कहने वालों का कुछ नहीं जाता, सहने वाले कमाल करते हैं। कौन ढूंढे जवाब ज़ख्मों के, लोग तो बस सवाल करते हैं!
Thursday, April 30, 2015
Wednesday, April 29, 2015
खतरनाक है औरत।
आज तक सिर्फ लड़की होने के अहसास को जिया था ,उस लड़की को जिसको बचपन से न जाने कितने सारे नियम कानून की पढ़ाई उसकी माँ देती है,आते जाते रिस्तेदार भी दे जाते मनो अपना फ़र्ज़ निभा दिया। उसके बाद स्कूल कॉलेज के संगी साथियो के बीच एक नयी ज़िन्दगी जीने का मौका मिलता है ,उसके बाद जब किसी लड़के की संगत मिलती है तब उसके दिमाग के हिसाब से लड़की खुद को ढालती है ,फिर उसके परिवार के हिसाब से ,फिर जब बच्चे हुए तब उनके हिसाब से ,वो बड़े हुए तब ज़िन्दगी का एक दौर ऐसा आता है जब लगता है की खुद के लिए सोचे लेकिन तब कोई बीमारी आ जकड़ती है ,और फिर एक दिन ये लड़की की इह लीला खत्म हो जाती है।
लेकिन ऐसा है नहीं ,ये लडकिया ही असल में सब झंझटो की जड़ है ,मैं लड़की हु ,और बोल रही हु ,की हाँ हम लडकिया बहुत खतरनाक है ,दिक्कत ये है की हम खुद को आज तक जान ही नहीं पाये। हमे जिसने जिस रूप में ढाला हम ढल गयी। लडकिया नहीं बल्कि उनका दिमाग जो ,जो की लड़को से ज्यादा तेज है ,लेकिन सिर्फ भावुकता के मसले में वो अपने को निढाल कर देती है ,सौप देती है खुद को किसी के हवाले ,ये सोचके की वो इन्हे संभालेगा ?भैया क्यों ? क्या तुम कभी ये जाना की की आखिर तुम्हारे लिए क्यों पगलाए फिरते है मर्द ?
इनको इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की औरत की भावनाए क्या है ,क्यों वो एक बार में खुद को समर्पित कर देती है। उनको सिर्फ तुमको निहारने से तुमको उल्ल जलूल कहने से ,तुमको हर बार पे नीचा दिखाने में मजा आता है ,ये वो मर्द है जो दिन भर जब तक औरत सूचक गालिया न दे दे उनको कॉन्फिडेंस नहीं आता ,लेकिन अगर यही गालिया किसी औरत ने दे दी तो इनकी मर्दानगी को चोट लग जाती है। और ये वो मौका होता है जब हम सब लडकिया औरते घटिया ,औरत के नाम पे कलंक , और बेहूदा साबित हो जाती है। यहाँ तक की सारी घटना ,की जिम्मेदार हम हो जाती है ,और तो और हमको गलत साबित करने के लिए ये मर्द हम औरतो का ही सहारा लेते है। मतलब बहुत ही सोची समझी चाल के तहत खुद को साबित कर किसी के अपने बने रहो और किसी को बदनाम कर दो। वैसे वो गलत भी नहीं है क्युकी हम औरतो को उनकी लत पड़ चुकी होती है। उनको ये पता है की किस तरह उनको झंझट से निकलना है ,वो गाली गलोच कर के निकल जाते है ,एक दूसरे पे आरोप लगा के पाक साफ़ ,और दोबारा जिसको गलत कहा उसके साथ नार्मल भी हो जाते है। ये उनकी बहुत बड़ी खासियत है। जो हम औरतो को नहीं आती ,हमे तो कोई कह भर दे की फलानी ने तेरे बारे में ऐसा कहा फिर देख लो हमारी पूरी एनर्जी लगा देंगे घर रिश्ते एक हो जाते है ,लेकिन साला तब भी मुह से गलत शब्द नहीं निकलते। अब इसे हार्ड डिस्क का प्रॉब्लम कहो या सॉफ्ट का ,कुछ नहीं हो सकता।
