Friday, August 30, 2013

mere pahali film samiksha



बाज़ार में बिकने वाली नींद की एक अलग सी कहानी, सोना स्पा

प्रेषित समय :20:51:46 PM / Fri, Aug 30th, 2013Share this on Facebook
स्नेहा चौहान. अनिद्रा एक ऐसे बीमारी है जिसकी चपेट में न जाने कितने लोग है. खास कर वो जिनकी जिज्ञासाएं, महत्वकांक्षाएं इतनी ज्यादा है कि वो इस सुकून भरी नींद का आनंद नहीं ले पाते और फिर अनचाही बीमारियां उनके शरीर को अपना घर बना लेती हैं. लेकिन अगर आपको कोई कहे कि आपको आपकी नींद बाज़ार में खरीदने से मिल जाएगी तो क्या आप उसे खरीदना चाहेंगे? सुनने में ये जितना अटपटा है उतना ही मजेदार भी. ये कितना आसान होगा आप सोच के देखें? आपके लिए कोई और सोयेगा और आप बिलकुल फ्रेश फील करेंगे!
ये सब्जेक्ट जरा नहीं, बहुत अलग है, बोले तो हट के है. ये असल में एक मूवी की कहानी है, सोना स्पा जिसे देख के मुझे ये समझ आया कि, देश की कई समस्याओं का समाधान इस तरीके से किया जा सकता है? क्यूँकि जिस दिमाग में शान्ति नहीं है, सुकून नहीं है, वही कहीं न कहीं जाके न जाने कितनी सारी घटनाओ को अंजाम देता है!
तो सोचें, उन इंसानों को जिनके दिमाग को सुकून नहीं है, अगर उनके लिए कोई सोये और वो तरोताजा हो जाये. सारी खुराफात  को भुलाया जा सकता है तो इस तरह की नींद देने में कोई आपति किसी को नहीं होगी.
SONA SPA की कहानी कुछ ऐसी ही है. इस नींद से लोगो को न जाने कितनी बातों से निजात मिल जाएगी. मुझे ये कहानी अच्छी लगी. मकरंद देशपांडे की कहानी में दम है, इसको अगर किसी तरह इस  भासी दुनिया में सच में कारगर कर दिया जाये, तो वाकई न जाने कितने लोगो का भविष्य सुधर जायेगा. लीक से हट के एक उम्दा सोच के साथ, सामाजिक दायरों को कहीं न कहीं गलत साबित करती फिल्म. एक बार देखा जा सकता है. मुझे स्टार देने की परंपरा को नहीं निभाना, क्यूँकि जब किसी बोल्ड सब्जेक्ट पर कोई कलाकार एक्टिंग करता है, तो उसको समझने के लिए एक कलाकार की आत्मा काफी है.

