Tuesday, July 2, 2013

पुलिस आला कमान के नाम एक खुला खत

पुलिस आला कमान के नाम एक खुला खत 
 

  

लैटर तो मैंने बहुत लिखे हैं, अपने बचपन से न जाने कितने और कितनों को,कुछ लोगों ने तो आज भी शायद मेरे ख़त संभाल के रखे होंगे,आज किसी प्रेस के एडिटर को नहीं,न ही किसी मित्र को ,बल्कि सोचा,जबलपुर के पुलिस आला कमान साहब को एक खुला ख़त लिखूं.............
मुझसे भले ही ज्यादा अच्छे शब्द, शायद ही निकले, पर कोशिश करने में क्या हर्ज़ है .जनाब,
आपने एक अच्छा काम किया है,पिछले दिनों,जो आपने सभी पुलिस वालो की परेड करवा दी.जी, मैं सड़कों में दिन-रात गश्त की बात कर रही हूं.जिन्हें नहीं पता उन्हें बता दूं कि हमारे यहाँ पिछले हफ्ते सड़कों पर लूट की घटना, एक-साथ तीन जगहों पर हुई,वैसे यह हमारे यहाँ हमेशा होती ही रहती है,अगर आप महिला हैं,तो उन्हें अपने जेवर पहन के नहीं निकलना चाहिए या अपने पर्स को संभाल के रखना यह उनकी जिम्मेदारी है.यहाँ आए-दिन कभी भी कोई भी बाइक सवार खुली सड़कों पर आते-जाते महिलाओं से पर्स छीन कर ले भागता है खासतौर पर काली बाइक पर सवार.इस तरह की घटना यहाँ के आम घटनाओं में शुमार माना जाता है.जी,....तो मैं बता रही थी कि उस दिन भी तीन लूट की वारदात एक साथ घट गईं
आला कमान ने सारे थाने की अफसरों की मीटिंग बुलाई और उनको गश्त लगाने के फरमान सुना दिए,पहले दिन तो गजब की पेट्रोलिंग हुई,पुलिस के वाहनें तेजी से सड़को पर आवाजाही करते दिखी.दूसरे दिन उनकी गति में थोड़ी कमी दिखी,शानिवार को दिन में तीन या चार बार,कल रविवार था इसलिए शायद पुलिस वालों को भी छुट्टी चाहिए थी,कुछ ज्यादा ही आराम हो गया,लेकिन अब आज एक भी बार कोई टाइगर वेन नज़र नहीं आई,जो दिखी भी तो कहीं सुस्ताते हुए जैसा.
सही भी है,आखिर कब तक मनचलों की तलाशी लेते रहते ?आखिर वो सब भी तो इंसान ही हैं.थकना भी स्वाभाविक है.
जनाब आपको यह जान कर हैरानी होगी कि इस दौरान मेरी एक पुलिस वाले से बात हुई ....जब उनसे पूछा कि ये क्या हो रहा है? कब तक चलेगा ? क्या ऐसे में लूटेरे पकड़ लिए जायेंगे?आपको यह जानकार आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि उस पुलिस वाले ने क्या जवाब दिया....उसने बड़े ही विनम्र स्वर में बताया कि मैडम,अब आप ही बताइए,क्या वो लूटेरे पागल हैं,जो खुले आम अब तक घूमेंगे,जब तक हमें पेट्रोल खर्च करना है,तब तक तो करेंगे ही.दो दिन की कहानी है..बस, आप देखना उसके बाद ,जो जैसे थे वो वैसे ही हो जायेंगे,ऐसे अगर सब लूटेरे घुमने लगे तो हो गयी,हमारी नौकरी ?
अब आप ही बताइए कि क्या हुआ?क्या सभी महिलाओं ने अपना जेवर पहनना छोड़ दिए या मनचलों ने सड़कों पर बाइक भगाना छोड़ दिया.आज भी बाइक पर चार लोगों की सवारी हो रही है,यातायात पुलिस अंधी बनी बैठी रहती है ,आपके पुलिस के लोग सिर्फ खाना पूर्ति कर रहे होते हैं,सड़को पर आवारापन पूरी तरह से हावी है.आपकी पुलिस की इतनी मेहनत का क्या नतीजा हुआ ?सिर्फ ये की इन चार दिनों में कोई लूट की घटना नहीं हुई,तो इस बात पर आपके लोगों को तमगे दिए जाने चाहिए,इन्होनें बहुत अच्छा काम किया.
जनाब,आप लोगों के पास भोपाल, रायपुर की तरह काम करने का जज्बा क्यों नहीं है,न तो आपके पास और न ही यातायात पुलिस के पास.आज भी कोई भी,कहीं भी अपनी गाडी पार्क कर रहा है.क्योंकि सड़कें इसी काम के लिए बड़ी बनाई गयी है.
इस हालत में अगर कोई लूट की घटना हो जाए और आम जनता कोशिश भी करे कि उस लूटेरे को पकड़ लें तो उनकी हिम्मत नहीं होती....क्योंकि आपके जबलपुर में ,आपके क्यों मेरे जबलपुर में ...कोई लॉ एंड आर्डर नाम की कोई चीज ही नहीं है.हर कोई बेफिक्र है,उसको मालूम है कि यहाँ कोई कुछ नहीं सकता,जिनका सामान गया,वो तो गया..भूल जाओ,लेकिन जो आज भी सड़को पर है उनका क्या?आप जब सड़को पर आने-जाने वालों की सुरक्षा नहीं कर सकते तो आप कैसे कह सकते हैं कि आप किसी बड़े केस को आसानी से सुलझा लेंगे.
अभी बारिश का बढ़िया मौसम है,कोई जरुरत नहीं है कि मुंह बंद करके सड़कों पर लोग चलें,लेकिन इसके बावजूद मनचले मुंह ढंक के घूम रहे हैं ,लडकियां भी घूम रही है,उन्हें कोई कुछ कहने वाला ही नहीं है,बाइकर गैंग के इस वारदात से आज पुलिस होश में आई.इसके पहले क्यों नहीं आई ? आज जिस तरह से आपके सहकर्मी दिन रात गाडियां घुमा रहे हैं .उससे इस समस्या का हल नहीं होगा,आपको सड़कों के लिए नियम कानून बनाने पड़ेंगे ?तभी आपकी इस मेहनत का कोई औचित्य है वरना पुलिस कर्मियों की परेड करवा के आपने कोई बहुत बड़ा काम नहीं कर लिया है ,उनको यूँ ही भगा कर आप भी पीठ पीछे हंसी का पात्र बने हैं,मेरे इस बात को अन्यथा न लेते हुए,आप इस पर गौर करें,और सबसे पहले जब तक सड़कों के लिए बने नियमों का,पालन नहीं करवाएंगे तब तक आपकी मेहनत बेकार है.इसके लिए आम जनता को भी साथ में लीजिये.उनको भी जरा कड़ा डोज दीजिये,तभी वो सही रास्ते पर आएंगे.आपको जनता के साथ उन बाज़ार वालों को भी अपने साथ लेना होगा,जो सड़को को नज़रंदाज़ करते हुए सिर्फ अपनी सोचते हैं,आप ये सब कर सकते हैं ,सिर्फ एक शिद्दत के साथ सब को अपने साथ ले लीजिये,शायद इस बहाने पुलिस का डर आम जनता के मन से जाये और वो आपको भी अपना समझे ...वैसे ये बात आप जल्दी समझ जायेंगे ,क्योंकि आप खुद आकलन करें कि लूटेरो के भूमिगत होने के बाद ,आपके हाथ क्या लगा .