तो जब कुछ हो ही नहीं सकता तो जैसा है वैसा ही रहे। खतरनाक होना ,कहलाना ,और असली में खतरनाक बनना बहुत फर्क है ,बाकी लोगो का मुझे नहीं पता लेकिन अब एक बात समझ आ गयी है मुझे की आप लाख कोशिश कर लो कुत्ते की पूछ की तरह किसी की सोच को ,और औरत के औरतपन को नहीं बदल सकते ,हाँ उसका इस्तमाल अपने हिसाब से कर सकते है।
२७ अप्रैल से २७ अप्रैल तक का का हिसाब किताब।
एडवोकेट नेमा जी ने रिटर्न फाइल किया और जैसे ही कॉपी के आखिरी पेज पे सिग्नेचर किये, बोल पड़े आज काफी दिनों के बाद २७ अप्रैल आई है ?मैं सामने बैठी हुयी जवाब में बोल गयी उस दिन भी २७ ही थी ? नेमा जी ने मुझे देखा उस दिन ? सेल्स टैक्स की कॉपी के आखिरी पेज से लेके, मैंने कॉपी के सारे पेजो को पलटाया और कॉपी के शुरुआत के ४ क़्वार्टली के उस पेज पे गयी ., जिसमे पापा ने २००७ का लास्ट रिटर्न फाइल किया था। फिर नेमा जी बोले आपको याद है आज भी ? उनका बोलना था और आँखों ने भीग के सारी कहानी बयान कर दी। इस कॉपी का २७ अप्रैल को शुरू होना एक चैप्टर का क्लोज होना था ,और आज जो कॉपी खत्म हुयी वो एक नए चैप्टर की शुरुआत।
२७ अप्रैल २००७ को उस रिटर्न को पापा ने फाइल किया उसके बाद आज की तारीख याने २८ अप्रैल २००७ को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा। नेमा जी को जब बात समझ आई तो उदास वो भी हुए और बोल पड़े। "ये होती है लडकिया "पापा की बेटी " उनका इतना कहना था और उस २७ अप्रैल ने मुझे इन बीते ९ सालो की एक एक घटना को जैसे रिवाइंड करा के दिखा दिया।
आज २९ अप्रैल माँ पापा की सालगिराह थी और आज के ही दिन बिना किसी बीमारी के अचानक पापा का जाना ,जैसे नीव को हिला गया ,ये भूकम्प का झटका नहीं था लेकिन उससे कई गुना बड़ा ऐसा नुक्सान देने वाला झटका साबित होगा ये नहीं सोचा था ?भूकम्प एक बार में या तो सब तबाह कर देता है या कुछ ऐसा बचा जाता है जिसके सहारे ज़िन्दगी शुरू कर कुछ नया हासिल हो जाता है। इन ९ सालो में मैं बहुत बदल गयी ,अपने आस पास के बदलते चेहरों ,मतलबी लोगो ,रिश्तेदारो ,सब को पहचान करना सिख गयी। किस किस ने मुझे सौम्य स्वाभाव से कठोर में बदल दिया ,आज सोचती हूँ तो यकीन नहीं होता। अपने में रहने वाली मैं अब लड़ाका बन चुकी हूँ। और कोई मरे या जिए मेरी बला से .,वाली सोच इस कदर भर गयी है की किसी की मौत से भी दुःख नहीं होता।
इस २७ अप्रैल को न सिर्फ यादे रिवाइंड हुयी बल्कि एक और सबक भी मिला मेरे अजीज दोस्त ने सिर्फ इसलिए दोस्ती खत्म करने का बोल दिया क्युकी उसको मेरी कोई हरकत बहुत दुखी कर गयी है ,मुझे अभी तक बात समझ नहीं आई ,आखिर ऐसा क्या हुआ ? अब मैं सोचना भी नहीं चाहती क्युकी मेरे पास इसका समय नहीं है की मैं ये सोच के अपने दोस्त को खो दू ,और न ही ईगो बचा है जो शायद कभी था भी नहीं ,जिसके लिए मैं अपने उन सालो की दोस्ती और उसके मुझ पर किये अहसान भूल जाऊ। अहसान ये की वो मेरा इकलौता ऐसा दोस्त बना है जिससे मैं अपने मन की ऐसे,, वैसे कैसी भी ,कुछ भी कह देती हूँ ,… ये अलग बात है की वो सुने या अनसुना कर देता है ,ये उसपे है ,लेकिन मैंने खुद से वादा किया है की दोस्ती नहीं तोड़ूँगी