कहने वालों का कुछ नहीं जाता, सहने वाले कमाल करते हैं। कौन ढूंढे जवाब ज़ख्मों के, लोग तो बस सवाल करते हैं!
Tuesday, October 30, 2012
Monday, October 1, 2012
Friday, September 28, 2012
Pencil and Eraser Story-very very real-
So true.......... Some of us have already lost either one or both of our "Erasers" But it's still nice to be reminded of them!
Pencil: I'm sorry !
Eraser: For what? You didn't do anything wrong.
Pencil: I'm sorry because you get hurt because of me.
Whenever I made a mistake, you're always there to erase it.
But as you make my mistakes vanish, you lose a part of yourself.
You get smaller and smaller each time.
Eraser: That's true. But I don't really mind. You see, I was made to do this.
I was made to help you whenever you do something wrong.
Even though one day, I know I'll be gone and you'll replace me with a new one,
I'm actually happy with my job.
So please, stop worrying. I hate seeing you sad.
Thursday, September 27, 2012
ज़िन्दगी दोबारा चांस नहीं देती ....................... .
दुनिया में लोगो को प्यार का मतलब नहीं मालूम या वो प्यार को सिर्फ एक ही नज़र से देखते है। प्यार के कई रूप है ,ये आप पे निर्भर करता है की आप उस प्यार को, जस्बात को, किस तरह जाहिर करना चाहते है। आला तो लोग इस बेहद ही नाजुक मामलो में इज़हार करना नहीं जानते या उनको न जाने किस तरह के डर ने घेरा हुआ है, अगर दहसत के साए है तो प्यार जैसे भावना को पनपने ही न दो न , प्यार करना भी है,जाताना भी नहीं है ,या उसको किसी और भावना में बदल के जाहिर करना ,बेहद ही नादानी भरा काम है, इसमे न सिर्फ प्यार करने वाला खुद को धोका देता है, बल्कि उस इंसान को भी आसमंजस में डाल देता है, जो प्यार करता है, जताता है और बाद में अपने को ठगा सा महसूस करता है, उस डोर को कैसे बांदना है पहले ये शिकना बहुत जरुरी है ,कोई भी रिश्ता बनाए रखा जाए उसके लिए पहले खुद को मजबूत होना होगा । जब हमें कोई अपनाता है तब हम उससे कुछ ऐसे धुत्कारते है, जैसे हमसे ज्यादा अच्छा कोई नहीं।लेकिन हम ये क्यों भूल जाते है की ऐसा ही कुछ कभी हमारे साथ भी हो सकता है।कभी कभी बात बनते बनते बिगड़ जाती है ,और जब बात समझ आती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है, इसलिए समय के साथ अपने मन की बातो को साफ़ करते चलना ,जरुरी हो गया है,जबरन को कोई गाठ किस्से के मन में रह जाए ,क्या फ़ायदा ,दोस्तों आप सोच रहे होगे की आज इससे क्या हुआ ये प्यार पे lecture क्यों दे रही है।आजकल के नए बच्चे सिर्फ इंसान के उपरी सुन्दरता देखते ,है न की दिल की सोम्यता या,सुन्दरता, उम्र ,और कमी, अरे दोस्तों ये सब देखके अगर प्यार करना है तो वो प्यार नहीं होता वो बहुत ही छोटे समय के लिए लिया गया आपका adjustment है जो आप खुद के दिल को धोका देके करते है,वेल मुझे बहुत दुःख होता है जब किस्से को प्यार में तड़पता देखती हु ख़ास कर के उन दोस्तों को, जो जिससे प्यार करते है, उसको इज़हार भी करते है ,लेकिन बदले में मिलता है, एक नस्तर चुबोता दर्द ,जिसकी चुबन आहे बाह गाहे, कभी न कभी इंसान को अंदर से हिला देती है।वो खुद से दूर हो जाता है।इसलिए अगर इस आग में जलने की हिम्मत ,,है तो इज़हार करने की हिम्मत करो वरना फ़ालतू का समय इस इम्ह्तिहान में देने का कोई मतलब नहीं। जलोगे तो सोने के निखर के बहार आओगे वरना ,अकेले पन की दुनिया में अकेले ही रह जाओगे।