Wednesday, August 7, 2013

mera article palpalindai.com mai



इंटरनेट मीडिया का विकृत रुप पोर्न पत्रकारिता
 
प्रेषित समय : 7 अगस्त, 2013
अखबार की खबर पर पाठक प्रतिक्रिया नहीं कर सकता, लेकिन मित्रों..इन्टरनेट मीडिया में त्वरित टिप्पणी की सुविधा मौजूद है. कहने का मतलब इन्टरनेट इंटरेक्टिव मीडिया है. न्यूज़ साईट हो या सोशल साईट, जिसमें विचारों का आदान-प्रदान होता रहता है. यदि किसी ने भी अश्लील सामान परोसा या इसी आशय का कोई विचार रखा तो पढ़ने वालो को पूरा अधिकार रहता है कि वह तुरंत अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करा कर सभी को अवगत करा सकता है. वो फिर चाहे अच्छी हो या बुरी. स्पष्ट है कि आपको उसकी जवाबदेही स्वीकार करनी होती है.
इंसान जितनी तेजी से हर मुकाम को हासिल करने की जद्दोजहद में आज अपने उसूलो को हर रोज दरकिनार कर रहा है ये कहीं न कहीं उसको ऐसे गर्त की तरफ ले जा रहा है की अभी तो इसके परिणाम से ये अनभिज्ञ हैं.
दो-तीन दिन से एक सोशल साइट पर, हमारे मित्रों को एक गंभीर मुद्दे के लिए धमकियां मिल रही हैं. जी हाँ मैं बात कर रही हूँ, पोर्न पत्रकारिता के जनकों की. आज एक मित्र की पोस्ट पढ़ी. … उसमे ऑनलाइन न्यूज़ साईट भास्कर डॉट कॉम की एक खबर को लेकर बात प्रतिक्रिया दी गयी थी. इस खबर की प्रतिक्रिया व्यक्त किये जाने पर पर फेस बुक के मित्रों को वहां काम करने वाले ने फ़ोन करके धमकी पर धमकी दिए जा रहे हैं. कारण उनकी न्यूज़ पेश करने का तरीका अश्लील से ओतप्रोत था. पोर्न पत्रकारिता को बढावा देने के बहाने अपनी न्यूज़ साईट की हिट्स बढ़ाने के हथकंडे के बारे में इस हरकत के बारे में किसी ने कुछ भी पोस्ट नहीं किया, क्योंकि किसी पत्रकार मित्र की हिम्मत ही नहीं हुयी ,उल्टा जिन मित्रों ने इनकी न्यूज़पर गरियाया उनकी एक भी पोस्टर को शेयर करने की हिम्मीत भी आज तक किसी की नहीं हुई.सबसे तेज दौड़ने वाले मीडिया के खिलाफ ऐसे बोलने के लिए जिगरा चाहिए, जो आजकल आप सब या मेरे जैसों के पास शायद नहीं है ,क्योंकि ये बड़े लोग हैं,इनको कोई फर्क नहीं पड़ता .यह हमलोग मान कर चलते हैं . जिगरा आजकल पत्रकारों के पास भी नहीं है.उनका खून सफेद हो गया है ,अब पत्रकारों पर से यकीन उठ गया.सब दलाल ही हैं.कोई सामने है तो कोई परदे के पीछे. ये कहना जितना आसान है ,उतना ही सोचने वाली बात ,ये है की जो इंसान धमकी दे रहा है ,कभी उसकी मानसिक स्थिति की तो सोचो,उसको भी ऊपर से आर्डर होंगे कि जो बोल रहे हैं उनको पहले धमकी दो .फिर बाद में हरे नोटों के दर्शन करा के अपनी तरफ कर लो ,छोटे लोग हैं- कब तक चिल्लायेंगे ,और इसमें गलत भी नहीं है ,जो बेचारा धमकी दे रहा है ,उसकी भी कमाई होगी ,मेरे जिन मित्रों को ,भास्कर कॉम .की तरफ से धमकी मिली है ,मुझे उनपर गर्व है ,इसलिए नहीं कि वो मेरे मित्र हैं,बल्कि इसलिए कि इन जैसे लोग ,आज के बाद आपसे डरेंगे ,आपने अपने आप को साबित कर दिया है ,ये वो लोग हैं जो शायद ,इन बनियों की दूकान को सजाने के लिए दिन भर ,नौकरी करते है ,और जो समय मिलता है ,उस समय में इनसे फ्रीफंड में ऑनलाइन न्यूज़ का काम. पत्रकारों की गलती नहीं है ,इन्होनें अपनी ऐसे हालत प्रबंधन के सामने खुद ही बनायीं है ,आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए ,इस बात को लेकर की ये पोर्न पत्रकारिता इस तरह कर रहे हैं ,सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता कि इनके ऑफिस का माहौल किस तरह का होगा . सिर्फ नाम बड़े है ,दर्शन खोटे हैं ,खुद लोग सब अन्दर से बिके हुए हैं ,ये अखबार नहीं चला रहे ,इनके मालिकों के ऊपर भी नेताओ का हाथ है.,ये सब बातें नयी नहीं है,पुरानी है.