Monday, March 28, 2016

रंगपंचमी की रात

कल  रंगपंचमी की  रात आंधी के साथ बारिश और बिजली की कड़कड़ाहट के साथ सारे इलाके की बिजली का घंटे भर के लिए जाना ,लगा समय कैसे बीतेगा ? मैच भी नहीं देख पाने की बात चल ही रही थी ,तभी  कुछ ख्याल दिल दिमाग में चल निकले ,लगा ऐसा सोचा जा सकता है ,क्या ऐसा होता होगा ,और कुछ दोस्तों की आप बीती पे मंथन शुरू हुआ ही था ,की मन हुआ आज संडे है ,रेडियो में ग़ज़ल आ रही होगी ,समय का लुफ्त  ऐसे लिया जाए ,रेडियो मिर्ची  लगाया  ही था ,की सायना  की मदहोश करने वाली आवाज़ में हसन की कहानी  बू सुनी। ....वो समय कैसे कट गया ,समझ नहीं आया ,मुझे कहानिया पढ़ने का कोई शौक  नहीं है ,इस तरह  किताब  लेके जैसे की लोग पढ़ते है ,किसी की आप बीती सुन के बात दिमाग हिलता है ,पर इस कहानी में कुछ बात थी ,जिसने मुझे उस पूरे माहौल में ये अहसास ही नहीं होने दिया की गर्मी  है ,या ठण्ड या मचछर काट रहे है। अब इसको सुनने के बाद फितूर चढ़ा है ,हसन मंटो को पढ़ डालना है ,दोस्तों को साहित्य ,कहानियो में क्या मजा आता है ,उनकी वो जाने ,लेकिन इस कहानी को सुनने के बाद एक सवाल आया ,की जो कशिश  मंटो में थी ,वो किस महिला कहानीकार में है ?अभी तो मेरी सुनी ये कहानी आप सभी के लिए। इसको  खुद के ब्लॉग में संभाल लिया है।  *************
बरसात के यही दिन थे. खिड़की के बाहर पीपल के पत्ते इसी तरह नहा रहे थे सागवन के स्प्रिन्गदार पलंग पर, जो अब 
खिड़की के पास थोड़ा इधर सरका दिया गया, एक घाटन लड़की रणधीर के साथ लिपटी हुई थी।  
खिड़की के पास बाहर पीपल के पत्ते रात के दुधिया अंधेरे में झुमरों की तरह थरथरा रहे थे, और शाम के समय, जब दिन भर एक अंग्रेजी अखबार की सारी खबरें और इश्तहार पढ़ने के बाद कुछ सुस्ताने के लिये वह बालकनी में आ खड़ा हुआ था तो उसने उस घाटन लड़की को, जो साथवाले रस्सियों के कारखाने में काम करती थी और बारिश से बचने के लिये इमली के पेड़ के नीचे खड़ी थी, खांस-खांसकर अपनी तरफ आकर्षित कर लिया था और उसके बाद हाथ के इशारे से ऊपर बुला लिया था।  

वह कई दिनों की बेहद तनहाई से उकता गया था। विश्वयुद्ध के चलते मुम्बई की लगभग तमाम ईसाई छोकरियां, जो अमूमन सस्ते दामों में मिल जाया करती थीं, वैसी जवान औरत और कमसीन लड़की अंग्रेजी फौज में भरती हो गई थीं. उनमें से कईयों ने फोर्ट के इलाके में डांस स्कूल खोल लिये थे, वहां सिर्फ फौजी गोरों को जाने की इजाजत थी। 

इन हालत के चलते रणधीर बहुत उदास हो गया था। जहां उसकी उदासी का कारण यह था कि क्रिश्चियन छोकरियां दुर्लभ हो गई थीं वहीं दुसरा यह कि फौजी गोरों के मुकाबले में कहीं ज्यदा सभ्य, पढ़ा-लिखा और खूबसूरत नौजवान होने के बावजूद रणधीर के लिये फोर्ट के लगभग तमाम दरवाजे बंद हो चुके थे, क्योंकि उसकी चमड़ी सफेद नहीं थी।

जंग के पहले रणधीर नागपाड़ा और ताजमहल होटल की कई मशहूर क्रिश्चियन छोकरियों से जिस्मानी रिश्ते कायम कर चुका था, उसे अच्छी तरह पता था कि इस किस्म के संबंधों के आधार पर वह उन क्रिश्चियन लड़कों के मुकाबले क्रिश्चियन लड़कीयों के बारे में कहीं ज्यदा जानकारी रखता था जिनसे ये छोकरियां फैशन के तौर पर रोमांस लड़ाती हैं और बाद में उन्हीं में से किसी बेवकूफ से शादी कर लेती हैं। 

रणधीर ने महज हैजल से बदला लेने की खातिर उस घाटन लड़की जो अलह्ड़ मस्त जवानी से भरी हुई जवान लड़की थी को ऊपर बुलाया था। हैजल उसके फ्लैट के नीचे रहती थी, वह रोज सुबह वर्दी पहनकर कटे हुए बालों पर खाकी रंग की टोपी तिरछे कोण से जमा कर बाहर निकलती थी और ऎसे बांकापन से चलती थी, जैसे फुटपाथ पर चलने वाले सभी लोग टाट की तरह उसके कदमों में बिछते चले जाएंगे। रणधीर सोचता था कि आखिर क्यों वह उन क्रिश्चियन छोकरियों की तरफ इतना ज्यदा रीझा हुआ है, इस में कोई शक नहीं कि वे मनचली लड़कियां अपने जिस्म की तमाम दिखाई जा सकने वाली चीजों की नुमाइश करती हैं. किसी किस्म की झिझक महसूस किये बगैर मनचली लड़की अपने कारनामों का जिक्र कर देती हैं।  अपने बीते हुए पुराने रोमांसों का हाल सुना देती हैं., यह सब ठीक है, लेकिन किसी दूसरी जवान औरत में भी ये खूबियां हो सकती हैं।  

रणधीर ने जब घाटन लड़की को इशारे से ऊपर बुलाया था तो उसे इस बात का कतई अंदाज नहीं था कि वह उसे अपने साथ सुला भी लेगा. वह तो इसके वहां आने के थोड़ी देर के बाद उसके भीगे हुए कपड़े देखकर यह शंका मन में उठी थी कि कहीं ऎसा न हो कि बेचारी को निमोनिया हो जाए. सो रणधीर ने उससे कहा था, " ये कपड़े उतार दो, सर्दी लग जाएगी " 

वह रणधीर की इस बात का मतलब समझ गई थी. उसकी आखों में शर्म के लाल डोरे तैर गए थे।  फिर भी जब रणधीर ने अपनी धोती निकालकर दी तो कुछ देर सोचकर अपना लहंगा उतार दिया, जिस पर मैल भीगने के कारण और भी उभर आया था।
लहंगा उतारकर उसने एक तरफ रख दिया और अपनी रानों पर जल्दी से धोती डाल ली. फिर उसने अपनी भींची-भींची टांगों से ही चोली उतारने की कोशिश की जिसके दोनों किनारों को मिलाकर उसने एक गांठ दे रखी थी. वह गांठ उसके तंदुरुस्त सीने के नन्हे लेकिन सिमटे गड्ढे में छिप गई थी। 

कुछ देर तक वह अपने घिसे हुए नाखूनों की मदद से चोली की गांठ खोलने की कोशिश करती रही जो भीगने के कारण बहुत ज्यादा  मजबूत हो गई थी. जब थक हार के बैठ गई तो उसने मरठी में रनधीर से कुछ कहा, जिसका मतलब यह था, " मैं क्या करुं, नहीं निकलती ".

