Friday, March 15, 2013


16 साल की बाली उम्र को सलाम

सरकार तेरे नए नियम को मेरा लाल   सलाम...। इस कानून को लेकर पता नहीं कोई सीरियस है या नहीं। किसी और का तो मुझे नहीं मालूम, पर मै  चिंता मे हूं। न जाने कितने सवालों और उसके जवाब के  मकड़जाल मे जब मै उलझ रही हूं, तो सरकार या वो माता पिता खामोश क्यों हैं?                                                           

सेक्‍स एजुकेशन किस वजह से और जेंडर एजुकेशन किसके लिए ?  सरकार तो मान रही है कि 16 की लड़की बालिग हो गईआम पक गएपके पकाए को क्‍या सिखानाक्‍या बिगड़ेगी। रेप नहींसहमति से सैक्‍स कहा जाएगा,मतलब 16 की उम्र में लड़की सेक्‍स के लिए सहमति दे सकती है। यहां सहमति अहम है। अगर सहमति है तो गलती कहां आती है। जब सही गलत का अहसास हो तो फिर जिम्‍मेदारी भी उसी कीजिसने फैसला लिया तोअलग सैक्‍स को बेडरूम से बाहर ला दें तो सब समझदार हो जाएंगी। फिर तो कोई दिक्‍कत नहीं है ना ? हां। अगर लड़की इस पर सफाई दे सकती हो तो कोई बात नहीं।

स्‍त्री की यौनिकता परिवार की मर्जी या समाज के पुरातन नियमों से क्‍यों नीलाम हो। वह अपनी मर्जी से जहां पसंद होअपने विवेक से इस्‍तेमाल कर सकती है।जैसे धर्म हमारा निजी मामला हैवैसे ही यौनिकता भी स्‍त्री का निजी मामला है।धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा, पर यहां सहमति शब्‍द बहुत ही नाजुक है इस शब्‍द का तत्‍कालीन परिस्‍थिति में कोई गवाह नहीं हो सकता लड़की बेहद उत्‍तेजना में सहमत हुई लड़की को किसी नशीली वस्‍तु खिलाकर सहमत किया गया या लड़की दबाव में सहमत हो गई। रेप में प्रमाण होते हैं लड़की के भीतरी और बाहरी अंगों पर चोट के निशान जो प्रतिरोध के होते हैं। अगर उत्‍तेजनावश सहमति हुई तो प्रतिरोध नहीं होगा सिर्फ कौमार्य भंग या वेजाइनल रैप्‍चर होगा, दबाव और नशे में भी यही बात होगी तो वह साबित कैसे करेगी अपनी असहमति लेकिन अगर हम उसे पढ़ाकर विवेकशील बनाएंगे तो यह भी दबाव बनाना होगा, उसके हकों पसंद,च्‍वॉइस को नकारने जैसा होगा। समाज को ही खुलना पड़ेगा, हम चंडीगढ़दिल्‍लीमुंबई जैसे समाज में नहीं रहते। हम गांवों में रहते हैं। वहां अभी भी शादी से पहले असहमति ही होती है। चाहे 16 में या 18 में, लेकिन कानून की नजर में सब बराबर हैं। यही इस कानून की सबसे बड़ी खामी है। 16 साल की उम्र शिक्षित समाज के हिसाब से ठीक है । लड़की पांचवीं तक पढ़कर बाहर आ जाए तो वह शिक्षित नहीं है।स्‍त्री अभी भी अपने फैसले खुद नहीं ले सकती। स्‍त्री को अपनी यौनिकता का अहसास पहले मासिक में ही हो जाता है। तब से लेकर पूरे 16 साल तक वह इस बात से चिढ़ी रहती है कि सिर्फ उसे ही खून क्‍यों आता है ? भाई को क्‍यों नहीं? 16 साल की उम्र में उसे पता चलता है कि वह एक लड़की है। जिसे लड़के पसंद करते हैं। उससे दोस्‍ती करना चाहते हैं। क्‍यों क्‍योंकि वह एकलड़की है। लड़के उसे छूना चाहते हैंक्‍योंकि वह मुलायम है। उसके शरीर पर बाल कम हैं। वह लड़कों से अलग बनावट की है। उसमें सैक्‍स हैक्‍योंकि उसे भी विपरीत लिंग की तरफ जाने की चाह होती है। यहां रुकावट समाज,परिवार के नियम हैं। जो उसे पहले बताए जाते हैं। यानी वर्जनाओं की बात पहले की जाती है। यानी वर्जनाओं की बात पहले की जाती है। विवेक से फैसला लेने की नहीं। क्‍या नहीं करना हैक्‍यों नहीं करना हैकहां नहीं जाना है वगैरह। यह बात शहरों में पांच साल की बच्‍चियों को भी बताई जाती है कि कौन सा स्‍पर्श क्‍या अर्थ रखता है।यानी लड़की के भेजे में भरा रहता है नो-नो नी वर्जनाओं की बात पहले की जाती है।विवेक से फैसला लेने की नहीं।क्‍या नहीं करना हैक्‍यों नहीं करना हैकहां नहीं जाना है वगैरह। यह बात शहरों में पांच साल की बच्‍चियों को भी बताई जाती है कि कौन सा स्‍पर्श क्‍या अर्थ रखता है।यानी लड़की के भेजे में भरा रहता है नो-नो जेंडर और सैक्‍स एजुकेशन बाद में इसे यस-नो के बीच के फासले को समझाने के लिए है। पर क्‍या यह बात समझ आएगी ?