अखबार की आड़ में कितने धंधे चल रहे है ,पता लगाने जाओ ,तब पता चलेगा .असल बात यह है कि इस तरह की कई झंझटो से हर कोई गुजर रहा है.किसी पत्रकार के घर जाके देखोगे ,तब पता चलेगा, वो जब सड़क पर कैमरा लिए होता है ,तो शेर नजर आता है .उसका रुतबा ,उसका गुरूर ,उसका काम जिसके लिए उसको आखिर तक एक झूठा चोला चढ़ाये रखना पड़ता है.उसने अपनी खबर बनायीं.अगर दिन भर में मिल गयी तो ,वरना ऑफिस में आके गूगल बाबा की जय ,और काम किया निकले ,और जब बहुत दिन तक एक-सा भोजन मिले और कभी कोई ख़ास खबर मिल जाये तब वो अचानक जोश से भर जाता है ,और अच्छा करने के चक्कर में एक ऐसे गलती कर जाता है,जिसका खामियाजा सारी जमात को भुगतना पड़ता है.इसमें वो सब आ जाते हैं ,जो पत्रकार हैं या कभी थे ,या जिन्होंने उस अखबार को रामराम कह दिया है वो सब ,हम सब सिर्फ आपस में दोषारोपण करते हैं कि तुम ऐसे हम ऐसे .लेकिन हकीक़त क्या है असल में हम सब जानते हैं , फिर वो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पत्रकार हो या कोई और.लेकिन अगर पत्रकारों को चौथा स्तम्भ कहा गया है ,तो हमारी भी कहीं न कही जिम्मेदारी बनती है कि जो खबर हमने बनायीं है उसके प्रति हम कितने ईमानदार हैं ,
मेरे जो मित्र इस तरह की पोर्न पत्रकारिता को बढावा दे रहे हैं-क्या कभी सोचा है कि आपके घर में बच्चे हैं ,वो भी उस न्यूज़ को देखेंगे व पढेंगे .अगर तो आपमें इतनी हिम्मत है कि आप उनसे सेक्स पर खुली चर्चा कर सकते हो ,तो आपकी न्यूज़ की हैडलाइन सही है ,आप जो कर रहे हैं ,वही करें,उस दोयम दर्जे की कमाई को खा पी के जो चाहे वो करें ,लेकिन यदि आप के पास पोर्न सब्जेक्ट पर या सेक्स पर बात करने की हिम्मत अपने घर में नहीं है तो आपको कोई हक नहीं बनता कि आप नई नसल को इस तरह से गर्त के रास्ते धकेलें . अपने ही मित्रों को धमकी दे के भी आप लोग कोई महान काम नहीं कर रहे.आप लोगों की उन्नति कभी नहीं हो सकती क्योंकि आप लोगों को आपस में ही एक दूसरों की टाँगे खीचने से फुरसत नहीं मिल रही. कभी खुद के मतलब के लिए ,कभी मालिकों की चापलूसी के लिए ,और वो जनाब लोग जो खुद को बड़ा एडिटर समझते हैं ,उनको अगर एडिटर का काम नहीं मालूम तो ऐसे एडिटर होने से अच्छा है की आप अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दें .आप लोगों को एक रूम में बैठ के खैनी खाने के लिए नोट नहीं मिलते ,इस तरह की बातों के लिए आपकी भी ज़िम्मेदारी है ,जैसा आप लोग कर रहे हैं वही नयी पीढ़ी कर रही है .दूसरों की खबर बनाने से पहले अपने अन्दर भी देखें . मेरी इन बातों से लोगो को मिर्ची लगेगी . हो सकता है कई मेरे दुश्मन बन जाये .कुछ लोग मुझे भी बहुत गन्दा कहेंगे ,मुझे कोई फरक नहीं पड़ने वाला . क्योंकि मैं भी आपकी ही ज़मात से निकल के आई हूं ,लेकिन जब इस तरह की बातें सुनती हूँ या पढ़ती हूँ ,तब बहुत शर्म महसूस होती है और कहीं न कहीं एक गर्व भी , कि अच्छा हुआ ,सही समय में उस कीचड़ से निकल आई.पर आज जब आपस में अपने ही मित्रो को इस तरह धमकी देते ,और न जाने कितनी बातों ,कितनों के मुंह से सुना ,तो अपने को रोक नहीं पायी और सोचा अपने अन्दर को, अपने शब्दों में, अपनों से व्यक्त कर दूं,