रणधीर उसके पास बैठ गया और गांठ खोलने लगा, जब नहीं खुली तो उसने चोली के दोनों सिरे दोनों हाथों से पकड़कर इतनी जोर का झटका दिया कि गंठ सरसराती सी फैल गई और इसी के साथ दो धड़कती हुई छातियां एकाएक उजागर हो गईं. क्षणभर के लिये रण्धीर ने सोचा कि उसके अपने हाथों से उस घाटन की लड़की के सीने पर नर्म-नर्म गुंथी हुई मिट्टी को कमा कर कुम्हार की तरह दो प्यालियों की शक्ल बना दी है.

उसकी भरी-भरी सेहतमंद उरोजों में वही धड़कन, वही गोलाई, वही गरम-गरम ठंडक थी, जो कुम्हार के हाथ से निकले हुए ताजे बरतनों में होती है। मटमैले रंग की उन कुंवारी और जवान औरत की उरोजों ने एक अजीब किस्म की चमक पैदा कर दी थी जो चमक होते हुए भी चमक नहीं थी।  उसके सीने पर ये उभार दो दीये मालूम होते थे जो तालब के गंदेले पानी पर जल रहे होने का आभास दे रहे थे।  

बरसात के यही दिन थे, खिड़की के बाहर पीपल के पत्ते इसी तरह कंपकंपा रहे थे. उस घाटन लड़की के दोनों कपड़े, जो पानी से सराबोर हो चुके थे, एक गंदेले ढेर की सूरत में फर्श पर पड़े थे और वह घाटन की नंगी लड़की रणधीर के साथ चिपटी हुई थी। उसके नंगे बदन की गर्मी रणधीर के बदन में हलचल पैदा कर रही थी, जो सख्त जाड़े के दिनों मेम नाइयों के गलीज लेकिन गरम हमामों में नहाते समय महसूस हुआ करती है।

दिन भर वह रणधीर के साथ चिपटी रही. दोनों एक दूसरे के साथ गड्डमड्ड हो गए थे। उन्होंने मुश्किल से एक दो बातें की होंगी, क्योंकि जो कुछ भी कहना सुनना था, सांसों, होंठों और हाथों से तय हो रहा था। रणधीर के हाथ सारी रात उसकी नर्म-नर्म उरोजों पर हवा के झोंकों की तरह फिरते रहे. उन हवाई झोंकों से उस घाटन लड़की के बदन में एक ऎसी सरसराहट पैदा होती थी कि खुद रणधीर भी कांप उठता था।

इस कंपकंपाहट से रणधीर का पहले भी सैकड़ों बार वास्ता पड़ चुका था। वह काम वासना से भरी हुई लड़की के मजे भी बखूबी जानता था। कई लड़कियों के नर्म और नाजुक लेकिन सख्त स्तनों से अपना सीना मिलाकर वह कई रातें गुजार चुका था, वह ऎसी बिलकुल अल्हड़ लड़कियों के साथ भी रह चुका था जो उसके साथ लिपट कर घर की वे सारी बातें सुना दिया करती थीं जो किसी गैर कानों के लिये नहीं होतीं। वो ऎसी कमीनी लड़की से भी जिस्मानी रिश्ता कायम कर चुका था जो सारी मेहनत खुद करती थीं और उसे कोई तकलीफ नहीं देती थीं। उसे कई सामाजिक रुप से बदचलन लड़की और बदचलन औरत का भी अनुभव था जिसे वह बहुत ही रुहानी मानता था।  

लेकिन यह घाटन की लड़की, जो इमली के पेड़ के नीचे भीगी हुई खड़ी थी और जिसे उसने इशारे से ऊपर बुला लिया था, बिलकुल भिन्न किस्म की लड़की थी।
सारी रात रणधीर को उसके जिस्म से एक अजीब किस्म की बू आती रही. इस बू को, जो एक हीं समय में खुशबू थी और बदबू भी, वह सारी रात पीता रहा। उसकी बगलों से, उसकी छातियों से, उसके बालों से, उसकी चमड़ी से, उसके जवान जिस्म के हर हिस्से से यह जो बदबू भी थी और खूशबू भी, रणधीर के पूरे शरीर में बस गई थी. सारी रात वह सोचता रहा था कि यह घाटन लड़की बिलकुल करीब हो कर भी हरगिज इतनी करीब नहीं होती, अगर उसके जिस्म से यह बू न उड़ती. यह बू उसके मन-मस्तिष्क की हर सल्वट में रेंग रही थी. उसके तमाम नए-पुराने अनुभवों में रच-बस गई थी।

उस बू ने उस लड़की और रणधीर को जैसे एक-दूसरे से एकाकार कर दिया था। दोनों एक-दूसरे में समा गए थे. उन अनंत गहराईयों में उतर गए थे जहां पहुंच कर इंसान एक खालिस इंसान की संतुष्टि से सरबोर होता है. ऎसी संतुष्टि, जो क्षणिक होने पर भी अनंत थी. लगातार बदलती हुई होने पर भी द्र्ढ और स्थायी थी, दोनों एक ऎसा जवाब बन गए थे, जो आसमान के नीले शून्य में उड़ते रहने पर भी दिखाई देता रहे।

उस बू को, जो उस घाटन लड़की के अंग-अंग से फूट रही थी, रणधीर बखूबी समझता था, लेकिन समझे हुए भी वह इनका विश्लेषण नहीं कर सकता था. जिस तरह कभी मिट्टी पर पानी छिड़कने से सोंधी-सोंधी बू निकलती है, लेकिन नहीं, वह बू कुछ और हीं तरह की थी. उसमें लेवेंडर और इत्र की मिलावट नहीं थी, वह बिलकुल असली थी, औरत और मर्द के शारीरिक संबंध की तरह असली और पवित्र।
रणधीर को पसीने की बू से सख्त नफरत थी. नहाने के बाद वह हमेशा बगलों वैगेरह में पाउडर छिड़कता था या कोई ऎसी दवा इस्तेमाल करता था, जिससे वह बदबू जती रहे, लेकिन ताज्जुब है कि उसने कई बार, हां कई बार, उस घाटन लड़की की बालों भरी बगलों का चुम्मा लिया. उसने चूमा और उसे बिलकुल घिन नहीं आई, बल्कि एक अजीब किस्म की तुष्टि का एहसास हुआ। रणधीर को ऎसा लगता था कि वह इस बू को जानता है, पहचानता है, उसका अर्थ भी पहचानता है, लेकिन किसी को समझा नहीं सकता।
बरसात के यही दिन थे. यूं ही खिड़की के बाहर जब उसने देखा तो पीपल के पत्ते उसी तरह नहा रहे थे. हवा में फड़फड़ाहटें घुली हुई थी. अंधेरा था, लेकिन उसमें दबी-दबी धुंधली - सी रोशनी समाई हुई थी. जैसे बरिश की बुंदों के सौ सितरों का हल्का-हल्का गुब्बारा नीचे उतर आया हो. बरसात के यही दिन थे, जब रणधीर के उस कमरे में सागवान का सिर्फ़ एक ही पलंग था. लेकिन अब उस से सटा हुआ एक और पलंग भी था और कोने में एक नई ड्रेसिंग टेबल भी मौजूद थी. दिन यही बरसात के थे. मौसम भी बिलकुल वैसा ही था. बारिश की बूंदों के साथ सितारों की रोशनी का हल्का-हल्का गुब्बार उसी तरह उतर रहा था, लेकिन वातावरण में हिना की तेज खूशबू बसी हुई थी. दूसरा पलंग खाली था. इस पलंग पर रणधीर औंधे मुंह लेटा खिड़की के बाहर पीपल के झुमते हुए पत्तों का नाच देख रहा था।  