जब नो का दायरा यस से बड़ा हो ? यह भी एक सर्वव्‍यापी सत्‍य है कि 16 साल की उम्र से ही स्‍त्री की यौनिकता बेकाबू होने लगती है। उसके दिमाग में भरे नो के चलते वह कई बातें दिल में छिपाने लगती है, क्‍योंकि बेकाबू होती इस यौनिकता को वह किसी को समझाकर नो को यस में नहीं बदल पाएगी। वह प्रेमप्‍यारचाहत और दोस्‍ती के अजीब से बंधनों में उलझती है। पढ़ाई और अच्‍छे नंबरों का सफर भी उसे तय करना है। सो वह ठान लेती है कि अभी नहीं। कुछ बन जाएं फिर देखेंगे। अभी थोड़े मजे कर लेंगे। बाकी कॉलेज में। यहां मजे से मतलब है थोड़ा घूमना फिरनाहंसी मजाकपार्टीआउटिंग या मूवीज। थोड़ी थोड़ी जिस्‍मानी छुअन और घर आकर तकिए को दोनों पैरों के नीचे डालकर सो जाना।लड़के इसी उम्र में नाइट फॉल और लड़कियां हॉट लैप्‍सेस की शिकार होती हैं। अगर मां को पता चले तो नो का दायरा फैलकर गर्दन पर फांस बना देता है।पर यौनिकता तो बेकाबू हो चुकी है। अब कुछ नहीं हो सकता।लड़के हनुमानजी के मंदिर में नजर आते हैं तो लड़कियां व्रत करती हैं। पढ़ाई में मन लगाने की कोशिश करती हैं।लड़कियों को हमेशा लगता है कि कोई उसे चाहेसराहेतोहफे दे। एक अजीब सी गुदगुदी होती है ऐसी वैसी बातों को सोचकर। केंद्र सरकार इसी उतावलेपन को सहमति मानती है। बाली उमर की इस दीवानगी को परिपक्‍वता की निशानी मानती है। 12वीं में लड़के लड़कियों के कॅरियर का एक अहम पायदान होता है।