कभी ,मतलब कभी नहीं ,उसको आज़ादी दी है वो जो चाहे करे ,गुस्सा होता है ,डाट देता है ,समझाता है ,लेकिन मन का बच्चा है ,कई बाते उससे सिखने मिली है जिसने मुझे मजबूत बनाया है , कहते है संगत का असर पड़ता है ,वाकई पड़ा है ,और २७ अप्रैल २०१५ का दिन मुझे याद रहेगा अब दो कारणों से , एक पापा की बेटी का मान मिला दूसरा किसी अपने को खोने का जो डर था वो अब नहीं रहा। बाकी आज पापा की तिथि है ,माँ घर पे नहीं मायके गयी है ,इसलिए कुछ पल अपने यादो और उन ९ सालो में क्या पाया क्या खोया का हिसाब किताब करने का मन है ,
खोया जो था वो आज भी साथ है पापा का आशीर्वाद है ,पाया उनकी बदौलत बहुत कुछ ,उन्होंने एक पत्रकार को बिज़नेस वुमन बना दिया ,ये अहसास तब हुआ जब उस कॉपी का आखिरी पन्ना भर रही थी ,इस साल पापा की शॉप का रेनोवेशन भी हुआ , तो पापा की दूकान को नए रूप में लाने का सपना पूरा करने में जुटी हूँ ,इस बीच कई अपनों को समय नहीं दे पा रही हूँ ,कईयों से दुश्मनी फ़ोकट में मौल ले ली है ,मजा आ रहा है लड़ने में , दिमाग शॉप पे होता है ,और घर आने के बाद कही और तो सब गडमड हो जाता है ,कईयों से बहस हो जाती है ,इस दुनिया में हो या आभासी दुनिया में , ये अप्रैल का महीना हर साल कुछ ना कुछ ले जाता है ,या दे जाता है।
इस बार 27 अप्रैल से लेके 30 अप्रैल तक खुद को सबसे दूर कर लिया है। न किसी से मिलना न कही जाना ,बस सिर्फ खुद के साथ रहना चाहती हूँ ,बाकी छिपने या भागने जैसी हरकत मेरे से ना होगी। बोलना बंद नहीं कर सकती ,लिखना जारी है ,कही और न सही खुद के ब्लॉग में सही ,
इस अप्रैल ने मुझे पापा की बेटी का मान दिया , साथ ही मेरी पदवी बड़ाई देव की बुआ बनाके , शॉप का काम पूरा हुआ ,दोस्ती में प्यार और हक़ बढ़ा दिया। तो सुनो अप्रैल तुम्हारा शुक्रिया ,जो दिया जो लिया उन सबके लिए।
२७ अप्रैल २००७ को उस रिटर्न को पापा ने फाइल किया उसके बाद आज की तारीख याने २८ अप्रैल २००७ को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा। नेमा जी को जब बात समझ आई तो उदास वो भी हुए और बोल पड़े। "ये होती है लडकिया "पापा की बेटी " उनका इतना कहना था और उस २७ अप्रैल ने मुझे इन बीते ९ सालो की एक एक घटना को जैसे रिवाइंड करा के दिखा दिया।
आज २९ अप्रैल माँ पापा की सालगिराह थी और आज के ही दिन बिना किसी बीमारी के अचानक पापा का जाना ,जैसे नीव को हिला गया ,ये भूकम्प का झटका नहीं था लेकिन उससे कई गुना बड़ा ऐसा नुक्सान देने वाला झटका साबित होगा ये नहीं सोचा था ?भूकम्प एक बार में या तो सब तबाह कर देता है या कुछ ऐसा बचा जाता है जिसके सहारे ज़िन्दगी शुरू कर कुछ नया हासिल हो जाता है। इन ९ सालो में मैं बहुत बदल गयी ,अपने आस पास के बदलते चेहरों ,मतलबी लोगो ,रिश्तेदारो ,सब को पहचान करना सिख गयी। किस किस ने मुझे सौम्य स्वाभाव से कठोर में बदल दिया ,आज सोचती हूँ तो यकीन नहीं होता। अपने में रहने वाली मैं अब लड़ाका बन चुकी हूँ। और कोई मरे या जिए मेरी बला से .,वाली सोच इस कदर भर गयी है की किसी की मौत से भी दुःख नहीं होता।
