Thursday, July 10, 2014

ग़ालियो का समाज शास्त्र।

किसी महिला के लिए दूसरी महिला को बिच कह देना कितना आसान है।यह एक शब्‍द पूरी पुरुष बिरादरी को हिंसक बलात्‍कारी और स्‍त्री को पीड़ित बना देता है। फिर स्‍त्री इस काले दाग के साथ पुरुष हिंसा के खिलाफ कितनी दृढ़ता से लड़ पाती होगी।क्‍योंकि यह बिच शब्‍द तो औरतों को बांट देता है। मोहल्‍ले की कुतिया सबकी होती हैकोई भी कुत्‍ता अपनी धाक जमाकर उसके साथ मैथुन कर सकता है। यानी वह रंडी बन जाती है।तो अगर औरत दूसरी औरत के लिए रंडी है तो वह रेप पर इतना हाय हाय क्‍यों करती है। यू बिच। एक औरत दूसरी से जुदा तो हो ही गई।एकता की कड़ी टूट गई।एक औरत को बड़ा ओहदा मिलता है। बॉस उसकी तारीफ करता है तो वह बिच बन जाती है।यहां बात अलग है। औरत कुतिया बनने पर बाकी औरतों से अलग हो जाती है।यानी हाशिए पर चली जाती है।पर आदमी कुत्‍ता बनकर गर्व महसूस करता है।अगर एक औरत आधुनिक कपड़ों में फोटो खिंचवाकर डाल दे और मर्द उसकी तरफ दोस्‍ती का हाथ बढ़ाए तो पत्‍नी फौरन बोलेगी, कौन है वह कुतिया ?अब अगर पति उस औरत से सैक्‍स करे तो पत्‍नी बोलेगी कि मेरा पति कुत्‍ता है। किसी के भी साथ सो जाता है।उधर वह औरत सोचेगी कि इसकी पत्‍नी तो ऐसी कुतिया है कि इसका पति मेरे पास चला आया सोने।औरत और औरत के बीच भेदकारी शब्‍द है बिच यानी कुतिया।यह औरतों को बांट देती है।औरतों की कथित एकजुटता की पोल खोल देती है।कल तक बहन, भाभी और सखी कहलाने वाली औरत एक झटके में कुतिया बन जाती है।और यह ओहदा देने वाली औरत ही है।किसी भी स्‍त्री की गरिमा को पूरी तरह से नष्‍ट करना हो तो कह दो उसे कुतिया।
यही तो है गालियों का समाजशास्‍त्र...
....दुनिया की हर गाली के केंद्र में है औरत... बास्‍टर्ड यानी हरामी। यह गाली महिलाएं पुरुषों को देती है। बड़े शान से।पर असल में वो खुद को गाली देती हैं, क्‍योंकि अगर पुरुष हराम का जना है, यानी नाजायज है तो उसे जन्‍म देने वाली औरत भी तो कलंकित हुई।इसी तरह मदर फकर भी स्‍त्री को ही संबोधित है।किसी भी समाज की पहचान खत्‍म कर उसे गुलाम बनाना है तो पहले स्‍त्री के वजूद को मिटाया जाता है।उसे कुतिया बनाया जाता है।ताकि समाज में कुत्‍ते ही पैदा हों।अमेरिका ने थाईलैंड में, कोरिया में, जापान और जर्मनी में यही किया।जब समाज में कुत्‍ते यानी दूसरी नस्‍ल के इंसान पैदा होंगे तो उन्‍हें अपनी पहचान, अपनी संस्‍कृति, अपने देश पर गर्व नहीं होगा।वे वैचारिक रूप से दूसरों के नस्‍ली गुलाम बन जाएंगे।असल में गाली देने वाला हमारा समाज इसी दिशा की ओर जा रहा है।मीडिया में गाली देना आम बात हैं। बॉस हो या रिपोर्टर बिना ग़ाली दिए कोइ एक अच्छा पत्रकार नहीं बन सकता। ऐसा मैंने सुना था ,देखा ,उस समय गालियो के इस समाजशास्त्र का ज्ञान नहीं था। ऑफिस में सुन लेती थी किसी क़ो गाली देतें तो उससे डाट समझ की हलके मे लें लेतीं।आज कुछ पढ़ा तो वही सवाल दिमाग में कौंध गए। आखिर क्यों ,आता है मजा ?फेसबुक के एक मित्र की वाल पे इसे पढ़ा।