यहां लुढ़केमतलब अच्‍छे कॉलेज और कोर्स से गएतो पूरा जोर इस पढ़ाई में लगता है। नोट्स के बहाने चिट्ठी पत्री बंटती है। कैंटीन मेंकभी लाइब्रेरी में मिलना हो जाता है।गुदगुदी ज्‍यादा हो तो ज्‍वॉइंट स्‍टडीज और कोचिंग अच्‍छा बहाना है। पर मुझे पढ़ना हैयही मंत्र दिमाग में छाया रहता है। एक साल का संयम और फिर कॉलेज में खुलेपन की छूट का लालच दोनों से यह सब करवा देता है। कॉलेज असल में हमारे शिक्षा तंत्र की मूल भावनायानीविवेकशील होने की पहली सीढ़ी है। यहां सारे चेहरों से परदा हट जाता है, क्‍योंकि सब खुले हैं। कोई कुछ भी कहसकता हैबोल-समझ और जान सकता है। मां-बाप के बंधन काफी खुल जाते हैं। उन्‍हें मालूम है कि बिटिया अब शादी के लायक हो गई है। परिवार का यह अतिरिक्‍त समर्थन ही लड़की को अंदर से मजबूत बनाता है। यहां पैर फिसलते नहीं। जो फिसला वो जानबूझकर गया।बचकाने प्‍यार को ज्‍यादातर लड़कियां यहीं पर बाय बोल देती हैं। वे आगे बढ़ती हैं। उन्‍हें लड़के में स्‍मार्टनेसकरियरफ्यूचर दिखना चाहिए। बोल्‍डनेसबॉडी आदि गुणों के बाद आता है लुक का मसला।                                         यहां दौलत और शोहरत मायने नहीं रखती।

तो कॉलेज में यानी 18 की उम्र आपको सहमति के लिहाज से ज्‍यादा मैच्‍योर लगती है या 16की?

Monday, February 4, 2013


जयुपर साहित्‍य उत्‍सव में 24 जनवरी 2013 को जानी मानी बांग्‍ला कथाकार महाश्‍वेतादेवी का उदघाटन वक्‍तव्‍य -


"ओ! फिर से जीना" - महाश्वेता देवी

शब्द। मैं नहीं जानती कि कहाँ से। एक लेखिका जो वेदना में है? शायद, इस अवस्था में पुनः जीने की इच्छा एक शरारतभरी इच्छा है। अपने नब्बेवें वर्ष से बस थोड़ी ही दूर पहुँचकर मुझे मानना पड़ेगा कि यह इच्छा एक सन्तुष्टि देती है, एक गाना है न ‘आश्चर्य के जाल से तितलियाँ पकड़ना’।इस के अतिरिक्त उस ‘नुकसान’ पर नजर दौड़ाइए जो मैं आशा से अधिक जीकर पहुँचा चुकी हूँ।अट्ठासी या सत्तासी साल की अवस्था में मैं प्रायः छायाओं में लौटते हुए आगे बढ़ती हूँ। कभी-कभी मुझ में इतना साहस भी होता है कि फिर से प्रकाश में चली जाऊँ। जब मैं युवती थी, एक माँ थी, तब मैं प्रायः अपनी वृद्धावस्था में चली जाती थी। अपने बेटे को यह बहाना करते हुए बहलाती थी कि मुझे कुछ सुनाई या दिखाई नहीं दे रहा है। अपने हाथों से वैसे टटोलती थी, जैसा अन्धों के खेल में होता है या याददाश्त का मजाक उड़ाती थी। महत्त्वपूर्ण बातें भूल जाना,वे बातें जो एक ही क्षण पहले घटी थीं। ये खेल मजेदार थे। लेकिन अब ये मजेदार नहीं है। मेरा जीवन आगे बढ़ चुका है और अपने को दुहरा रहा है। मैं स्वयं को दुहरा रही हूँ। जो हो चुका है, उसे आप के लिए फिर से याद कर रही हूँ। जो है, जो हो सकता था, हुआ होगा।

अब स्मृति की बारी है कि वह मेरी खिल्ली उड़ाए।

मेरी मुलाकात कई लेखकों, मेरी कहानियों के चरित्रों, उन लोगों के प्रेतों से होती है जिन्हें मैं ने ‘जिया’ है, प्यार किया है और खोया है। कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं एक ऐसा पुराना घर हूँ जो अपने वासियों की बातचीत का सहभागी है। लेकिन हमेशा यह कोई वरदान जैसा नहीं होता है! लेकिन ‘यदि कोई व्यक्ति अपनी शक्ति के अन्त पर पहुँच जाए तब क्या होगा’? शक्ति का अन्त कोई पूर्णविराम नहीं है। न ही यह वह अन्तिम पड़ाव है जहाँ आप की यात्रा समाप्त होती है। यह केवल धीमा पड़ना है, जीवनशक्ति का ह्रास। वह सोच जिस से मैंने प्रारम्भ किया था वह है ‘आप अकेले हैं ’।

