सेठजी ,
जी हाँ, मै बात कर रही हु , शोभा डे की कहानी की ,वैसे तो मुझे इस तरह की किताबो को पढ्ने का मौका नहीं मिला ,लेकिन जब ये किताब का मुख्य पृष्ट्य देखा तो लगा पता नहीं ,पॉलिटिक्स की कहानी है,और इन दिनों राजनीति में बड़ा मज़ा आ रहा है ,तो किताब पढ़ने की हिम्मत करी ,वरना में बहुत मूडी हु ,कहो साल लगा दू ,या एक दिन ,या एक हफ्ता या कुछ महीने ,किताब पढ़ने में। सेठजी की कहानी जिस जगह से शुरू होती है ,उसको पढ़के लगा बकवास कहानी होगी ,फ़ालतू की राजनीती ,लेकिन सेठजी की बहु का किरदार बहुत ही अच्छे से गढ़ा गया है,मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं की इस किताब को मैंने शायद उस बहु ,बीबी ,बेटी ,और प्रेमिका के साथ एक अधूरी औरत के लिए ही पढ़ा। और दो दिन में आश्चर्य जनक तरीके से पूरा पढ़ डाला ,जो मेरे लिए भी यकीन करने वाली बात नहीं है ,दिमाग इस कद्र सोच में पड़ गया है ,की इस तरह की कहानी शोभा जैसी महिला ने लिखी ,और क्या सोच के लिखा होगा ?
राजनीती के हिसाब से देखा जाए जो कहानी में सेठजी के बेटे सूरज द्वारा पहाड़ी लड़की का बलात्कार और उसको छुपाने की जदोजहद में ,सेठजी का अपनी बहु को इस्तेमाल करना ,करवाना ,और करता हुआ देखना ,जहा अजीब है ,वही उस औरत की अपनी कहानी ,जहा वो बेटी थी ,फिर बहु बनी ,एक ऐसे ससुर की बहु जिसके लिए मरते दम तक सिर्फ उसका शरीर जरूरी था ,उसकी भावनाओ ,और समर्पण की कोई कदर नहीं।
पति भी बहु अमृता को ऐसा मिला ,जिसने उससे उसके सुखो से कोशों दूर रखा ,पति नहीं बन पाया ,बहु के शरीर का भोग ससुर ने किया ,बेटो को पता था लेकिन सब चुप ,किसी की सेठजी के आगे नहीं चलती थी ,राजनीती के गुण अमृता ने साथ रह के जो सीखे ,वो बेटे नहीं सिख पाये। राजनीती में साथियो ,के साथ दुश्मनो का भी मान पान होता है ,फिर उसके लिए चाहे किसी भी हद तक क्यों न जाना पड़े। सेठजी का अमृता को अरुण के पास बेजना ,फिर उसके पूर्व प्रेमी के साथ,,सूरज को बचाने के लिए छोड़ देना , अकेले सारा इंतज़ाम करने की अमृता की परिपक्वता ,अगर उसके चरित्र को मजबूती देती है ,तो उस समय उसका आपा खो जाना ,जब प्रेमी उसको जकड़ता है ,बिस्तर पे ले जाता है ,और एक बार नहीं दो बार अधूरा छोड़ जाता है ,उसको इतना मजबूर बना देता है ,की वो अफ़सोस भी नहीं कर पाती ,ये जानते हुए की उसके आस पास के जितने भी मर्द है ,वो सब उससे सिर्फ उसका शरीर चाहते है ,बाकी किसी को अमृता की कोई जरुरत नहीं है ,कई सवाल पैदा करता है ?आखिर क्यों कोई औरत इतनी मजबूर है की वो अपने शरीर का सुख खुद अपनी मर्ज़ी से नहीं भोग सकती?