एक गोरी - चिट्टी लड़की अपने नंगे जिस्म को चादर से छुपाने की नाकाम कोशिश करते करते रणधीर के और भी करीब आ गई थी, उसकी सुर्ख रेशमी सलवार दूसरे पलंग पर पड़ी थी जिसके गहरे सुर्ख रंग के हजार्बंद का एक फुंदना नीचे लटक रहा था. पलंग पर उसके दूसरे कपड़े भी पड़े थे. सुनहरी फूलदार जम्फर, अंगिया, जांधिया और मचलती जवानी की वह पुकार, जो रणधीर ने घाटन लड़की के बदन की बू में सूंघी थी. वह पुकार, जो दूध के प्यासे बच्चे के रोने से ज्यादा आनंदमयी होती है, वह पुकार जो स्वप्न के दायरे से निकल कर खामोश हो गई थी।

रणधीर खिड़की के बाहर देख रहा था. उसके बिलकुल करीब पीपल के नहाये हुए पत्ते झूम रहे थे. वह उनकी मस्ती भरी कम्पन के उस पार कहीं बहुत दूर देखने की कोशिश कर रहा था, जहां गठीले बादलों में अजीब किस्म की रोशनी घुली हुई दिखाई दे रही थी। ठीक वैसे ही जैसे उस घाटन लड़की के सीने में उसे नजर आई थी ऎसी रोशनी जो पुरैसरार गुफ्तगु की तरह दबी लेकिन स्पष्ट थी।

रणधीर के पहलू में एक गोरी - चिट्टी लड़की, जिसका जिस्म दूध और घी में गुंथे आटे की तरह मुलायम था, उस जवान औरत की उरोजों में मक्खान सी नजाकत थी. लेटी थी। उसके नींद में मस्त जवान लड़की के मस्त नंगे बदन से हिना के इत्र की खुशबू आ रही थी जो अब थकी-थकी सी मालूम होती थी। रणधीर को यह दम तोड़ती और जुनून की हद तक पहुंची हुई खुशबू बहुत बुरी मालूम हुई. उसमें कुछ खटास थी, एक अजीब किस्म की खटास, जैसे बदहजमी में होती है, उदास, बेरंग, बेचैन।

रणधीर ने अपने पहलू में लेटी हुई लड़की को देखा. जिस तरह फटे हुए दूध के बेरंग पानी में सफेद मुर्दा फुटकियां तैरने लगती हैं, उसी तरह इस लड़की के दूधिया जिस्म पर खराशें और धब्बे तैर रहे थे और … हिना की ऊटपटांग खुशबू. दरअसल रणधीर के मन - मस्तिष्क में वह बू बसी हुई थी, जो घाटन लड़की के जिस्म से बिना किसी बहरी कोशिश के स्वयं निकल रही थी. वह बू जो हिना के इत्र से कहीं ज्यदा हल्की - फुल्की और रस में डूबी हुई थी, जिसमें सूंघे जाने की कोशिश शामिल नही थी. वह खुद - ब - खुद नाक के रास्ते अंदर घुस अपनी सही मंजिल पर पहुंच जाती थी।

लड़की के स्याह बालों में चांदी के बुरादे के कण की तह जमे हुए थे. चेहरे पर पाउडर, सुर्खी और चांदी के बुरादे के इन कणों ने मिल - जुल कर एक अजीब रंग पैदा कर दिया था, बेनाम सा उड़ा - उड़ा रंग और उसके गोरे सीने पर कच्चे रंग की अंगिया ने जगह - जगह सुर्ख ध्ब्बे बना दिये थे।

लड़की की छातियां दूध की तरह सफेद थी. उनमें हल्का - हल्का नीलापन भी थी. बगलों में बाल मुंड़े हुए थे, जिसकी वजह से वहां सुरमई गुब्बार सा पैदा हो गया था। रणधीर लड़की की तरफ देख-देखकर कई बार सोच चुका था, क्यों ऎसा नहीं लगता, जैसे मैने अभी-अभी कीलें उखाड़कर उसे लकड़ी के बंद बक्से से निकाला हो? अमूमन किताबों और चीनी के बर्तनों पर जैसी हल्की हल्की खराशें पड़ जाती हैं, ठीक उसी प्रकार उस लड़की के नंगी जवान जिस्म पर भी कई निशान थी।  

जब रणधीर ने उसके तंग और चुस्त अंगिया की डोरियां खोली थी तो उसकी पीठ और सामने सीने पर नर्म - नर्म गोश्त की झुर्रियां सी दिखाई दी थी और कमर के चारों तरफ कस्कर बांधे हुए इजार्बद का निशान भी. वजनी और नुकीले नेक्लेस से उसके सीने पर कई जगह खराशें पड़ गई थीं, जैसे नाखूनों से बड़े जोर से खुजलाया गया हो। 

बरसात के यही दिन थे, पीपल के नर्म नर्म पत्तों पर बारिश की बूंदें गिरने से वैसी ही आवाज पैदा हो रही थी, जैसी रण्धीर उस दिन सारी रात सुनता रहा था. मौसम बेहद सुहाना था. ठंडी ठंडी हवा चल रही थी . उसमें हिना के इत्र की तेज खुशबू घुली हुई थी.

रणधीर के हाथ देर तक उस गोरी लड़की के क्च्चे दूध की तरह सफेद स्तनों पर हवा के झोंकों की तरह फिरते रहे थे। उसकी अंगुलियों ने उस गोरे गोरे बदन में कई चिनगारियां दौड़ती हुई महसूस की थी। उस नाजुक बदन में कई जगहों पर सिमटे हुए क्म्पन का भी उसे पता चला था, जब उसने अपना सीना उसके सीना के साथ मिलाया तो रणधीर के जिस्म के हर रोंगटे ने उस लड़की के बदन के छिड़े तारों की भी आवाज सुनी थी, मगर वह आवाज कहां थी?

रणधीर ने आखिरी कोशिश के तौर पर उस लड़की के दूधिया जिस्म पर हाथ फेरा, लेकिन उसे कोई कपंकंपी महसूस नहीं हुई. उसकी नई नवेली दुल्हन, जो कमशीन कली थी, जो फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट की बेटी थी और जो अपने कालेज के सैकड़ों दिलों की धड़कन थी, रणधीर की किसी भी चेतना को छू न सकी. वह हिना की खुशबू में उस बू को तलाश रहा था, जो इन्हीं दिनों जब खिड़की के बाहर पीपल के पत्ते बारिश में नहा रहे थे, उस घाटन लड़की के मैले बदन से आई थी।  

Sunday, March 13, 2016

मर्यादा का पाठ


शिक्षा मंत्री को दोष दूँ या उस स्कूल को ,या उन पेरेंट्स को ,या उन
बुद्धिजीवी को या खुद की जमात को याने पत्रकारों को ?
आज दिन भर कुछ सवालो ने मेरा दिमाग गरम कर दिया ,उस समय तो बहुत जोर से
झल्लाहट हुयी जब मेरी बातो पे मुझे मर्यादा में रहने को कहा गया। जबकि दो
दिन भी नहीं हुए महिला दिवस के गान को गाये ?
जबलपुर के  एक अंग्रेजी स्कूल की प्रिंसिपल ने किसी बच्चे को 11th  क्लास में पास का रिजल्ट के साथ   टीसी देके  स्कूल से   निकालने की बात उसके पेरेंट्स से की ,स्वाभाविक है प्रेशर
होगा उस बच्चे पे भी ,उसके माता पिता पे भी ,मुझे जैसे बात पता चली मैंने
उस मुद्दे को लेके कई बुद्धिजीवियों से बात की ,मामला सीरियस इसलिए भी
लगा क्युकी कुछ दिन पहले उस स्कूल में एक बच्चे ने टीचर के प्रेसर  में
आत्महत्या कर ली थी। वो लड़का था ,अब मामला उसी स्कूल की लड़की का है।
बच्चो पे प्रेसर न सिर्फ टीचर्स का होता है ,बल्कि उनके अभिभावकों का भी
होता है। कुछ जो बच्चो को संभाल  लेते है ,लेकिन कुछ झूठी  दिखावट के
चलते बच्चे के भविष्य की वाट लगा देते है। स्कूल मैनेजमेंट के पास नियमो
की लिस्ट है ,या तो आप उसको मानो या बच्चे को निकाल लो। कोई जिम्मेदारी
लेने तैयार नहीं ,हाँ साल के लाखो रुपैये फीस के रूप में लेने की
जिम्मेदारी उनकी है जो वो बाकायदा समय से निभाते है।  

सवाल ये की यहाँ गलती किसकी ? उस माता पिता की ?बच्चे की ?या स्कूल की ?

