Thursday, November 14, 2013

दिल-दिमाग ने की तौबा

 इश्क़ में हम तुम्हें क्या बताएं किस कदर चोट खाये हुए हैं...… इस गाने कि लाइन को अब कुछ इस तरह गाया जा सकता है....,  राजनीति में हम  तुम्हें क्या बताएं किस कदर चोट खाये हुए हैं. आलाकमान की एक ना से जान तक गवां चुके है….
इन दिनों आम लोगो के साथ साथ नेताओं की जान भी सस्ती हो चली है, आज काफी देर तक दिमाग में खलबली मची हुयी थी कि एक टिकट मिलने या न मिलने के कारण, जिन लोगो ने बड़ी ही आसानी से अपनी जान गंवा दी, फिर वो टिकट मिलने के बाद का टेंशन  रहा हो? या फिर न मिलने का दुख, या फिर नहीं मिलने के बाद की आत्मग्लानि. जो भी कहें, एक बड़ा सवाल  सामने आया है, क्या राजनीति जान से भी बड़ी हो गयी है?
एक नेता की मौत इसलिए हो जाती है क्योंकि उनको पार्टी ने टिकट दे दिया है, लेकिन चुनाव जीतने का टेंशन, इतना ज्यादा कि दिल ने धड़कने से मना  कर दिया. एक नेता ऐसे कि टिकट नहीं मिली तो खुदखुशी कर ली, एक ऐसे कि टिकट नहीं मिली तो टेंशन में ब्रेन हेमरेज का शिकार हो गए, वहीं कईयो ने पार्टी की अनदेखी से पार्टी में ही बगावत कर दी.
इन नेताओ से जब राजनीति होती नहीं है तो ये करते क्यों है??? इस सवाल के साथ-साथ एक सवाल ये भी, कि पार्टी ने जो भी नियम कानून बनाये थे, उनको दरकिनार कर दिया गया है जब ये बात समझ आ गयी थी तब क्यों टिकट के लिए इतनी माथापच्ची की. मुझे ये कहने में जरा भी अफ़सोस नहीं है, कि जो नेता अपनी पार्टी का नहीं हुआ, अरे यहाँ तक कि अपने परिवार का भी नहीं हुआ, जान देने से पहले, परिवार के लोगो का नहीं सोचा, इतना सेल्फिश कोई कैसे हो सकता है?
ये वही लोग है आपके परिवार के जिन्होंने आपकी नेतागिरी के चक्कर में न जाने कितने लोगो से दुआएं कम, बददुआएं फ्री में ली है. और आप नेताजी, टिकट नहीं मिला और एक झटके में चलते बने!
मरने वाले के लिए यहाँ मुझे भाषा का इस्तमाल सही करना चाहिए, या थोड़ा नम्र होके लिखना चाहिए था शायद. लेकिन मैं आपकी इस तरह की हरकत को कतई सही नहीं कहूँगी, जो इंसान अपने परिवार का न हुआ, वो इन आम जनता के लिए क्या करेगा.
आज मेरे जबलपुर के एक नेता की चुनावी टेंशन के कारण हुई मौत का खामियाज़ा उस क्षेत्र की जनता को भुगतना पड़ेगा. कारण उनके बेटे को बिना कुछ किये, पिता की जगह अनुकम्पा नियुक्ति की तरह  पार्टी ने फ्री का टिकट दे दिया है. इस बार उसका जीतना तय है, पिताजी की मौत का फ़ायदा उसको सहानुभूति में मिले वोटो से जो होने वाला है. अभी भी क्षेत्र की जनता का रुझान उस परिवार के लिए ज्यादा है, बाप के नाम पे बेटा फ्री वोट पाके बन जायेगा नेता! यहाँ नेताजी की मौत का फ़ायदा हुआ है परिवार को. इसे अपवाद कहा जा सकता है अन्य की अपेक्षा, लेकिन उनका क्या जहां न टिकट मिला, न कोई घर से दावेदार है.
अभी तक ये सुना था, कि राजनीति में अपना खून भी साथ नहीं देता, ये तो देखने मिल रहा है. लेकिन अब इस जुमले को बदलने का वक़्त आ गया है कि राजनीती में अब अपना दिल और दिमाग दोनों कब साथ छोड़ दें, भरोसा नहीं. परिवर्तन की बेला शायद यही है, जिसका इंतज़ार न जाने कब से था. इस बार पार्टियों ने जिस तरह नियम कानून को दरकिनार किया है दावों के साथ, ये होना लाज़मी था. और एक तरह से अच्छा भी है, इस तरह अब भविष्य में नयी सोच के साथ नए ऊर्जा के साथ लोग इस हवन में अपनी आहुति देंगे.