इस पूरी किताब में शोभा ने बहुत ही नायाब तरीके से औरत को रंडी ,और कुतिया जैसे श्ब्दों से नवाज़ा है ,घर की लक्ष्मी कहे जाने वाली बहु को ससुर ,देवर बहार के लोग बड़े ही आराम से गालिया देते है ,और अमृता सुनती है ?हाई प्रोफाइल मुंबई में जिस भाऊ का चरित्र शोभा ने बताया है ,वो बाला साहेब जैसा लगता है। उनके बेटो का किरदार भी।
अमृता का हमबिस्तर होना ,फिर वो ससुर के साथ हो ,या प्रेमी के साथ ,या मीडिया के ऑफिस में एंकर का एक नज़र में उसका शरीर नाप लेना। और अपना कार्ड देना ,कही न कही समाज की उस बातो की तरफ सीधा इशारा है ,की औरत तुम अपने कामो से कम बल्कि तुम्हारी शरीर की बनावट ,कसावट ,और उत्तेजना से ज्यादा पहचानी जाओगी।
शोभा की एक बात अच्छी लगी ,की सेठजी के बहाने उन्होंने उस दुनिया की असली तस्वीर लोगो के सामने लायी ,जो बहुत छुपी हुयी है ,या जिसे लोग जानते है ,लेकिन कहने से डरते है ,या शरमाते है ,और जब एक कमरे के भीतर दो जिस्म के मिलने या रगड़न की भाषा कोई औरत कहती है ,तो लोग उस भाषा को एक झटके से नकार देते है ,उनके हिसाब से बहुत ही वाहियात कहानी का लेखन किया जाना ,यु कह दिया जाता है ,जैसे कोई बात या कोई खाने का कौर गले में अटग गया है।
मैंने जो सोच के कहानी पढ़ी थी ,उसमे मुझे उतना मजा नहीं आया ,राजनीती की तिकड़म होगी कुछ कूटनीति।
ये पूरी कहानी अमृता के शरीर की कहानी थी ,उसका आज़ाद पहनावा ,जिसमे ब्रा की बंदिश नहीं थी ,उसका सुडोल जिस्म जिसको हर भूखी नज़र कैद कर लेना चाहती है ,और कहानी का अंत ,अमृता का पूरा जीवन उसके शरीर के अहसानो तले कही खो गया ,दब गया मर गया.
शोभा को कहानी के लिए मैं शायद 5 में से 2 दू। लेकिन उनकी बेबाक ,गालियो ,औरत की मनोदशा,कल्पनायें ,खुद से प्यार ,अपनी इक्षाओ की मांग का चित्रण करने के लिए ,पूरे 4 दूंगी।
मैंने ये पहली फिक्शन पढ़ी है ,हो सकता है की , इस तरह की खुली बाते
आपको असहज लगे ,मुझे भी पहले पहल लगी ,लेकिन सोचने के बाद ऐसा लगा की आज हम सब जिस माहौल में रह रहे है वहाँ इसे हर किसी को पढ़ना चाहिए। खासकर महिलाओ को ,जिन्हे आज भी अपनी मर्ज़ी ,अपने शरीर की इम्पोर्टेंस नहीं पता। यहाँ तक उनको खुद की पसंद को कबूल करने में भी हीच कि चाहट होती है। औरत वाकई एक मर्तबान की तरह होती है ,जिससे जैसे चाहो वैसे उपयोग में लाओ ,ये बात अलग है की जब घर में मेहमान आये ,तब उनको उन बर्तनो ,मर्तबानो की तरह सजाया जाता है ,जैसे आज ही बड़े सलीके से उस अलमारी से निकला है ,जहा बरसो से उससे सजा के रख दिया जाता हो नाजुक मर्तबान। और फिर कुछ मर्तबान आये दिन की आजमाइश के साथ इतने रगड़ जाते है की उसको भी आदत हो जाती है ,मालूम है यही खाना इसमें बनेगा ,आज कुछ उबाला जाना है ,या आज कुछ में सिर्फ छौक लगेगा।
मर्तबान की तरह इस कहानी में भी अमृता को सब ने यूज़ किया ,लेकिन उसे अब सेठजी की आदत हो गयी थी। और आखिर कार सब कुछ मिलने के बाद दिल्ली का सपना जब पूरा हो रहा हो ,तब ये शरीर क्या है ,न पहले कुछ था ,न अब कुछ है।
कहानी में सेठजी ही थे जिसने उसके शरीर को शायद चाहा था ,ये बात अलग थी की अमृता के लिए वो कभी चाहत या पसंद नहीं रहे ,सिर्फ एक सामान या जरिया की तरह ,मर्तबान की तरह उसको भी अब ससुर की आदत हो गयी थी।
