में सबसे ज्‍यादा फायदा सिविल सोसायटी के उन लोगों का हो रहा है, जिनका एकमात्र मकसद सिर्फ प्रचार पाना है। दुर्गति के शिकार ओंकारेश्‍वर बांध से विस्‍थापित वे लोग हुए हैं और होंगे, जिन्‍होंने ऐसे लोगों की बात सुनकर अपना जल सत्‍याग्रह छोड़ दिया। उनके इस कदम से इंदिरा सागर बांध के विस्‍थापितों का जल सत्‍याग्रह खत्‍म हो गया। चित्‍तरूपा पालित अगर वाकई प्रचार की भूखी नहीं थी तो उन्‍हें जमीन मिलने तक आंदोलन जारी रखना था। क्‍या मध्‍यप्रदेश सरकार दर्जनों मीडियाकर्मियों के सामने उनका आंदोलन खत्‍म करा सकती थी। लेकिन उन्‍होंने ऐसा नहीं किया और इंदिरा सागर बांध के विस्‍थापितों की आवाज बंद करने का विरोध भी नहीं हुआ। यहां तक कि जल सत्‍याग्रह को प्रचारित कर रहे भोपाल और दिल्‍ली में बैठे समर्थक 
भी महंगाई का रोना रोने लगे।
मेरे जैसे पत्रकार के लिए यह बेहद दुखद है कि जनांदोलनों का तिलिस्‍म कुछ इस कदर से टूट रहा है कि 
मीडिया के पास खुद को कोसने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं बचा। जब आंदोलन की जमीन मीडिया और फेसबुक बन जाए तो उसका तिलिस्‍म टूटने में देर नहीं लगती। भाइयों और बहनों, इस माह की तीनों बड़ी घटनाओं से सबक लो और जमीन के आंदोलनों को जमीन में ही लड़ो। तुम्‍हारी आवाज इतनी बुलंद होनी चाहिए कि बिना मीडिया और फेसबुक के वह दिल्‍ली तक गूंजे। 
मेरे जैसे पत्रकार के लिए यह बेहद दुखद है कि जनांदोलनों का तिलिस्‍म कुछ इस कदर से टूट रहा है कि मीडिया के पास खुद को कोसने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं बचा। जब आंदोलन की जमीन मीडिया और फेसबुक बन जाए तो उसका तिलिस्‍म टूटने में देर नहीं लगती। भाइयों और बहनों, इस माह की तीनों बड़ी घटनाओं से सबक लो और जमीन के आंदोलनों को जमीन में ही लड़ो। तुम्‍हारी आवाज इतनी बुलंद होनी चाहिए कि बिना मीडिया और फेसबुक के वह दिल्‍ली तक गूंजे। 




Thursday, July 26, 2012


सुनो जानेमन ,
जरुरी नहीं की मेरे कहने पे तुम इतराओ ,
यु लजाओ  जरा फिर से एक बार मेरे पहले वाली प्रियेतामा बना जाओ ....
सुनो जानेमन ,
बरस बीते  कुछ अच्छा सुने ,तेरे सुन्दर मुख से,
सुनो फिर से कुछ वैसे  ही आके कुछ धीरे से  होले से ,
मेरे कानो मै कुछ गुनगुना जाओ ,
जरा फिर से मेरे पहले वाली प्रियतमा बन जाओ ....
सुनो जाने मन ,
वो पहले जैसे कहती थी तुम्हारी आँखे मुझसे ,
कुछ अपनी ,कुछ घर की,कुछ सब की,
जरुरी नहीं मेरे कहने पे तुम कहो ,
फिर एक बार आँखों से अपनी कुछ अपनी आप बीती कह जाओ ,
सुनो जाने मन  
जरा एक बार फिर मेरे पहले वाली प्रियतमा बन जाओ .....

Wednesday, July 25, 2012

mera alhad bachpan


सर्दी की गुनगुनी धुप में ,
धीरे धीरे सिकता मेरा मन ,
कुछ इस तरह गर्माता है ,
जैसे ४० के बाद १६ की याद ,
तेरे पहलू मै आके गुनगुनी धुप का ,
वो अहसास सिमटता है कुछ ऐसे ,
जैसे उन   की बुनावट  मै ठण्ड ,
ये गर्माहट  भी सजी सावरी है ,
कुछ याद दिलाती बचपन की,
चाहे दादा की गोदी हो.
या पापा का प्यार,
माँ की डाट रुला देते थी 
दादी के बाहों की गर्मी मुझको चुप करा देते थी,
उम्र दर उम्र की गुनगुनाती धुप .,
न जाने कब ,कैसे , आज इस मोड़ पे ले आयी ,
जहा एक बार फिर मन चाहता है ,
सिमटना ,गुदगुदाना ,चुलबुलाना ,उस गोद की गर्मी मै ,
वो प्यार भरा मेरा अल्हड बचपन ,ढूंढ रहा है , 
मेरी वो पुरानी ठण्ड की गुनगुनाती धुप और उसकी गर्माहट ..........?

