कोई क्यों कर बदले ,या न बदले, बदले तो ऐसे या वैसे ,या फिर उस तरह जैसे उस दिन कहा था ,उस दिन वाला याद नहीं तो, आज जो कहा वो पल्लेबांध कर बदलो ,लेकिन बदलो ,सवाल वही है ,की कैसे ?जब बदलने के लिए कुछ होगा तभी न बदलेगा ?दिमाग ,में २४ घंटे साला एक ही धुन बजेगी तो दिमाग कैसे बदलने की सोचेगा ?ये करो वो करो, करो तो कैसे करो ?जो करना है , हमको हीन करना है . तुम बस बोलते जाओ हम सुनते जाए, ये सुनना वहाँ ऐसा करना है ?उसको ऐसा बोला ,इसको वैसा बोला ,दिमाग को जब एक की आदत सी हो जाए तो समझ लो डूबने की आखिरी घड़ी नज़दीक है। दिमाग का सन्नाटा और मन की अस्थिरता को काबू में लाने में समय लगता है। समय ये भी एक कहानी है ,जिसको जरुरत है उसके लिए होता नहीं जहा कोई मोल नहीं वहा अपार है। हम तो जैसे थे ,वैसे ही रहेंगे ,ऐसा सोचा नहीं है ठाना नहीं है। कुछ बंधा हुआ है ,कहा पता नहीं ,क्यों पता नहीं ,उस बंधन से मुक्ति चाहिए नहीं ,चाहिए है जो वो मिलेगा नहीं ,रोके गाके हँसके जो करना है कर लो ,जानते हुए भी चाहिए तो वही ,बस एक वही यही जो चाहिए मन का मीट कह लो या एक सपना हक़ीक़त में बदलनेवाला नहीं कभी नहीं कभी नहीं कभी नहीं। लेकिन उसको पाने के लालसा अब नहीं ,फिर भी एक उम्मीद है कीशायद मिलेगा कभी मुझे वो बस यही यही यही। वह री मन की विडम्बना तू जा कही और कही किसी और के दिल घूम के आ। अभी यहाँ अस्थिरता का डेरा है ,जो सिर्फ मेरा है मेरा है मेरा है।
जो भी आदमी या औरत खुद को हर मामले में डेमोक्रेटिक, लिबरल, एथीस्ट, फेमिनिस्ट, प्रोग्रेसिव वगैरह वगैरह क्लेम कर रहा या रही है उससे उसके घर का हाल पूछ लीजिए। सारी क्रांति धरी की धरी रह जाएगी।
जो व्यक्ति, लड़कियों को खुद के बनाए खांचे में फिट बैठने वाली प्रगतिशीलता, स्वतंत्रता आदी का घनघोर पक्षधर है उससे बस एक बार उसकी ही पीढ़ी के और उसके अपने रिश्तेदारों का हाल ले लीजिए। ज्यादा कुछ मत कीजिए।
कहने और करने में बहुत फर्क होता है ,इसलिए जो कह रहे है करने की हिम्मत भी करे। कहने वालो का कुछ नहीं जाता करने वाले कमाल करते है। जो कर लिया तो गुरु हो गए। वरना धूनी जमाये अपने तिये पे।
आज कुछ भी लिखा है की धुन सवार है अकल मिली है थोड़ी सी ,यु तो हम कुछ लिखते नहीं ,बोलते नहीं ,लेकिन जब बोलते है तब मिर्ची लगती है सबको। इस लिए हम एक झटके में नेगेटिव हो जाते है।
जो भी आदमी या औरत खुद को हर मामले में डेमोक्रेटिक, लिबरल, एथीस्ट, फेमिनिस्ट, प्रोग्रेसिव वगैरह वगैरह क्लेम कर रहा या रही है उससे उसके घर का हाल पूछ लीजिए। सारी क्रांति धरी की धरी रह जाएगी।
जो व्यक्ति, लड़कियों को खुद के बनाए खांचे में फिट बैठने वाली प्रगतिशीलता, स्वतंत्रता आदी का घनघोर पक्षधर है उससे बस एक बार उसकी ही पीढ़ी के और उसके अपने रिश्तेदारों का हाल ले लीजिए। ज्यादा कुछ मत कीजिए।
कहने और करने में बहुत फर्क होता है ,इसलिए जो कह रहे है करने की हिम्मत भी करे। कहने वालो का कुछ नहीं जाता करने वाले कमाल करते है। जो कर लिया तो गुरु हो गए। वरना धूनी जमाये अपने तिये पे।
आज कुछ भी लिखा है की धुन सवार है अकल मिली है थोड़ी सी ,यु तो हम कुछ लिखते नहीं ,बोलते नहीं ,लेकिन जब बोलते है तब मिर्ची लगती है सबको। इस लिए हम एक झटके में नेगेटिव हो जाते है।