इस मुद्दे को लेके हम परेशान हुए ,हमने अपने सोशल ग्रुप में मैटर  शेयर
किया ,सभी से पूछा की क्या किया जा सकता है ,कुछ बुद्धिजीवियों ने बड़े ही
विनम्रता से बात की ,सहयोग लेके आगे आने की बात की ,मुद्दे को तवज़्ज़ो
मिला। कुछ ने लीगल एक्शन की बात की ,सामाजिक मुद्दे को समझा। मुझे एक
उम्मीद बंधी की चलो कुछ अच्छा किया जाए ,और सब मिलके प्रयास होगा तो
रिजल्ट अच्छा आएगा ?
 लेकिन तुरंत कुछ देर में हमारी जमात के ग्रुप में मेरी बात को ये कहके
समझाइश दी गयी की "कोई भी बात को रखते समय उचित शब्दों का इस्तेमाल करे
,उतनी ही बात रखे जितनी हमारी क्षमता है ,हमें ग्रुप की मर्यादा बनायीं
रखनी चाहिए ," यहाँ तक कहा गया की उस ग्रुप का मजाक बना दिया गया है। कई
लोग लेफ्ट हो गए ,जो की रात होते होते वापस वही थे।
जब वहा  ये बताया गया की जिस बच्ची की बात हो रही है वो इसी ग्रुप के
मेंबर की बिटिया है ,उसके बाद कोई कुछ नहीं बोला ?

बात ये  समझ नहीं आई की ऐसे कौन से शब्द थे मेरे जिससे मर्यादा भंग  हो
गयी। खुद को  कलम का सिपाही कहते है ,और स्कूल की एक फोटो ,एक न्यूज़ एक
ऐड पे अपना ज़मीर बेच देते है ,खुद पत्रकार है लेकिन हिम्मत नहीं की खुद
आगे आके लड़े ,किसी का कन्धा लिया , उसको शब्दों से चढ़ाया और तीर निशाने
पे लगा दिया ,जब मामला  फ़ैल गया ,तब अपने कदम पीछे लेलो। या उस सामने
वाली पार्टी से हाथ मिला के खुद का उल्लू सीधा कर लो। मुझे ये कहने में
कोई डर  या शर्म नहीं की ऐसे समय में लड़कियों का कन्धा बड़ा काम आता है।
आज शायद मेरा मिल गया था।

मुझे कोई दिक्कत नहीं न ही डर  है  ये कहने में मेरी जमात के ही लोग है
,जो मालिको के डर से ,खुद की नौकरी के जाने की डर  से ,घर बार चलाने  के
खातिर आज किस तरह से खुद के ज़मीर को मार के जी रहे है। कई ऐसे भी है जो
एक बोतल दारू ,और न जाने कैसे कैसे गिफ्ट के भरोसे अपने बीबी बच्चो को
पाल रहे है ? विदेश घूमने जाते है ,क्युकी किसी ख़ास न्यूज़ को रोक लिया था
छपने  से ,किसी ने न्यूज़ इसलिए रोक ली क्युकी उस जगह उनका ठेका लगा है।
आप सबकी मर्यादा उस समय कहाँ जाती है जब आप अपने ज़मीर  से समझोता करते है
? उस महिला को मर्यादा बताई जाती है ,लेकिन खुद के ऑफिस में काम कर ने
वाली महिला पत्रकार को जब अजीब से शब्दों से नवाज़ते है तब ? उस समय
मर्यादा कहाँ जाती है ?शब्दों के चयन में तब सावधानी क्यों नहीं बरती
जाती ? उस समय मर्यादा या शब्दों का चयन गायब हो जाता है जब संपादक महिला पत्रकार को गालियो से सम्बोधित करता है ?
तब मर्यादा कहाँ जाती है जब सोशल मीडिया में ग्रुप में फब्तियां कसी जाती है ?
अफ़सोस होता है ये देखके की चंद  इस तरह के लोगो के कारण एक मुद्दा ,बच्चे
की ज़िन्दगी का उसके भविष्य का मजाक बन जाता है ?
किसी अफसर के बारे में हमारे पत्रकार गलत नहीं सुन सकते ?क्यों? क्युकी
रोज वहा हाज़िरी देनी है। कईओ के काम करवाने है। आप काम करवाईये ,लेकिन
खुद की कोई सेल्फरेस्पेक्ट  नाम की चीज़  होती है या नहीं ?

शायद यही कारण है की माल्या जैसा आदमी हमारी जमात को एक झटके में नंगा कर
देता है ये कहके की किसने कितनी मौज उड़ाई है उसका हिसाब किताब है उसके
पास ?

बेचारी शिक्षामंत्री जी आज बच गयी ,गलती उसकी भी नहीं है ,सारे नियमकानून
 बनाये कोई और भुगते कोई और मलाई खाए कोई और ? ऐसे में यही ख्याल आया एक
बार मरने दो ,जिसको मरना  है ,किसी के अच्छे के लिए सोचने का या कुछ करने
का समय ही नहीं है ? सच बोलो तो दिक्कत झूठ बोलो  तो दिक्कत।  बस सुनो
सबकी आज इसका जनम दिन कल उसकी सालगिराह। उसने शायरी सुना दी इसने वाहवाह
कर दिया। कोई ने गलती से अपने विचार रख क्या दिए ,वो तो बड़ा द्रोह हो गया
?

सोचती हूँ मेरे जैसे कितनेहोंगे जिनको गलत बर्दाश  नहीं होता होगा ?क्या
सब लिखने लगते है ,या सब मौन हो जाते है ? मौन होना भी कोई सोलुशन नहीं
है ,गलत को गलत और सही को सही भी न कह सको तो लानत है ऐसे ज़िन्दगी पे।
बाकी सबक मिला आज की कन्धा मत बनो ,समय आ गया है कंधे खोजो और निशाना
लगाओ ?