Sunday, July 15, 2012


पुरुषवादी नैतिकता के जहर बुझे बादल
मध्‍यप्रदेश के खंडवा की रहने वाली सुनीता अपने एक रिश्‍तेदार के साथ चार साल पहले जब दिल्‍ली आई थी, तो आंखों में ढेर सारे सपने थे। बंगले में काम करेगी। अच्‍छा खाना, कपड़े और साथ में हर माह पांच हजार रुपए मिलेंगे। उसे ये सारे सपने उसी रिश्‍तेदार ने दिखाए, जो उसे इस महानगर तक लेकर आया। लेकिन जल्‍द ही सुनीता के सारे सपने टूट गए। रिश्‍तेदार ने उसे जिस्‍मफरोशी के अड्डे पर बेच दिया था। रोज कई-कई बार मरना और अगले दिन फिर जिंदा रहने के लिए जी उठना। आखिर दो साल के बेटे के साथ भाग आई 21 वर्षीय सुनीता। हकीकत में जीने लगी, पर जमाने को यह मंजूर नहीं था। जब भी वह काम के लिए घर से निकलती, छेड़छाड़ के साथ अश्‍लील फब्‍तियां उसका इंतजार करती।
गुवाहाटी की सड़क पर पिछले सोमवार को एक स्‍कूली छात्रा के साथ बदसलूकी और सुनीता के मामले में ज्‍यादा अंतर नहीं है। सुनीता बाजार में बेची गई, जबकि उस बदनसीब स्‍कूली छात्रा की गलती यही थी कि उसने अपने दोस्‍तों के साथ एक बार में जाने की गुस्‍ताखी की। पब, डिस्‍को थेक, बार जैसी महानगरीय सुविधाएं समाज के आधे हिस्‍से के लिए नैतिकता की कसौटी पर पाक साफ तरीके से नहीं उभर पाई हैं। इसे यूं भी देख सकते हैं कि भूमंडलीकरण ने समाज को मौज-मस्‍ती और मनोरंजन के बहुतेरे साधन तो दिए हैं, पर इसमें महिलाओं का बढ़-चढ़कर हिस्‍सा लेना एक बड़े हिस्‍से को रास नहीं आ रहा है। गुवाहाटी की घटना को कवर करने वाले स्‍थानीय असमिया चैनल के प्रमुख अतनु भुयां लेट नाइट क्‍लबों और बार में जाने वाली अधिकांश लड़कियों को वेश्‍या करार देते हैं। ट्विटर पर वे लिखते हैं कि महिलाओं के साथ बदतमीजी की घटनाएं सबसे ज्‍यादा ऐसे क्‍लबों, बार के बाहर होती हैं। सवाल यह है कि क्‍या वे इसी बात को साबित करना चाहते थे ? अतनु अपने बचाव में यह ट्वीट भी करते हैं कि उनके चैनल के रिपोर्टरों ने कोई ‘अनर्थ’ होने से पहले ही पुलिस बुला ली थी। वे तो सिर्फ इस घटना की वीडियो शूटिंग कर अहम सुबूत इकट्ठा कर रहे थे। लेकिन उनका असली मकसद अगले दो ट्वीट से साफ हो जाता है, जिसमें उन्‍होंने यू-ट्यूब पर डाले वीडियो के लिंक भेजे, साथ ही अपने ही चैनल की बढ़ी हुई टीआरपी भी बताई। आखिर में अतनु ये भी लिखते हैं कि बम ब्‍लास्‍ट होने पर उनके चैनल के रिपोर्टर पीड़ितों को रक्‍तदान करने के बजाय घटना को शूट करना ज्‍यादा जरूरी समझेंगे। साफ है कि ऐसी घटनाओं के पीछे मीडिया की मानसिकता भी कहीं न कहीं ज्‍यादा से ज्‍यादा व्‍यावसायिक फायदा उठाने की रहती है।
कुछ दिन पहले ही असम में ही एक गर्भवती महिला विधायक की भीड़ ने बेरहमी से सिर्फ इसलिए पिटाई कर दी, क्‍योंकि उसने अपने पति को छोड़कर एक मुस्‍लिम युवक के साथ रहने का फैसला कर लिया। हमारा समाज प्रतिगामी, पितृ सत्‍तात्‍मक है। वह आज भी औरत को सदियों पुराने पितृसत्‍तात्‍मक बंधनों में देखता है। पर यहां इस समाज के दो चेहरे भी उभरते हैं। एक वह संपन्‍न तबका, जो भूमंडलीकरण के दौर में बाजारवादी विकास के साथ कदम मिलाकर चलना चाहता है और दूसरा वह जो इस चकाचौंध से खुद को बहिष्‍कृत पाता है। दरअसल पितृ सत्‍तात्‍मक बंदिशों की जड़ें इसी तबके में अभी भी गहरे जमी हुई हैं। सिनेमाई संस्‍कृति से लेकर मॉल और पब कल्‍चर के रूप में पनप रही आधुनिकता की गति को रोकने की न तो इस वर्ग की मंशा है और न ही सामर्थ्‍य। परोक्ष रूप से यह नव उपभोक्‍तावाद का समर्थन भी करता है, पर इसकी आजादी सिर्फ पुरुषों तक ही सीमित है। चार साल पहले मुंबई के एक पांच सितारा होटल से बाहर निकलीं दो महिलाओं के ऊपर हमला करने वाले अधिकांश आरोपी इसी वर्ग से थे। उनके कृत्‍य को भले ही यौन हिंसा की श्रेणी में डालकर देखा गया, लेकिन इस तरह की घटनाओं के पीछे छिपे सामाजिक कारणों को न तो तब उजागर करने की कोशिश हुई और न ही अब हो रही है। ऐसी घटनाओं के खिलाफ व्‍यापक शिक्षित, जागरूक समाज गुस्‍सा जताता है, सिस्‍टम को कोसता है, महिलाओं के प्रति नजरिया बदलने की हिदायत देता है। लेकिन मसले का हल उसके पास भी नहीं है, क्‍योंकि हमारा बाजारवादी आर्थिक विकास सबको साथ लेकर चल पाने में नाकाम रहा है।
इस समस्‍या का एक राजनीतिक पक्ष भी है। आधुनिकता से अछूता पितृसत्‍तात्‍मक समाज का वर्ग भले ही नवउपभोक्‍तावादी विकास में हिस्‍सेदार न हो, पर राजनीतिक रूप से काफी सक्रिय है। यही वह वर्ग है, जो राजनीतिक रैलियों, चुनाव सभाओं और प्रचार में भीड़ का हिस्‍सा बनता है। यह वोट बैंक है। एक ऐसा वोट बैंक जिसे राजनीतिक फायदे के लिए मोड़ा जा सकता है। यह भीड़ है और हमारे देश में भीड़ ही रास्‍ता बनाती रही है। शिक्षित मध्‍यमवर्ग इस भीड़ में शामिल नहीं होना चाहता, क्‍योंकि वह खुद को विकसित मानता है, बाकियों से अलग समझता है। भीड़ ही सत्‍ता तक पहुंचने का रास्‍ता साफ करती है और जब यह अपनी मनमानी पर उतर आती है तो इसका कोई चेहरा नहीं होता। हमारा कानून भी भीड़ को व्‍यक्‍ति विशेष के रूप में पहचानने से इनकार कर देता है। ऐसे में आरोपी सुबूतों के अभाव में छूट जाते हैं। भीड़ का यह चरित्र पहले गांवों में अक्‍सर दिखाई देता था, जो अब शहरों में नजर आ रहा है। यह हमारे लोकतंत्र के भीड़तंत्र में तब्‍दील होने की परिणति है।
सुनीता की कहानी अंतिम नहीं है और न ही गुवाहाटी की घटना के बाद देशभर में जताया जा रहा आक्रोश हमारे समाज की पितृसत्‍तात्‍मक तस्‍वीर को बदलने के लिए काफी है। लगातार ऐसी घटनाओं का सामने आना समाज में महिलाओं के प्रति असुरक्षा का माहौल पैदा करता है। ऐसा होने देने के पीछे कुछ राजनीतिक स्‍वार्थ भी हैं। समाज के विकसित, शिक्षित वर्ग को इन्‍हें समझना होगा और तभी ऐसी घटनाओं को रोकने का कोई रास्‍ता निकल सकेगा।
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Tuesday, July 10, 2012