नारीवादियों को एक बार इससे पढ़ना चाहिए ,मुझे अचम्बा है की इस पे किसी ने कुछ कहा क्यों नहीं। जबकि इस तरह की कहानी में एक औरत को किस तरह मजबूर दिखाया है।
या यु कहु की उस दुनिया की हकीकत यही है। इसलिए सब मौन है। दो तीन मर्दो ने इससे बेकार कह दिया ,तो किसी ने पढ़ा ही नहीं।
पॉलिटिक्स के लिए नहीं तो महिलाओ को उस महिला की उस खुली सोच के लिए एक बार पढ़ना चाहिए।
जी हाँ, मै बात कर रही हु , शोभा डे की कहानी की ,वैसे तो मुझे इस तरह की किताबो को पढ्ने का मौका नहीं मिला ,लेकिन जब ये किताब का मुख्य पृष्ट्य देखा तो लगा पता नहीं ,पॉलिटिक्स की कहानी है,और इन दिनों राजनीति में बड़ा मज़ा आ रहा है ,तो किताब पढ़ने की हिम्मत करी ,वरना में बहुत मूडी हु ,कहो साल लगा दू ,या एक दिन ,या एक हफ्ता या कुछ महीने ,किताब पढ़ने में। सेठजी की कहानी जिस जगह से शुरू होती है ,उसको पढ़के लगा बकवास कहानी होगी ,फ़ालतू की राजनीती ,लेकिन सेठजी की बहु का किरदार बहुत ही अच्छे से गढ़ा गया है,मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं की इस किताब को मैंने शायद उस बहु ,बीबी ,बेटी ,और प्रेमिका के साथ एक अधूरी औरत के लिए ही पढ़ा। और दो दिन में आश्चर्य जनक तरीके से पूरा पढ़ डाला ,जो मेरे लिए भी यकीन करने वाली बात नहीं है ,दिमाग इस कद्र सोच में पड़ गया है ,की इस तरह की कहानी शोभा जैसी महिला ने लिखी ,और क्या सोच के लिखा होगा ?
राजनीती के हिसाब से देखा जाए जो कहानी में सेठजी के बेटे सूरज द्वारा पहाड़ी लड़की का बलात्कार और उसको छुपाने की जदोजहद में ,सेठजी का अपनी बहु को इस्तेमाल करना ,करवाना ,और करता हुआ देखना ,जहा अजीब है ,वही उस औरत की अपनी कहानी ,जहा वो बेटी थी ,फिर बहु बनी ,एक ऐसे ससुर की बहु जिसके लिए मरते दम तक सिर्फ उसका शरीर जरूरी था ,उसकी भावनाओ ,और समर्पण की कोई कदर नहीं।
पति भी बहु अमृता को ऐसा मिला ,जिसने उससे उसके सुखो से कोशों दूर रखा ,पति नहीं बन पाया ,बहु के शरीर का भोग ससुर ने किया ,बेटो को पता था लेकिन सब चुप ,किसी की सेठजी के आगे नहीं चलती थी ,राजनीती के गुण अमृता ने साथ रह के जो सीखे ,वो बेटे नहीं सिख पाये। राजनीती में साथियो ,के साथ दुश्मनो का भी मान पान होता है ,फिर उसके लिए चाहे किसी भी हद तक क्यों न जाना पड़े। सेठजी का अमृता को अरुण के पास बेजना ,फिर उसके पूर्व प्रेमी के साथ,,सूरज को बचाने के लिए छोड़ देना , अकेले सारा इंतज़ाम करने की अमृता की परिपक्वता ,अगर उसके चरित्र को मजबूती देती है ,तो उस समय उसका आपा खो जाना ,जब प्रेमी उसको जकड़ता है ,बिस्तर पे ले जाता है ,और एक बार नहीं दो बार अधूरा छोड़ जाता है ,उसको इतना मजबूर बना देता है ,की वो अफ़सोस भी नहीं कर पाती ,ये जानते हुए की उसके आस पास के जितने भी मर्द है ,वो सब उससे सिर्फ उसका शरीर चाहते है ,बाकी किसी को अमृता की कोई जरुरत नहीं है ,कई सवाल पैदा करता है ?आखिर क्यों कोई औरत इतनी मजबूर है की वो अपने शरीर का सुख खुद अपनी मर्ज़ी से नहीं भोग सकती?