तो अब समय है सच को स्वीकार करो , जो मन में है उसको बोलो ,साफ़ बोलो,इज़हार करो ,सीधे सीधे ,कोई न नुकुर नहीं,कोई दिखावा नहीं,लेकिन एक जवाब हमेशा अपने साथ लेते हुए की ,जरुरी नहीं की हाँ ही सुनने मिले न सुनने की हिम्मत भी होनी चाहिए .. प्यार नाम ही है ,साफ़ ,सरल ,शब्दों का दिल की आवाज़ का जो बहुत ही पाक है।।।।।।।
दुनिया में लोगो को प्यार का मतलब नहीं मालूम या वो प्यार को सिर्फ एक ही नज़र से देखते है। प्यार के कई रूप है ,ये आप पे निर्भर करता है की आप उस प्यार को, जस्बात को, किस तरह जाहिर करना चाहते है। आला तो लोग इस बेहद ही नाजुक मामलो में इज़हार करना नहीं जानते या उनको न जाने किस तरह के डर ने घेरा हुआ है, अगर दहसत के साए है तो प्यार जैसे भावना को पनपने ही न दो न , प्यार करना भी है,जाताना भी नहीं है ,या उसको किसी और भावना में बदल के जाहिर करना ,बेहद ही नादानी भरा काम है, इसमे न सिर्फ प्यार करने वाला खुद को धोका देता है, बल्कि उस इंसान को भी आसमंजस में डाल देता है, जो प्यार करता है, जताता है और बाद में अपने को ठगा सा महसूस करता है, उस डोर को कैसे बांदना है पहले ये शिकना बहुत जरुरी है ,कोई भी रिश्ता बनाए रखा जाए उसके लिए पहले खुद को मजबूत होना होगा । जब हमें कोई अपनाता है तब हम उससे कुछ ऐसे धुत्कारते है, जैसे हमसे ज्यादा अच्छा कोई नहीं।लेकिन हम ये क्यों भूल जाते है की ऐसा ही कुछ कभी हमारे साथ भी हो सकता है।कभी कभी बात बनते बनते बिगड़ जाती है ,और जब बात समझ आती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है, इसलिए समय के साथ अपने मन की बातो को साफ़ करते चलना ,जरुरी हो गया है,जबरन को कोई गाठ किस्से के मन में रह जाए ,क्या फ़ायदा ,दोस्तों आप सोच रहे होगे की आज इससे क्या हुआ ये प्यार पे lecture क्यों दे रही है।आजकल के नए बच्चे सिर्फ इंसान के उपरी सुन्दरता देखते ,है न की दिल की सोम्यता या,सुन्दरता, उम्र ,और कमी, अरे दोस्तों ये सब देखके अगर प्यार करना है तो वो प्यार नहीं होता वो बहुत ही छोटे समय के लिए लिया गया आपका adjustment है जो आप खुद के दिल को धोका देके करते है,वेल मुझे बहुत दुःख होता है जब किस्से को प्यार में तड़पता देखती हु ख़ास कर के उन दोस्तों को, जो जिससे प्यार करते है, उसको इज़हार भी करते है ,लेकिन बदले में मिलता है, एक नस्तर चुबोता दर्द ,जिसकी चुबन आहे बाह गाहे, कभी न कभी इंसान को अंदर से हिला देती है।वो खुद से दूर हो जाता है।इसलिए अगर इस आग में जलने की हिम्मत ,,है तो इज़हार करने की हिम्मत करो वरना फ़ालतू का समय इस इम्ह्तिहान में देने का कोई मतलब नहीं। जलोगे तो सोने के निखर के बहार आओगे वरना ,अकेले पन की दुनिया में अकेले ही रह जाओगे।
तो अब समय है सच को स्वीकार करो , जो मन में है उसको बोलो ,साफ़ बोलो,इज़हार करो ,सीधे सीधे ,कोई न नुकुर नहीं,कोई दिखावा नहीं,लेकिन एक जवाब हमेशा अपने साथ लेते हुए की ,जरुरी नहीं की हाँ ही सुनने मिले न सुनने की हिम्मत भी होनी चाहिए .. प्यार नाम ही है ,साफ़ ,सरल ,शब्दों का दिल की आवाज़ का जो बहुत ही पाक है।।।।।।।
एक बार हिम्मत करो ,ज़िन्दगी दोबारा चांस नहीं देगी ............................
Wednesday, September 26, 2012
तेरा मेरा नाता है क्या?
तुम देती हो... मै लेता हूं
तुम लेती हो... मै देता हूं
घडी़ घडी़ में रूप है बदलता
समय का पहिया सदा है चलता
हम दोनों में फर्क है कैसा
आपस में एक जैसा है क्या?