उस परिवेश से जहाँ से मैं आयी हूँ, मेरा ऐसा बन जाना अप्रत्याशित था। मैं घर में सब से बड़ी थी। मैं नहीं जानती कि आप के भी वही अनुभव हैं कि नहीं, लेकिन उस समय प्रत्येक स्त्री का पहला यौन अनुभव परिवार से ही आता था। और युवावस्था से ही मुझ में प्रबल शारीरिक आकर्षण था, मैं इसे जानती थी, इसे अनुभव करती थी और ऐसा ही मुझे कहा गया था। उस समय हम सभी टैगोर से काफी प्रभावित थे। शांतिनिकेतन में थी, प्रेम में पड़ी, जो कुछ भी किया बड़े उत्साह से किया। तेरह से अठारह वर्ष की अवस्था तक मैं अपने एक दूर के भाई से बहुत प्रेम करती थी। उस के परिवार में आत्मघात की प्रवृत्ति थी,और उस ने भी आत्महत्या कर ली। सभी मुझे दोष देने लगे, कहने लगे कि वह मुझे प्यार करता था और मुझे न पा सका इसीलिए उस ने आत्मघात कर लिया। यह सही नहीं था। उस समय तक मैं कम्युनिस्ट पार्टी के निकट आ चुकी थी, और सोचती थी कि ऐसी छोटी अवस्था में यह कितना घटिया काम था। मुझे लगता था कि उस ने ऐसा क्यों किया। मैं टूट गयी थी। पूरा परिवार मुझे दोष देता था। जब मैं सोलह साल की हुई, तभी से मेरे माता-पिता विशेषकर मेरे सम्बन्धी मुझे कोसते थे कि इस लड़की का क्या किया जाए। यह इतना ज्यादा बाहर घूमती है, अपने शारीरिक आकर्षण को नहीं समझती है। तब इसे बुरा समझा जाता था।

मध्यवर्गीय नैतिकता से मुझे घृणा है। यह कितना बड़ा पाखंड है। सब कुछ दबा रहता है।

लेखन मेरा वास्तविक संसार हो गया, वह संसार जिस में मैं जीती थी और संघर्ष करती थी। समग्रतः।मेरी लेखन प्रक्रिया पूरी तरह बिखरी हुई है। लिखने से पहले मैं बहुत सोचती हूँ, विचार करती हूँ, जब तक कि मेरे मस्तिष्क में एक स्पष्ट प्रारूप न बन जाए। जो कुछ मेरे लिए जरूरी है वह पहले करती हूँ। लोगों से बात करती हूँ, पता लगाती हूँ। तब मैं इसे फैलाना आरम्भ करती हूँ। इस के बाद मुझे कोई कठिनाई नहीं होती है, कहानी मेरी पकड़ में आ चुकी होती है। जब मैं लिखती हूँ, मेरा सारा पढ़ा हुआ, स्मृति, प्रत्यक्ष अनुभव, संगृहीत जानकारियाँ सभी इस में आ जाते हैं।