उत्तर-मध्य में मच के रहेगी उथल-पुथल!

विधान सभा चुनाव के लिए जबलपुर उत्तर-मध्य क्षेत्र इस बार अपने आप में लोगो की नज़र में चर्चा का विषय बना हुआ है. वैसे देखा जाये तो, यहाँ कोई नया चेहरा नहीं है. दोनों बड़ी पार्टियों ने वही पुराने चेहरों को मैदान में उतारा है. इस बार ख़ास यह है कि यहाँ से स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने वालों की अधिकता है, जिसमे एक महिला पार्षद भी है. इसके साथ ही इस इलाके से किन्नर हीराबाई भी मैदान  में है. ये दोनों पहले भी चुनाव लड़ चुकी हैं.
इस बार इस इलाके के कई वोट इधर उधर होने कि गुंजाइश बनी है. बड़ा कारण ये है कि बीजेपी के प्रत्याशी खिलाफ पार्टी में बगावत के स्वर सुनने मिल रहे है, वही कांग्रेस के प्रत्याशी के खिलाफ भी क्षेत्र की जनता के मन में काफी रोष है. इसके साथ ही स्वतंत्र महिला प्रत्याशी ने अपने इलाके में अपनी एक अलग पहचान  बनाई हुई है, वही किन्नर समुदाय के वोट का फ़ायदा हीराबाई को मिलेगा. उनके पार्षद रहते किये गए कामो का फ़ायदा उन्हें इस समय मिल सकता है.
बीजेपी के प्रत्याशी को भले ही पार्टी ने चुनाव का टिकट दे दिया है लेकिन उन्होंने अपने 10 साल के कार्यकाल में अपनी जनता के लिए ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे जनता उन्हें वोट दे. लोगों से हुई बातचीत में जनता की राय यह है कि -अब नहीं. इस शराबी को इस बार वोट नहीं देना, इसने सिर्फ अपना भला किया है जनता को बेवक़ूफ़ बनाया है. वहीं कांग्रेस के उम्मीदवार ने भी कुछ ख़ास नहीं किया. उनके भी अपनी पार्टी के साथ मनमुटाव शुरू से रहे हैं. जो अपनी पार्टी का नहीं हुआ वो हम जनता का क्या होगा. 10 साल में इनके तो दर्शन भी दुर्लभ थे, ये तो ये, जो विधायक बने उनके भी.
तो अब बचे स्वतंत्र उमीदवार, इनमें से भी कुछ की छंटनी सोमवार को हो जायेगी, तब कहीं जा कर पूरा समीकरण सही तरीके से समझ में आएगा. अन्य पार्टियो के उम्मीदवारों के हिस्से में जो वोट जायेंगे उससे भी इस बार दोनों बड़ी पार्टियों को फर्क पड़ेगा. इस इलाके में अधिकांश लोगों का इरादा नोटा बटन दबाने का बन रहा है.
एक नज़र इस इलाके पर
ये इलाका मुस्लिम, जैन और सभी समुदायो के साथ व्यापार का मुख्य केंद्र है. इस इलाके में 10 साल में आज तक कोई भी तरक्की नहीं हुई. यहाँ न तो पार्किंग की व्यवस्था है, न ही  चौड़ी सड़को का जाल. आये दिन यहाँ ट्रैफिक की समस्या मूंह खोले रहती है. व्यापारिक इलाका होते हुए यहाँ सुरक्षा के कोई इंतज़ाम नहीं है. बाज़ार में एक भी सुलभ शौचालय नहीं है, जनता को परेशानी का सामना करना पड़ता है. विधायक मद का इस्तेमाल नहीं हुआ, कारण इलाका नगर निगम के अंतर्गत आता है. ये सब बहाने पर्याप्त है जनता के पास और उनके पास एक बड़ा सवाल ये भी है कि इनको वोट हम क्यों दें?
विधायक का बातचीत का अंदाज़ भी यहाँ के लोगों के गले नहीं उतरता. कुल जमा बात कि इस बार इस सीट पे भी मुकाबला देने के लिए दोनों उम्मीदवारों के सामने जहां नए लोग हैं, वही नोटा का असर भी देखने मिलेगा.

