Saturday, February 1, 2014

स्त्रीलेखन कि पीड़ा बनाम अंतर्द्वंद

गीताश्री की एक कहानी ‘प्रगतिशील इरावती’ मार्च,  2013 के महिला विशेषांक में छपी है- ताप. एक युवा पुत्री की मां अपने बूढ़े पति की शारीरिक भूख से त्रस्त है. वह अपनी व्यथा पुत्री को बताती है. एक आधुनिक युवा पुत्री पिता को समझाने, किसी सलाहकार के पास भेजने या उनके आगे कोई अन्य विकल्प रखने के बजाय खुद उनके लिये एक युवा वेश्या खरीद लाती है जो घर पर ही आकर पिता को होमसर्विस देकर उनकी भूख शांत कर दे. यानी एक युवा स्त्री अपने वृद्ध पिता के लिए दूसरी युवा स्त्री को यौनदासी बनाती है. स्त्री सशक्तीकरण की चरम अवस्था को प्राप्त कर चुकी इस लेखिका की कहानी में एक ट्विस्ट है. कहानी के अंत में युवा वेश्या युवा पुत्री से कहती है- ‘ये किसी काम का नहीं है. तुम बेकार अपने पैसे बर्बाद कर रही हो. मैं ठरकी बुड्ढों को खूब जानती हूं. अंग्रेज़ी मुहावरा याद है न- ‘द डिजायर इज हाइ बट द फ़्लेश इज वीक.’ बोल्ड लेखिका के रूप में एक विशेष समूह द्वारा अति प्रशंसित गीताश्री इससे पूर्व ‘इंद्रधनुष के उस पार’ कहानी में दिखा चुकी हैं कि कॉरपोरेट दफ्तर में काम करने वाली युवती परेशान है कि उसका बॉस उसके कपडे-लत्तों पर हरदम रोक-टोक करवाता रहता है. युवती की चिंता सही भी है क्योंकि सभ्य समाज यही मानता है कि स्त्री को अपने वस्त्र स्वयं चुनने और पहनने का पूरा हक है . मगर इस कहानी में भी ट्विस्ट है. लड़की अपनी पोशाक स्वयं तय करने के अधिकार का प्रयोग करते हुए पूर्णतया निर्वस्त्र होकर न्यूड पार्टी में जाती है जहां पर सभी लोग निर्वस्त्र आए हैं, वह बॉस भी जो उसे स्लीवलेस टॉप पहनने पर टोकता था. ऐसी पार्टियां हमारे समाज में होती हैं या ‘इंद्रधनुष के उस पार’ यह कह पाना कठिन है.

