Friday, August 30, 2013

mere pahali film samiksha



बाज़ार में बिकने वाली नींद की एक अलग सी कहानी, सोना स्पा

प्रेषित समय :20:51:46 PM / Fri, Aug 30th, 2013Share this on Facebook
स्नेहा चौहान. अनिद्रा एक ऐसे बीमारी है जिसकी चपेट में न जाने कितने लोग है. खास कर वो जिनकी जिज्ञासाएं, महत्वकांक्षाएं इतनी ज्यादा है कि वो इस सुकून भरी नींद का आनंद नहीं ले पाते और फिर अनचाही बीमारियां उनके शरीर को अपना घर बना लेती हैं. लेकिन अगर आपको कोई कहे कि आपको आपकी नींद बाज़ार में खरीदने से मिल जाएगी तो क्या आप उसे खरीदना चाहेंगे? सुनने में ये जितना अटपटा है उतना ही मजेदार भी. ये कितना आसान होगा आप सोच के देखें? आपके लिए कोई और सोयेगा और आप बिलकुल फ्रेश फील करेंगे!
ये सब्जेक्ट जरा नहीं, बहुत अलग है, बोले तो हट के है. ये असल में एक मूवी की कहानी है, सोना स्पा जिसे देख के मुझे ये समझ आया कि, देश की कई समस्याओं का समाधान इस तरीके से किया जा सकता है? क्यूँकि जिस दिमाग में शान्ति नहीं है, सुकून नहीं है, वही कहीं न कहीं जाके न जाने कितनी सारी घटनाओ को अंजाम देता है!
तो सोचें, उन इंसानों को जिनके दिमाग को सुकून नहीं है, अगर उनके लिए कोई सोये और वो तरोताजा हो जाये. सारी खुराफात  को भुलाया जा सकता है तो इस तरह की नींद देने में कोई आपति किसी को नहीं होगी.
SONA SPA की कहानी कुछ ऐसी ही है. इस नींद से लोगो को न जाने कितनी बातों से निजात मिल जाएगी. मुझे ये कहानी अच्छी लगी. मकरंद देशपांडे की कहानी में दम है, इसको अगर किसी तरह इस  भासी दुनिया में सच में कारगर कर दिया जाये, तो वाकई न जाने कितने लोगो का भविष्य सुधर जायेगा. लीक से हट के एक उम्दा सोच के साथ, सामाजिक दायरों को कहीं न कहीं गलत साबित करती फिल्म. एक बार देखा जा सकता है. मुझे स्टार देने की परंपरा को नहीं निभाना, क्यूँकि जब किसी बोल्ड सब्जेक्ट पर कोई कलाकार एक्टिंग करता है, तो उसको समझने के लिए एक कलाकार की आत्मा काफी है.