Saturday, June 29, 2013

प्यार से नहीं...बाबू.. इन सड़कों से डर लगता है 
एक मित्र ने कहा- और सुनाओ, क्या चल रहा है? मेरा जवाब था कुछ ख़ास नहीं, बारिश का मजा चल रहा है, सामने से सवाल आया, कहाँ हो? घर पे या बाहर? कहीं लॉन्ग ड्राइव पे? मैंने कहा कहीं नहीं घर पे? अरे? क्यों भई? ऐसे में तो भींगने का मजा लो, क्या घर की चाहरदीवारी में कैद हो? मैंने कहा, यहाँ की सड़कों का मत पूछो, बहुत गन्दा हाल है. कहीं भी जाने मतलब, आने के बाद सारे मूड की मटिया पलीद, अरे! मित्र बोल पड़े... तुम तो बारिश का सोचो, बस ये सब बकवास है ये सब ऐसे ही चलेगा, कुछ नहीं हो सकता हर साल का रोना है.
बारिश का मजा लूं तो कैसे लूँ? मेरे शहर की सड़कों, में इतने गड्डे हैं, कि साला समझ नहीं आता, गाडी निकालूं तो.. कहाँ से.. इधर से निकालूं या उधर से, मेरे शहर की सड़कें इन दिनों अपने ऊपर हुए सरकारी बलात्कार के जख्मों की गवाह बनी है, और वो रोज अपने पे छिडके जाने वाले नमक की जलन से झल्ली होकर, उस दर्द को सड़कें चिल्ला चिल्ला के कह रही है, सुन रहा है न तू, रो रही हूँ मैं... लेकिन हमारे नगर का प्रशासन उसके कानों में तो हैडफ़ोन लगे हुए है, कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा है, इसलिए अब अगर कोई कहे, या कहीं से ये सुनाई दे, की बाबूजी मुझे आपके प्यार से नहीं अपने यहाँ की सड़कों से डर लगता है, तो उसकी इस पीड़ा को समझना... इस बारिश का मजा लेने से पहले जरा उस सड़क की तरफ भी एक नज़र देखना, की कहीं आपकी गाडी के पहिये उसके उन जख्मों को और न कुरेदे, आप तो चले जायेंगे, बारिश का मजा चार चके पे लेने, लेकिन किसी की सीने को रौंदना अच्छी बात नहीं है.
दोस्त की एक बात बिलकुल सही लगी की हर साल का रोना है, लेकिन क्या हम लोगों का खून पानी हो गया है, की दिन भर मेहनत करके हम कमाते हैं किसलिए? घर के साथ अपनी उन जरूरतों को पूरा करे, जिसके लिए हमें अपनी कमाई से टैक्स इस निकम्मी सरकार को देना होता है, क्यों क्योंकि वो हमारे लिए सड़क और अन्य सुविधाओं को मुहैया कराए, लेकिन इस तरह की काला बाजारी की अब तो शर्म से डूबने का भी समय निकल गया, प्रदेश का मुखिया जिस दिन यहाँ तशरीफ लाएगा उस दिन रातों-रात उस सड़क को नए कपड़ो के साथ सजा-धजा के या कहूँ चिथड़ो को लगा कर, उस लड़की की तरह सजा दिया जाता है जिससे साथ एक रात बिताने कोठे पे नामुराद जाते हैं, रात के अंधेरो में, मुखिया की रात बीती, सब चापलूस अपने-अपने घर को घुस जाते है, और फिर वही रोज का आना-जाना चालु, न जाने कितनी दफा, वो सड़क अपने चिथड़ो को, बनते, मिटते देखती है, और हम जैसे कई लोग, रोज अपने दो पहिये, या चार पहियों से उसे रौंदते है, हम कर भी कुछ नहीं सकते ?
मेरे बातों को कई लोग फ़िल्मी कहेंगे, कहीं कहेंगे इसमें नया क्या है? सही भी है इसमे नया क्या है? आज इंसान के पास वैसे ही ज़िन्दगी कम है जीने के लिए, ऊपर से इस तरह की हालत में कोई कैसे निकले? हम बड़ी बड़ी बात नहीं करेंगे की मौत से डर नहीं लगता या मौत कब कहाँ आ सकती है, लेकिन ये सोचने वाली बात है, जिसको सोचने का आज हमारे पास वक़्त नहीं है, आपमें से किसी ने सोचा है की विधायक के घर के सामने की सड़क पक्की है, विधानसभा अध्यक्ष के घर के सामने की सड़क पक्की है, लेकिन जिस जगह आप में से कई लोग दुर्घटना ग्रस्त हो कर भर्ती होते हों वहां की सड़क पक्की नहीं है, क्यों? ये सवाल कभी आया किसी के दिमाग में, या जिस कॉलोनी में आपने लोन ले के अपना सपनों का घर बनाया है, उसके बिल्डर ने पहले आपको वहां की सड़क क्यों नहीं बनवा के दी? कचनार सिटी के वाशिन्दों से जा के मिलो? मुस्कान हाइट्स के लोगों से मिलो? क्यों? आपने तो अपने घरों की क़िस्त उनको दी है, आप तो निगम को टैक्स दे रहे हैं? फिर क्यों? जब तक ये सवाल किसी के दिमाग में नहीं आएगा, ये सब ऐसे ही चलेगा? आपके रुपयों से बंगला बनेगा, लेकिन वो उस अध्यक्ष का बनेगा जो वोट के नाम पे आम जनता के दिलों से, भावनाओं से खेल रहा है, क्योंकि जिस अस्पताल के सामने की सड़क नहीं बनी है, उसके करता-धर्ता का बंगला सिविल लाइन में बन रहा है, वहां की सड़कें जा के देखो, लेकिन किसी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि आज हम सब सिर्फ अपना देखते हैं, लेकिन जिस दिन हमारा कोई अपना पानी से भरे गड्डो की बलि चढ़ेगा, हमने तो तब रोना-धोना मचाना है, अब हम सब इस काम में माहिर हो चुके हैं, हमारी कमाई का माल खाए कोई और हमें क्या? हमारे हिस्से का सुख भोगे कोई और हमें क्या? हम जिस दिन इस धज्जियों भरी सड़को, और इस पे चल रहे वाहनों की नीचे आयेंगे, तब हम सोचेंगे की हमें क्या करना है? बहुत ही कम अकाल का है इंसान कभी कभी लगता है, अपने किसी को रूपये देने के बात आती है तो पहले लेने की बात करता है कि कब इसका ब्याज दोगे, लेकिन वहीँ दूसरी तरफ मेहनत की कमाई का कोई और घर भर रहा है, तो उसके आगे नतमस्तक हो जाता है, वाह रे इंसान तू और तेरे रूप?
आज दिमाग में बहुत गालियाँ है, बहुत कडवापन है, सिर्फ इसलिए नहीं की मुझे इस सुहाने मौसम का लुफ्त उठाने नहीं मिल रहा, बल्कि इसलिए कि जिनको मिलना चाहिए, उनको नहीं मिल रहा, वे घिसट रहे हैं, रेंग रहे हैं, और जिनका इससे दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं, वो मुफ्त खोरी का मजा ले रहे हैं. बात गहरी है.. समझोगे तो आपका भला... नहीं तो दो अपनी मेहनत की कमाई का हिस्सा.. इन जैसे मुफ्त खोरों को, जो आपको ज़िन्दगी को यूँ ही निचोड लेंगे...