यही है असल आज़ादी ,असल ज़िन्दगी।

Wednesday, August 12, 2015

सामाजिक संसार की फंतासी का जादूगर

ज्ञान जी का नाम बहुत सुना था , उनका गुस्सा, उनका हड़काना, उनका ये उनका वो, लेकिन सच कहूँ तो उनको आज तक पढ़ा कभी नहीं, पहल का नाम सुना था, कभी ऐसी कोशिश नहीं की ,पहल को  पढूं। मुझे कहानीयों का कविताओ का कभी शौक नहीं रहा ,जब तक फील्ड में थी। सिर्फ हक़ीक़त को बयान करना ही आया। उसमे कभी कमी नहीं की और अगर कोई ने कह दिया की ये तुम्हारे बस का नहीं तो फिर ज़मीन आसमान एक कर देना ये फितूर रहा है। शायद यही फितूर था जिसकी बदौलत मुझे ज्ञान जी से मिलने का मौका मिला, नौकरी से इस्तीफे के बाद जब ऑनलाइन खबरों की दुनिया में आई तब साहित्य जगत का कोई ज्ञान नहीं था, लेकिन कुछ अलग करने की चाहत में सोचा जबलपुर के सभी जाने माने लोगो का इंटरव्यू करना है, लिस्ट में ज्ञान जी का नाम भी था, लेकिन कोई कांटेक्ट नहीं, पत्रकारिता में मेरे गुरु से मैंने कहा मुझे ज्ञान जी को इंटरव्यू करना है, "पागल हो गयी हो क्या " सोचना भी नहीं, क्या जानती हो उनके बारे में, कभी पढ़ा है उनको, आज तक हम लोग कभी इंटरव्यू नहीं लिए तुम कल की उनका इंटरव्यू करोगी ? साहित्य, कहानी कभी पढ़ी है। अच्छे अच्छो की सवाल की हिम्मत नहीं उनके सामने। 

फिर  क्या था उस समय जो मुद्दा चल रहा था, उस  पे सवाल तैयार  किये और परेश तिवारी के साथ उनके घर सुबह सुबह मोबाइल लेके पहुंच गयी। ज्ञान जी ने इतनी आत्मीयता के साथ मेरे से बात की, लगा ही नहीं की इस इंसान के बारे में लोगो ने क्या क्या फैलाया हुआ था ? उन्होंने मेरा परिचय लिया अपना मोबाइल नंबर दिया और उस इंटरव्यू  की कॉपी मुझे देने का आदेश  भी। उसके बाद मैं उनसे जब भी मिलती दुआ सलाम होने लगी, लेकिन अब तक भी मैंने उनको नहीं पढ़ा था। आज जब पहल को ४० साल हुए, १००वां अंक आने को है तब फिर फितूर चढ़ा की मुझे उनके लिए लिखना है क्योंकि अब तक कहानियाँ कई पढ़ चुकी हूँ, कविता समझ आने लगी है, साहित्य में रूचि बढ़ रही है, तो दोबारा ज्ञान जी के व्यक्तित्व ने मुझे  आकर्षित किया।

एक बात जो अब भी ख़ास थी मैंने अब तक  ज्ञान जी का लिखा  नहीं पढ़ा था , इस बार न जाने कितनो से बात की। कुछ लोगो ने साफ़ मना  कर दिया, माफ़ी मांगते हुए की हम उनके बारे में नहीं लिखेंगे, कुछ उनको जानते नहीं। कुछ ने कहा कभी पढ़ा नहीं ?आश्चार्य  ये हुआ की ये सब लोग साहित्य के लोग थे, जिन्होंने मुझे अजीबो गरीब परिस्थिति में डाल  दिया था। एक बार लगा, जब ये दिग्गज कुछ नहीं बोल रहे, पढ़ा नहीं, कह रहे तो मैं कैसे उनके बारे में लिखूंगी। 



फिर क्या था ज्ञान जी की कहानियाँ ऑनलाइन   खोजी और एक रात में २  कहानियाँ  दो दिन में उनकी प्रतिनिधि कहानियाँ पढ़ डाली। अब समझ आया की वो आखिर है क्या ? एक ऐसे कहानीकार जो अपने पढ़ने वाले को इस तरह अपने शब्दों की भूलभुलैय्या  में घुसने को मजबूर कर देता है, जिसमे जो एक बार फँस  गया वो या तो खुद को वहीँ का मान लेता है या वहां से बहार आने के बाद दोबारा बार बार उसमे पनाह लेना चाहता है। जो हाल मेरा हुआ। उनकी सिंपल सी योजना बध तरीके से गढ़ी गयी कहानी गजब जादू ढा  देती है पाठक के मन मस्तिस्क पे। 

ये कला आज तक कोई कहानीकार नहीं सीख पाया होगा न ही कोई कर पायेगा। उनको उनकी कहानियों ने मेरे करीब ला दिया। सामाजिक संसार के अनुभव को अपनी फंतासी से पाठक को बांधे रखने की कला का जादूगर।ये कहना अतिस्योक्ति नहीं होगी। उनकी कहानियो में वो घटनाये ,और बाते है जो आज वर्तमान में घटित हो रही है। 


अब मुझे समझ आया है की क्यों लोगो ने मना किया उनके बारे में कुछ कहने से। साहित्य जगत में राजनीति  आज अपने चरम पर है। कोई किसी को आगे नहीं आने देना चाहता। ऐसे में 70 के  दशक में ज्ञान जी ने सभी नए लोगो को 'पहल' में छापने का काम कर, उस मनु  विचारधारा को तोड़ा   था। आज भी वो युवाओ को जिस तरह से प्रोत्साहित करते है, वो काबिले तारीफ़ है। आज के साहित्य में वो झटके या जलवा वाली बात ही नहीं। कोई भी कहानी याद नहीं रह पाती। जबकि ज्ञानजी के कहानी के पात्र आज भी याद है। ज्ञान जी में आज भी एक छटपटाहट   है किस की कहानी और कविता में क्या नया है, ये स्वभाव  उनको सबसे अलग रखता है। 


ये तो हुयी मेरी बात जो मैंने समझी जानी पहल और ज्ञानजी के बारे में। लेकिन कई ऐसे भी मिले  जो  ज्ञान जी को नहीं जानते या उनके बारे में ज्यादा नही जानते,या सिर्फ सुना है ,या तो पढ़ा है लेकिन  कुछ कहना नहीं चाहते ,कईयों को पहल  की  जानकारी  ही नहीं ,कईयों ने  पहल  को पढ़ा  ही नही। 


पहल एक मात्र ऐसी  पत्रिका रही है जो देश के विभिन्न  प्रदेशो की   जेल तक  में पहुंची है कई कैदियों ने इसे  पढ़ा , इसमें छपने  का सपना हर लिखने वाले को होता है, ये कहना है जबलपुर के युवा रंगकर्मी आशीष पाठक  का, जो ज्ञान जी को ज्यादा नहीं जानते सिर्फ इतना  की उनके लिखित नाटक रेड फ्रॉक को देखने के बाद ज्ञान जी ने कहा था, आशीष तुमने रंगमंच की दिशा बदल दी। 

ज्ञानपीठ पुरूस्कार से सम्मानित कवित्री  बाबुषा के लिए ज्ञानरंजन उस बरगद की तरह मालूम पड़ते हैं जिसके तले बैठ कर छाँव भी मिलती है और मिट्टी का खुरदुरापन भी महसूस होता रहता है। उनकी आँखों की चमक क़ाबिले-ग़ौर है। ये सच्चाई की चमक है।

