Wednesday, July 25, 2012

mera alhad bachpan


सर्दी की गुनगुनी धुप में ,
धीरे धीरे सिकता मेरा मन ,
कुछ इस तरह गर्माता है ,
जैसे ४० के बाद १६ की याद ,
तेरे पहलू मै आके गुनगुनी धुप का ,
वो अहसास सिमटता है कुछ ऐसे ,
जैसे उन   की बुनावट  मै ठण्ड ,
ये गर्माहट  भी सजी सावरी है ,
कुछ याद दिलाती बचपन की,
चाहे दादा की गोदी हो.
या पापा का प्यार,
माँ की डाट रुला देते थी 
दादी के बाहों की गर्मी मुझको चुप करा देते थी,
उम्र दर उम्र की गुनगुनाती धुप .,
न जाने कब ,कैसे , आज इस मोड़ पे ले आयी ,
जहा एक बार फिर मन चाहता है ,
सिमटना ,गुदगुदाना ,चुलबुलाना ,उस गोद की गर्मी मै ,
वो प्यार भरा मेरा अल्हड बचपन ,ढूंढ रहा है , 
मेरी वो पुरानी ठण्ड की गुनगुनाती धुप और उसकी गर्माहट ..........?

3 comments:

  1. सर्दी की गुनगुनी धुप में ,
    धीरे धीरे सिकता मेरा मन ,
    कुछ इस तरह गर्माता है ,
    जैसे ४० के बाद १६ की याद
    बहुत खूब..वो गीत आया
    कोई मुझको लौटा दे बचपन का सावन,वो कागज की कश्ती ...

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  2. पहलू में आकर गर्माहट का अहसास मां-पापा की गोद की याद कैसे दिला सकती है? मेरे विचार से दोनों अहसास शायद अलग होते हैं। एक प्‍यार की ऊष्‍मा और दूसरा रिश्‍तों की गर्मी देता है। हां, ठंड की गुनगुनी धूप जरूर मां की गोद का अहसास दिला सकती है, क्‍योंकि प्रकृति भी तो आखिर मां ही है। शायद तुम मुझे ठीक से समझा सको स्‍नेहा।

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