Monday, April 22, 2013

मां मुझे इस दिल्ली से दूर ले जा
और ले जा उस बड़े दिलवाली दिल्ली में
जिसके दिल में जिस्म की भूख ना हो
सीने में वासना की आग ना हो
और बलात्कार का वो काला दाग ना हो
बस माँ मुझे ले चल
मैं ही नहीं तू भी बच जाएगी
ये दिल्ली हमें नोंच नोंच के नहीं खाएगी

मैं तो अभी बहुत छोटी हूं
मुझे छुपा ले अपने आंचल में
कहीं इस दिल्ली की गन्दी नज़र मुझपे ना पड़ जाये
कहीं मेरा आने वाला कल आने से पहले ही ना सड़ जाये
माँ तुम उठती क्यों नहीं?
क्या बड़े दिलवाली दिल्ली बहुत दूर है?
या वो दिल्ली भी इतनी ही क्रूर है?
क्या इस दिल्ली के लोग भी उस दिल्ली में रहने लगे
मां अब तेरी आंखों से आंसू क्यों बहने लगे? 

मां ये तू क्या कह रही
बड़े दिलवाली दिल्ली कहीं है ही नहीं
दिलवाली बस एक छवि ही रह गई
अब दिल्ली का दिल आवारा हो गया
और इसे लगता है हर लड़की का जिस्म हमारा हो गया
मां तुझे पता था दिल्ली अब हैवान है
यहाँ कोई इंसान नहीं सब शैतान हैं
फिर भी तूने मुझे पैदा किया
अपनी ममता का क्यों सौदा किया
अपनी दिल्ली को मैंने इन सभ्य बलात्कारियो को हार दिया
मां तूने मुझे कोख में ही क्यों न मार दिया?