आज संसद परिसर में एक मजेदार वाकया हुआ, दो बड़े अंग्रेजी चैनलों की महिला रिपोर्टर आपस में एक बाईट के मुद्दे पर लड़ पड़ीं। मुंह सिकोड़कर वो एक दूसरे को 'बिच' (जानने वाले लोग हिन्दी अनुवाद करे लें) कह रही थीं। हमको गांव याद आ गया, गांव की गालियों का भी समाजशास्त्र होता है।---- Mukesh Kaushik, की इस पोस्ट को पढ़के रहा नहीं गया। और लिख डाला।                     आजतक ये लगता था की ये पुरुष गालिया कितनी सहजता से देते है ,छोटी छोटी बात पे ,जिससे अगर मैं  देना भी चाहू तो मुह से नहीं निकलती। कुछ लड़कियों को देते हुए देखा ,तब लगा शायद जरूरी है ,अब लड़कियों को भी देना चाहिए ,लेकिन आज अपने मन की ये बात जब एक मित्र से जाननी चाही ,तो जो बात सामने आई ,वो जानके शर्म नहीं ,बल्कि लगा की मैं  भी उन औरतो की जमात का हिस्सा हु ,जिसके मुह से बिच सुनके मर्दो को मजा आया। और बात भी बनी  होगी। या यु भी तो वो लोग बोलते होंगे। लेकिन जब औरत ही औरत को हासिये पे ले जाने का काम कर रही हो  तो   किसे ?क्या ?कहा जाए ? गालिया देने का अलग ही आनंद है ,तुम नहीं समझोगी ?क्यों भला ?अरे तुमने कभी दी नहीं ना।  आज सुबह सुबह का वाक़या है ,पडोसी के यहाँ जवान बेटे को बाप ने घर की बुजूर्ग ओर ,अपनी माँ के साथ बीबी के सामने इतनि गालिया दीं ,मैं  दंग रह गयी। मारता जा रहा था वो बेटे को ओर गालिया थीं  कई बन्द ही नही हो रही थी ,किसी ने उसे  रोका भी नहीं। जवान लड़की है घर में ,शायद ये औरत और लड़की मुझे ही समझ आये क्यूँकि मैंने गालियों का समाजशास्त्र कॉल समझा था। तभी सोच लिया था की हो सकता है लोगो को इनका शास्त्र नही पता ,या शायद महिलाओ को जो बडे ही सुन्दर और धैर्य से इससे सुनती भी है ,और अब उनको देने में भी अब कोई हिचक नहीं होती। शाम होते होते मोबाइल मे एक विडिओ आ  गया। जिसमे लड़की गालिया इसलिए दें रही हैं क्यूँकि उससे टीवी की किसी शो मे जाना  है। आजकल ये फैशन और स्टैण्डर्ड की बात हो गयी है। लेकिन मुझे ऐसे समाज की कोइ दरकार नही जंहा  इतनी  बुरी तरह से हासिये पे लें  जानें के काम अपनी ही ज़मात के लाग करती हैं। ये वो सब दोगले इंसान ही हैं ,जो मतलबपरस्त है समय के हिसाब से अपने अंदर का उबाल निकालनी की लिए इन गालियों क़ो साहारा  लेतें हैँ। मैं चाहती तो सभी श्ब्दों   अर्थ  लिखती ,लेकिन लिखते नहीं बना। इसलिए एक के जरिये कोशिश की है क़ि औरतो को ए बात समझ ऑ जाएं। और मर्दो को भी जिन्हे बहुत मज़ा आता है।     
https://www.youtube.com/watch?v=NtvIQQ3alW8 
ये वो लिंक है जिसमे लड़की ने बरसात की गलियो क़ी। 

2 comments:

  1. सही सवाल उठाये हैं स्नेहा. बाकी ये अंग्रेजीदां नारीवादी समझेंगी नहीं.

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    1. sahi kaha samar ,koi nahi samjhega,lekin ek koshish jaari rahegi....

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