Saturday, February 2, 2013

 आखिर कब तक ?                                                                                                                                                   
                                                                      आज उसकी समझ के  बहार था की वो ऐसा क्या करे ,की सारी  बात उसकी हिसाब से  ठीक हो जाये ,लेकिन उसकी ये बदकिस्मती थी ,की वो जब भी कोई काम करने जाती ,उसका काम होता ,पर कुछ इस तरह से ,की जिस सोच के  साथ उसनेउस काम  को   करने का सोचा होता ,वो बात न जाने कहा गायब हो जाती ।और बात कुछ और ही रास्ते से  होकर निकल जाती  और वो फिर वही उस जगह वापस ,जहा थी अकेली ,ये उसकी साथ पहली बार नहीं हुआ ,उसकी साथ हमेशा होता है ,कितनी भी कोशिश कर ले .लेकिन फिर एक सवाल ,और उसका बड़ा सा जवाब ,जो हर बार की उसकी कोशिश को मुह चिढाता  हुआ चला जाता मानो कह  रहा है, की ले आज फिर तू हार गयी ,तू अकेले रहनी के लिए बनी है ,तुझे किसी की ख़ुशी मै  शरीक होने का कोई हक नहीं है ,और तेरे पास लोग आयेंगे ,अपना हालै  बयाँ कर  जायेंगे ,लेकिन तुझे समझने वाला कोई नहीं होगा, सौम्या जी हाँ मै  बात कर रही हु इस लड़की की जिसकी ज़िन्दगी  मै  कही लोग आती है ,अपनी ही तरह कई सवालों के  साथ ,जिसको सुलझाते  सुलझाते इसने अपनी तरफ कभी नहीं देखा ,या ये कहै की दूसरो की ज़िन्दगी मै  हसी लाने के  चक्कर मे  खुद अपना मजाक बना बेठी ।सौम्या  की गलती क्या थी की उसने अपने कई  दोस्तों  को ऐसे समय मे  साथ दिया .जब उनकी पास शायद कोई नहीं था ,बिना किसी उम्मीद के  ,वो हस्ती ,खिलखिलाती ,और जो मन मे  आता वो बोल देती ,बेबाक ,बिना सोची समझे ,शायद यही उसकी कमजोरी थी ,जिसकी कारण आज उसका  कोई अपना   नहीं था ।   

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