ज्ञान जी का नाम बहुत सुना था , उनका गुस्सा, उनका हड़काना, उनका ये उनका वो, लेकिन सच कहूँ तो उनको आज तक पढ़ा कभी नहीं, पहल का नाम सुना था, कभी ऐसी कोशिश नहीं की ,पहल को पढूं। मुझे कहानीयों का कविताओ का कभी शौक नहीं रहा ,जब तक फील्ड में थी। सिर्फ हक़ीक़त को बयान करना ही आया। उसमे कभी कमी नहीं की और अगर कोई ने कह दिया की ये तुम्हारे बस का नहीं तो फिर ज़मीन आसमान एक कर देना ये फितूर रहा है। शायद यही फितूर था जिसकी बदौलत मुझे ज्ञान जी से मिलने का मौका मिला, नौकरी से इस्तीफे के बाद जब ऑनलाइन खबरों की दुनिया में आई तब साहित्य जगत का कोई ज्ञान नहीं था, लेकिन कुछ अलग करने की चाहत में सोचा जबलपुर के सभी जाने माने लोगो का इंटरव्यू करना है, लिस्ट में ज्ञान जी का नाम भी था, लेकिन कोई कांटेक्ट नहीं, पत्रकारिता में मेरे गुरु से मैंने कहा मुझे ज्ञान जी को इंटरव्यू करना है, "पागल हो गयी हो क्या " सोचना भी नहीं, क्या जानती हो उनके बारे में, कभी पढ़ा है उनको, आज तक हम लोग कभी इंटरव्यू नहीं लिए तुम कल की उनका इंटरव्यू करोगी ? साहित्य, कहानी कभी पढ़ी है। अच्छे अच्छो की सवाल की हिम्मत नहीं उनके सामने।
फिर क्या था उस समय जो मुद्दा चल रहा था, उस पे सवाल तैयार किये और परेश तिवारी के साथ उनके घर सुबह सुबह मोबाइल लेके पहुंच गयी। ज्ञान जी ने इतनी आत्मीयता के साथ मेरे से बात की, लगा ही नहीं की इस इंसान के बारे में लोगो ने क्या क्या फैलाया हुआ था ? उन्होंने मेरा परिचय लिया अपना मोबाइल नंबर दिया और उस इंटरव्यू की कॉपी मुझे देने का आदेश भी। उसके बाद मैं उनसे जब भी मिलती दुआ सलाम होने लगी, लेकिन अब तक भी मैंने उनको नहीं पढ़ा था। आज जब पहल को ४० साल हुए, १००वां अंक आने को है तब फिर फितूर चढ़ा की मुझे उनके लिए लिखना है क्योंकि अब तक कहानियाँ कई पढ़ चुकी हूँ, कविता समझ आने लगी है, साहित्य में रूचि बढ़ रही है, तो दोबारा ज्ञान जी के व्यक्तित्व ने मुझे आकर्षित किया।
एक बात जो अब भी ख़ास थी मैंने अब तक ज्ञान जी का लिखा नहीं पढ़ा था , इस बार न जाने कितनो से बात की। कुछ लोगो ने साफ़ मना कर दिया, माफ़ी मांगते हुए की हम उनके बारे में नहीं लिखेंगे, कुछ उनको जानते नहीं। कुछ ने कहा कभी पढ़ा नहीं ?आश्चार्य ये हुआ की ये सब लोग साहित्य के लोग थे, जिन्होंने मुझे अजीबो गरीब परिस्थिति में डाल दिया था। एक बार लगा, जब ये दिग्गज कुछ नहीं बोल रहे, पढ़ा नहीं, कह रहे तो मैं कैसे उनके बारे में लिखूंगी।
