पुरुषवादी नैतिकता के जहर बुझे बादल
मध्यप्रदेश के खंडवा की रहने वाली सुनीता अपने
एक रिश्तेदार के साथ चार साल पहले जब दिल्ली आई थी, तो आंखों में ढेर सारे सपने
थे। बंगले में काम करेगी। अच्छा खाना, कपड़े और साथ में हर माह पांच हजार रुपए
मिलेंगे। उसे ये सारे सपने उसी रिश्तेदार ने दिखाए, जो उसे इस महानगर तक लेकर
आया। लेकिन जल्द ही सुनीता के सारे सपने टूट गए। रिश्तेदार ने उसे जिस्मफरोशी
के अड्डे पर बेच दिया था। रोज कई-कई बार मरना और अगले दिन फिर जिंदा रहने के लिए
जी उठना। आखिर दो साल के बेटे के साथ भाग आई 21 वर्षीय सुनीता। हकीकत में जीने
लगी, पर जमाने को यह मंजूर नहीं था। जब भी वह काम के लिए घर से निकलती, छेड़छाड़
के साथ अश्लील फब्तियां उसका इंतजार करती।
गुवाहाटी की सड़क पर पिछले सोमवार को एक स्कूली
छात्रा के साथ बदसलूकी और सुनीता के मामले में ज्यादा अंतर नहीं है। सुनीता बाजार
में बेची गई, जबकि उस बदनसीब स्कूली छात्रा की गलती यही थी कि उसने अपने दोस्तों
के साथ एक बार में जाने की गुस्ताखी की। पब, डिस्को थेक, बार जैसी महानगरीय
सुविधाएं समाज के आधे हिस्से के लिए नैतिकता की कसौटी पर पाक साफ तरीके से नहीं
उभर पाई हैं। इसे यूं भी देख सकते हैं कि भूमंडलीकरण ने समाज को मौज-मस्ती और
मनोरंजन के बहुतेरे साधन तो दिए हैं, पर इसमें महिलाओं का बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना
एक बड़े हिस्से को रास नहीं आ रहा है। गुवाहाटी की घटना को कवर करने वाले स्थानीय
असमिया चैनल के प्रमुख अतनु भुयां लेट नाइट क्लबों और बार में जाने वाली अधिकांश
लड़कियों को वेश्या करार देते हैं। ट्विटर पर वे लिखते हैं कि महिलाओं के साथ बदतमीजी
की घटनाएं सबसे ज्यादा ऐसे क्लबों, बार के बाहर होती हैं। सवाल यह है कि क्या
वे इसी बात को साबित करना चाहते थे ?
अतनु अपने बचाव में यह ट्वीट भी करते हैं कि उनके
चैनल के रिपोर्टरों ने कोई ‘अनर्थ’ होने से पहले ही पुलिस बुला ली थी। वे तो सिर्फ
इस घटना की वीडियो शूटिंग कर अहम सुबूत इकट्ठा कर रहे थे। लेकिन उनका असली मकसद
अगले दो ट्वीट से साफ हो जाता है, जिसमें उन्होंने यू-ट्यूब पर डाले वीडियो के
लिंक भेजे, साथ ही अपने ही चैनल की बढ़ी हुई टीआरपी भी बताई। आखिर में अतनु ये भी
लिखते हैं कि बम ब्लास्ट होने पर उनके चैनल के रिपोर्टर पीड़ितों को रक्तदान
करने के बजाय घटना को शूट करना ज्यादा जरूरी समझेंगे। साफ है कि ऐसी घटनाओं के
पीछे मीडिया की मानसिकता भी कहीं न कहीं ज्यादा से ज्यादा व्यावसायिक फायदा
उठाने की रहती है।
कुछ दिन पहले ही असम में ही एक गर्भवती महिला
विधायक की भीड़ ने बेरहमी से सिर्फ इसलिए पिटाई कर दी, क्योंकि उसने अपने पति को
छोड़कर एक मुस्लिम युवक के साथ रहने का फैसला कर लिया। हमारा समाज प्रतिगामी,
पितृ सत्तात्मक है। वह आज भी औरत को सदियों पुराने पितृसत्तात्मक बंधनों में देखता