इस २७ अप्रैल को न सिर्फ यादे रिवाइंड हुयी बल्कि एक और सबक भी मिला मेरे अजीज दोस्त ने सिर्फ इसलिए दोस्ती खत्म करने का बोल दिया क्युकी उसको मेरी कोई हरकत बहुत दुखी कर गयी है ,मुझे अभी तक बात समझ नहीं आई ,आखिर ऐसा क्या हुआ ? अब मैं सोचना भी नहीं चाहती क्युकी मेरे पास इसका समय नहीं है की मैं ये सोच के अपने दोस्त को खो दू ,और न ही ईगो बचा है जो शायद कभी था भी नहीं ,जिसके लिए मैं अपने उन सालो की दोस्ती और उसके मुझ पर किये अहसान भूल जाऊ। अहसान ये की वो मेरा इकलौता ऐसा दोस्त बना है जिससे मैं अपने मन की ऐसे,, वैसे कैसी भी ,कुछ भी कह देती हूँ ,… ये अलग बात है की वो सुने या अनसुना कर देता है ,ये उसपे है ,लेकिन मैंने खुद से वादा किया है की दोस्ती नहीं तोड़ूँगी कभी ,मतलब कभी नहीं ,उसको आज़ादी दी है वो जो चाहे करे ,गुस्सा होता है ,डाट देता है ,समझाता है ,लेकिन मन का बच्चा है ,कई बाते उससे सिखने मिली है जिसने मुझे मजबूत बनाया है , कहते है संगत का असर पड़ता है ,वाकई पड़ा है ,और २७ अप्रैल २०१५ का दिन मुझे याद रहेगा अब दो कारणों से , एक पापा की बेटी का मान मिला दूसरा किसी अपने को खोने का जो डर था वो अब नहीं रहा। बाकी आज पापा की तिथि है ,माँ घर पे नहीं मायके गयी है ,इसलिए कुछ पल अपने यादो और उन ९ सालो में क्या पाया क्या खोया का हिसाब किताब करने का मन है ,
खोया जो था वो आज भी साथ है पापा का आशीर्वाद है ,पाया उनकी बदौलत बहुत कुछ ,उन्होंने एक पत्रकार को बिज़नेस वुमन बना दिया ,ये अहसास तब हुआ जब उस कॉपी का आखिरी पन्ना भर रही थी ,इस साल पापा की शॉप का रेनोवेशन भी हुआ , तो पापा की दूकान को नए रूप में लाने का सपना पूरा करने में जुटी हूँ ,इस बीच कई अपनों को समय नहीं दे पा रही हूँ ,कईयों से दुश्मनी फ़ोकट में मौल ले ली है ,मजा आ रहा है लड़ने में , दिमाग शॉप पे होता है ,और घर आने के बाद कही और तो सब गडमड हो जाता है ,कईयों से बहस हो जाती है ,इस दुनिया में हो या आभासी दुनिया में , ये अप्रैल का महीना हर साल कुछ ना कुछ ले जाता है ,या दे जाता है।
इस बार 27 अप्रैल से लेके 30 अप्रैल तक खुद को सबसे दूर कर लिया है। न किसी से मिलना न कही जाना ,बस सिर्फ खुद के साथ रहना चाहती हूँ ,बाकी छिपने या भागने जैसी हरकत मेरे से ना होगी। बोलना बंद नहीं कर सकती ,लिखना जारी है ,कही और न सही खुद के ब्लॉग में सही ,
इस अप्रैल ने मुझे पापा की बेटी का मान दिया , साथ ही मेरी पदवी बड़ाई देव की बुआ बनाके , शॉप का काम पूरा हुआ ,दोस्ती में प्यार और हक़ बढ़ा दिया। तो सुनो अप्रैल तुम्हारा शुक्रिया ,जो दिया जो लिया उन सबके लिए।
Friday, November 14, 2014
यहाँ अस्थिरता का डेरा है ,जो सिर्फ मेरा है मेरा है मेरा है।