फिर क्या था उस समय जो मुद्दा चल रहा था, उस पे सवाल तैयार किये और परेश तिवारी के साथ उनके घर सुबह सुबह मोबाइल लेके पहुंच गयी। ज्ञान जी ने इतनी आत्मीयता के साथ मेरे से बात की, लगा ही नहीं की इस इंसान के बारे में लोगो ने क्या क्या फैलाया हुआ था ? उन्होंने मेरा परिचय लिया अपना मोबाइल नंबर दिया और उस इंटरव्यू की कॉपी मुझे देने का आदेश भी। उसके बाद मैं उनसे जब भी मिलती दुआ सलाम होने लगी, लेकिन अब तक भी मैंने उनको नहीं पढ़ा था। आज जब पहल को ४० साल हुए, १००वां अंक आने को है तब फिर फितूर चढ़ा की मुझे उनके लिए लिखना है क्योंकि अब तक कहानियाँ कई पढ़ चुकी हूँ, कविता समझ आने लगी है, साहित्य में रूचि बढ़ रही है, तो दोबारा ज्ञान जी के व्यक्तित्व ने मुझे आकर्षित किया।
एक बात जो अब भी ख़ास थी मैंने अब तक ज्ञान जी का लिखा नहीं पढ़ा था , इस बार न जाने कितनो से बात की। कुछ लोगो ने साफ़ मना कर दिया, माफ़ी मांगते हुए की हम उनके बारे में नहीं लिखेंगे, कुछ उनको जानते नहीं। कुछ ने कहा कभी पढ़ा नहीं ?आश्चार्य ये हुआ की ये सब लोग साहित्य के लोग थे, जिन्होंने मुझे अजीबो गरीब परिस्थिति में डाल दिया था। एक बार लगा, जब ये दिग्गज कुछ नहीं बोल रहे, पढ़ा नहीं, कह रहे तो मैं कैसे उनके बारे में लिखूंगी।
फिर क्या था ज्ञान जी की कहानियाँ ऑनलाइन खोजी और एक रात में २ कहानियाँ दो दिन में उनकी प्रतिनिधि कहानियाँ पढ़ डाली। अब समझ आया की वो आखिर है क्या ? एक ऐसे कहानीकार जो अपने पढ़ने वाले को इस तरह अपने शब्दों की भूलभुलैय्या में घुसने को मजबूर कर देता है, जिसमे जो एक बार फँस गया वो या तो खुद को वहीँ का मान लेता है या वहां से बहार आने के बाद दोबारा बार बार उसमे पनाह लेना चाहता है। जो हाल मेरा हुआ। उनकी सिंपल सी योजना बध तरीके से गढ़ी गयी कहानी गजब जादू ढा देती है पाठक के मन मस्तिस्क पे।
ये कला आज तक कोई कहानीकार नहीं सीख पाया होगा न ही कोई कर पायेगा। उनको उनकी कहानियों ने मेरे करीब ला दिया। सामाजिक संसार के अनुभव को अपनी फंतासी से पाठक को बांधे रखने की कला का जादूगर।ये कहना अतिस्योक्ति नहीं होगी। उनकी कहानियो में वो घटनाये ,और बाते है जो आज वर्तमान में घटित हो रही है।
अब मुझे समझ आया है की क्यों लोगो ने मना किया उनके बारे में कुछ कहने से। साहित्य जगत में राजनीति आज अपने चरम पर है। कोई किसी को आगे नहीं आने देना चाहता। ऐसे में 70 के दशक में ज्ञान जी ने सभी नए लोगो को 'पहल' में छापने का काम कर, उस मनु विचारधारा को तोड़ा था। आज भी वो युवाओ को जिस तरह से प्रोत्साहित करते है, वो काबिले तारीफ़ है। आज के साहित्य में वो झटके या जलवा वाली बात ही नहीं। कोई भी कहानी याद नहीं रह पाती। जबकि ज्ञानजी के कहानी के पात्र आज भी याद है। ज्ञान जी में आज भी एक छटपटाहट है किस की कहानी और कविता में क्या नया है, ये स्वभाव उनको सबसे अलग रखता है।