Wednesday, August 7, 2013

mera article palpalindai.com mai



इंटरनेट मीडिया का विकृत रुप पोर्न पत्रकारिता
 
प्रेषित समय : 7 अगस्त, 2013
अखबार की खबर पर पाठक प्रतिक्रिया नहीं कर सकता, लेकिन मित्रों..इन्टरनेट मीडिया में त्वरित टिप्पणी की सुविधा मौजूद है. कहने का मतलब इन्टरनेट इंटरेक्टिव मीडिया है. न्यूज़ साईट हो या सोशल साईट, जिसमें विचारों का आदान-प्रदान होता रहता है. यदि किसी ने भी अश्लील सामान परोसा या इसी आशय का कोई विचार रखा तो पढ़ने वालो को पूरा अधिकार रहता है कि वह तुरंत अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करा कर सभी को अवगत करा सकता है. वो फिर चाहे अच्छी हो या बुरी. स्पष्ट है कि आपको उसकी जवाबदेही स्वीकार करनी होती है.
इंसान जितनी तेजी से हर मुकाम को हासिल करने की जद्दोजहद में आज अपने उसूलो को हर रोज दरकिनार कर रहा है ये कहीं न कहीं उसको ऐसे गर्त की तरफ ले जा रहा है की अभी तो इसके परिणाम से ये अनभिज्ञ हैं.
दो-तीन दिन से एक सोशल साइट पर, हमारे मित्रों को एक गंभीर मुद्दे के लिए धमकियां मिल रही हैं. जी हाँ मैं बात कर रही हूँ, पोर्न पत्रकारिता के जनकों की. आज एक मित्र की पोस्ट पढ़ी. … उसमे ऑनलाइन न्यूज़ साईट भास्कर डॉट कॉम की एक खबर को लेकर बात प्रतिक्रिया दी गयी थी. इस खबर की प्रतिक्रिया व्यक्त किये जाने पर पर फेस बुक के मित्रों को वहां काम करने वाले ने फ़ोन करके धमकी पर धमकी दिए जा रहे हैं. कारण उनकी न्यूज़ पेश करने का तरीका अश्लील से ओतप्रोत था. पोर्न पत्रकारिता को बढावा देने के बहाने अपनी न्यूज़ साईट की हिट्स बढ़ाने के हथकंडे के बारे में इस हरकत के बारे में किसी ने कुछ भी पोस्ट नहीं किया, क्योंकि किसी पत्रकार मित्र की हिम्मत ही नहीं हुयी ,उल्टा जिन मित्रों ने इनकी न्यूज़पर गरियाया उनकी एक भी पोस्टर को शेयर करने की हिम्मीत भी आज तक किसी की नहीं हुई.सबसे तेज दौड़ने वाले मीडिया के खिलाफ ऐसे बोलने के लिए जिगरा चाहिए, जो आजकल आप सब या मेरे जैसों के पास शायद नहीं है ,क्योंकि ये बड़े लोग हैं,इनको कोई फर्क नहीं पड़ता .यह हमलोग मान कर चलते हैं . जिगरा आजकल पत्रकारों के पास भी नहीं है.उनका खून सफेद हो गया है ,अब पत्रकारों पर से यकीन उठ गया.सब दलाल ही हैं.कोई सामने है तो कोई परदे के पीछे. ये कहना जितना आसान है ,उतना ही सोचने वाली बात ,ये है की जो इंसान धमकी दे रहा है ,कभी उसकी मानसिक स्थिति की तो सोचो,उसको भी ऊपर से आर्डर होंगे कि जो बोल रहे हैं उनको पहले धमकी दो .फिर बाद में हरे नोटों के दर्शन करा के अपनी तरफ कर लो ,छोटे लोग हैं- कब तक चिल्लायेंगे ,और इसमें गलत भी नहीं है ,जो बेचारा धमकी दे रहा है ,उसकी भी कमाई होगी ,मेरे जिन मित्रों को ,भास्कर कॉम .की तरफ से धमकी मिली है ,मुझे उनपर गर्व है ,इसलिए नहीं कि वो मेरे मित्र हैं,बल्कि इसलिए कि इन जैसे लोग ,आज के बाद आपसे डरेंगे ,आपने अपने आप को साबित कर दिया है ,ये वो लोग हैं जो शायद ,इन बनियों की दूकान को सजाने के लिए दिन भर ,नौकरी करते है ,और जो समय मिलता है ,उस समय में इनसे फ्रीफंड में ऑनलाइन न्यूज़ का काम. पत्रकारों की गलती नहीं है ,इन्होनें अपनी ऐसे हालत प्रबंधन के सामने खुद ही बनायीं है ,आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए ,इस बात को लेकर की ये पोर्न पत्रकारिता इस तरह कर रहे हैं ,सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता कि इनके ऑफिस का माहौल किस तरह का होगा . सिर्फ नाम बड़े है ,दर्शन खोटे हैं ,खुद लोग सब अन्दर से बिके हुए हैं ,ये अखबार नहीं चला रहे ,इनके मालिकों के ऊपर भी नेताओ का हाथ है.,ये सब बातें नयी नहीं है,पुरानी है.अखबार की आड़ में कितने धंधे चल रहे है ,पता लगाने जाओ ,तब पता चलेगा .असल बात यह है कि इस तरह की कई झंझटो से हर कोई गुजर रहा है.किसी पत्रकार के घर जाके देखोगे ,तब पता चलेगा, वो जब सड़क पर कैमरा लिए होता है ,तो शेर नजर आता है .उसका रुतबा ,उसका गुरूर ,उसका काम जिसके लिए उसको आखिर तक एक झूठा चोला चढ़ाये रखना पड़ता है.उसने अपनी खबर बनायीं.अगर दिन भर में मिल गयी तो ,वरना ऑफिस में आके गूगल बाबा की जय ,और काम किया निकले ,और जब बहुत दिन तक एक-सा भोजन मिले और कभी कोई ख़ास खबर मिल जाये तब वो अचानक जोश से भर जाता है ,और अच्छा करने के चक्कर में एक ऐसे गलती कर जाता है,जिसका खामियाजा सारी जमात को भुगतना पड़ता है.इसमें वो सब आ जाते हैं ,जो पत्रकार हैं या कभी थे ,या जिन्होंने उस अखबार को रामराम कह दिया है वो सब ,हम सब सिर्फ आपस में दोषारोपण करते हैं कि तुम ऐसे हम ऐसे .लेकिन हकीक़त क्या है असल में हम सब जानते हैं , फिर वो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पत्रकार हो या कोई और.लेकिन अगर पत्रकारों को चौथा स्तम्भ कहा गया है ,तो हमारी भी कहीं न कही जिम्मेदारी बनती है कि जो खबर हमने बनायीं है उसके प्रति हम कितने ईमानदार हैं ,
मेरे जो मित्र इस तरह की पोर्न पत्रकारिता को बढावा दे रहे हैं-क्या कभी सोचा है कि आपके घर में बच्चे हैं ,वो भी उस न्यूज़ को देखेंगे व पढेंगे .अगर तो आपमें इतनी हिम्मत है कि आप उनसे सेक्स पर खुली चर्चा कर सकते हो ,तो आपकी न्यूज़ की हैडलाइन सही है ,आप जो कर रहे हैं ,वही करें,उस दोयम दर्जे की कमाई को खा पी के जो चाहे वो करें ,लेकिन यदि आप के पास पोर्न सब्जेक्ट पर या सेक्स पर बात करने की हिम्मत अपने घर में नहीं है तो आपको कोई हक नहीं बनता कि आप नई नसल को इस तरह से गर्त के रास्ते धकेलें . अपने ही मित्रों को धमकी दे के भी आप लोग कोई महान काम नहीं कर रहे.आप लोगों की उन्नति कभी नहीं हो सकती क्योंकि आप लोगों को आपस में ही एक दूसरों की टाँगे खीचने से फुरसत नहीं मिल रही. कभी खुद के मतलब के लिए ,कभी मालिकों की चापलूसी के लिए ,और वो जनाब लोग जो खुद को बड़ा एडिटर समझते हैं ,उनको अगर एडिटर का काम नहीं मालूम तो ऐसे एडिटर होने से अच्छा है की आप अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दें .आप लोगों को एक रूम में बैठ के खैनी खाने के लिए नोट नहीं मिलते ,इस तरह की बातों के लिए आपकी भी ज़िम्मेदारी है ,जैसा आप लोग कर रहे हैं वही नयी पीढ़ी कर रही है .दूसरों की खबर बनाने से पहले अपने अन्दर भी देखें . मेरी इन बातों से लोगो को मिर्ची लगेगी . हो सकता है कई मेरे दुश्मन बन जाये .कुछ लोग मुझे भी बहुत गन्दा कहेंगे ,मुझे कोई फरक नहीं पड़ने वाला . क्योंकि मैं भी आपकी ही ज़मात से निकल के आई हूं ,लेकिन जब इस तरह की बातें सुनती हूँ या पढ़ती हूँ ,तब बहुत शर्म महसूस होती है और कहीं न कहीं एक गर्व भी , कि अच्छा हुआ ,सही समय में उस कीचड़ से निकल आई.पर आज जब आपस में अपने ही मित्रो को इस तरह धमकी देते ,और न जाने कितनी बातों ,कितनों के मुंह से सुना ,तो अपने को रोक नहीं पायी और सोचा अपने अन्दर को, अपने शब्दों में, अपनों से व्यक्त कर दूं,