जहाँ भी मैं जाती हूँ, मैं चीजों को लिख लेती हूँ। मन जगा रहता है पर मैं भूल भी जाती हूँ। मैं वस्तुतः जीवन से बहुत खुश हूँ। मैं किसी के प्रति देनदार नहीं हूँ, मैं समाज के नियमों का पालन नहीं करती, मैं जो चाहती हूँ करती हूँ, जहाँ चाहती हूँ जाती हूँ, जो चाहती हूँ लिखती हूँ।वह हवा जिस में मैं साँस लेती है, शब्दों से भरी हुई है। जैसे कि पर्णनर। पलाश के पत्तों से बना हुआ। इस का सम्बन्ध एक विचित्र प्रथा से है। मान लीजिए कि एक आदमी गाड़ी की दुर्घटना में मर गया है। उस का शरीर घर नहीं लाया जा सका है। तब उस के सम्बन्धी पुआल या किसी दूसरी चीज से आदमी बनाते हैं। मैं जिस जगह की बात कर रही हूँ, वह पलाश से भरी हुई है। इसलिए वे इस के पत्तों का उपयोग करते हैं एक आदमी बनाने के लिए।पाप पुरुष। लोक विश्वास की उपज। शाश्वत जीवन के लिए नियुक्त। वह दूसरे लोगों के पापों पर नजर रखता है। वह कभी प्रकट होता है, कभी नहीं। उस ने स्वयं पाप नहीं किया है। वह अन्य सभी के अतिचारों का लेखा-जोखा रखता है। उन के पापों का। अनवरत। और इसीलिए वह धरती पर आता है। छोटी-से-छोटी बातों को लिपिबद्ध करते हुए। एक बकरा। दण्डित। दहकते सूरज के नीचे अपने खूँटे से बँधा हुआ। पानी या छाया तक पहुँचने में असमर्थ। तब पाप पुरुष बोलता है –‘यह एक पाप है। तुम ने जो किया है वह गलत है। तुइ जा कोरली ता पाप।’वस्तुतः यह एक मनुष्य नहीं है। केवल एक विचार की अभिव्यक्ति है।यह एक दण्ड हो सकता है। उस ने कोई भीषण अपराध किया होगा। शे होयतो कोनो पाप कोरेछिलो। कोई अक्षम्य पाप। और अब वह कल्पान्त तक पाप पुरुष बनने के लिए अभिशप्त है। वस्तुतः केवल एक ही पाप पुरुष नहीं है, कई हैं। उसी तरह जैसे कि इस कथा को मानने वाले प्रदेश भी कई हैं।इस से भी सुन्दर कई शब्द हैं। बंगाली शब्द। चोरट अर्थात् तख्ता। और फिर डाक संक्रान्ति। इस का सम्बन्ध चैत्र संक्रान्ति से है। डाक माने डेके डेके जाय। जो आत्माएँ अत्यन्त जागरुक और चैतन्य हैं, वे ही इस पुकार को सुन सकती हैं। पुराने साल की पुकार, जो जा रहा है, प्रश्न करते हुए। पुराना साल आज समाप्त हो रहा है। और नया साल कल प्रारम्भ हो रहा है। क्या है जो तुम ने नहीं किया है ? क्या है, जो अभी तुम्हें करना है ? उसे अभी पूरा कर दो।गर्भदान। यह बड़ा रोचक है। एक स्त्री गर्भवती है। कोई उसे वचन देता है कि यदि बेटी का जन्म होता है, उसे यह-वह मिलेगा। यदि बेटा होता है तो कुछ और मिलेगा। गर्भ थाकते देन कोरछे। दान हो चुका है जब कि बच्चा अभी गर्भ में ही है। इस कथा का कहना है कि अजात शिशु इस वचन को सुन सकता है, इसे याद कर सकता है, और इसे अपनी स्मृति में सहेज सकता है। बाद में वह शिशु उस व्यक्ति से उस वचन के बारे में उस गर्भदान के बारे में पूछ सकता है जो अभी हुआ नहीं है।हमारा भारत बड़ा विचित्र है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र के परधी समुदाय को लें। एक विमुक्त समुदाय। चूँकि वे आदिवासी समुदाय हैं, बच्चियों की बड़ी माँग है। किसी गर्भवती स्त्री का पति आसानी से अजन्मे बच्चे की नीलामी करा सकता है या बेच सकता है। पेट की भाजी, पेटे जा आछे। जो अभी गर्भ में ही है। नीलाम कोरे दीछे। गर्भ के फल को नीलाम कर देता है।नरक के कई नाम हैं। नरकेर अनेक गुलो नाम आछे। एक नाम जो मुझे विशेष पसन्द है, वह है ओशि पत्र वन। नरक के कई प्रकार हैं। ओशि का अर्थ तलवार है। और पत्र अर्थात एक पौधा जिस के तलवार सरीखे पत्ते हों। ऐसे पौधों से भरा हुआ जंगल। और आप की आत्मा को इस जंगल से गुजरना होता है। तलवार सरीखे पत्ते उस में बिंध जाते हैं। आखिर आप नरक में अपने पापों के कारण ही तो हैं। इसलिए आप की आत्मा को इस कष्ट को सहना ही है।जब भी मुझे कोई रोचक शब्द मिलता है, मैं उसे लिख लेती हूँ। ये सारी कापियाँ, कोटो कथा। इतने सारे शब्द, इतनी सारी ध्वनियाँ। जब भी उन से मिलती हूँ, मैं उन्हें बटोर लेती हूँ।अन्त में मैं उस विचार के बारे में बताऊँगी जिस पर मैं आराम से समय मिलने पर लिखूँगी। मैं अरसे से इस पर सोचती रही हूँ। वैश्वीकरण को रोकने का एक ही मार्ग है। किसी जगह पर जमीन का एक टुकड़ा है। उसे घास से पूरी तरह ढँक जाने दें। और उस पर केवल एक पेड़ लगाइए, भले ही वह जंगली पेड़ हो। अपने बच्चे की तिपहिया साइकिल वहाँ छोड़ दीजिए। किसी गरीब बच्चे को वहाँ आकर उस से खेलने दीजिए, किसी चिड़िया को उस पेड़ पर रहने दीजिए। छोटी बातें, छोटे सपने। आखिर आप के भी तो अपने छोटे-छोटे सपने हैं।कहीं पर मैँ ने ‘दमितों की संस्कृति’ पर लिखने का दावा किया है। यह दावा कितना बड़ा या छोटा, सच्चा या झूठा है ? जितना अधिक मैं सोचती और लिखती हूँ, किसी निष्कर्ष पर पहुँचना उतना ही कठिन होता जाता है। मैं झिझकती हूँ, हिचकिचाती हूँ। मैं इस विश्वास पर अडिग हूँ कि समय के पार जीनेवाली हमारे जैसी किसी प्राचीन संस्कृतिके लिए एक ही स्वीकार्य मौलिक विश्वास हो सकता है वह है सहृदयता। सम्मान के साथ मनुष्य की तरह जीने केसभी के अधिकार को स्वीकार करना। लोगों के पास देखनेवाली आँखें नहीं हैं। अपने पूरे जीवन में मैं ने छोटे लोगों और उन के छोटे सपनों को ही देखा है। मुझे लगता है कि वे अपने सारे सपनों को तालों में बन्द कर देना चाहते थे, लेकिन किसी तरह कुछ सपने बच गये। कुछ सपने मुक्त हो गये। जैसे गाड़ी को देखती दुर्गा (पाथेर पांचाली उपन्यास में), एक बूढ़ी औरत, जो नींद के लिए तरसती है, एक बूढ़ा आदमी जो किसी तरह अपनी पेंशन पा सका। जंगल से बेदखल किये गये लोग, वे कहाँ जाएँगे। साधारण आदमी और उन के छोटे-छोटे सपने। जैसे कि नक्सली। उन का अपराध यही था कि उन्होंने सपने देखने का साहस किया। उन्हें सपने देखने की भी अनुमति क्यों नहीं है?जैसा कि मैं सालों से बार-बार कहती आ रही हूँ, सपने देखने का अधिकार पहला मौलिक अधिकार होना चाहिए। हाँ, सपने देखने का अधिकार।यही मेरी लड़ाई है, मेरा स्वप्न है। मेरे जीवन और मेरे साहित्य में।