स्नेहा चौहान
स्नेहा चौहान जबलपुर में सक्रिय फ्रीलांस पत्रकार हैं 
पूर्व में समाचारपत्र दैनिक भास्कर में कार्यरत 
सामाजिक ज्वलंत मुद्दों और स्त्री विमर्श पर सतत लेखन 
शिक्षा: माता गुज़री कॉलेज जबलपुर
1.सोलह बरस की बाली उमर को सलाम
2.हर औरत रेप की हकदार है?
3.प्यार से नहीं...बाबू.. इन सड़कों से डर लगता है
4.पुलिस आला कमान के नाम एक खुला खत
5.इंटरनेट मीडिया का विकृत रुप पोर्न पत्रकारिता

Friday, August 2, 2013

मेरे मुस्कुराने की आदत भी कितनी महंगी पड़ी मुझे ,
भुला दिया सबने मुझे ये कहके की,                                                                                                                     तुम तो 
अकेले भी खुश रह सकते हो ………

कुछ लोग मतलब के लिए खोजते है मुझे ,
बिन मतलब जो आयें तो क्या बात है ,
कतल कर के तो सब ले जायेंगे दिल मेरा ,
कोई चाहत से ले जाये तो क्या बात है …।

लोग डूबते हैं तो समंदर को दोष देते हैं,
मंजिल ना मिले तो किस्‍मत को दोष देते हैं,
खुद तो संभलकर चलते नहीं,
जब लगती है ठोकर तो पत्‍थर को दोष देते हैं।

कही बारिश बरस जाये ,कही दरिया तरस जाये ,
कही आके घटा ठहरे, तुम्हारे और मेरे दरमियाँ आकर खुदा ठहरे ....|
चाँद के साथ कई दर्द पुराने निकले ,
कितने ग़म थे जो तेरे ग़म के बहाने निकले,
दिल ने एक ईंट से तामीर किया था हसीन ताजमहल ,
तूने एक बात कही लाख फ़साने निकले ……।

जाने क्या सोच कर हम तुमसे वफ़ा करते है , 
क़र्ज़ है कोई पिछले जन्म का जो अदा करते है

Tuesday, July 2, 2013

पुलिस आला कमान के नाम एक खुला खत

पुलिस आला कमान के नाम एक खुला खत 
 

  

