इश्क़ में हम तुम्हें क्या बताएं किस कदर चोट खाये हुए हैं...… इस गाने कि लाइन को अब कुछ इस तरह गाया जा सकता है...., राजनीति में हम तुम्हें क्या बताएं किस कदर चोट खाये हुए हैं. आलाकमान की एक ना से जान तक गवां चुके है….
इन दिनों आम लोगो के साथ साथ नेताओं की जान भी सस्ती हो चली है, आज काफी देर तक दिमाग में खलबली मची हुयी थी कि एक टिकट मिलने या न मिलने के कारण, जिन लोगो ने बड़ी ही आसानी से अपनी जान गंवा दी, फिर वो टिकट मिलने के बाद का टेंशन रहा हो? या फिर न मिलने का दुख, या फिर नहीं मिलने के बाद की आत्मग्लानि. जो भी कहें, एक बड़ा सवाल सामने आया है, क्या राजनीति जान से भी बड़ी हो गयी है?
एक नेता की मौत इसलिए हो जाती है क्योंकि उनको पार्टी ने टिकट दे दिया है, लेकिन चुनाव जीतने का टेंशन, इतना ज्यादा कि दिल ने धड़कने से मना कर दिया. एक नेता ऐसे कि टिकट नहीं मिली तो खुदखुशी कर ली, एक ऐसे कि टिकट नहीं मिली तो टेंशन में ब्रेन हेमरेज का शिकार हो गए, वहीं कईयो ने पार्टी की अनदेखी से पार्टी में ही बगावत कर दी.
इन नेताओ से जब राजनीति होती नहीं है तो ये करते क्यों है??? इस सवाल के साथ-साथ एक सवाल ये भी, कि पार्टी ने जो भी नियम कानून बनाये थे, उनको दरकिनार कर दिया गया है जब ये बात समझ आ गयी थी तब क्यों टिकट के लिए इतनी माथापच्ची की. मुझे ये कहने में जरा भी अफ़सोस नहीं है, कि जो नेता अपनी पार्टी का नहीं हुआ, अरे यहाँ तक कि अपने परिवार का भी नहीं हुआ, जान देने से पहले, परिवार के लोगो का नहीं सोचा, इतना सेल्फिश कोई कैसे हो सकता है?
ये वही लोग है आपके परिवार के जिन्होंने आपकी नेतागिरी के चक्कर में न जाने कितने लोगो से दुआएं कम, बददुआएं फ्री में ली है. और आप नेताजी, टिकट नहीं मिला और एक झटके में चलते बने!
मरने वाले के लिए यहाँ मुझे भाषा का इस्तमाल सही करना चाहिए, या थोड़ा नम्र होके लिखना चाहिए था शायद. लेकिन मैं आपकी इस तरह की हरकत को कतई सही नहीं कहूँगी, जो इंसान अपने परिवार का न हुआ, वो इन आम जनता के लिए क्या करेगा.
आज मेरे जबलपुर के एक नेता की चुनावी टेंशन के कारण हुई मौत का खामियाज़ा उस क्षेत्र की जनता को भुगतना पड़ेगा. कारण उनके बेटे को बिना कुछ किये, पिता की जगह अनुकम्पा नियुक्ति की तरह पार्टी ने फ्री का टिकट दे दिया है. इस बार उसका जीतना तय है, पिताजी की मौत का फ़ायदा उसको सहानुभूति में मिले वोटो से जो होने वाला है. अभी भी क्षेत्र की जनता का रुझान उस परिवार के लिए ज्यादा है, बाप के नाम पे बेटा फ्री वोट पाके बन जायेगा नेता! यहाँ नेताजी की मौत का फ़ायदा हुआ है परिवार को. इसे अपवाद कहा जा सकता है अन्य की अपेक्षा, लेकिन उनका क्या जहां न टिकट मिला, न कोई घर से दावेदार है.
अभी तक ये सुना था, कि राजनीति में अपना खून भी साथ नहीं देता, ये तो देखने मिल रहा है. लेकिन अब इस जुमले को बदलने का वक़्त आ गया है कि राजनीती में अब अपना दिल और दिमाग दोनों कब साथ छोड़ दें, भरोसा नहीं. परिवर्तन की बेला शायद यही है, जिसका इंतज़ार न जाने कब से था. इस बार पार्टियों ने जिस तरह नियम कानून को दरकिनार किया है दावों के साथ, ये होना लाज़मी था. और एक तरह से अच्छा भी है, इस तरह अब भविष्य में नयी सोच के साथ नए ऊर्जा के साथ लोग इस हवन में अपनी आहुति देंगे.