Monday, October 27, 2014

ये एक भरम था।

तुम्हारा अनदेखा सा  अनमना सा वो मुट्ठी भर दिल ,
और उसकी वो धक धक करती धड़कन  की आवाज़ ,
आज भी मेरे कानो को ,उस पल  का अहसास कराती है ,
इसको सुनने की प्रबल इक्शा शक्ति  ने मुझे ,
अनहोने मोह की आंच में तापा दिया।
उस कमरे की सनसनाहट  और तुम्हारे बकबक की आवाज़ ,
बहार का  मौसम ,अजीब सी निडरता ,और साहस का वो अहसास ,
मुझे कही भी ले  जा सकता था ,तुम भी बंधे थे ,अधमने से ,
उस पल में बंद मेरी आँखे ,तुम्हारी खुली आँखों से उस याद को जी रही थी ,
जो तुम्हारे दिल और दिमाग को दबोचे हुए थी ,पागल थी में ,उस पल को जीना चाहती थी ,
दिल की दो धड़कनो के बीच कोई एक जगह थी ,जहा कोई पागल नहीं होता ,
मेरा पागल दिल कुछ  सोचना ही नहीं चाह रहा था ,वो सिर्फ कमरे की  दीवाल ,
को निहार रहा था ,एक टक टकटक ,बोल अलग थे ,दिल कुछ और बोल रहा था ,
कंधे के नीचे माथा टेकी मासूम ,पागल  सी वो लड़की उसको रुक रुक के देखती ,
उसका गठा   बदन जिसमे कोई रवानी नहीं थी ,जो था वो दिल और दिमाग में चल रही कश्मकश।
वो कब दबे पाँव इसके दिल में घर कर गया पगली  को पता नहीं चला ,
उस दिन उन अधूरी सी धड़कनो को सुनके उसको लगा की वो उसके लिए नहीं धड़क रहा  है।
वो होले  से उठी ,और उसको अधूरे आलिंगन की बजाये पूरा भींच लिया।
उसने कुछ बहुत ही धीरे से निडरता से कुछ कहा जैसे वो सुन ही न रहा हो।
उसने सुन लिया था ,और आगे बाहो को जकड़ते हुए उस सुकून को जताया जिसको
दोनों ने अनमने ,शायद किसी एक ने महसूस किया,मानो  दोनों के लिए ये एक भरम था। 

Saturday, October 11, 2014

तुम ...और तुम्हारा प्रेम ...



गिराए हुए पर्दो के बीच से झांकना
उठाए हुए दंभ की दीवार लांघना
शक की सिलवटें पोंछ आना
विश्वास की चादर ओढ़ आना

कभी..जब भर जाए मन
तुम्हारे गढ़े कठोर दायरों से
तो उसके पार आना तुम....

फिर
कहीं...
किसी मोड़ पर मिलना मुझसे
जब ढली हो शाम
महक रही हो रात
तारे टिमटिमा रहे हों
पसर रहा हो सन्नाटा...
अपने गुस्से को चकमा देकर
छिपते-छिपाते चले आना तुम
उन लम्हों के मंज़र पर
जहां बनाकर अधूरा छोड़ आए थे
खूबसूरत अहसासों का घरौंदा...
जहां से हमने शुरू किया था
अद्भुत अध्याय को गढ़ना....

और...
तब बुलाना मुझे
यथार्थ के उस जज़ीरे पर
जहां मेरा ख्वा ब मसल गए थे तुम....

मालूम है तुम्हें
तब से अब तक
न जाने कितने मौसम गुज़र गए
हम जले भी... सूखे भी... बिखरे भी
किन्तु
प्रतीक्षा के इस विशाल सागर में
आशाओं को भिगोए रखा

आना तुम जब एकांकी
मेरे लिए विलाप करने लगे
और
तब छूना मेरी धड़कनों को
अपनी मौजूदगी की शिनाख्त के लिए
उसमें मच रहे शोर से
जान जाओगे तुम....
कि मेरे लिए सदा से ही
कितना अनमोल रहा है
तुम... और तुम्हारा प्रेम !!

Wednesday, October 1, 2014

मेरी टीस

मुझे पता है वो तुम हो ही नहीं ,तुम जो हो वो मुझसे बेहतर कोई जानता नहीं ,
पर वो  शब्‍द ,जिसने मुझे सर से लेकर पाँव के खुर तक निचोड़ डाला। 
उसकी गंध ,उसकी तीखी धार ने अंदर तक भिगो दिया इस बार ,
विश्वास था की कुछ है ,जो अब भी है ,और रहेगा ,छुपा दिया है ,
उस... है, ..को कही अब मैंने ,अपने अंदर ,सपने की चादर के साथ ,
दुबक के किसी कोने में अब वो ,जो तुम ने मुझे दिया संवाद स्वरुप ,
वो वही पलेगा ,लेकिन बढ़ेगा नहीं ,उसकी नियति नहीं है बढ़ना ,
एक खाली जगह थी ,जिसे  भरा हुआ समझने की ग़लतफ़हमी में ,
अब मन, दिल जो चाहो कहो सब भीग चूका है ,
इस कदर की डूबने से पहले तैरना जरुरी हो गया है। 
झुकने की आदत ने मुझसे मेरी पहचान ले ली ,
रीढ़ की हड्डी अभी इतनी भी कमजोर नहीं हुयी,
ज़हर की पोटली पहले भी अंदर भरी थी ,आज भी है और मरते दम  तक रहेगी। 
तुम नीलकंठ नहीं बन सकते ,कोई बात नहीं ,समंदर का ज़हर पीना हर किसी के बस का नहीं।