लैटर तो मैंने बहुत लिखे हैं, अपने बचपन से न जाने कितने और कितनों को,कुछ लोगों ने तो आज भी शायद मेरे ख़त संभाल के रखे होंगे,आज किसी प्रेस के एडिटर को नहीं,न ही किसी मित्र को ,बल्कि सोचा,जबलपुर के पुलिस आला कमान साहब को एक खुला ख़त लिखूं.............
मुझसे भले ही ज्यादा अच्छे शब्द, शायद ही निकले, पर कोशिश करने में क्या हर्ज़ है .जनाब,
आपने एक अच्छा काम किया है,पिछले दिनों,जो आपने सभी पुलिस वालो की परेड करवा दी.जी, मैं सड़कों में दिन-रात गश्त की बात कर रही हूं.जिन्हें नहीं पता उन्हें बता दूं कि हमारे यहाँ पिछले हफ्ते सड़कों पर लूट की घटना, एक-साथ तीन जगहों पर हुई,वैसे यह हमारे यहाँ हमेशा होती ही रहती है,अगर आप महिला हैं,तो उन्हें अपने जेवर पहन के नहीं निकलना चाहिए या अपने पर्स को संभाल के रखना यह उनकी जिम्मेदारी है.यहाँ आए-दिन कभी भी कोई भी बाइक सवार खुली सड़कों पर आते-जाते महिलाओं से पर्स छीन कर ले भागता है खासतौर पर काली बाइक पर सवार.इस तरह की घटना यहाँ के आम घटनाओं में शुमार माना जाता है.जी,....तो मैं बता रही थी कि उस दिन भी तीन लूट की वारदात एक साथ घट गईं
आला कमान ने सारे थाने की अफसरों की मीटिंग बुलाई और उनको गश्त लगाने के फरमान सुना दिए,पहले दिन तो गजब की पेट्रोलिंग हुई,पुलिस के वाहनें तेजी से सड़को पर आवाजाही करते दिखी.दूसरे दिन उनकी गति में थोड़ी कमी दिखी,शानिवार को दिन में तीन या चार बार,कल रविवार था इसलिए शायद पुलिस वालों को भी छुट्टी चाहिए थी,कुछ ज्यादा ही आराम हो गया,लेकिन अब आज एक भी बार कोई टाइगर वेन नज़र नहीं आई,जो दिखी भी तो कहीं सुस्ताते हुए जैसा.
सही भी है,आखिर कब तक मनचलों की तलाशी लेते रहते ?आखिर वो सब भी तो इंसान ही हैं.थकना भी स्वाभाविक है.
जनाब आपको यह जान कर हैरानी होगी कि इस दौरान मेरी एक पुलिस वाले से बात हुई ....जब उनसे पूछा कि ये क्या हो रहा है? कब तक चलेगा ? क्या ऐसे में लूटेरे पकड़ लिए जायेंगे?आपको यह जानकार आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि उस पुलिस वाले ने क्या जवाब दिया....उसने बड़े ही विनम्र स्वर में बताया कि मैडम,अब आप ही बताइए,क्या वो लूटेरे पागल हैं,जो खुले आम अब तक घूमेंगे,जब तक हमें पेट्रोल खर्च करना है,तब तक तो करेंगे ही.दो दिन की कहानी है..बस, आप देखना उसके बाद ,जो जैसे थे वो वैसे ही हो जायेंगे,ऐसे अगर सब लूटेरे घुमने लगे तो हो गयी,हमारी नौकरी ?