Saturday, February 2, 2013

आखिर कब तक ?      2

सौम्या  की जिंदगी  मे कभी  भी कोई चीज  या ख़ुशी ,उसे  अपने आप आसानी से  नहीं मिली थी ,वो अन्य लडकियों की तरह नहीं थी ,नो डाउट उसने कभी  अपनी ख्वाइशो  को किसी पे लादा  नहीं ,जो मिला उसमे खुश ,कभी कोई जिद नहीं की की उसको ये पसंद है तो उससे यही चहिये ,हर परिस्थिथि मे  खुद को ढाल  दिया ,वो हर किसी के  लिए उस समय इम्पोर्टेन्ट  होती जब लोगो को उससे काम होता ,फिर वो कोई भी क्यों न हो,स्कूल टाइम मे  सब क्लास मेट ,कॉलेज मे  सब दोस्त ,किसी को गर्ल फ्रेंड  पटाने मे  मदद चाहिए होती ,तो  किसी को अपने खुद के  प्रॉब्लम सोल्वे करने मे  ,सौम्या  ने  सब का काम किया, करवाया ,बेबाकी से ,बिना डरे ,वो सब की चहेती भी बनी ,आज भी है ,नो डाउट ,पर अब उसका ये सीधा पन ,उसको अन्दर ही अन्दर कचोटता है ,आज वो न जाने  कितने सारे  अनगिनित सवालों से  घिरी है ,की उसकी साथ ही ऐसा क्यों होता है , बचपन से  लेकर आज जब वो उम्र कई ऐसे पड़ाव मे  है ,आज भी  लोगो का वही सिलसिला जारी है,आते है ,कुछ अपनी कहते है , दूसरो की कहते है ,सब की कहते है ,पर उसकी कोई नहीं सुनता ,न जाने कितनो की कहानी ,बनी कितनो की सुधारी  ,पर वो आज तक अपनी कहानी नहीं बना पायी अनजानी , बेगानी सी ,अपने ही फितूर  के साथ ,अपनी ही स्टाइल मे  जीने वाली लेकिन कोई बात तो है , की उसकी उम्मीद अभी मरी नहीं है ,उसको लगता है ,की कोई नहीं ,तो न सही ,वो अकेली ही सही ,अपनी ज़िन्दगी  जी लेगी ,अपने सो कॉल्ड बतमीजी के 
 साथ ,बिना तमीज के  अड़ियल  स्वभाव के  साथ ,शायद यही एक कारण है की आज उसकी हर बात को मे  कहानी का रूप दे सकू ।