Friday, April 19, 2013


हर औरत रेप की हकदार है ?
रेप होते नहीं कराए जाते हैं। दिल्‍ली के गांधीनगर इलाके में रेप और अप्राकृतिक कृत्‍य की शिकार पांच साल की बच्‍ची के पिता से पुलिस ने यही कहा। थाने में रिपोर्ट कराने गए बचची के पिता से कहा गया, ‘शुक्र करो कि तुम्‍हारी बेटी जिंदा है। चाय-नाश्‍ते के लिए 2000 रुपए रखो और घर जाकर बच्‍ची का इलाज करवाओ।’
मीडिया में इस शर्मनाक बयान को पढ़ने वाले किस भी सजग व्‍यक्‍ति के जेहन में तहलका का वह स्‍टिंग ऑपरेशन आएगा, जिसमें रेप के मामलों को लेकर दिल्‍ली पुलिस की अलिखित गाइडलाइन सामने आई थी। सिर्फ दिल्‍ली पुलिस ही नहीं, देश के तकरीबन हर राज्‍य की पुलिस दुष्‍कर्म के मामलों पर इसी तरह की शर्मनाक दलीलें पेश करती है। इन दलीलों को सुनकर सभ्‍य, सुसंस्‍कृत समाज का कोई भी व्‍यक्‍ति यही कहेगा कि ऐसे में देश की हर स्‍त्री के साथ दुष्‍कर्म होना चाहिए। हर औरत जन्‍म से ही रेप की हकदार है, देखिए क्‍यों ?
1.       वह हमेशा सलवार-कमीज, साड़ी, दुपट्टे में नहीं रहती
लड़कियों को ‘यहां तक, नहीं यहां तक....’ इस यहां की कोई हद नहीं है। यह तालिबानी नैतिकता आजादी के बाद की तीसरी पीढ़ी के हर व्‍यक्‍ति के दिमाग में छाई रहती है। पुलिस ही नहीं, अधिकांश लोग मानते हैं ‘लो कट’ दिखावा है, पुरुषों को रेप के लिए उकसाने का जरिया है। स्‍कर्ट पहनना भी इसी तरह की उकसाने वाली हरकत है। यानी औरत बाहर न जाए। काम न करे। वह सलवार-कमीज, साड़ी, दुपट्टे में घर पर बैठी रहे। औरत खुद को जितना दिखाएगी, भेड़िए उसकी ओर ज्‍यादा लपकेंगे। यानी घर, सड़क, स्‍कूल-कॉलेज हर जगह भेड़िए बैठे हैं। अपने शिकार की खोज में। उन पर कोई रोक नहीं है। कोई रोक नहीं लगा सकता, क्‍योंकि रोक लगाने वाले भी वही भेड़िए हैं। इन भेड़ियों के पक्ष में बहुसंख्‍यक पुरुष आबादी है। कानून भी इनके सामने बेबस है। आप पुलिस में शिकायत कीजिए। रिपोर्ट नहीं लिखी जाएगी। रिपोर्ट लिख ली गई तो कोर्ट में कमजोर केस पेश किया जाएगा। भेड़िया छूट जाएगा। पहले से और मजबूत। मीडिया के लिए रेप एक मसालेदार फिल्‍म की तरह है। उससे भी ज्‍यादा चीर-फाड़ दिखाने वाला, जो कि अदालत में जिरह के दौरान होना है। रेप के बाद औरत का जीवन इस्‍तेमाल की गई चीज बनकर रह जाता है। भेड़ियों की विरासत बन जाता है। लेकिन पांच साल की बच्‍ची वह भी तो चारा बन रही है ?इस पर पुलिस और भेड़िया समुदाय का क्‍या जवाब है ?
2.       10 लड़कों के साथ, यानी बदनाम !
अगर किसी लड़की को सरेराह सड़क चलते एक गाड़ी में बैठे 10 लड़के उठाकर ले जाते हैं। बारी-बारी से रेप करके सड़क पर फेंक देते हैं। इस पर सबसे पहले पुलिस कहेगी, ‘जरूर उनमें से किसी लड़के के साथ वह सोई होगी। वरना कोई यूं थोड़े ही किसी लड़की को उठाता है।’ मीडिया भी चीख-चीखकर इस बयान को दोहराएगी। समाज इसे सच मान लेगा। आरोपी पकड़े जाएंगे। छूट भी जाएंगे। औरत ‘इस्‍तेमाल’ जो हो चुकी है। उस पर सबका हक है। वह मासूम नहीं है। नादान भी नहीं। उसे ‘संबंध’ के बारे में सब पता है। वह बदनाम है। कोठे पर बैठने लायक है। कोई भी उसके साथ कुछ भी कर सकता है। तो फिर हर लड़की, हर बच्‍ची बदनाम है। सबको कोठे पर बिठा दो।
3.       दारू पी, यानी रेप तो होगा ही
अगर किसी लड़की ने पार्टी या डिस्‍को में कुछ अजनबियों के साथ शराब पी ली तो फिर उसका रेप होना तय है। शराब पीने के बाद पुरुष भेड़िया हो जाता है। लड़की देखते ही पागल। नहीं सोचता कि वह क्‍या करने जा रहा है। गलती लड़की की है। पुलिस भी यही कहेगी, मीडिया और समाज भी। वह बदचलन है। क्‍यों दारू पी उसने यह तो भेड़ियों का काम है। यह कोई नहीं देखेगा कि शराब या नशीली वस्‍तु उसे धोखे से या जबर्दस्‍ती पिलाई भी जा सकती है। पुलिस यह मानकर कोर्ट में केस पेश करेगी कि लड़की तो आदतन अजनबियों के साथ शराब पीने की आदी है। वह ऐसे ही किसी मौके पर ‘संबंध’ भी बना चुकी होगी। यानी ‘इस्‍तेमाल’ हो चुकी होगी। तो फिर भेड़िए की क्‍या गलती ? वह तो रेप करेगा ही ना ? औरत को दारू नहीं पीनी चाहिए। उसे ऐसी किसी जगह नहीं होना चाहिए, जहां भेड़िए दारू पीकर टल्‍ली हो रहे हों।
4.       जब मां ही ऐसी हो तो...
हुजूर, मां की उम्र 40 पार है। पति ने उसे छोड़ दिया है।  अकेली  बेटियों के साथ रहती है। घर पर एक खास व्‍यक्‍ति का आना जाना है। वह व्‍यक्‍ति रात को भी घर पर रह जाता है। औरत है। उसकी भी अपनी इच्‍छाएं हैं। क्‍या करे ? मोहल्‍ले में पांच गवाह (असल में ये भेड़िए हैं, जिन्‍हें शिकार नहीं मिल सका) कोर्ट में इसे दोहराने को तैयार हैं कि औरत बदनाम है। ऐसे में दोनों बच्‍चियां भी मां के रास्‍ते पर चली गईं। उनके साथ रेप होना ही था। दोषी मां है। उसने बेटियों को जन्‍म क्‍यों दिया ?
5.       उसने रेप करवाया होगा
भेड़िया समुदाय जिसमें पुलिस भी शामिल है, सोचती है कि बड़े घरों की औरतें आजाद ख्‍याल होती हैं। वहां फ्री सैक्‍स होता है। कुछ भी पहनो, कहीं भी आओ-जाओ, कितनी भी देर तक घूमो। घर पर बच्‍चे भी आजाद ख्‍याल बन जाते हैं। उन्‍हें ‘मुंह मारने’ की आदत पड़ जाती है। भेड़िया समुदाय तो मासूम है। उसकी भी अपनी इच्‍छाएं हैं। इधर पल्‍लू सरका कि भेड़िया होश खो बैठेगा। फिर तो रेप होना तय है। अगर औरत निम्‍न परिवार की हो तो भी उसे बन-ठनकर निकलने का हक नहीं है। वह तो खुद को दिखा रही है। कोई आए और उसे लूटकर चला जाए। बदले में नोट की गड्डी थमा जाए। गरीबी रेप भी करवाती है। अगर किसी ने कम पैसे दिए तो रेप की रिपोर्ट लिखवा दो। कोर्ट में केस नहीं टिकेगा, क्‍योंकि पुलिस खुद भेड़िया बिरादरी की है। इतना सजकर तू रात को क्‍या करने गई थी? घर पर पति, बाप, भाई क्‍या काम करते हैं ? ये जवाब अनजाने में खुद भेड़ियों को बचाने वाले साबित होते हैं।
6.       रिपोर्ट झूठी है
लड़की ने रेप की रिपोर्ट लिखवाई ? उसे शर्म नहीं आती ? क्‍या उसे पता नहीं कि कोर्ट में उसकी इज्‍ज्‍त तार-तार होने वाली है ? क्‍या उसे पता नहीं कि समाज उसे ‘इस्‍तेमाल’ की चीज बना देगा ? वह भेड़ियों का आसान शिकार बनेगी ? उसे सबकी ‘भूख’ मिटानी होगी ? इतना सब जानने-समझने के बाद भी रिपोर्ट करवाई है तो मकसद पैसा कमाना ही होगा। वह अपना सौदा करना चाहती है। आरोपी मालदार है। रसूखवाला है। औरत ही बदचलन है। ‘सोना’ तो उसका पेशा है। वह वैश्‍या है। खामख्‍वाह एक ‘मासूम’ (भेड़िए) पर झूठा आरोप लगा रही है। कोर्ट में साबित किया जाए इस झूठ को। मीडिया बार-बार दोहराएगी इसे। झूठ सच साबित हो जाएगा। औरत ‘सार्वजनिक रूप से उपलब्‍ध’ हो जाएगी।
तो महिलाओ   – तैयार हो जाओ रेप के लिए। आपका रेप होना तय है, क्‍योंकि भेड़िया समुदाय यही चाहता है।
पढ़ें तहलका की 14 अप्रैल 2012 की स्‍टिंग : http://archive.tehelka.com/story_main52.asp?filename=Ne140412Coverstory.asp 