अब आप ही बताइए कि क्या हुआ?क्या सभी महिलाओं ने अपना जेवर पहनना छोड़ दिए या मनचलों ने सड़कों पर बाइक भगाना छोड़ दिया.आज भी बाइक पर चार लोगों की सवारी हो रही है,यातायात पुलिस अंधी बनी बैठी रहती है ,आपके पुलिस के लोग सिर्फ खाना पूर्ति कर रहे होते हैं,सड़को पर आवारापन पूरी तरह से हावी है.आपकी पुलिस की इतनी मेहनत का क्या नतीजा हुआ ?सिर्फ ये की इन चार दिनों में कोई लूट की घटना नहीं हुई,तो इस बात पर आपके लोगों को तमगे दिए जाने चाहिए,इन्होनें बहुत अच्छा काम किया.
जनाब,आप लोगों के पास भोपाल, रायपुर की तरह काम करने का जज्बा क्यों नहीं है,न तो आपके पास और न ही यातायात पुलिस के पास.आज भी कोई भी,कहीं भी अपनी गाडी पार्क कर रहा है.क्योंकि सड़कें इसी काम के लिए बड़ी बनाई गयी है.
इस हालत में अगर कोई लूट की घटना हो जाए और आम जनता कोशिश भी करे कि उस लूटेरे को पकड़ लें तो उनकी हिम्मत नहीं होती....क्योंकि आपके जबलपुर में ,आपके क्यों मेरे जबलपुर में ...कोई लॉ एंड आर्डर नाम की कोई चीज ही नहीं है.हर कोई बेफिक्र है,उसको मालूम है कि यहाँ कोई कुछ नहीं सकता,जिनका सामान गया,वो तो गया..भूल जाओ,लेकिन जो आज भी सड़को पर है उनका क्या?आप जब सड़को पर आने-जाने वालों की सुरक्षा नहीं कर सकते तो आप कैसे कह सकते हैं कि आप किसी बड़े केस को आसानी से सुलझा लेंगे.
अभी बारिश का बढ़िया मौसम है,कोई जरुरत नहीं है कि मुंह बंद करके सड़कों पर लोग चलें,लेकिन इसके बावजूद मनचले मुंह ढंक के घूम रहे हैं ,लडकियां भी घूम रही है,उन्हें कोई कुछ कहने वाला ही नहीं है,बाइकर गैंग के इस वारदात से आज पुलिस होश में आई.इसके पहले क्यों नहीं आई ? आज जिस तरह से आपके सहकर्मी दिन रात गाडियां घुमा रहे हैं .उससे इस समस्या का हल नहीं होगा,आपको सड़कों के लिए नियम कानून बनाने पड़ेंगे ?तभी आपकी इस मेहनत का कोई औचित्य है वरना पुलिस कर्मियों की परेड करवा के आपने कोई बहुत बड़ा काम नहीं कर लिया है ,उनको यूँ ही भगा कर आप भी पीठ पीछे हंसी का पात्र बने हैं,मेरे इस बात को अन्यथा न लेते हुए,आप इस पर गौर करें,और सबसे पहले जब तक सड़कों के लिए बने नियमों का,पालन नहीं करवाएंगे तब तक आपकी मेहनत बेकार है.इसके लिए आम जनता को भी साथ में लीजिये.उनको भी जरा कड़ा डोज दीजिये,तभी वो सही रास्ते पर आएंगे.आपको जनता के साथ उन बाज़ार वालों को भी अपने साथ लेना होगा,जो सड़को को नज़रंदाज़ करते हुए सिर्फ अपनी सोचते हैं,आप ये सब कर सकते हैं ,सिर्फ एक शिद्दत के साथ सब को अपने साथ ले लीजिये,शायद इस बहाने पुलिस का डर आम जनता के मन से जाये और वो आपको भी अपना समझे ...वैसे ये बात आप जल्दी समझ जायेंगे ,क्योंकि आप खुद आकलन करें कि लूटेरो के भूमिगत होने के बाद ,आपके हाथ क्या लगा .