 चित्रकार विनय अम्बर  के अनुसार पहल इस महा देश की वैज्ञानिक पत्रिका है यानी वैज्ञानिक  तरीके से जीवन जीने के लिए प्रेरित करने वाली साहित्यिक पत्रिका है। वैचारिक प्रतिबद्धता  को समर्पित, यह सब ज्ञान जी के विचार और विज्ञानं के साथ साहित्य के संलगनता का परिचायक है। पिछले ४० सालो में किसी साहित्यकार ने एक संपादक  के रूप में इतना काम नहीं  किया। खोज खोजकर कहानीकार, कवियों को अवसर दिए। पहल ने विश्व को अनेक भारतीय साहित्यकार दिए। उनको सलाम है। 
अरुण पाण्डेय वरिष्ठ नाट्य कर्मी होने के साथ  कहानीकार भी है। हाल ही में पहल के ९९वे अंक में अरुण जी की कहानी छपी, उन्होंने बताया  की ज्ञान जी की  चुनौती  को पार किया उस हौसले  के दम पे जिसके लिए ज्ञान जी ने कहा था की हौसला हो तो आगे आओ वरना मैं रास्ता बदल रहा हूँ। अपने मन को मारते हुए आज तक किसी प्रसिद्धि के चरम पर पहुंचे इंसान को नहीं देखा, उनकी ये अदा अजीब रही। यथार्त और आगत यथार्त को सूंघ कर उस पर रणनीति बना कर लोगो को बताना हिंदी के रचनाकारो की आदत नहीं रही है। बदले ग्रामीण परिवेश, पूंजीवाद का विकास, नव उदारवाद बाजार का चरित्र माफिया , आंदोलन, आरक्षण और भी  कितने मुद्दो का पूरा सच समय से पहले पहल ने ही बताया। ज्ञान जी शहर की हाय तौबा आपसी पीठ थपथपाउ संस्कृति के कभी हिस्सा नहीं रहे। जो अच्छा लगा, उसका साथ दिया जो बुरा लगा उसे बगैर देर किये छोड़ दिया। उनको देख के जीवन और संघर्ष के मायने न केवल समझ में आते है बल्कि उन रास्तो में बेधड़क चलने का मन बनता है। हौसला अफजाई और निराशा के गर्त से उबारने की कला को जताने वाला शहर का एक मात्र महाविद्यालय  वे स्वयं है। पहल अब पत्रिका नहीं रही वो अब परिवार हो गयी है बस ये परिवार यूँही बढ़ता रहे।  

वही उनके हमप्याला दोस्त साहित्यकार  राजेंद्र दानी जी पहल और ज्ञान जी को अलग नहीं मानते, उनके हिसाब से पहल ने २५ साल पहले जो संघर्ष किया, इस मुकाम में लाने के लिए, उसके वो गवाह हैं। उनमे जो रचना शीलता है, जिसकी बदौलत वो हर रचना में से उसका बेस्ट निकालने का काम करवाती है। 

लेखक अमृतलाल वेगड़ के शब्दों में जो स्थान जनसत्ता का अखबारों में है वही स्थान पहल का साहित्य में है। ज्ञान रंजन को पहल से अलग नहीं किया जा सकता। अपने लेखक पद से पहल के संपादक के लिए दिया गया बलिदान वेगड़ जी बड़े गर्व से बताते है, उनके हिसाब से पहल को ज्ञान जी के इस बलिदान की जरुरत थी।

कवि व लेखक  राजेश्वर वशिष्ठ ने ज्ञान जी को कुछ इस तरह अपने शब्दों में बयान किया पहल आज हिन्दी कहानी का पर्याय है। इस पत्रिका का प्रकाशन साठोत्तरी कहानी के अग्रणी कहानीकार श्री ज्ञानरंजन ने  1973 में बहुत सीमित साधनों के साथ किया था। भले ही ज्ञान रंजन जी के साधन बेशक बहुत सीमित थे, पर उनकी दृष्टि बहुत व्यापक थी। एक समय आया जब यह पत्रिका साहित्य के क्षेत्र में क्रांति का बिगुल बन गई। इस पत्रिका में कहानी का प्रकाशन ही किसी को कहानीकार के रूप में स्थापित करता था।  
पहल ने कहानियों का चयन कभी भी सम्पर्क और सौजन्य के आधार पर नहीं किया। पहल की कहानियों मे सामाजिकता का निरूपण, पीड़ित, दबे-कुचले की व्यथा सहित सदैव यथार्थपरक ही रहा। विचार धारा के स्तर पर यह पत्रिका सदा जनवादी मूल्यों की पोषक रही। इस पत्रिका में नए चलन के नाम पर कभी भी यौन स्वच्छन्दता को नहीं परोसा गया जबकि इसकी प्रतिस्पर्धी पत्रिकाओं ने ऐसा खुल कर किया। ज्ञानरंजन आज हिन्दी कहानी के सम्माननीय प्रतीक हैं और यह जान कर अच्छा लग रहा है कि पहल का सौवाँ अंक शीग्र ही आने वाला है। हार्दिक शुभकामनाएं।


पत्रकार ,संपादक राजीव मित्तल के शब्दों में ज्ञान जी से अपनापा बहुत रहा  लेकिन जान-पहचान शून्य …… अड़तालीस साल पहले खुर्जा में चाचा प्रभात मित्तल की शादी में ज्ञान जी सुभाष परिहार के साथ आये थे … तो जनवासे में खुसुर-पुसुर होने लगी....कौन आये हैं ये देखने हम भी उस छोटी सी भीड़ में शामिल हो गए … काली दाढ़ी और बड़े बाल वाले ज्ञान जी काफी हंसमुख लगे …… बस, अगले   कई साल इस परिचित नाम के गुजर  गए … पहल ने ज्ञान जी को कभी भूलने ही नहीं दिया … जबकि पढ़े या देखे दो-चार अंक ही होंगे.... 
फिर 1995 में ज्ञान जी  और परिहार जी से मेरठ में मुलाकात …दोनों अपने स्वर्गीय मित्र  की शादी में आये थे … अगली सुबह दिल्ली तक का साथ और  समय एक छोटी सी नमस्ते.... अगली दो मुलाकातें जैसे आपस में टकराना जाना …

फिर तो दस साल गुजर गए....अब अपना मक़ाम था मुजफ्फरपुर .... अखबार जम कर लेखन हो रहा था … तभी रश्मि रेखा ने राग छेड़ा कि आप पहल  नहीं लिखते …… उसी दिन छपा कुछ भी ज्ञान जी को भेज दिया …साथ में उन मुलाकातों का जिक्र भी … कुछ ही दिन में ज्ञान का जवाब … पिछला कुछ याद नहीं....प्रभात की याद है....तुम्हारा लेखन काफी अलग हट कर है....  पहल के लिए शहरनामा लिख कर भेजो … भेज दिया और पहल में छप  भी गया....फिर क्या …  मैं  विषय बताता और वो पहल में  छापने का ऐलान …सुयोग से जबलपुर ने अपने पास  बुला लिया …वहां पहुँचते ही ज्ञान जी  खोजा … पता चला अपनी बेटी के पास यूएस गए हुए हैं … मायूस हो गया … एक दिन किन्ही पंकज स्वामी का फ़ोन आया की ज्ञान जी आपको तलाश रहे हैं आप उन्हें फ़ोन कर लीजिये …फ़ोन पर उन्होंने बेहद खुशी जताई और घर आने को कहा … तुरंत किसी को पकड़ उनके घर गया....खूब सारी बातें हुईं .... अगली बार घर गया तो अपना एक लेख भी ले गया ....देख कर बोले कि पिछली बार लेकर क्यों नहीं आये इस अंक में छाप जाता....कुछ दिन बाद उनका फ़ोन आया ये लेख तो  भयंकर है दंगा हो जाएगा....…  ज्ञान जी से मुलाक़ात होती रही  .... अचानक जबलपुर छूट गया … तीन  साल बाद  जबलपुर जाने और ज्ञान जी  का सिलसिला शुरू हो गया … पर  यही कहूँगा कि  अपनापा तो बहुत है पर जान-पहचान बहुत कम.

