Thursday, July 26, 2012


सुनो जानेमन ,
जरुरी नहीं की मेरे कहने पे तुम इतराओ ,
यु लजाओ  जरा फिर से एक बार मेरे पहले वाली प्रियेतामा बना जाओ ....
सुनो जानेमन ,
बरस बीते  कुछ अच्छा सुने ,तेरे सुन्दर मुख से,
सुनो फिर से कुछ वैसे  ही आके कुछ धीरे से  होले से ,
मेरे कानो मै कुछ गुनगुना जाओ ,
जरा फिर से मेरे पहले वाली प्रियतमा बन जाओ ....
सुनो जाने मन ,
वो पहले जैसे कहती थी तुम्हारी आँखे मुझसे ,
कुछ अपनी ,कुछ घर की,कुछ सब की,
जरुरी नहीं मेरे कहने पे तुम कहो ,
फिर एक बार आँखों से अपनी कुछ अपनी आप बीती कह जाओ ,
सुनो जाने मन  
जरा एक बार फिर मेरे पहले वाली प्रियतमा बन जाओ .....

3 comments:

  1. वाह...
    बहुत सुन्दर रचना...
    हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!
    अनु

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  2. बेहतरीन ........सुनो जानेमन ....बधाई

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