Friday, March 15, 2013


16 साल की बाली उम्र को सलाम

सरकार तेरे नए नियम को मेरा लाल   सलाम...। इस कानून को लेकर पता नहीं कोई सीरियस है या नहीं। किसी और का तो मुझे नहीं मालूम, पर मै  चिंता मे हूं। न जाने कितने सवालों और उसके जवाब के  मकड़जाल मे जब मै उलझ रही हूं, तो सरकार या वो माता पिता खामोश क्यों हैं?                                                           

सेक्‍स एजुकेशन किस वजह से और जेंडर एजुकेशन किसके लिए ?  सरकार तो मान रही है कि 16 की लड़की बालिग हो गईआम पक गएपके पकाए को क्‍या सिखानाक्‍या बिगड़ेगी। रेप नहींसहमति से सैक्‍स कहा जाएगा,मतलब 16 की उम्र में लड़की सेक्‍स के लिए सहमति दे सकती है। यहां सहमति अहम है। अगर सहमति है तो गलती कहां आती है। जब सही गलत का अहसास हो तो फिर जिम्‍मेदारी भी उसी कीजिसने फैसला लिया तोअलग सैक्‍स को बेडरूम से बाहर ला दें तो सब समझदार हो जाएंगी। फिर तो कोई दिक्‍कत नहीं है ना ? हां। अगर लड़की इस पर सफाई दे सकती हो तो कोई बात नहीं।

स्‍त्री की यौनिकता परिवार की मर्जी या समाज के पुरातन नियमों से क्‍यों नीलाम हो। वह अपनी मर्जी से जहां पसंद होअपने विवेक से इस्‍तेमाल कर सकती है।जैसे धर्म हमारा निजी मामला हैवैसे ही यौनिकता भी स्‍त्री का निजी मामला है।धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा, पर यहां सहमति शब्‍द बहुत ही नाजुक है इस शब्‍द का तत्‍कालीन परिस्‍थिति में कोई गवाह नहीं हो सकता लड़की बेहद उत्‍तेजना में सहमत हुई लड़की को किसी नशीली वस्‍तु खिलाकर सहमत किया गया या लड़की दबाव में सहमत हो गई। रेप में प्रमाण होते हैं लड़की के भीतरी और बाहरी अंगों पर चोट के निशान जो प्रतिरोध के होते हैं। अगर उत्‍तेजनावश सहमति हुई तो प्रतिरोध नहीं होगा सिर्फ कौमार्य भंग या वेजाइनल रैप्‍चर होगा, दबाव और नशे में भी यही बात होगी तो वह साबित कैसे करेगी अपनी असहमति लेकिन अगर हम उसे पढ़ाकर विवेकशील बनाएंगे तो यह भी दबाव बनाना होगा, उसके हकों पसंद,च्‍वॉइस को नकारने जैसा होगा। समाज को ही खुलना पड़ेगा, हम चंडीगढ़दिल्‍लीमुंबई जैसे समाज में नहीं रहते। हम गांवों में रहते हैं। वहां अभी भी शादी से पहले असहमति ही होती है। चाहे 16 में या 18 में, लेकिन कानून की नजर में सब बराबर हैं। यही इस कानून की सबसे बड़ी खामी है। 16 साल की उम्र शिक्षित समाज के हिसाब से ठीक है । लड़की पांचवीं तक पढ़कर बाहर आ जाए तो वह शिक्षित नहीं है।स्‍त्री अभी भी अपने फैसले खुद नहीं ले सकती। स्‍त्री को अपनी यौनिकता का अहसास पहले मासिक में ही हो जाता है। तब से लेकर पूरे 16 साल तक वह इस बात से चिढ़ी रहती है कि सिर्फ उसे ही खून क्‍यों आता है ? भाई को क्‍यों नहीं? 16 साल की उम्र में उसे पता चलता है कि वह एक लड़की है। जिसे लड़के पसंद करते हैं। उससे दोस्‍ती करना चाहते हैं। क्‍यों क्‍योंकि वह एकलड़की है। लड़के उसे छूना चाहते हैंक्‍योंकि वह मुलायम है। उसके शरीर पर बाल कम हैं। वह लड़कों से अलग बनावट की है। उसमें सैक्‍स हैक्‍योंकि उसे भी विपरीत लिंग की तरफ जाने की चाह होती है। यहां रुकावट समाज,परिवार के नियम हैं। जो उसे पहले बताए जाते हैं। यानी वर्जनाओं की बात पहले की जाती है। यानी वर्जनाओं की बात पहले की जाती है। विवेक से फैसला लेने की नहीं। क्‍या नहीं करना हैक्‍यों नहीं करना हैकहां नहीं जाना है वगैरह। यह बात शहरों में पांच साल की बच्‍चियों को भी बताई जाती है कि कौन सा स्‍पर्श क्‍या अर्थ रखता है।यानी लड़की के भेजे में भरा रहता है नो-नो नी वर्जनाओं की बात पहले की जाती है।विवेक से फैसला लेने की नहीं।क्‍या नहीं करना हैक्‍यों नहीं करना हैकहां नहीं जाना है वगैरह। यह बात शहरों में पांच साल की बच्‍चियों को भी बताई जाती है कि कौन सा स्‍पर्श क्‍या अर्थ रखता है।यानी लड़की के भेजे में भरा रहता है नो-नो जेंडर और सैक्‍स एजुकेशन बाद में इसे यस-नो के बीच के फासले को समझाने के लिए है। पर क्‍या यह बात समझ आएगी ?