है। पर यहां इस समाज के दो चेहरे भी उभरते हैं। एक वह संपन्न तबका, जो भूमंडलीकरण
के दौर में बाजारवादी विकास के साथ कदम मिलाकर चलना चाहता है और दूसरा वह जो इस
चकाचौंध से खुद को बहिष्कृत पाता है। दरअसल पितृ सत्तात्मक बंदिशों की जड़ें
इसी तबके में अभी भी गहरे जमी हुई हैं। सिनेमाई संस्कृति से लेकर मॉल और पब कल्चर
के रूप में पनप रही आधुनिकता की गति को रोकने की न तो इस वर्ग की मंशा है और न ही
सामर्थ्य। परोक्ष रूप से यह नव उपभोक्तावाद का समर्थन भी करता है, पर इसकी आजादी
सिर्फ पुरुषों तक ही सीमित है। चार साल पहले मुंबई के एक पांच सितारा होटल से बाहर
निकलीं दो महिलाओं के ऊपर हमला करने वाले अधिकांश आरोपी इसी वर्ग से थे। उनके कृत्य
को भले ही यौन हिंसा की श्रेणी में डालकर देखा गया, लेकिन इस तरह की घटनाओं के
पीछे छिपे सामाजिक कारणों को न तो तब उजागर करने की कोशिश हुई और न ही अब हो रही
है। ऐसी घटनाओं के खिलाफ व्यापक शिक्षित, जागरूक समाज गुस्सा जताता है, सिस्टम
को कोसता है, महिलाओं के प्रति नजरिया बदलने की हिदायत देता है। लेकिन मसले का हल
उसके पास भी नहीं है, क्योंकि हमारा बाजारवादी आर्थिक विकास सबको साथ लेकर चल
पाने में नाकाम रहा है।
इस समस्या का एक राजनीतिक पक्ष भी है। आधुनिकता
से अछूता पितृसत्तात्मक समाज का वर्ग भले ही नवउपभोक्तावादी विकास में हिस्सेदार
न हो, पर राजनीतिक रूप से काफी सक्रिय है। यही वह वर्ग है, जो राजनीतिक रैलियों,
चुनाव सभाओं और प्रचार में भीड़ का हिस्सा बनता है। यह वोट बैंक है। एक ऐसा वोट
बैंक जिसे राजनीतिक फायदे के लिए मोड़ा जा सकता है। यह भीड़ है और हमारे देश में
भीड़ ही रास्ता बनाती रही है। शिक्षित मध्यमवर्ग इस भीड़ में शामिल नहीं होना
चाहता, क्योंकि वह खुद को विकसित मानता है, बाकियों से अलग समझता है। भीड़ ही सत्ता
तक पहुंचने का रास्ता साफ करती है और जब यह अपनी मनमानी पर उतर आती है तो इसका
कोई चेहरा नहीं होता। हमारा कानून भी भीड़ को व्यक्ति विशेष के रूप में पहचानने
से इनकार कर देता है। ऐसे में आरोपी सुबूतों के अभाव में छूट जाते हैं। भीड़ का यह
चरित्र पहले गांवों में अक्सर दिखाई देता था, जो अब शहरों में नजर आ रहा है। यह
हमारे लोकतंत्र के भीड़तंत्र में तब्दील होने की परिणति है।
सुनीता की कहानी अंतिम नहीं है और न ही गुवाहाटी
की घटना के बाद देशभर में जताया जा रहा आक्रोश हमारे समाज की पितृसत्तात्मक तस्वीर
को बदलने के लिए काफी है। लगातार ऐसी घटनाओं का सामने आना समाज में महिलाओं के
प्रति असुरक्षा का माहौल पैदा करता है। ऐसा होने देने के पीछे कुछ राजनीतिक स्वार्थ
भी हैं। समाज के विकसित, शिक्षित वर्ग को इन्हें समझना होगा और तभी ऐसी घटनाओं को
रोकने का कोई रास्ता निकल सकेगा।
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