युवा चित्रकार ,पत्रकार सुप्रिया अम्बर  के अनुसार ज्ञान जी से जब भी मिलना होता है किसी ना किसी महत्वपूर्ण विषय पर बहस छिड़  जाती है ,चर्चा परिचर्चा आलोचना सभी कुछ ,और जब हम विसर्जित होते है तो हर बार एक नई तरह की ऊर्जा सभी में प्रसारित हो चुकी होती है। ज्ञानजी और पहल हर पृष्ट पर नया उल्लेख हर मुलाकात में नई ऊर्जा। 
इन लोगो से बात करते हुए मुझे लगा की कुछ कमी है, ठीक वैसे है जैसे दारु की बोतल सामने है, गिलास में डाल  लिया, एक घूंट पीने के बाद भी दिमाग को शान्ति नहीं होती। तब तक जब तक उसका हल्का हल्का सुरूर न चढ़ने लगे। 

साहित्यकार विमल कुमार के अनुसार पहल    ने पिछले चालीस सालों में हिन्दी साहित्य और हिन्दी पट्टी के वैचारिक जगत में बौधिक खुराक तो दी है बल्कि जरूरी सवालों में हस्तक्षेप भी किया है और खलबली भी मचाई है .पहल के बंद होने पर भास्कर में मैंने एक पेज लिखा भी था जिसमे उसके योगदान की सविस्तार चर्चा भी की थी. पहल के टक्कर में आज कोई पत्रिका नहीं है उसकी तुलना केवल तद्भव से हो सकती है पर पहल में जो धार और तीखापन है वो अखिलेश की पत्रिका में नहीं है .पहल का इंतज़ार सभी करते हैं .पहल और ज्ञानरंजन एक दूसरे के पर्याय  बन गए हैं.जबल पुर पहले परसाई जी के कारण जाना जाता था अब वह ज्ञानरंजन के कारण भी  जाना जाता है .ये बड़ी बात है कि एक पत्रिका से एक शहर की पहचान बन जाये .लेकिन ये भी सच है कि ज्ञान जी साहित्य के सात्ता केंद्र के धुरी भी बने .उनके प्रशंसकों का एक क्लब भी है .लेकिन ये क्लब राजेंद्र यादव नामवर सिंह और अशोक वाजपेयी के क्लब से अलग है .इस क्लब के सदस्यों से ज्ञान जी घिर भी गए हैं और कई कमजोर रचनाएँ भी छपी हैं लेकिन इसके बाद भी पहल ने सरस्वती हंस मतवाला और प्रताप जैसी  भूमिका निभायी है.


मुझे अब भी इतना सब सुनके  पहल और ज्ञान जी के बारे में  संतुष्टि नहीं  हो  पा रही थी। कुछ अधूरा  सा, बेमानी सा लग रहा था, तभी एक दूसरे  फितूर  ने दस्तक दी की इनको पढ़ना है दोबारा । एक दिन में ज्ञान जी की ३   प्रमुख कहानियाँ  दोबारा पढ़  डाली।  छलांग,घंटा , पिता । वैसे सच कहु तो दोबारा पढ़ने  के बाद  अब जो नशा चढ़ा उसका आलम आज तक बरकरार है। इन कहानियों  में मैं खुद को  मुख्य चरित्र  समझ रही थी। उस गजब की फंतासी और अनेक विरूपताओ का खुलासा, पारिवारिक परिवेश की विकृतिया चाहे स्त्री के सन्दर्भ में हो या पुरुष के या उन संस्कारो के रूप में उनका प्रस्तुतीकरण, फिर उसमे प्रेम, किशोरावस्था के मनोभाव, प्रौढ़ परिणीति के चित्र आँखों के सामने एक चल चित्र की माफिक गुज़र गए और कहानी खत्म होने के बाद भी पाठक याने मैं, मुझे खुद को सामान्य करने में समय लगा। अब उस अविस्मरणीय  पल की मैं गवाह बन चुकी थी। 


ज्ञान जी और मेरे में एक समानता है ,आलसी पन , जैसा की उन्होंने कही लिखा है ,मुझे लिखने में आलस आता है ,खासकर जब आँखे गढ़ाके  कम्प्यूटर  पे  हिंदी लिखनी हो ,लेकिन इस खुमार के आलम में जो लिखने का काम शुरू हुआ ,परत दर परत  प्याज की माफिक ज्ञान जी का व्यक्तित्व से में अनजान नहीं रही। मै  दावे के साथ कह सकती हूँ की आज के साहित्य कारो ,कहानीकारों ने अगर उन २५ कहानियो को नहीं पढ़ा तो वो साहित्य जगत में उस ईरानी के जैसे है जो कहने को शिक्षा मंत्री है लेकिन डिग्री फ़र्ज़ी लिए हुए। 

बाकी अब ये बात भी समझ आई की लोग उनसे आतंकित और चुप्पी क्यों बनाये रहते है ,कोई कुछ कहना ही नहीं चाहता। जानते सब है लेकिन कोई जानता  भी नहीं ,मुझे वो कभी गुस्से वाले नहीं लगे, जैसा की लोगो ने बताया था ,आज उनके बारे में अपने शब्दों में लिखने की जुर्रत की है ,बाकी इस उम्मीद के साथ की साहित्य में कदम रख ही दिया है तो अब गुरु से क्या डरना। वैसे यहाँ एक बात कहना चाहूंगी ज्ञानजी ने मेरे पापा को कॉलेज में पढ़ाया था ,और अब वो मेरे भी गुरु है। 

कहने  को  ,ज्ञान  जी और पहल   के  लिए  अब इतना सारा है ,की समझ नहीं आ रहा  क्या लिखू ? सिर्फ इतना ही कहूँगी पहल ने उस आपातकाल में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी ,ठीक उसी तरह आज जब आपातकाल जैसे हालात दोबारा बनने की बात होती है तब एक उम्मीद इस पहल से भी की ये कल की याद को आज के बीच एक नए रंग ,रूप ,के साथ लाने में कामयाब हुयी है।


digital india ki asli tasveer


अनोखे तारो से मुलाकात

संडे की सुबह कुछ ख़ास रही ,वैसे तो मै कई बार बीच गयी थी ,आज के पहले अपनी पत्रकारिता की नौकरी के दौरान तब वैसा कभी महसूस नहीं किया था ,जो बात आज महसूस की या कह लो ,तन मन आत्मा सब भर गयी ,आँशु भी झलक पड़े ,आलम ये है की अभी तक खुद को नार्मल नहीं कर पा रही हूँ। आज मेरे से या हम में से किसी से कोई पूछ ले कोई दिक्कत या तकलीफ बुक्का फुला के रो लेंगे ,सब बता देंगे ,इसने ये किया उसने ये किया , न जाने कितना सब कुछ ,लेकिन जब इन बच्चियों से मैंने ये सवाल किया ,तो वो खिलखिला के हँसी और कहा कुछ नहीं दीदी बस सर दर्द देता है , ये दर्द इनको होगा क्युकी ये बच्चियां देख नहीं सकती। आज मुझे ऐसा भी लगा की कितना अच्छा है की ये दुनिया के बदरंगो से पर है ? हम लोगो से लाख गुना सुखी ,जिनके पास ईश्वर ने सब कुछ दिया है फिर भी दो पल का सुकून नहीं ,हाय ये ,हाय वो, हाय इसका ,हाय उसका ,उसने ऐसा ,तो उसने वैसा में ही सारी ज़िन्दगी निकाल देते है ? उनकी आवाज़ में वो खनक थी ,जो अंदर तक हिला गयी ,सुनी तो पहले भी थी तब शायद कानो से टकरा के चली गयी होगी ,आज कान के रस्ते दिल के अंदर गयी और तांडव सा मचा दिया मन में।
सब लडकिया है ,पढ़ने में जोरदार ,गायन जबरदस्त , डिसीप्लेन छोटी उम्र से बड़ी उम्र तक का जबरदस्त ,कितने कदम में क्या है ,किसको क्या कब देना देना है , किससे कब कैसे बात करनी है , बिना टकराये भीड़ में से खुद को कैसे निकालना है ,हम और आप आँख वाले क्या करेंगे जो आज इन बच्चियों को मैंने करते देखा ? ये है जबलपुर की नेत्रहीन कन्या विद्यालय की बच्चियां ,मौका था वात्सल्य एक्यु हीलर कैंप का जो आज यहाँ लगाया गया था। बड़े बड़े लोग जाते है ,उनके गीत सुनते है ,कुछ दान देते है और आ जाते है। इनको दान की कोई जरुरत नहीं है असल ज्ञान का दान हमको इनसे लेना चाहिए ?बाकियो का मुझे पता नहीं ,अब से ,आज से ,लेकिन मैंने आज जो पाया है वो बहुमूल्य है इनको सहानुभूति नहीं चाहिए ,इनको ज्ञान और सम्मान चाहिए ,रोजगार चाहिए ,महीने की तकलीफ से गुजरने वाली इन लड़कियों को आज जैसे ही पेट दर्द का इलाज़ बताया ,जैसे ही माथे के रोज के दर्द का इलाज़ बताया ,उनके चेहरे खिल उठे ? वो हँसी वो ख़ुशी देख के लगा की आज बहुत कुछ पा लिया।
"किसी का दर्द जो मिल सके तो ले उधार जीना इसी का नाम है ",सही मायनो में आज समझ आया। अब कोई कमी की शिकायत नहीं करुँगी आज से ,जो है, जैसा है, जितना है ,बहुत है।
शुक्रिया वात्सल्य एक्यु हीलर से मेरी गुरु प्रतिमा भाभी और गोल्डी भैया का ,जिनके कारण मुझे आज ये अनुभव हुआ। हर रविवार अब हम ने सोच लिया है की कुछ अनोखे तारो से मुलाकात करेंगे।