स्नेहा चौहान
स्नेहा चौहान जबलपुर में सक्रिय फ्रीलांस पत्रकार हैं 
पूर्व में समाचारपत्र दैनिक भास्कर में कार्यरत 
सामाजिक ज्वलंत मुद्दों और स्त्री विमर्श पर सतत लेखन 
शिक्षा: माता गुज़री कॉलेज जबलपुर
1.सोलह बरस की बाली उमर को सलाम
2.हर औरत रेप की हकदार है?
3.प्यार से नहीं...बाबू.. इन सड़कों से डर लगता है
4.पुलिस आला कमान के नाम एक खुला खत
5.इंटरनेट मीडिया का विकृत रुप पोर्न पत्रकारिता

Friday, August 2, 2013

मेरे मुस्कुराने की आदत भी कितनी महंगी पड़ी मुझे ,
भुला दिया सबने मुझे ये कहके की,                                                                                                                     तुम तो 
अकेले भी खुश रह सकते हो ………

कुछ लोग मतलब के लिए खोजते है मुझे ,
बिन मतलब जो आयें तो क्या बात है ,
कतल कर के तो सब ले जायेंगे दिल मेरा ,
कोई चाहत से ले जाये तो क्या बात है …।

लोग डूबते हैं तो समंदर को दोष देते हैं,
मंजिल ना मिले तो किस्‍मत को दोष देते हैं,
खुद तो संभलकर चलते नहीं,
जब लगती है ठोकर तो पत्‍थर को दोष देते हैं।

कही बारिश बरस जाये ,कही दरिया तरस जाये ,
कही आके घटा ठहरे, तुम्हारे और मेरे दरमियाँ आकर खुदा ठहरे ....|
चाँद के साथ कई दर्द पुराने निकले ,
कितने ग़म थे जो तेरे ग़म के बहाने निकले,
दिल ने एक ईंट से तामीर किया था हसीन ताजमहल ,
तूने एक बात कही लाख फ़साने निकले ……।

जाने क्या सोच कर हम तुमसे वफ़ा करते है , 
क़र्ज़ है कोई पिछले जन्म का जो अदा करते है