मुझे पता है उसे नींद न आई होगी
सपने चल रहें होंगे आंखों में
करवट बदलेगी.. तन्हाई होगी
मुझे पता है उसे नींद आई होगी
उसके सामने वही बादल.. जो मेरे सामने
उसके सामने वही कोहरा.. जो मेरे सामने
उसके-मेरे अर्धविराम भी वही, पूर्णविराम भी
तभी तो मै जब यहां बेचैन हूं
उसकी पलकें भी ना झपकी होंगी
मुझे पता है उसे नींद न आई होगी
सुख-दुख बरसे हम पर जब भी
हंस दिए, कभी रो लिए हम भी
राहें अपनी संग चलतीं हैं
जब चाहे नजरें मिलती हैं
ये किस जनम से लेकर चलें हैं
ये रिश्तों का राज है क्या?
तेरा मेरा नाता है क्या?
ना रिश्ते को हो कोई नाम
दिल से मिलना दिल का काम
अलग-अलग हैं सफर हमारे
फिर भी एक दूजे के हैं सहारे
जब भी मुझको कांटा चुभता है
तेरे दिल में ये दर्द है क्या?
तेरा मेरा नाता है क्या?
Saturday, September 15, 2012
मीडिया का इंद्रजाल और आंदोलनों का तिलिस्म
जादूगर के तमाशे और सड़क पर भीख मांगती किसी महिला और उसकी गोद में एक बीमार बच्चे में क्या फर्क है। कहीं न कहीं दोनों ही आंखों का धोखा हैं। ये इंद्रजाल है। इसका तिलिस्म टूटता है तो लोग खुद को कोसते हैं। मध्यप्रदेश में ओंकारेश्वर बांध का जलसत्याग्रह और भोपाल में इंडिया अगेंस्ट करप्शन का तमाशा दोनों इसकी जीती-जागती मिसाल हैं। दोनों को मीडिया ने एक इंद्रजाल की तरह पेश किया। यह दिखाने की कोशिश की कि लोग अब सड़कों पर लड़ाई लड़ने को आगे आ रहे हैं। लेकिन इनका तिलिस्म जल्द ही टूट गया। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर में पत्रकार ने लिखा है कि जल सत्याग्रही टीवी कवरेज के लिए 20 फुट के गहरे गड्ढे में बैठे थे। सरकार के झुकने से जब पानी उतरा तो यह तिलिस्म भी टूट गया। इस खबर पर नर्मदा बचाओ आंदोलन की कथित नेता चित्तरूपा पालित का वह पत्र भी हास्यास्पद है, जिसमें उसने आंदोलन के नेता आलोक अग्रवाल का बयान न छापे जाने की निंदा की है। उन्हें पत्रकार को यह सीख देने का कोई हक नहीं है कि वह किसका बयान छापे और किसका नहीं। पत्रकार ने (भले ही पानी उतरने के चार दिन बाद ही सही) मौके पर जाकर जो देखा वही लिखा। गड्ढा तो 20 फुट का ही है, उसे नकारने वाला कोई नहीं। उसमें कोई डूब नहीं सकता। नाक तक पानी आने की असलियत भी उजागर हो गई है। समूचा तिलिस्म ही टूट गया है। मेरे अपने शहर जबलपुर में भी यही तमाशा कुछ स्वयंसेवी संगठनों ने जलसत्याग्रह के नाम से किया और मीडिया का कवरेज भी लूटा। भोपाल में भी ज्योति टॉकीज चौराहे पर कुछ युवाओं ने पानी की टंकी में डूबकर ऐसा ही तमाशा किया था। ऐसे लोग अपने पीछे कुछ समर्थकों को छोड़कर आते हैं, जो असल में प्रचारक हैं। वे फोटो को बार बार फेसबुक पर लगाते हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा संवेदनाएं जुटाई जा सकें। दूसरा वर्ग इनके प्रशंसकों का है, जो हां में हां मिलाने का काम करते हैं।