कोई क्यों कर बदले ,या न बदले, बदले तो ऐसे या वैसे ,या फिर उस तरह जैसे उस दिन कहा था ,उस दिन वाला याद नहीं तो, आज जो कहा वो पल्लेबांध कर बदलो ,लेकिन बदलो ,सवाल वही है ,की कैसे ?जब बदलने के लिए कुछ होगा तभी न बदलेगा ?दिमाग ,में २४ घंटे साला एक ही धुन बजेगी तो दिमाग कैसे बदलने की सोचेगा ?ये करो वो करो, करो तो कैसे करो ?जो करना है , हमको हीन करना है . तुम बस बोलते जाओ हम सुनते जाए, ये सुनना वहाँ ऐसा करना है ?उसको ऐसा बोला ,इसको वैसा बोला ,दिमाग को जब एक की आदत सी हो जाए तो समझ लो डूबने की आखिरी घड़ी नज़दीक है। दिमाग का सन्नाटा और मन की अस्थिरता को काबू में लाने में समय लगता है। समय ये भी एक कहानी है ,जिसको जरुरत है उसके लिए होता नहीं जहा कोई मोल नहीं वहा अपार है। हम तो जैसे थे ,वैसे ही रहेंगे ,ऐसा सोचा नहीं है ठाना नहीं है। कुछ बंधा हुआ है ,कहा पता नहीं ,क्यों पता नहीं ,उस बंधन से मुक्ति चाहिए नहीं ,चाहिए है जो वो मिलेगा नहीं ,रोके गाके हँसके जो करना है कर लो ,जानते हुए भी चाहिए तो वही ,बस एक वही यही जो चाहिए मन का मीट कह लो या एक सपना हक़ीक़त में बदलनेवाला नहीं कभी नहीं कभी नहीं कभी नहीं। लेकिन उसको पाने के लालसा अब नहीं ,फिर भी एक उम्मीद है कीशायद मिलेगा कभी मुझे वो बस यही यही यही। वह री मन की विडम्बना तू जा कही और कही किसी और के दिल घूम के आ। अभी यहाँ अस्थिरता का डेरा है ,जो सिर्फ मेरा है मेरा है मेरा है।
जो भी आदमी या औरत खुद को हर मामले में डेमोक्रेटिक, लिबरल, एथीस्ट, फेमिनिस्ट, प्रोग्रेसिव वगैरह वगैरह क्लेम कर रहा या रही है उससे उसके घर का हाल पूछ लीजिए। सारी क्रांति धरी की धरी रह जाएगी।
जो व्यक्ति, लड़कियों को खुद के बनाए खांचे में फिट बैठने वाली प्रगतिशीलता, स्वतंत्रता आदी का घनघोर पक्षधर है उससे बस एक बार उसकी ही पीढ़ी के और उसके अपने रिश्तेदारों का हाल ले लीजिए। ज्यादा कुछ मत कीजिए।
कहने और करने में बहुत फर्क होता है ,इसलिए जो कह रहे है करने की हिम्मत भी करे। कहने वालो का कुछ नहीं जाता करने वाले कमाल करते है। जो कर लिया तो गुरु हो गए। वरना धूनी जमाये अपने तिये पे।
आज कुछ भी लिखा है की धुन सवार है अकल मिली है थोड़ी सी ,यु तो हम कुछ लिखते नहीं ,बोलते नहीं ,लेकिन जब बोलते है तब मिर्ची लगती है सबको। इस लिए हम एक झटके में नेगेटिव हो जाते है।
जो भी आदमी या औरत खुद को हर मामले में डेमोक्रेटिक, लिबरल, एथीस्ट, फेमिनिस्ट, प्रोग्रेसिव वगैरह वगैरह क्लेम कर रहा या रही है उससे उसके घर का हाल पूछ लीजिए। सारी क्रांति धरी की धरी रह जाएगी।
जो व्यक्ति, लड़कियों को खुद के बनाए खांचे में फिट बैठने वाली प्रगतिशीलता, स्वतंत्रता आदी का घनघोर पक्षधर है उससे बस एक बार उसकी ही पीढ़ी के और उसके अपने रिश्तेदारों का हाल ले लीजिए। ज्यादा कुछ मत कीजिए।
कहने और करने में बहुत फर्क होता है ,इसलिए जो कह रहे है करने की हिम्मत भी करे। कहने वालो का कुछ नहीं जाता करने वाले कमाल करते है। जो कर लिया तो गुरु हो गए। वरना धूनी जमाये अपने तिये पे।
आज कुछ भी लिखा है की धुन सवार है अकल मिली है थोड़ी सी ,यु तो हम कुछ लिखते नहीं ,बोलते नहीं ,लेकिन जब बोलते है तब मिर्ची लगती है सबको। इस लिए हम एक झटके में नेगेटिव हो जाते है।
Monday, October 27, 2014
ये एक भरम था।