कोई जोर से तो कोई होश में, बिक रहा है सब कुछ यहां, बेमोल राजनीति

 चुनाव में जीतने के लिए जो न करो वो कम हैं. देश से अगर चंदा नहीं मिल रहा तो विदेशो से मंगवाए जा रहे हैं. जितना बड़ा आसामी, मतलब उमीदवार उतने बड़े चोंचले. इसी तरह का हाल हमारे जबलपुर का भी है.
एक नेता जी ने चुनाव की टिकट मिलने से पहले ही इलाके में गांधी जी के कागज़ बटवा दिए और टिकट मिलने के बाद टेंशन में जान चली गयी. पिता कि मृत्यु का फ़ायदा बेटे को हुआ. पार्टी ने टिकट भी दिया और जनता को पिता जी पहले ही खुश कर गए, तो अब उनको कोई चिंता नहीं. पर जनाब एक्टिंग है बेटे की, उसको जब ये कहते हुए सुनो कि दादा के जैसे ही जनता का ख्याल रखूँगा.
वहीं एक निर्दलीय महिला नेत्री का MMS  चुनाव प्रचार के पहले ही चर्चा का विषय बना हुआ है. इसके साथ ही उसके त्रिया चरित्र को लेकर भी विपक्ष और जनता में माहौल गरम है. आज नाम वापस लेने के आखिर दिन सुबह से बाज़ार गरम रहा कि पति ने अभी तक पत्नी के नाम पे बहुत ऐश  किये है, उसका कोई भरोसा नहीं कि शाम तक वो बिक जाये और बीबी का नाम वापस ले ले. कहने वालों का ये भी कहना है कि पति और पत्नी दोनों का चरित्र कोई साफ़ नहीं है.
महिलाओं के लिए जो महिला कल तक एक उम्मीद बनी हुयी थी, आज उसको लेकर महिलाओं में भी गुटरगूं शुरू हो गयी है. इस महिला प्रत्याशी  ने अपना नाम वापस ले लिया है खबर लिखे जाने के पहले ही. अभी अभी आयी ताज़ा खबर के अनुसार पति ने लाखों रुपए लेके बीबी का नाम वापस ले लिया है.
वही पश्चिम इलाके में दारु के साथ कम्बल पिछले चुनाव में मिली थी इस बार तो उसकी आस  में गरीब जनता उम्मीद की चादर लिए बेरहम ठण्ड से दो चार हो रही है. उम्मीद पर दुनिया कायम है. उनको इससे कोई मतलब नहीं कि कौन जीतेगा या कौन हारेगा. उनको ठण्ड से राहत इस चुनाव के बहाने मिल जायेगी और नेता जी की तो वैसे ही वाट लगने वाली है. इस बार वहां से दूसरी पार्टी के उम्मीदवार का परचा अभी से दमदार है. इस बार जनता ने सोच लिया है, न रेत न डम्पर और न चलेगा अब कोई बम्पर. हमको चाहिए बस एक सज्जन सा नेता, जिसका हाथ हमारे साथ, उसको देंगे अपना साथ.
चुनाव आयोग की नज़र बचा के सब जगह नोटों की दीवाली हो चुकी है. कुछ खेल शुरू में खेले जा चुके हैं कुछ सीधे-सीधे नज़रो के सामने खेले जा रहे है. यहाँ हर कोई बिक रहा है, ये खेल वाकई में अब बहुत रोचक बन चला है. आने वाले दिनों में देखना यह है कि अब जो बचे हुए है उनमे से कौन अपना गेम किस दिशा में ले जायेगा.

