कभी कभी हम ये नहीं समझ पाते की क्या अच्छा है और क्या गलत ,क्युकी हमारे पास सब्र नाम की कोई चीज़ नहीं है ,हो भी कैसे हर चीज़ को पाने की जल्दी ,के चलते उस बात से होने वाले नुक्सान को हम भुला बैठते है ,लेकिन अगर थोडा सा सब्र रख के किया गया काम बहुत ही इन्मेनान के साथ संपन होता है ,इसकी अनुभूति उस समय हुई जब मेरे किये गए काम का मुझे कोई पारितोषक नहीं मिला जबकि में उसकी हकदार थी,मुझे बहुत दुख हुआ।तब मुझे मेरे गुरु नै कहा शायद आज का दिन तुम्हारे लिए नहीं था .तुमने बहुत उत्सुकता पूर्वक काम किया ,बिना ये सोचे की इसका अंजाम क्या होगा ,जबकि कोई भी काम बिना उसके परिणाम को सोचे नहीं किया जाना चाहिए ,बस फिर क्या था ,मेरा पारा चड़ा हुआ था दिमाग गरम ,लेकिन जैसे ही ये बाते कानो में गूंजी ,मन शांत हुआ ,और हम जुट गए फिर से नए सिरे से काम में ,वो दिन है और आज का दिन जब कभी भी ऐसे परिस्थिति आती है,मुझे वो गुरु की बात याद आती है और में रस बस के पुरे तन मन के साथ लग जाती हु उस काम को पूरा करने में ।और अब मेरे सारे काम बहुत ही अच्छे से पुरे होते है ।
जय हो गुरुदेव की। हमें भी उनसे दीक्षा दिला दीजिए।
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