जब नो का दायरा यस से बड़ा हो ? यह भी एक सर्वव्‍यापी सत्‍य है कि 16 साल की उम्र से ही स्‍त्री की यौनिकता बेकाबू होने लगती है। उसके दिमाग में भरे नो के चलते वह कई बातें दिल में छिपाने लगती है, क्‍योंकि बेकाबू होती इस यौनिकता को वह किसी को समझाकर नो को यस में नहीं बदल पाएगी। वह प्रेमप्‍यारचाहत और दोस्‍ती के अजीब से बंधनों में उलझती है। पढ़ाई और अच्‍छे नंबरों का सफर भी उसे तय करना है। सो वह ठान लेती है कि अभी नहीं। कुछ बन जाएं फिर देखेंगे। अभी थोड़े मजे कर लेंगे। बाकी कॉलेज में। यहां मजे से मतलब है थोड़ा घूमना फिरनाहंसी मजाकपार्टीआउटिंग या मूवीज। थोड़ी थोड़ी जिस्‍मानी छुअन और घर आकर तकिए को दोनों पैरों के नीचे डालकर सो जाना।लड़के इसी उम्र में नाइट फॉल और लड़कियां हॉट लैप्‍सेस की शिकार होती हैं। अगर मां को पता चले तो नो का दायरा फैलकर गर्दन पर फांस बना देता है।पर यौनिकता तो बेकाबू हो चुकी है। अब कुछ नहीं हो सकता।लड़के हनुमानजी के मंदिर में नजर आते हैं तो लड़कियां व्रत करती हैं। पढ़ाई में मन लगाने की कोशिश करती हैं।लड़कियों को हमेशा लगता है कि कोई उसे चाहेसराहेतोहफे दे। एक अजीब सी गुदगुदी होती है ऐसी वैसी बातों को सोचकर। केंद्र सरकार इसी उतावलेपन को सहमति मानती है। बाली उमर की इस दीवानगी को परिपक्‍वता की निशानी मानती है। 12वीं में लड़के लड़कियों के कॅरियर का एक अहम पायदान होता है।

यहां लुढ़केमतलब अच्‍छे कॉलेज और कोर्स से गएतो पूरा जोर इस पढ़ाई में लगता है। नोट्स के बहाने चिट्ठी पत्री बंटती है। कैंटीन मेंकभी लाइब्रेरी में मिलना हो जाता है।गुदगुदी ज्‍यादा हो तो ज्‍वॉइंट स्‍टडीज और कोचिंग अच्‍छा बहाना है। पर मुझे पढ़ना हैयही मंत्र दिमाग में छाया रहता है। एक साल का संयम और फिर कॉलेज में खुलेपन की छूट का लालच दोनों से यह सब करवा देता है। कॉलेज असल में हमारे शिक्षा तंत्र की मूल भावनायानीविवेकशील होने की पहली सीढ़ी है। यहां सारे चेहरों से परदा हट जाता है, क्‍योंकि सब खुले हैं। कोई कुछ भी कहसकता हैबोल-समझ और जान सकता है। मां-बाप के बंधन काफी खुल जाते हैं। उन्‍हें मालूम है कि बिटिया अब शादी के लायक हो गई है। परिवार का यह अतिरिक्‍त समर्थन ही लड़की को अंदर से मजबूत बनाता है। यहां पैर फिसलते नहीं। जो फिसला वो जानबूझकर गया।बचकाने प्‍यार को ज्‍यादातर लड़कियां यहीं पर बाय बोल देती हैं। वे आगे बढ़ती हैं। उन्‍हें लड़के में स्‍मार्टनेसकरियरफ्यूचर दिखना चाहिए। बोल्‍डनेसबॉडी आदि गुणों के बाद आता है लुक का मसला।                                         यहां दौलत और शोहरत मायने नहीं रखती।

तो कॉलेज में यानी 18 की उम्र आपको सहमति के लिहाज से ज्‍यादा मैच्‍योर लगती है या 16की?

Monday, February 4, 2013


जयुपर साहित्‍य उत्‍सव में 24 जनवरी 2013 को जानी मानी बांग्‍ला कथाकार महाश्‍वेतादेवी का उदघाटन वक्‍तव्‍य -


"ओ! फिर से जीना" - महाश्वेता देवी

शब्द। मैं नहीं जानती कि कहाँ से। एक लेखिका जो वेदना में है? शायद, इस अवस्था में पुनः जीने की इच्छा एक शरारतभरी इच्छा है। अपने नब्बेवें वर्ष से बस थोड़ी ही दूर पहुँचकर मुझे मानना पड़ेगा कि यह इच्छा एक सन्तुष्टि देती है, एक गाना है न ‘आश्चर्य के जाल से तितलियाँ पकड़ना’।इस के अतिरिक्त उस ‘नुकसान’ पर नजर दौड़ाइए जो मैं आशा से अधिक जीकर पहुँचा चुकी हूँ।अट्ठासी या सत्तासी साल की अवस्था में मैं प्रायः छायाओं में लौटते हुए आगे बढ़ती हूँ। कभी-कभी मुझ में इतना साहस भी होता है कि फिर से प्रकाश में चली जाऊँ। जब मैं युवती थी, एक माँ थी, तब मैं प्रायः अपनी वृद्धावस्था में चली जाती थी। अपने बेटे को यह बहाना करते हुए बहलाती थी कि मुझे कुछ सुनाई या दिखाई नहीं दे रहा है। अपने हाथों से वैसे टटोलती थी, जैसा अन्धों के खेल में होता है या याददाश्त का मजाक उड़ाती थी। महत्त्वपूर्ण बातें भूल जाना,वे बातें जो एक ही क्षण पहले घटी थीं। ये खेल मजेदार थे। लेकिन अब ये मजेदार नहीं है। मेरा जीवन आगे बढ़ चुका है और अपने को दुहरा रहा है। मैं स्वयं को दुहरा रही हूँ। जो हो चुका है, उसे आप के लिए फिर से याद कर रही हूँ। जो है, जो हो सकता था, हुआ होगा।

अब स्मृति की बारी है कि वह मेरी खिल्ली उड़ाए।

मेरी मुलाकात कई लेखकों, मेरी कहानियों के चरित्रों, उन लोगों के प्रेतों से होती है जिन्हें मैं ने ‘जिया’ है, प्यार किया है और खोया है। कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं एक ऐसा पुराना घर हूँ जो अपने वासियों की बातचीत का सहभागी है। लेकिन हमेशा यह कोई वरदान जैसा नहीं होता है! लेकिन ‘यदि कोई व्यक्ति अपनी शक्ति के अन्त पर पहुँच जाए तब क्या होगा’? शक्ति का अन्त कोई पूर्णविराम नहीं है। न ही यह वह अन्तिम पड़ाव है जहाँ आप की यात्रा समाप्त होती है। यह केवल धीमा पड़ना है, जीवनशक्ति का ह्रास। वह सोच जिस से मैंने प्रारम्भ किया था वह है ‘आप अकेले हैं ’।