Saturday, June 29, 2013

प्यार से नहीं...बाबू.. इन सड़कों से डर लगता है 
एक मित्र ने कहा- और सुनाओ, क्या चल रहा है? मेरा जवाब था कुछ ख़ास नहीं, बारिश का मजा चल रहा है, सामने से सवाल आया, कहाँ हो? घर पे या बाहर? कहीं लॉन्ग ड्राइव पे? मैंने कहा कहीं नहीं घर पे? अरे? क्यों भई? ऐसे में तो भींगने का मजा लो, क्या घर की चाहरदीवारी में कैद हो? मैंने कहा, यहाँ की सड़कों का मत पूछो, बहुत गन्दा हाल है. कहीं भी जाने मतलब, आने के बाद सारे मूड की मटिया पलीद, अरे! मित्र बोल पड़े... तुम तो बारिश का सोचो, बस ये सब बकवास है ये सब ऐसे ही चलेगा, कुछ नहीं हो सकता हर साल का रोना है.
बारिश का मजा लूं तो कैसे लूँ? मेरे शहर की सड़कों, में इतने गड्डे हैं, कि साला समझ नहीं आता, गाडी निकालूं तो.. कहाँ से.. इधर से निकालूं या उधर से, मेरे शहर की सड़कें इन दिनों अपने ऊपर हुए सरकारी बलात्कार के जख्मों की गवाह बनी है, और वो रोज अपने पे छिडके जाने वाले नमक की जलन से झल्ली होकर, उस दर्द को सड़कें चिल्ला चिल्ला के कह रही है, सुन रहा है न तू, रो रही हूँ मैं... लेकिन हमारे नगर का प्रशासन उसके कानों में तो हैडफ़ोन लगे हुए है, कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा है, इसलिए अब अगर कोई कहे, या कहीं से ये सुनाई दे, की बाबूजी मुझे आपके प्यार से नहीं अपने यहाँ की सड़कों से डर लगता है, तो उसकी इस पीड़ा को समझना... इस बारिश का मजा लेने से पहले जरा उस सड़क की तरफ भी एक नज़र देखना, की कहीं आपकी गाडी के पहिये उसके उन जख्मों को और न कुरेदे, आप तो चले जायेंगे, बारिश का मजा चार चके पे लेने, लेकिन किसी की सीने को रौंदना अच्छी बात नहीं है.
दोस्त की एक बात बिलकुल सही लगी की हर साल का रोना है, लेकिन क्या हम लोगों का खून पानी हो गया है, की दिन भर मेहनत करके हम कमाते हैं किसलिए? घर के साथ अपनी उन जरूरतों को पूरा करे, जिसके लिए हमें अपनी कमाई से टैक्स इस निकम्मी सरकार को देना होता है, क्यों क्योंकि वो हमारे लिए सड़क और अन्य सुविधाओं को मुहैया कराए, लेकिन इस तरह की काला बाजारी की अब तो शर्म से डूबने का भी समय निकल गया, प्रदेश का मुखिया जिस दिन यहाँ तशरीफ लाएगा उस दिन रातों-रात उस सड़क को नए कपड़ो के साथ सजा-धजा के या कहूँ चिथड़ो को लगा कर, उस लड़की की तरह सजा दिया जाता है जिससे साथ एक रात बिताने कोठे पे नामुराद जाते हैं, रात के अंधेरो में, मुखिया की रात बीती, सब चापलूस अपने-अपने घर को घुस जाते है, और फिर वही रोज का आना-जाना चालु, न जाने कितनी दफा, वो सड़क अपने चिथड़ो को, बनते, मिटते देखती है, और हम जैसे कई लोग, रोज अपने दो पहिये, या चार पहियों से उसे रौंदते है, हम कर भी कुछ नहीं सकते ?
मेरे बातों को कई लोग फ़िल्मी कहेंगे, कहीं कहेंगे इसमें नया क्या है? सही भी है इसमे नया क्या है? आज इंसान के पास वैसे ही ज़िन्दगी कम है जीने के लिए, ऊपर से इस तरह की हालत में कोई कैसे निकले? हम बड़ी बड़ी बात नहीं करेंगे की मौत से डर नहीं लगता या मौत कब कहाँ आ सकती है, लेकिन ये सोचने वाली बात है, जिसको सोचने का आज हमारे पास वक़्त नहीं है, आपमें से किसी ने सोचा है की विधायक के घर के सामने की सड़क पक्की है, विधानसभा अध्यक्ष के घर के सामने की सड़क पक्की है, लेकिन जिस जगह आप में से कई लोग दुर्घटना ग्रस्त हो कर भर्ती होते हों वहां की सड़क पक्की नहीं है, क्यों? ये सवाल कभी आया किसी के दिमाग में, या जिस कॉलोनी में आपने लोन ले के अपना सपनों का घर बनाया है, उसके बिल्डर ने पहले आपको वहां की सड़क क्यों नहीं बनवा के दी? कचनार सिटी के वाशिन्दों से जा के मिलो? मुस्कान हाइट्स के लोगों से मिलो? क्यों? आपने तो अपने घरों की क़िस्त उनको दी है, आप तो निगम को टैक्स दे रहे हैं? फिर क्यों? जब तक ये सवाल किसी के दिमाग में नहीं आएगा, ये सब ऐसे ही चलेगा? आपके रुपयों से बंगला बनेगा, लेकिन वो उस अध्यक्ष का बनेगा जो वोट के नाम पे आम जनता के दिलों से, भावनाओं से खेल रहा है, क्योंकि जिस अस्पताल के सामने की सड़क नहीं बनी है, उसके करता-धर्ता का बंगला सिविल लाइन में बन रहा है, वहां की सड़कें जा के देखो, लेकिन किसी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि आज हम सब सिर्फ अपना देखते हैं, लेकिन जिस दिन हमारा कोई अपना पानी से भरे गड्डो की बलि चढ़ेगा, हमने तो तब रोना-धोना मचाना है, अब हम सब इस काम में माहिर हो चुके हैं, हमारी कमाई का माल खाए कोई और हमें क्या? हमारे हिस्से का सुख भोगे कोई और हमें क्या? हम जिस दिन इस धज्जियों भरी सड़को, और इस पे चल रहे वाहनों की नीचे आयेंगे, तब हम सोचेंगे की हमें क्या करना है? बहुत ही कम अकाल का है इंसान कभी कभी लगता है, अपने किसी को रूपये देने के बात आती है तो पहले लेने की बात करता है कि कब इसका ब्याज दोगे, लेकिन वहीँ दूसरी तरफ मेहनत की कमाई का कोई और घर भर रहा है, तो उसके आगे नतमस्तक हो जाता है, वाह रे इंसान तू और तेरे रूप?
आज दिमाग में बहुत गालियाँ है, बहुत कडवापन है, सिर्फ इसलिए नहीं की मुझे इस सुहाने मौसम का लुफ्त उठाने नहीं मिल रहा, बल्कि इसलिए कि जिनको मिलना चाहिए, उनको नहीं मिल रहा, वे घिसट रहे हैं, रेंग रहे हैं, और जिनका इससे दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं, वो मुफ्त खोरी का मजा ले रहे हैं. बात गहरी है.. समझोगे तो आपका भला... नहीं तो दो अपनी मेहनत की कमाई का हिस्सा.. इन जैसे मुफ्त खोरों को, जो आपको ज़िन्दगी को यूँ ही निचोड लेंगे...