अति हमेशा नुकसानदायी रहे है ,समय है संभल जाओ।

अति हमेशा नुकसानदायी रहे है ,समय है संभल जाओ।


''enjoy the  rape ''वाले सीबीआई डायरेक्टर के बयान को बिना पढ़े गलत बताने में भारतीये जनता पार्टी कि महिला नेता सुषमा स्वराज को एक मिनिट का वक़्त नहीं लगा। लेकिन  उनसे मध्य प्रदेश में महिला अत्याचारो ,और बलात्कारो के बारे में सवाल किया ,तो वो इस तरह मुकर गयी ,कि उनके लिए ये आकड़े कोई मायेने नहीं रखते। और तो और प्रदेश में बलात्कार के मामले में तुरंत फ़ासी कि है  उन्होंने इस तरह किया  उनकी सरकार कि बहुत बड़ी उपलब्धि है ,उनके अनुसार सारे आकड़े गलत है ,मनगढ़त है। ,सुषमा जी से मेरा सवाल ,क्या आपको ये नहीं लगता कि विपक्षी दल कि एक मात्र सशक्त  महिला नेता होने के बाद आपका इस तरह का रवैया ,वो भी ऐसे वक़्त पे जब आप जनता के पास अपनी सरकार को दोबारा जीतने के लिए  वोट मांगने जा रही है ,आपको शोभा देता है???। चलिए माना  कि राजनीती में ऐसे बयान दिए जाते है ,लेकिन एक महिला होने के बाद आपका महिलाओ के प्रति ये रवैया कहा तक सही है ,आज आपसे हुयी मुलाकात में एक बात और समझ आयी कि महिला नेता होने का फ़ायदा आपके द्वारा आपकी पार्टी कि महिलाओ को नहीं मिला है ,जब आप किसी मंच से इस तरह का सफ़ेद झूठ इतनी आसानी से कह जाती है ,तो हम सब आधी आबादी के लोग आप जैसे लोगो पे क्यों भरोसा करे ???
मुझे आपकी पार्टी कि एक बुजुर्ग महिला ने आके कहा कि आपने हम लोगो  के लिए सवाल किया ,अच्छा किया। 
सुषमा जी बात यहाँ सिर्फ महिलाओ पे हो रहे अत्याचारो कि नहीं है ,बात है आपकी पार्टी के दावो कि जो खोखले साबित हुए है , 
एक तरफ आपकी पार्टी महिलाओ कि रक्षा का दावा करती है वही उसका मजाक बनाने से भी पीछे नहीं है ,महिला का मंगलसुत्र  उसके सुहाग कि निशानी होता है आपने तो उसको तक नहीं बक्शा। चुनाव प्रचार के नाम पे मंगल सूत्र को हीदाव  पे लगा दिया। इन सब बातो को दरकिनार कर भी दिया जाये तो आपकी पार्टी ने महिलाओ को टिकट देने में जो कंजूसी दिखायी है उसका क्या ?आपके  कथनी और करनी के इस फर्क का नतीज़ा आपको चुनाव परिणाम में देखने मिलेगा ,इस बात को भी आपने सिरे से नकार दिया ,अगर इन सारे बातो को आप के साथ आपकी पार्टी के लोग इस तरह से नकार रहे है ,तो क्या ये समझा जाए कि ,१० सालो में जो कुछ भी किया वो यही हुआ ,कि मकान बनाया किसी ने उसको पुतवा के किसी ने वाहवाही लूट ली ,क्युकी अगर आप और आपकी पार्टी के सभी नेता अपने कामो कि वजह से तीसरी बार सरकार में आने वाले है ,जैसा कि आपका दवा ही नहीं पूर्ण विश्वास है ,तो सिर्फ ये बताइये कि इस बार के आपके मैनिफेस्टो  में महिलाओ कि सुरक्षा कि बात पे आप का निरुतर होना ,और अभी तक सभी नेताओ का सिर्फ एक बात को कहना कि चाँद दिन में सब सही हो जायेगा। आप लोग ऐसा क्या करने वाले है किसी खरीद फरोख्त होने वाली है जो सारे समीकरण अचानक से बदल जायेंगे। अंधे इंसान का ये विश्वास कि वो बिना सहारे के चल लेगा ,समझ आता है ,लेकिन दिमाग के अन्धो का क्या ,जिनके पल्ले आप नेताओ कि दोगली बाते  पल्ले नहीं पड़ती |  

आपका ये विश्वास कही अति उत्साहित  बयान तो नहीं ,कि इस बार फिर आप सरकार बना रही है।