उस परिवेश से जहाँ से मैं आयी हूँ, मेरा ऐसा बन जाना अप्रत्याशित था। मैं घर में सब से बड़ी थी। मैं नहीं जानती कि आप के भी वही अनुभव हैं कि नहीं, लेकिन उस समय प्रत्येक स्त्री का पहला यौन अनुभव परिवार से ही आता था। और युवावस्था से ही मुझ में प्रबल शारीरिक आकर्षण था, मैं इसे जानती थी, इसे अनुभव करती थी और ऐसा ही मुझे कहा गया था। उस समय हम सभी टैगोर से काफी प्रभावित थे। शांतिनिकेतन में थी, प्रेम में पड़ी, जो कुछ भी किया बड़े उत्साह से किया। तेरह से अठारह वर्ष की अवस्था तक मैं अपने एक दूर के भाई से बहुत प्रेम करती थी। उस के परिवार में आत्मघात की प्रवृत्ति थी,और उस ने भी आत्महत्या कर ली। सभी मुझे दोष देने लगे, कहने लगे कि वह मुझे प्यार करता था और मुझे न पा सका इसीलिए उस ने आत्मघात कर लिया। यह सही नहीं था। उस समय तक मैं कम्युनिस्ट पार्टी के निकट आ चुकी थी, और सोचती थी कि ऐसी छोटी अवस्था में यह कितना घटिया काम था। मुझे लगता था कि उस ने ऐसा क्यों किया। मैं टूट गयी थी। पूरा परिवार मुझे दोष देता था। जब मैं सोलह साल की हुई, तभी से मेरे माता-पिता विशेषकर मेरे सम्बन्धी मुझे कोसते थे कि इस लड़की का क्या किया जाए। यह इतना ज्यादा बाहर घूमती है, अपने शारीरिक आकर्षण को नहीं समझती है। तब इसे बुरा समझा जाता था।

मध्यवर्गीय नैतिकता से मुझे घृणा है। यह कितना बड़ा पाखंड है। सब कुछ दबा रहता है।

लेखन मेरा वास्तविक संसार हो गया, वह संसार जिस में मैं जीती थी और संघर्ष करती थी। समग्रतः।मेरी लेखन प्रक्रिया पूरी तरह बिखरी हुई है। लिखने से पहले मैं बहुत सोचती हूँ, विचार करती हूँ, जब तक कि मेरे मस्तिष्क में एक स्पष्ट प्रारूप न बन जाए। जो कुछ मेरे लिए जरूरी है वह पहले करती हूँ। लोगों से बात करती हूँ, पता लगाती हूँ। तब मैं इसे फैलाना आरम्भ करती हूँ। इस के बाद मुझे कोई कठिनाई नहीं होती है, कहानी मेरी पकड़ में आ चुकी होती है। जब मैं लिखती हूँ, मेरा सारा पढ़ा हुआ, स्मृति, प्रत्यक्ष अनुभव, संगृहीत जानकारियाँ सभी इस में आ जाते हैं।

जहाँ भी मैं जाती हूँ, मैं चीजों को लिख लेती हूँ। मन जगा रहता है पर मैं भूल भी जाती हूँ। मैं वस्तुतः जीवन से बहुत खुश हूँ। मैं किसी के प्रति देनदार नहीं हूँ, मैं समाज के नियमों का पालन नहीं करती, मैं जो चाहती हूँ करती हूँ, जहाँ चाहती हूँ जाती हूँ, जो चाहती हूँ लिखती हूँ।वह हवा जिस में मैं साँस लेती है, शब्दों से भरी हुई है। जैसे कि पर्णनर। पलाश के पत्तों से बना हुआ। इस का सम्बन्ध एक विचित्र प्रथा से है। मान लीजिए कि एक आदमी गाड़ी की दुर्घटना में मर गया है। उस का शरीर घर नहीं लाया जा सका है। तब उस के सम्बन्धी पुआल या किसी दूसरी चीज से आदमी बनाते हैं। मैं जिस जगह की बात कर रही हूँ, वह पलाश से भरी हुई है। इसलिए वे इस के पत्तों का उपयोग करते हैं एक आदमी बनाने के लिए।पाप पुरुष। लोक विश्वास की उपज। शाश्वत जीवन के लिए नियुक्त। वह दूसरे लोगों के पापों पर नजर रखता है। वह कभी प्रकट होता है, कभी नहीं। उस ने स्वयं पाप नहीं किया है। वह अन्य सभी के अतिचारों का लेखा-जोखा रखता है। उन के पापों का। अनवरत। और इसीलिए वह धरती पर आता है। छोटी-से-छोटी बातों को लिपिबद्ध करते हुए। एक बकरा। दण्डित। दहकते सूरज के नीचे अपने खूँटे से बँधा हुआ। पानी या छाया तक पहुँचने में असमर्थ। तब पाप पुरुष बोलता है –‘यह एक पाप है। तुम ने जो किया है वह गलत है। तुइ जा कोरली ता पाप।’वस्तुतः यह एक मनुष्य नहीं है। केवल एक विचार की अभिव्यक्ति है।यह एक दण्ड हो सकता है। उस ने कोई भीषण अपराध किया होगा। शे होयतो कोनो पाप कोरेछिलो। कोई अक्षम्य पाप। और अब वह कल्पान्त तक पाप पुरुष बनने के लिए अभिशप्त है। वस्तुतः केवल एक ही पाप पुरुष नहीं है, कई हैं। उसी तरह जैसे कि इस कथा को मानने वाले प्रदेश भी कई हैं।इस से भी सुन्दर कई शब्द हैं। बंगाली शब्द। चोरट अर्थात् तख्ता। और फिर डाक संक्रान्ति। इस का सम्बन्ध चैत्र संक्रान्ति से है। डाक माने डेके डेके जाय। जो आत्माएँ अत्यन्त जागरुक और चैतन्य हैं, वे ही इस पुकार को सुन सकती हैं। पुराने साल की पुकार, जो जा रहा है, प्रश्न करते हुए। पुराना साल आज समाप्त हो रहा है। और नया साल कल प्रारम्भ हो रहा है। क्या है जो तुम ने नहीं किया है ? क्या है, जो अभी तुम्हें करना है ? उसे अभी पूरा कर दो।गर्भदान। यह बड़ा रोचक है। एक स्त्री गर्भवती है। कोई उसे वचन देता है कि यदि बेटी का जन्म होता है, उसे यह-वह मिलेगा। यदि बेटा होता है तो कुछ और मिलेगा। गर्भ थाकते देन कोरछे। दान हो चुका है जब कि बच्चा अभी गर्भ में ही है। इस कथा का कहना है कि अजात शिशु इस वचन को सुन सकता है, इसे याद कर सकता है, और इसे अपनी स्मृति में सहेज सकता है। बाद में वह शिशु उस व्यक्ति से उस वचन के बारे में उस गर्भदान के बारे में पूछ सकता है जो अभी हुआ नहीं है।हमारा भारत बड़ा विचित्र है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र के परधी समुदाय को लें। एक विमुक्त समुदाय। चूँकि वे आदिवासी समुदाय हैं, बच्चियों की बड़ी माँग है। किसी गर्भवती स्त्री का पति आसानी से अजन्मे बच्चे की नीलामी करा सकता है या बेच सकता है। पेट की भाजी, पेटे जा आछे। जो अभी गर्भ में ही है। नीलाम कोरे दीछे। गर्भ के फल को नीलाम कर देता है।नरक के कई नाम हैं। नरकेर अनेक गुलो नाम आछे। एक नाम जो मुझे विशेष पसन्द है, वह है ओशि पत्र वन। नरक के कई प्रकार हैं। ओशि का अर्थ तलवार है। और पत्र अर्थात एक पौधा जिस के तलवार सरीखे पत्ते हों। ऐसे पौधों से भरा हुआ जंगल। और आप की आत्मा को इस जंगल से गुजरना होता है। तलवार सरीखे पत्ते उस में बिंध जाते हैं। आखिर आप नरक में अपने पापों के कारण ही तो हैं। इसलिए आप की आत्मा को इस कष्ट को सहना ही है।जब भी मुझे कोई रोचक शब्द मिलता है, मैं उसे लिख लेती हूँ। ये सारी कापियाँ, कोटो कथा। इतने सारे शब्द, इतनी सारी ध्वनियाँ। जब भी उन से मिलती हूँ, मैं उन्हें बटोर लेती हूँ।अन्त में मैं उस विचार के बारे में बताऊँगी जिस पर मैं आराम से समय मिलने पर लिखूँगी। मैं अरसे से इस पर सोचती रही हूँ। वैश्वीकरण को रोकने का एक ही मार्ग है। किसी जगह पर जमीन का एक टुकड़ा है। उसे घास से पूरी तरह ढँक जाने दें। और उस पर केवल एक पेड़ लगाइए, भले ही वह जंगली पेड़ हो। अपने बच्चे की तिपहिया साइकिल वहाँ छोड़ दीजिए। किसी गरीब बच्चे को वहाँ आकर उस से खेलने दीजिए, किसी चिड़िया को उस पेड़ पर रहने दीजिए। छोटी बातें, छोटे सपने। आखिर आप के भी तो अपने छोटे-छोटे सपने हैं।कहीं पर मैँ ने ‘दमितों की संस्कृति’ पर लिखने का दावा किया है। यह दावा कितना बड़ा या छोटा, सच्चा या झूठा है ? जितना अधिक मैं सोचती और लिखती हूँ, किसी निष्कर्ष पर पहुँचना उतना ही कठिन होता जाता है। मैं झिझकती हूँ, हिचकिचाती हूँ। मैं इस विश्वास पर अडिग हूँ कि समय के पार जीनेवाली हमारे जैसी किसी प्राचीन संस्कृतिके लिए एक ही स्वीकार्य मौलिक विश्वास हो सकता है वह है सहृदयता। सम्मान के साथ मनुष्य की तरह जीने केसभी के अधिकार को स्वीकार करना। लोगों के पास देखनेवाली आँखें नहीं हैं। अपने पूरे जीवन में मैं ने छोटे लोगों और उन के छोटे सपनों को ही देखा है। मुझे लगता है कि वे अपने सारे सपनों को तालों में बन्द कर देना चाहते थे, लेकिन किसी तरह कुछ सपने बच गये। कुछ सपने मुक्त हो गये। जैसे गाड़ी को देखती दुर्गा (पाथेर पांचाली उपन्यास में), एक बूढ़ी औरत, जो नींद के लिए तरसती है, एक बूढ़ा आदमी जो किसी तरह अपनी पेंशन पा सका। जंगल से बेदखल किये गये लोग, वे कहाँ जाएँगे। साधारण आदमी और उन के छोटे-छोटे सपने। जैसे कि नक्सली। उन का अपराध यही था कि उन्होंने सपने देखने का साहस किया। उन्हें सपने देखने की भी अनुमति क्यों नहीं है?जैसा कि मैं सालों से बार-बार कहती आ रही हूँ, सपने देखने का अधिकार पहला मौलिक अधिकार होना चाहिए। हाँ, सपने देखने का अधिकार।यही मेरी लड़ाई है, मेरा स्वप्न है। मेरे जीवन और मेरे साहित्य में।