ये तो हुयी मेरी बात जो मैंने समझी जानी पहल और ज्ञानजी के बारे में। लेकिन कई ऐसे भी मिले जो ज्ञान जी को नहीं जानते या उनके बारे में ज्यादा नही जानते,या सिर्फ सुना है ,या तो पढ़ा है लेकिन कुछ कहना नहीं चाहते ,कईयों को पहल की जानकारी ही नहीं ,कईयों ने पहल को पढ़ा ही नही।
पहल एक मात्र ऐसी पत्रिका रही है जो देश के विभिन्न प्रदेशो की जेल तक में पहुंची है कई कैदियों ने इसे पढ़ा , इसमें छपने का सपना हर लिखने वाले को होता है, ये कहना है जबलपुर के युवा रंगकर्मी आशीष पाठक का, जो ज्ञान जी को ज्यादा नहीं जानते सिर्फ इतना की उनके लिखित नाटक रेड फ्रॉक को देखने के बाद ज्ञान जी ने कहा था, आशीष तुमने रंगमंच की दिशा बदल दी।
ज्ञानपीठ पुरूस्कार से सम्मानित कवित्री बाबुषा के लिए ज्ञानरंजन उस बरगद की तरह मालूम पड़ते हैं जिसके तले बैठ कर छाँव भी मिलती है और मिट्टी का खुरदुरापन भी महसूस होता रहता है। उनकी आँखों की चमक क़ाबिले-ग़ौर है। ये सच्चाई की चमक है।
चित्रकार विनय अम्बर के अनुसार पहल इस महा देश की वैज्ञानिक पत्रिका है यानी वैज्ञानिक तरीके से जीवन जीने के लिए प्रेरित करने वाली साहित्यिक पत्रिका है। वैचारिक प्रतिबद्धता को समर्पित, यह सब ज्ञान जी के विचार और विज्ञानं के साथ साहित्य के संलगनता का परिचायक है। पिछले ४० सालो में किसी साहित्यकार ने एक संपादक के रूप में इतना काम नहीं किया। खोज खोजकर कहानीकार, कवियों को अवसर दिए। पहल ने विश्व को अनेक भारतीय साहित्यकार दिए। उनको सलाम है।
अरुण पाण्डेय वरिष्ठ नाट्य कर्मी होने के साथ कहानीकार भी है। हाल ही में पहल के ९९वे अंक में अरुण जी की कहानी छपी, उन्होंने बताया की ज्ञान जी की चुनौती को पार किया उस हौसले के दम पे जिसके लिए ज्ञान जी ने कहा था की हौसला हो तो आगे आओ वरना मैं रास्ता बदल रहा हूँ। अपने मन को मारते हुए आज तक किसी प्रसिद्धि के चरम पर पहुंचे इंसान को नहीं देखा, उनकी ये अदा अजीब रही। यथार्त और आगत यथार्त को सूंघ कर उस पर रणनीति बना कर लोगो को बताना हिंदी के रचनाकारो की आदत नहीं रही है। बदले ग्रामीण परिवेश, पूंजीवाद का विकास, नव उदारवाद बाजार का चरित्र माफिया , आंदोलन, आरक्षण और भी कितने मुद्दो का पूरा सच समय से पहले पहल ने ही बताया। ज्ञान जी शहर की हाय तौबा आपसी पीठ थपथपाउ संस्कृति के कभी हिस्सा नहीं रहे। जो अच्छा लगा, उसका साथ दिया जो बुरा लगा उसे बगैर देर किये छोड़ दिया। उनको देख के जीवन और संघर्ष के मायने न केवल समझ में आते है बल्कि उन रास्तो में बेधड़क चलने का मन बनता है। हौसला अफजाई और निराशा के गर्त से उबारने की कला को जताने वाला शहर का एक मात्र महाविद्यालय वे स्वयं है। पहल अब पत्रिका नहीं रही वो अब परिवार हो गयी है बस ये परिवार यूँही बढ़ता रहे।