Wednesday, May 27, 2015

आनंद अनुभूति सेवा लाया बुधवार।

इंसान से दो बोल मीठे बोलने वाला कोई नहीं है ,और सबसे बड़ी बात उसको सुनने वाला भी नहीं है ,फुर्सत ही नहीं किसी के पास की जरा हाल चाल जान ले। ये हम सब के साथ उन विशेष लोगो की भी आप बीती है जो अपराध की दुनिया की सजा काट रहे है ,आज अपने पेशे अलग जब उनसे मिलना हुआ तो ये अनुभव हुआ। कैमरा लेके सेंट्रल जेल बहुत बार गयी। लेकिन तब सिर्फ स्टोरी या न्यूज़  मकसद होता था। आज मकसद कुछ नहीं था बस जाना था और जो खुद सीखा है उससे उनको अवगत करना था। बात यही खत्म हो जानी थी ,लेकिन नहीं ऐसा नहीं है ,जब जेल गए हम ३ लोग प्रतिमा भाभी ,दक्षा मासी ,और वहा  महिला कारागार में उनको एक्सूप्रेसर  की जानकारी दी साथ ही कई बीमारियो से पीड़ित महिलाओ का उपचार पॉइंट्स दबा के किया ,उसका अनुभव अद्भुत रहा। अपराधी बनते नहीं है उनको बना दिया जाता है ,या घोषित कर दिया जाता है ,कुछ नोट की माया से बहार आ जाते है , नोट नहीं वो सज़ायाफ्ता बन जाते है। महिलाओ के साथ उनके छोटे बच्चे जो सजा काट रहे है ,या  बचपन जेल की चार दीवारो के बीच  उनको देख के कई सवाल आये।  आज मेरे दिमाग ने मना  कर दिया की कोई जवाब नहीं खोजना। बस आज सिर्फ सेवा करनीहै। फिर क्या था हम तीनो के पास एक के बाद एक सब अपनी तकलीफो के साथ आने लगी। कुछ महिलाये ऐसे रही की मेरे पॉइंट्स  दवाब से उनको दर्द  तुरंत आराम लगा ,और उन्होंने बहुत दुआये  दी। मन की चंचलता लिए ,कुछ गंभीर सोच  के साथ ,तो कुछ अपने भविष्य की चिंता में दर्दो से दोस्ती किये हुयी है।  आज उनमे कुछ नयी जानकारी जानने की उत्सुकता दिखी। और हम सबने ये तह किया की इनको ये थेरेपी सिखाई जायेगी। मैं सिरिन  आंटी के साथ प्रतिमा भाभी की भी आभारी हूँ जिन्होंने मुझे इस सेवा का मौका दिया। इंसान बुरा नहीं होता परिस्थिति बना देती है। या कह लो हमारे कर्म  है जो हमसे वो सब करवाते है जो भाग्य  है। आज के इस  आनंद  अनुभति को दोस्तों से शेयर किये बिना रहा नहीं गया।  



 daksha masi mahilao ko heal karti



 jailer sahaab ko heal karti pratima bhabhi

Sunday, May 17, 2015

जबलपुर का नाम किया रोशन डॉ यादव ने।

जबलपुर के लिए बहुत गर्व की बात है ,लेकिन मुझे अफ़सोस हुआ इस बात पे की इस तरह की न्यूज़ को आजकल कोई तवाजो नहीं दी जाती  मुझे  जानकारी मिली सोचा कोई छापेगा  या नहीं मुझे इस पर  लिखना है। उस देश की महिला जहा का माहौल इन दिनों बहुत खराब है , वहा  से कोई हमारे यहाँ आता है ,डॉ कमर की बीमारी  से हमारे देश में भी लोग ग्रसित है ,लेकिन उनको विदेश की याद आती है ,और कमर जैसे डॉ   अपने डॉ की खोज को भारत में आके पूरा करते है ,तो क्या हुआ जो जबलपुर आज भी एक छोटा सा गाव  कहा जाने वाला शहर है।  ,डॉ कमर के पति  होशमा 
अफगानिस्तान से आई नेत्र रोग सर्जन डॉ कमर जबलपुर के  मेडिकल अस्पताल   के विश्व  प्रसिद्ध न्यूरो सर्जन  डॉ वाए. आर. यादव से ट्राई जेमिनल न्यूरल्जिया नामक  बीमारी का इलाज़ करने जबलपुर आई है। महिला  डॉ कमर  के पति होशमा ने बताया की डॉ यादव एशिया के एक मात्र न्यूरो सर्जन  है जो दूरबीन पद्दति  से सर्जरी करते है। इस तरह से सर्जरी करने वाले मात्र ३ डॉ है जिसमे एक अमेरिका ,दूसरा जर्मनी और तीसरे भारत से डॉ यादव है। जिसमे विश्व में दूरबीन से सर्जरी सबसे ज्यादा डॉ यादव ने की है। इसलिए अफगानिस्तान से  दिल्ली  और फिर जबलपुर मेडिकल अस्पताल आये है। 

क्या है ट्राई जेमिनल न्यूरल्जिया  ?
 डॉ यादव के अनुसार ये एक ऐसे बीमारी है जिसमे दिमाग की नस का कनेक्शन रक्त की नस से हो जाता है इसमें मरीज़ को बोलने ,खाने पीने में ,और चेहरे को छूने  से भी बिजली के करंट जैसा दर्द  होता है। दर्द इतना तेज होता है की बात  मुश्किल हो जाता है। इसका ऑपरेशन दो तरह से होता है ,एक माइक्रोस्कोप से दूजा दूरबीन से 

कैसे मिली जानकारी ?
डॉ कमर को जर्मनी की  एक मैगज़ीन में छपे लेख से डॉ यादव की जानकारी मिली ,और वो अपने इलाज़ के लिए ,इंटरनेट से जानकारी लेके जबलपुर आई।   

जबलपुर मेडिकल अस्पताल के लिए ये एक गौरव की बात है ,साथ ही भारत  के  लिए भी। इस तरह की बीमारी सलमान भाई को भी है ,साथ ही आशा राम को भी।