Monday, August 25, 2014

ओह रे बंधू..

ओह रे बंधू........................
तुमसे प्यार करना न तो मेरी मज़बूरी है ,
न ही मेरे ख्वाईश ,ये मेरी किस्मत है। 
ये प्यार कमबख्त अहसास ही कुछ ऐसा है ,
जो न चाहते हुए जकड़ता है पकड़ता है। 
इसे रोकना चाहा ,चाहकर भी नहीं रोका ,
इसमें डूबने का आनंद मुझे रास आया। 
ये रास अब आनंद बन गया है ,
ये जानते हुए की तू सिर्फ मेरा नहीं। 
तुझे चाहना मेरे फितरत बन चुकी है ,
दिन हो या रात ,या कोई और पल ,
दिमाग की कोशिकाओ में तेरे होने का ,
नशा कुछ ऐसे रेंगता है ,जैसे मेरे जिस्म में रक्तवाहिनियां। 
प्रयास जारी है ,इसे रोकू इसे थामु ,
पर ये थमता ही नहीं ,उम्र के साथ बढ़ते यौवन ,
यौवन की उन जटिलताओं को ढोते हुए ,
आज आखिर दिमाग ने कह दिया ,अब बस। 
सिर्फ और सिर्फ तुम्हे अताह प्यार करना , 
मेरी ज़िन्दगी है!!!!!!!!

Saturday, August 23, 2014

शादी प्यार या समझोता ? भाग १

ज़िन्दगी के १८ साल एक ऐसे इंसान के साथ रहके गुज़ारे जिसको नैना ने बहुत प्याररिश्ता  तोड़ लिया। नैना अपनी एक शौक  को पूरा करने के खातिर उस समय आशीष के साथ भागी, जब उसके घर वाले उसको भोपाल ले जा रहे थे ,किसी करीबी मित्र के बेटे से पापा ने नैना की शादी की बात चलायी थी ,बात पक्की हो गयी थी , नैना बेखबर थी ,जब उसको पता चला तो उसने आशीष को कहा की शादी करोगे मुझसे ?आशीष इससे पहले उसको अपना निवेदन कर चूका था ,तब नैना ने भाव नहीं दिया था। आज जब शादी की बात निकली ,नैना से रहा नहीं गया , आशीष को बुलाया ,शाम को भोपाल में सगाई की तैयारी में परिवार बिजी था ,नैना पार्लर जाने के नाम से निकली ,और आशीष के साथ बहुत दूर निकल गयी। 
आशीष आज जब घर आया तब उसने नैना की सहेलियों से बात नहीं की ,जो की उसके घर उससे मिलने १८ साल बाद आई थी ,सहेलियों को ड्राइंग रूम में छोड़ नैना किचन में गयी ,आशीष को खाना दिया ,इस दौरान दोनों ने शायद ही कोई बात की होगी ,जो घर पहले नैना की खिलखिलाहट से गूँज रहा था ,वहाँ मरघट सा सन्नाटा छा गया था। वो आया खाना खाया और निकल गया। इस खिलखिलाहट को सन्नाटे में बदलते हुए जब मैंने देखा तो दिमाग हिल गया था। लाज़मी था। ख़ास कर मुझ जैसे के लिए ,जिसके लिए प्यार और शादी के मायने ही अलग है। खासकर जब कोई कहे की लव मैरिज है। आज न मुझे लव  कही समझ आया , न ही कही मैरिज ?