 आखिर कब तक ?                                                                                                                                                   
                                                                      आज उसकी समझ के  बहार था की वो ऐसा क्या करे ,की सारी  बात उसकी हिसाब से  ठीक हो जाये ,लेकिन उसकी ये बदकिस्मती थी ,की वो जब भी कोई काम करने जाती ,उसका काम होता ,पर कुछ इस तरह से ,की जिस सोच के  साथ उसनेउस काम  को   करने का सोचा होता ,वो बात न जाने कहा गायब हो जाती ।और बात कुछ और ही रास्ते से  होकर निकल जाती  और वो फिर वही उस जगह वापस ,जहा थी अकेली ,ये उसकी साथ पहली बार नहीं हुआ ,उसकी साथ हमेशा होता है ,कितनी भी कोशिश कर ले .लेकिन फिर एक सवाल ,और उसका बड़ा सा जवाब ,जो हर बार की उसकी कोशिश को मुह चिढाता  हुआ चला जाता मानो कह  रहा है, की ले आज फिर तू हार गयी ,तू अकेले रहनी के लिए बनी है ,तुझे किसी की ख़ुशी मै  शरीक होने का कोई हक नहीं है ,और तेरे पास लोग आयेंगे ,अपना हालै  बयाँ कर  जायेंगे ,लेकिन तुझे समझने वाला कोई नहीं होगा, सौम्या जी हाँ मै  बात कर रही हु इस लड़की की जिसकी ज़िन्दगी  मै  कही लोग आती है ,अपनी ही तरह कई सवालों के  साथ ,जिसको सुलझाते  सुलझाते इसने अपनी तरफ कभी नहीं देखा ,या ये कहै की दूसरो की ज़िन्दगी मै  हसी लाने के  चक्कर मे  खुद अपना मजाक बना बेठी ।सौम्या  की गलती क्या थी की उसने अपने कई  दोस्तों  को ऐसे समय मे  साथ दिया .जब उनकी पास शायद कोई नहीं था ,बिना किसी उम्मीद के  ,वो हस्ती ,खिलखिलाती ,और जो मन मे  आता वो बोल देती ,बेबाक ,बिना सोची समझे ,शायद यही उसकी कमजोरी थी ,जिसकी कारण आज उसका  कोई अपना   नहीं था ।   

Wednesday, December 19, 2012

अदावत: मजे के बहाने...

अदावत: मजे के बहाने...: हरजीत आज शाम मजे के मूड में घर से निकला था। पापा की होंडा कार उठाई, रास्‍ते में बियर के पांच कैन खरीदे और निकल पड़ा दिल्‍ली के सुनसान रास्‍...

अदावत: बीमारी दूर होगी तो बीमार भी कम होंगे

अदावत: बीमारी दूर होगी तो बीमार भी कम होंगे: आंध्रप्रदेश के खम्‍मम जिले में 2007 की घटना। नौ दरिंदे 15 साल की एक लड़की को घर से अगवा कर कोथागुडेम शहर के बाहर ले गए। उसका सामूहिक बलात्...