वही उनके हमप्याला दोस्त साहित्यकार राजेंद्र दानी जी पहल और ज्ञान जी को अलग नहीं मानते, उनके हिसाब से पहल ने २५ साल पहले जो संघर्ष किया, इस मुकाम में लाने के लिए, उसके वो गवाह हैं। उनमे जो रचना शीलता है, जिसकी बदौलत वो हर रचना में से उसका बेस्ट निकालने का काम करवाती है।
लेखक अमृतलाल वेगड़ के शब्दों में जो स्थान जनसत्ता का अखबारों में है वही स्थान पहल का साहित्य में है। ज्ञान रंजन को पहल से अलग नहीं किया जा सकता। अपने लेखक पद से पहल के संपादक के लिए दिया गया बलिदान वेगड़ जी बड़े गर्व से बताते है, उनके हिसाब से पहल को ज्ञान जी के इस बलिदान की जरुरत थी।
कवि व लेखक राजेश्वर वशिष्ठ ने ज्ञान जी को कुछ इस तरह अपने शब्दों में बयान किया पहल आज हिन्दी कहानी का पर्याय है। इस पत्रिका का प्रकाशन साठोत्तरी कहानी के अग्रणी कहानीकार श्री ज्ञानरंजन ने 1973 में बहुत सीमित साधनों के साथ किया था। भले ही ज्ञान रंजन जी के साधन बेशक बहुत सीमित थे, पर उनकी दृष्टि बहुत व्यापक थी। एक समय आया जब यह पत्रिका साहित्य के क्षेत्र में क्रांति का बिगुल बन गई। इस पत्रिका में कहानी का प्रकाशन ही किसी को कहानीकार के रूप में स्थापित करता था।
पहल ने कहानियों का चयन कभी भी सम्पर्क और सौजन्य के आधार पर नहीं किया। पहल की कहानियों मे सामाजिकता का निरूपण, पीड़ित, दबे-कुचले की व्यथा सहित सदैव यथार्थपरक ही रहा। विचार धारा के स्तर पर यह पत्रिका सदा जनवादी मूल्यों की पोषक रही। इस पत्रिका में नए चलन के नाम पर कभी भी यौन स्वच्छन्दता को नहीं परोसा गया जबकि इसकी प्रतिस्पर्धी पत्रिकाओं ने ऐसा खुल कर किया। ज्ञानरंजन आज हिन्दी कहानी के सम्माननीय प्रतीक हैं और यह जान कर अच्छा लग रहा है कि पहल का सौवाँ अंक शीग्र ही आने वाला है। हार्दिक शुभकामनाएं।
पत्रकार ,संपादक राजीव मित्तल के शब्दों में ज्ञान जी से अपनापा बहुत रहा लेकिन जान-पहचान शून्य …… अड़तालीस साल पहले खुर्जा में चाचा प्रभात मित्तल की शादी में ज्ञान जी सुभाष परिहार के साथ आये थे … तो जनवासे में खुसुर-पुसुर होने लगी....कौन आये हैं ये देखने हम भी उस छोटी सी भीड़ में शामिल हो गए … काली दाढ़ी और बड़े बाल वाले ज्ञान जी काफी हंसमुख लगे …… बस, अगले कई साल इस परिचित नाम के गुजर गए … पहल ने ज्ञान जी को कभी भूलने ही नहीं दिया … जबकि पढ़े या देखे दो-चार अंक ही होंगे....