 शालिनी माथुर के एक लेख का एक अंश मात्र है ये ,जिससे पढ़ के मै विचलित  हो गयी थी। 

इस को पढ़ के में सोच में पढ़ गयी थी कि ऐसा कैसे हुआ होगा ,रात भर सो नहीं सकी ,फिर इस कहानी को खोज मारा और जब इससे पूरा पढ़ा ,तब लगा कि ये घटना तो मेरे आस पास कई बार घटित हुयी है ,इसमें नया क्या है ,और गलत भी कुछ नहीं ,इसलिए मैंने शालिनी माथुर के लेख को दोबारा पढ़ा ,उसमे बाकी जिस जिस महिला लेखिकाओ का नाम था और कहानिया ,उसके कई अंश को बार बार पड़ने के बाद लगा कि ये सब ऐसा नहीं है कि हमें नहीं पता ,हम सब ,यहाँ तक कि आप सब भी न जाने कितनी बार देखते है ,और सुनते है ,उसके बाद भी या तो उसको दरकिनार कर देते है ,या शुतुरमुर्ग कि तरह अपनी गर्दन को रेत  में डाल के कुछ और ही बताना चाहते है ,आखिर क्यों ?और क्या ,गलत है इस कहानी में ,एक औरत ने आखिर कार जो हिम्मत  दिखायी वो क्या मर्द कर सकता है ?
बात यहाँ ये नहीं है ,बात ये है कि अभी तो पूरे लेख को पढ़के जिस तरह मेरे एक रात सवालो के मकड़ जाल में बीती क्या ऐसा किसी और के साथ नहीं हुआ होगा। मैंने बाकी कि कहानियो के कोट को अभी नहीं खोला है ,सच कहु तो अब हिम्मत नहीं है ,क्युकी जब कभी भी इस तरह कि बाते ,खासकर औरत के देह को लेकर सुनती हु ,दिमाग वाकई में किसी काम का नहीं रहता ,और क्यों हमेशा औरत और औरत का देह ,क्या हम औरते इतनी भावना हीन  हो चुकी है कि आज भी सिर्फ औरत कि देह को ही मुद्दा बना के रहना चाहती है। 
इससे कभी ऊपर उठता जा सकता है ?
शालिनी ने अपने लेख में जो मुद्दा या जो सवाल किया ??असल मुद्दा वो है ??स्त्री लेखन होता क्या है? क्या वह, जो कुछ भी स्त्री लिख दे, या वह, जो स्त्री के विषय में हो, या वह, जो स्त्रीवादी हो, या वह, जो स्त्री समर्थक हो? स्त्री लेखन के नाम पर आज जो कुछ परोसा जा रहा है, आखिर वह है क्या?
शालिनी ने लिखा अच्छा ,बहुत सारे कहानियो को ,उनके उन पहलू को कोट किया ,जिससे पढ़ के आम इंसान को लगता है, जैसा कि मुझे लगा कि ये सब क्या बकवास है ,या ये ही लेखन है तो मेरे तौबा ,मै तो कभी न लिखू इस तरह का , और अच्छा हुआ कि मैंने इस तरह के साहित्य को नहीं पढ़ा ,इसके लिए शालिनी का धन्यवाद कहूँगी ,कि मुझे नींद से जगा दिया ,लेकिन शालिनी ताप को पढ़ के मुझे लगा कि ये घटना घटी है ,इसलिए ये सच बात है ,इसे  इस तरह सभी कहानियो के साथ लेना शायद गलत होगा। मै  ये नहीं कह रही ,किबाकी सब मन से लिखी गयी है ,हो सकता है हाँ या नहीं भी ,पर जिस मुद्दे को यहाँ मैं मुद्दा होना चाहिए था वो भी तो कही जाके   भटक गया।  
मेरा सोचना ये है कि जब तक हम सब जब तक देह को पीछे किसी जगह पे छोड़  के कुछ नया नहीं लिखेंगे। तब तक हम कैसे ये उम्मीद करे कि हम अपनी नसलो को कुछ दे रहे है ,बिलकुल नही ,आज उन लेखिकाओ के कहानियो को आपने समेटा  और अपनी बात कह दी ?क्यों ? क्या आपके पास आज कि किसी ऐसे नारी कि कोई अच्छी बात नहीं थी ,जो आपको इस लाइन में न खड़े करके ,एक ऐसे नयी लाइन बनाने को दुसरो को प्रेरित करती ,जहा वाकई कुछ नया होता ?
आपके एक एक शब्द दिल को भेदने वाले है ,और आपने उन बेकार के विषये को लिया ,और एक बार फिर साबित किया कि नारी नारी के देह के अलावा कुछ नहीं सोच सकती। पुरुष के खेल में नारी का नाच ,इसको नारी के खेल में पुरुष का नाच होना चाहिए था। 
जिस दिन औरत इस तरह कि सोच के साथ लिखेगी उस दिन शायद वाकई वो स्त्रीलेखन होगा। लेकिन हम ये सोच के नयी इबारत नहीं लिखा चाहती ,क्युकी अगर इसकी शुरुआत हमारे घर से हो गयी तो ???
मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि हम इंसानो कि आदत है ,कि किसी और के घर कि आग हमे बहुत सुकून देती है। जब तक वाकई वह राख का ढेर न हो जाए। उसकी ताप सुकून दायी होती है ,लेकिन जब खुद के घर कि आग से ताप लेने का सुख भोगने को बोलो तब सब कि हालत बिगड़ जाती है। 
शालिनी का शुक्रिया कहूँगी ,कि उसने मुझे गलत राय कायम करने से बचाया ,और इस गम्भीर मुद्दे पे अपने विचार रखने को प्रेरित किया। और एक सबक भी मिला कि किसी भी बात को बिना समझे राय बनाना ,आज  के हिसाब से बहुत गलत है। 
ये लाज़मी है कि हर औरत के लिए उसका शरीर शायद उतना जरुरी न हो ,कही सुना है ,जब औरत एक बार अपना सब कुछ किसी को दे देती है ,तो वो देह से परे भावनाओ के समंदर में गोते लगाती है ,पुरुष मानसिकता के विपरीत ,यही सबसे बड़ी विडम्बना है ,जिस दिन उसको उसके देह के साथ ,उसकी अनगिनित इक्षाओं कि पूर्ति करने के साथ एक सही सामंजस का हिसाब करना आ जायेगा ,वो कभी देह के लिए बेचारी नहीं रहेगी ,लेकिन होता इसके विपरीत है ,औरत सिर्फ देह के लिए ,उसकी सुरक्षा के लिए ,उसको सम्भालने के लिए ,उसको सवारने के लिए अपनी पूरी ज़िन्दगी लगा देती है। 
आखिर तब तक ???अरे इससे बहार आओ ?दुनिया देखो ?फ़ालतू कि मोह माया से हट के सोचो। जिस दिन ऐसा हो गया यकीन जानो आधे स्त्री  अपराध भी ख़तम हो जायेंगे। बात फिर घूम फिर के वहा आये उससे पहले। सिर्फ एक बात और कि सब को एक लाइन में मत लाया करो यार। जब उस ऊपर वाले ने हमें कोई चीज़े या कोई अंग एक सामान नहीं दिया है तो हम कौन होते है ??दो आँखे भी एक सी नहीं है। सोचो। मुझे मेरे नींद बहुत प्यारी है। उस एक रात कि जो नींद गयी है न ,ये सब उसी का नतीज़ा है। उफ्फ्फ्फ़।