इस पूरी किताब में शोभा ने बहुत ही नायाब तरीके से औरत को रंडी ,और कुतिया जैसे श्ब्दों से नवाज़ा है ,घर की लक्ष्मी कहे जाने वाली बहु को ससुर ,देवर बहार के लोग बड़े ही आराम से गालिया देते है ,और अमृता सुनती है ?हाई प्रोफाइल मुंबई में जिस भाऊ का चरित्र शोभा ने बताया है ,वो बाला साहेब जैसा लगता है। उनके बेटो का किरदार भी।
अमृता का हमबिस्तर होना ,फिर वो ससुर के साथ हो ,या प्रेमी के साथ ,या मीडिया के ऑफिस में एंकर का एक नज़र में उसका शरीर नाप लेना। और अपना कार्ड देना ,कही न कही समाज की उस बातो की तरफ सीधा इशारा है ,की औरत तुम अपने कामो से कम बल्कि तुम्हारी शरीर की बनावट ,कसावट ,और उत्तेजना से ज्यादा पहचानी जाओगी।
शोभा की एक बात अच्छी लगी ,की सेठजी के बहाने उन्होंने उस दुनिया की असली तस्वीर लोगो के सामने लायी ,जो बहुत छुपी हुयी है ,या जिसे लोग जानते है ,लेकिन कहने से डरते है ,या शरमाते है ,और जब एक कमरे के भीतर दो जिस्म के मिलने या रगड़न की भाषा कोई औरत कहती है ,तो लोग उस भाषा को एक झटके से नकार देते है ,उनके हिसाब से बहुत ही वाहियात कहानी का लेखन किया जाना ,यु कह दिया जाता है ,जैसे कोई बात या कोई खाने का कौर गले में अटग गया है।
मैंने जो सोच के कहानी पढ़ी थी ,उसमे मुझे उतना मजा नहीं आया ,राजनीती की तिकड़म होगी कुछ कूटनीति।
ये पूरी कहानी अमृता के शरीर की कहानी थी ,उसका आज़ाद पहनावा ,जिसमे ब्रा की बंदिश नहीं थी ,उसका सुडोल जिस्म जिसको हर भूखी नज़र कैद कर लेना चाहती है ,और कहानी का अंत ,अमृता का पूरा जीवन उसके शरीर के अहसानो तले कही खो गया ,दब गया मर गया.
शोभा को कहानी के लिए मैं शायद 5 में से 2 दू। लेकिन उनकी बेबाक ,गालियो ,औरत की मनोदशा,कल्पनायें ,खुद से प्यार ,अपनी इक्षाओ की मांग का चित्रण करने के लिए ,पूरे 4 दूंगी।
मैंने ये पहली फिक्शन पढ़ी है ,हो सकता है की , इस तरह की खुली बाते
आपको असहज लगे ,मुझे भी पहले पहल लगी ,लेकिन सोचने के बाद ऐसा लगा की आज हम सब जिस माहौल में रह रहे है वहाँ इसे हर किसी को पढ़ना चाहिए। खासकर महिलाओ को ,जिन्हे आज भी अपनी मर्ज़ी ,अपने शरीर की इम्पोर्टेंस नहीं पता। यहाँ तक उनको खुद की पसंद को कबूल करने में भी हीच कि चाहट होती है। औरत वाकई एक मर्तबान की तरह होती है ,जिससे जैसे चाहो वैसे उपयोग में लाओ ,ये बात अलग है की जब घर में मेहमान आये ,तब उनको उन बर्तनो ,मर्तबानो की तरह सजाया जाता है ,जैसे आज ही बड़े सलीके से उस अलमारी से निकला है ,जहा बरसो से उससे सजा के रख दिया जाता हो नाजुक मर्तबान। और फिर कुछ मर्तबान आये दिन की आजमाइश के साथ इतने रगड़ जाते है की उसको भी आदत हो जाती है ,मालूम है यही खाना इसमें बनेगा ,आज कुछ उबाला जाना है ,या आज कुछ में सिर्फ छौक लगेगा।
मर्तबान की तरह इस कहानी में भी अमृता को सब ने यूज़ किया ,लेकिन उसे अब सेठजी की आदत हो गयी थी। और आखिर कार सब कुछ मिलने के बाद दिल्ली का सपना जब पूरा हो रहा हो ,तब ये शरीर क्या है ,न पहले कुछ था ,न अब कुछ है।
कहानी में सेठजी ही थे जिसने उसके शरीर को शायद चाहा था ,ये बात अलग थी की अमृता के लिए वो कभी चाहत या पसंद नहीं रहे ,सिर्फ एक सामान या जरिया की तरह ,मर्तबान की तरह उसको भी अब ससुर की आदत हो गयी थी।
नारीवादियों को एक बार इससे पढ़ना चाहिए ,मुझे अचम्बा है की इस पे किसी ने कुछ कहा क्यों नहीं। जबकि इस तरह की कहानी में एक औरत को किस तरह मजबूर दिखाया है।
या यु कहु की उस दुनिया की हकीकत यही है। इसलिए सब मौन है। दो तीन मर्दो ने इससे बेकार कह दिया ,तो किसी ने पढ़ा ही नहीं।
पॉलिटिक्स के लिए नहीं तो महिलाओ को उस महिला की उस खुली सोच के लिए एक बार पढ़ना चाहिए।