तुम्हारा अनदेखा सा अनमना सा वो मुट्ठी भर दिल ,
और उसकी वो धक धक करती धड़कन की आवाज़ ,
आज भी मेरे कानो को ,उस पल का अहसास कराती है ,
इसको सुनने की प्रबल इक्शा शक्ति ने मुझे ,
अनहोने मोह की आंच में तापा दिया।
उस कमरे की सनसनाहट और तुम्हारे बकबक की आवाज़ ,
बहार का मौसम ,अजीब सी निडरता ,और साहस का वो अहसास ,
मुझे कही भी ले जा सकता था ,तुम भी बंधे थे ,अधमने से ,
उस पल में बंद मेरी आँखे ,तुम्हारी खुली आँखों से उस याद को जी रही थी ,
जो तुम्हारे दिल और दिमाग को दबोचे हुए थी ,पागल थी में ,उस पल को जीना चाहती थी ,
दिल की दो धड़कनो के बीच कोई एक जगह थी ,जहा कोई पागल नहीं होता ,
मेरा पागल दिल कुछ सोचना ही नहीं चाह रहा था ,वो सिर्फ कमरे की दीवाल ,
को निहार रहा था ,एक टक टकटक ,बोल अलग थे ,दिल कुछ और बोल रहा था ,
कंधे के नीचे माथा टेकी मासूम ,पागल सी वो लड़की उसको रुक रुक के देखती ,
उसका गठा बदन जिसमे कोई रवानी नहीं थी ,जो था वो दिल और दिमाग में चल रही कश्मकश।
वो कब दबे पाँव इसके दिल में घर कर गया पगली को पता नहीं चला ,
उस दिन उन अधूरी सी धड़कनो को सुनके उसको लगा की वो उसके लिए नहीं धड़क रहा है।
वो होले से उठी ,और उसको अधूरे आलिंगन की बजाये पूरा भींच लिया।
उसने कुछ बहुत ही धीरे से निडरता से कुछ कहा जैसे वो सुन ही न रहा हो।
उसने सुन लिया था ,और आगे बाहो को जकड़ते हुए उस सुकून को जताया जिसको
दोनों ने अनमने ,शायद किसी एक ने महसूस किया,मानो दोनों के लिए ये एक भरम था।
और उसकी वो धक धक करती धड़कन की आवाज़ ,
आज भी मेरे कानो को ,उस पल का अहसास कराती है ,
इसको सुनने की प्रबल इक्शा शक्ति ने मुझे ,
अनहोने मोह की आंच में तापा दिया।
उस कमरे की सनसनाहट और तुम्हारे बकबक की आवाज़ ,
बहार का मौसम ,अजीब सी निडरता ,और साहस का वो अहसास ,
मुझे कही भी ले जा सकता था ,तुम भी बंधे थे ,अधमने से ,
उस पल में बंद मेरी आँखे ,तुम्हारी खुली आँखों से उस याद को जी रही थी ,
जो तुम्हारे दिल और दिमाग को दबोचे हुए थी ,पागल थी में ,उस पल को जीना चाहती थी ,
दिल की दो धड़कनो के बीच कोई एक जगह थी ,जहा कोई पागल नहीं होता ,
मेरा पागल दिल कुछ सोचना ही नहीं चाह रहा था ,वो सिर्फ कमरे की दीवाल ,
को निहार रहा था ,एक टक टकटक ,बोल अलग थे ,दिल कुछ और बोल रहा था ,
कंधे के नीचे माथा टेकी मासूम ,पागल सी वो लड़की उसको रुक रुक के देखती ,
उसका गठा बदन जिसमे कोई रवानी नहीं थी ,जो था वो दिल और दिमाग में चल रही कश्मकश।
वो कब दबे पाँव इसके दिल में घर कर गया पगली को पता नहीं चला ,
उस दिन उन अधूरी सी धड़कनो को सुनके उसको लगा की वो उसके लिए नहीं धड़क रहा है।
वो होले से उठी ,और उसको अधूरे आलिंगन की बजाये पूरा भींच लिया।
उसने कुछ बहुत ही धीरे से निडरता से कुछ कहा जैसे वो सुन ही न रहा हो।
उसने सुन लिया था ,और आगे बाहो को जकड़ते हुए उस सुकून को जताया जिसको
दोनों ने अनमने ,शायद किसी एक ने महसूस किया,मानो दोनों के लिए ये एक भरम था।
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