Saturday, February 2, 2013

आखिर कब तक ?      2

सौम्या  की जिंदगी  मे कभी  भी कोई चीज  या ख़ुशी ,उसे  अपने आप आसानी से  नहीं मिली थी ,वो अन्य लडकियों की तरह नहीं थी ,नो डाउट उसने कभी  अपनी ख्वाइशो  को किसी पे लादा  नहीं ,जो मिला उसमे खुश ,कभी कोई जिद नहीं की की उसको ये पसंद है तो उससे यही चहिये ,हर परिस्थिथि मे  खुद को ढाल  दिया ,वो हर किसी के  लिए उस समय इम्पोर्टेन्ट  होती जब लोगो को उससे काम होता ,फिर वो कोई भी क्यों न हो,स्कूल टाइम मे  सब क्लास मेट ,कॉलेज मे  सब दोस्त ,किसी को गर्ल फ्रेंड  पटाने मे  मदद चाहिए होती ,तो  किसी को अपने खुद के  प्रॉब्लम सोल्वे करने मे  ,सौम्या  ने  सब का काम किया, करवाया ,बेबाकी से ,बिना डरे ,वो सब की चहेती भी बनी ,आज भी है ,नो डाउट ,पर अब उसका ये सीधा पन ,उसको अन्दर ही अन्दर कचोटता है ,आज वो न जाने  कितने सारे  अनगिनित सवालों से  घिरी है ,की उसकी साथ ही ऐसा क्यों होता है , बचपन से  लेकर आज जब वो उम्र कई ऐसे पड़ाव मे  है ,आज भी  लोगो का वही सिलसिला जारी है,आते है ,कुछ अपनी कहते है , दूसरो की कहते है ,सब की कहते है ,पर उसकी कोई नहीं सुनता ,न जाने कितनो की कहानी ,बनी कितनो की सुधारी  ,पर वो आज तक अपनी कहानी नहीं बना पायी अनजानी , बेगानी सी ,अपने ही फितूर  के साथ ,अपनी ही स्टाइल मे  जीने वाली लेकिन कोई बात तो है , की उसकी उम्मीद अभी मरी नहीं है ,उसको लगता है ,की कोई नहीं ,तो न सही ,वो अकेली ही सही ,अपनी ज़िन्दगी  जी लेगी ,अपने सो कॉल्ड बतमीजी के 
 साथ ,बिना तमीज के  अड़ियल  स्वभाव के  साथ ,शायद यही एक कारण है की आज उसकी हर बात को मे  कहानी का रूप दे सकू ।