फिर 1995 में ज्ञान जी और परिहार जी से मेरठ में मुलाकात …दोनों अपने स्वर्गीय मित्र की शादी में आये थे … अगली सुबह दिल्ली तक का साथ और समय एक छोटी सी नमस्ते.... अगली दो मुलाकातें जैसे आपस में टकराना जाना …
फिर तो दस साल गुजर गए....अब अपना मक़ाम था मुजफ्फरपुर .... अखबार जम कर लेखन हो रहा था … तभी रश्मि रेखा ने राग छेड़ा कि आप पहल नहीं लिखते …… उसी दिन छपा कुछ भी ज्ञान जी को भेज दिया …साथ में उन मुलाकातों का जिक्र भी … कुछ ही दिन में ज्ञान का जवाब … पिछला कुछ याद नहीं....प्रभात की याद है....तुम्हारा लेखन काफी अलग हट कर है.... पहल के लिए शहरनामा लिख कर भेजो … भेज दिया और पहल में छप भी गया....फिर क्या … मैं विषय बताता और वो पहल में छापने का ऐलान …सुयोग से जबलपुर ने अपने पास बुला लिया …वहां पहुँचते ही ज्ञान जी खोजा … पता चला अपनी बेटी के पास यूएस गए हुए हैं … मायूस हो गया … एक दिन किन्ही पंकज स्वामी का फ़ोन आया की ज्ञान जी आपको तलाश रहे हैं आप उन्हें फ़ोन कर लीजिये …फ़ोन पर उन्होंने बेहद खुशी जताई और घर आने को कहा … तुरंत किसी को पकड़ उनके घर गया....खूब सारी बातें हुईं .... अगली बार घर गया तो अपना एक लेख भी ले गया ....देख कर बोले कि पिछली बार लेकर क्यों नहीं आये इस अंक में छाप जाता....कुछ दिन बाद उनका फ़ोन आया ये लेख तो भयंकर है दंगा हो जाएगा....… ज्ञान जी से मुलाक़ात होती रही .... अचानक जबलपुर छूट गया … तीन साल बाद जबलपुर जाने और ज्ञान जी का सिलसिला शुरू हो गया … पर यही कहूँगा कि अपनापा तो बहुत है पर जान-पहचान बहुत कम.
युवा चित्रकार ,पत्रकार सुप्रिया अम्बर के अनुसार ज्ञान जी से जब भी मिलना होता है किसी ना किसी महत्वपूर्ण विषय पर बहस छिड़ जाती है ,चर्चा परिचर्चा आलोचना सभी कुछ ,और जब हम विसर्जित होते है तो हर बार एक नई तरह की ऊर्जा सभी में प्रसारित हो चुकी होती है। ज्ञानजी और पहल हर पृष्ट पर नया उल्लेख हर मुलाकात में नई ऊर्जा।
इन लोगो से बात करते हुए मुझे लगा की कुछ कमी है, ठीक वैसे है जैसे दारु की बोतल सामने है, गिलास में डाल लिया, एक घूंट पीने के बाद भी दिमाग को शान्ति नहीं होती। तब तक जब तक उसका हल्का हल्का सुरूर न चढ़ने लगे।
साहित्यकार विमल कुमार के अनुसार पहल ने पिछले चालीस सालों में हिन्दी साहित्य और हिन्दी पट्टी के वैचारिक जगत में बौधिक खुराक तो दी है बल्कि जरूरी सवालों में हस्तक्षेप भी किया है और खलबली भी मचाई है .पहल के बंद होने पर भास्कर में मैंने एक पेज लिखा भी था जिसमे उसके योगदान की सविस्तार चर्चा भी की थी. पहल के टक्कर में आज कोई पत्रिका नहीं है उसकी तुलना केवल तद्भव से हो सकती है पर पहल में जो धार और तीखापन है वो अखिलेश की पत्रिका में नहीं है .पहल का इंतज़ार सभी करते हैं .पहल और ज्ञानरंजन एक दूसरे के पर्याय बन गए हैं.जबल पुर पहले परसाई जी के कारण जाना जाता था अब वह ज्ञानरंजन के कारण भी जाना जाता है .ये बड़ी बात है कि एक पत्रिका से एक शहर की पहचान बन जाये .लेकिन ये भी सच है कि ज्ञान जी साहित्य के सात्ता केंद्र के धुरी भी बने .उनके प्रशंसकों का एक क्लब भी है .लेकिन ये क्लब राजेंद्र यादव नामवर सिंह और अशोक वाजपेयी के क्लब से अलग है .इस क्लब के सदस्यों से ज्ञान जी घिर भी गए हैं और कई कमजोर रचनाएँ भी छपी हैं लेकिन इसके बाद भी पहल ने सरस्वती हंस मतवाला और प्रताप जैसी भूमिका निभायी है.