 कभी कभी हम ये नहीं समझ पाते की क्या अच्छा है और क्या गलत ,क्युकी हमारे पास सब्र नाम की कोई  चीज़ नहीं है ,हो भी कैसे हर चीज़ को पाने की जल्दी ,के चलते उस बात से होने वाले नुक्सान को हम भुला बैठते है ,लेकिन अगर थोडा सा सब्र रख के किया गया काम बहुत ही इन्मेनान के साथ संपन होता है ,इसकी अनुभूति उस समय हुई जब मेरे  किये गए काम का मुझे कोई पारितोषक नहीं मिला जबकि में  उसकी हकदार थी,मुझे बहुत दुख हुआ।तब मुझे मेरे गुरु नै कहा शायद आज का दिन तुम्हारे लिए नहीं था .तुमने बहुत उत्सुकता पूर्वक काम किया ,बिना ये सोचे की इसका अंजाम क्या होगा ,जबकि कोई भी काम बिना उसके परिणाम को सोचे नहीं किया जाना चाहिए ,बस फिर क्या था ,मेरा पारा  चड़ा हुआ था दिमाग गरम ,लेकिन जैसे ही ये बाते कानो में गूंजी ,मन शांत हुआ ,और हम जुट गए फिर से नए सिरे से काम में ,वो दिन है और आज का दिन जब कभी भी ऐसे परिस्थिति आती है,मुझे वो गुरु की बात याद आती है और में  रस बस के पुरे तन मन के साथ लग जाती हु उस काम को पूरा करने में ।और अब मेरे सारे काम बहुत ही अच्छे से पुरे होते है ।