तिलिस्म टूटता है तो मुझ जैसे आम नागरिकों को बहुत दर्द होता है, जो सही मायनों में इंसाफ चाहते हैं। इंसाफ उस कौम के लिए जो बरगी, सरदार सरोवर, इंदिरा सागर और महेश्वर जैसे बांधों से प्रभावित है। जिन्हें अब तक जमीन नहीं मिली। मेधा पाटकर ने इनके लिए लंबी जमीनी लड़ाई लड़ी। लेकिन इन दोनों लड़ाइयों में उन्हें बिल्कुल अलग-थलग रखा गया। लगता है (?) नर्मदा बचाओ आंदोलन का नेतृत्व अब चित्तरूपा पालित उर्फ सिल्वी जैसी सनसनी पैदा कर जंग जीतने का इरादा रखने वाली नेताओं के हाथ में आ गया है। ठीक वैसे ही, जैसे अन्ना को परे रखकर राजनीति में कूदने की घोषणा करते ही इंडिया अगेंस्ट करप्शन का तिलिस्म टूट गया। भोपाल में मनीष सिसोदिया के सामने इंडिया अगेंस्ट करप्शन के कार्यकर्ताओं ने एक-दूसरे को मां-बहन की गालियों और मर्डर, घोटाले के आरोपों से नवाज दिया। असल में यही असलियत है जमीनी आंदोलन के नाम पर तिलिस्म का चोगा पहनकर घूमने वाले युवाओं की। इनमें से कुछ तो अपने नाम के साथ एक्टिविस्ट की पट्टी लगाकर भी घूमते हैं।
असल में सरकार और जनता के बीच खड़ी है सिविल सोसायटी। दोनों के बीच मीडिया भी खड़ी है। जब कभी मीडिया आगे बढ़कर आंदोलनों के तिलिस्म में उलझकर सिविल सोसायटी से हाथ मिला लेती है तो जनता का पलड़ा वजनदार हो जाता है। यह सिविल सोसायटी के हाथों इस्तेमाल होने जैसी बात है और मुझे नहीं लगता कि किसी छोटे से बड़े पत्रकार को यह गवारा होगा। टाइम्स की खबर से यह साफ जाहिर हो गया है कि मीडिया अपनी इस कोशिश में एक इंद्रजाल बुनती है। लोगों को धीरे-धीरे समझ आने लगा है कि यह एक धोखा है। इस धोखेबाजी में सबसे ज्यादा फायदा सिविल सोसायटी के उन लोगों का हो रहा है, जिनका एकमात्र मकसद सिर्फ प्रचार पाना है। दुर्गति के शिकार ओंकारेश्वर बांध से विस्थापित वे लोग हुए हैं और होंगे, जिन्होंने ऐसे लोगों की बात सुनकर अपना जल सत्याग्रह छोड़ दिया। उनके इस कदम से इंदिरा सागर बांध के विस्थापितों का जल सत्याग्रह खत्म हो गया। चित्तरूपा पालित अगर वाकई प्रचार की भूखी नहीं थी तो उन्हें जमीन मिलने तक आंदोलन जारी रखना था। क्या मध्यप्रदेश सरकार दर्जनों मीडियाकर्मियों के सामने उनका आंदोलन खत्म करा सकती थी। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और इंदिरा सागर बांध के विस्थापितों की आवाज बंद करने का विरोध भी नहीं हुआ। यहां तक कि जल सत्याग्रह को प्रचारित कर रहे भोपाल और दिल्ली में बैठे समर्थक
भी महंगाई का रोना रोने लगे।
मेरे जैसे पत्रकार के लिए यह बेहद दुखद है कि जनांदोलनों का तिलिस्म कुछ इस कदर से टूट रहा है कि
मीडिया के पास खुद को कोसने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं बचा। जब आंदोलन की जमीन मीडिया और फेसबुक बन जाए तो उसका तिलिस्म टूटने में देर नहीं लगती। भाइयों और बहनों, इस माह की तीनों बड़ी घटनाओं से सबक लो और जमीन के आंदोलनों को जमीन में ही लड़ो। तुम्हारी आवाज इतनी बुलंद होनी चाहिए कि बिना मीडिया और फेसबुक के वह दिल्ली तक गूंजे।
मेरे जैसे पत्रकार के लिए यह बेहद दुखद है कि जनांदोलनों का तिलिस्म कुछ इस कदर से टूट रहा है कि मीडिया के पास खुद को कोसने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं बचा। जब आंदोलन की जमीन मीडिया और फेसबुक बन जाए तो उसका तिलिस्म टूटने में देर नहीं लगती। भाइयों और बहनों, इस माह की तीनों बड़ी घटनाओं से सबक लो और जमीन के आंदोलनों को जमीन में ही लड़ो। तुम्हारी आवाज इतनी बुलंद होनी चाहिए कि बिना मीडिया और फेसबुक के वह दिल्ली तक गूंजे।
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