मुझे अब भी इतना सब सुनके पहल और ज्ञान जी के बारे में संतुष्टि नहीं हो पा रही थी। कुछ अधूरा सा, बेमानी सा लग रहा था, तभी एक दूसरे फितूर ने दस्तक दी की इनको पढ़ना है दोबारा । एक दिन में ज्ञान जी की ३ प्रमुख कहानियाँ दोबारा पढ़ डाली। छलांग,घंटा , पिता । वैसे सच कहु तो दोबारा पढ़ने के बाद अब जो नशा चढ़ा उसका आलम आज तक बरकरार है। इन कहानियों में मैं खुद को मुख्य चरित्र समझ रही थी। उस गजब की फंतासी और अनेक विरूपताओ का खुलासा, पारिवारिक परिवेश की विकृतिया चाहे स्त्री के सन्दर्भ में हो या पुरुष के या उन संस्कारो के रूप में उनका प्रस्तुतीकरण, फिर उसमे प्रेम, किशोरावस्था के मनोभाव, प्रौढ़ परिणीति के चित्र आँखों के सामने एक चल चित्र की माफिक गुज़र गए और कहानी खत्म होने के बाद भी पाठक याने मैं, मुझे खुद को सामान्य करने में समय लगा। अब उस अविस्मरणीय पल की मैं गवाह बन चुकी थी।
ज्ञान जी और मेरे में एक समानता है ,आलसी पन , जैसा की उन्होंने कही लिखा है ,मुझे लिखने में आलस आता है ,खासकर जब आँखे गढ़ाके कम्प्यूटर पे हिंदी लिखनी हो ,लेकिन इस खुमार के आलम में जो लिखने का काम शुरू हुआ ,परत दर परत प्याज की माफिक ज्ञान जी का व्यक्तित्व से में अनजान नहीं रही। मै दावे के साथ कह सकती हूँ की आज के साहित्य कारो ,कहानीकारों ने अगर उन २५ कहानियो को नहीं पढ़ा तो वो साहित्य जगत में उस ईरानी के जैसे है जो कहने को शिक्षा मंत्री है लेकिन डिग्री फ़र्ज़ी लिए हुए।
बाकी अब ये बात भी समझ आई की लोग उनसे आतंकित और चुप्पी क्यों बनाये रहते है ,कोई कुछ कहना ही नहीं चाहता। जानते सब है लेकिन कोई जानता भी नहीं ,मुझे वो कभी गुस्से वाले नहीं लगे, जैसा की लोगो ने बताया था ,आज उनके बारे में अपने शब्दों में लिखने की जुर्रत की है ,बाकी इस उम्मीद के साथ की साहित्य में कदम रख ही दिया है तो अब गुरु से क्या डरना। वैसे यहाँ एक बात कहना चाहूंगी ज्ञानजी ने मेरे पापा को कॉलेज में पढ़ाया था ,और अब वो मेरे भी गुरु है।
कहने को ,ज्ञान जी और पहल के लिए अब इतना सारा है ,की समझ नहीं आ रहा क्या लिखू ? सिर्फ इतना ही कहूँगी पहल ने उस आपातकाल में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी ,ठीक उसी तरह आज जब आपातकाल जैसे हालात दोबारा बनने की बात होती है तब एक उम्मीद इस पहल से भी की ये कल की याद को आज के बीच एक नए रंग ,रूप ,के साथ लाने में कामयाब हुयी है।








