सुन्दर,अनमोल पलों की कहानी है लंच बॉक्स
| प्रेषित समय :13:14:09 PM / Wed, Sep 25th, 2013 palpalindia.com mai mere sabdo mai lunch box ka swaad..... |
खाना कब धीरे से किसी अकेले इंसान की ज़िन्दगी को एक नया रूप दे दे ,और कैसे खाने के बहाने एक औरत की ज़िन्दगी में नए सपनो के पंख लिए कोई इंसान नयी उमीदे भर देता है ,कुछ ऐसे ही सुन्दर ,अनमोल पलों की कहानी है लंच बॉक्स ,इला को नहीं पता की उसके हाथ का बना खाना जिसे वो अपने पति को सोच के बड़े प्यार से बनाती है, लेकिन वो गलती से किसी और को मिलता है ,जिसके लिए वो खाना उसकी नौकरी के अंतिम दिनों में एक नयी हवा के झोके की तरह आता है जो अकेले इंसान को उस अजनबी के प्रति आकर्षित ही नहीं करता ,बल्कि उसके लिए प्यार का बीज भी बोता है, इला के हाथ के खाने को धन्यवाद देने के बहाने पत्रों का सिलसिला ,कुछ इस तरह आगे बढता है की इला की पडोसी आंटी ,और उसके परिवार के सभी लोगो का परिचय एक अनजान इंसान साजन से ,यहाँ तक की दर्शको से भी ,की लगता है जैसे वो इला को बहुत अच्छे से समझ रहे है ,ये उनके ही बीच की किसी एक की कहानी है , इरफ़ान का अभिनय जब वो लंच बॉक्स का इंतज़ार करते है और जब टेबल पे उसे खोलने की जल्दी के साथ आस पास को निहायत ही तरीके से देखना ,जबरदस्त ,
मुंबई के डिब्बावालो की दिनचर्या ,इला का भूटान जाने की बात ,और वहा के रेडियो स्टेशन में वहा का गाना,वाकई सोचने पे मजबूर कर देता है की प्यार ,किस तरह से किसी के खाली जीवन को उमंगो से भर देता है ,इरफ़ान के दोस्त बने नवाज़ुद्दीन ने शानदार अभिनय किया है ,कुछ जगह वो हम दर्शको को हँसाने में सफल रहे है ,अभिनय की होड़ में इला ,इरफ़ान ,दोनों बराबर रहे है , तय करना मुश्किल होगा कि कौन इक्कीस है,
अच्छा साहित्य, अच्छी फिल्म और अच्छी कला तक कम ही लोग पहुँचते हैं।ठीक वैसा ही यहाँ भी हुआ है.आज हॉल में मात्र २५ लोग मिले ,जो इस शानदार प्रेम कहानी को देखने पहुचे.मुझे तकलीफ हुयी ,जहा बिना आइटम सोंग, और फाइट सीन ,के साथ उबाऊ वल्गर द्रश्य नहीं थे.वह आज दर्शक भी नहीं थे. ये फिल्म की खूबियों में इसका छायांकन और बैकग्राउंड म्यूजिक भी है.फिल्म के रंग और ध्वनि में शहर की ऊब, भीड़ , खुशी और गम के साथ ही हर व्यक्ति अकेलेपन को भी हम देख-सुन पाते हैं.
किसी अनाथ के साथ जब कुनबा मिलता है तब उसके अन्दर के भावनाए किस तरह मचलती है किसी को अपना बनाने के लिए उसका चित्रांकन भी जबरदस्त है ,मुंबई के डिब्बावालो की दिनचर्या ,इला का भूटान जाने की बात ,और वहा के रेडियो स्टेशन में वहा का गाना,वाकई सोचने पे मजबूर कर देता है की प्यार ,किस तरह से किसी के खाली जीवन को उमंगो से भर देता है ,इरफ़ान के दोस्त बने नवाज़ुद्दीन ने शानदार अभिनय किया है ,कुछ जगह वो हम दर्शको को हँसाने में सफल रहे है ,अभिनय की होड़ में इला ,इरफ़ान ,दोनों बराबर रहे है , तय करना मुश्किल होगा कि कौन इक्कीस है,
अच्छा साहित्य, अच्छी फिल्म और अच्छी कला तक कम ही लोग पहुँचते हैं।ठीक वैसा ही यहाँ भी हुआ है.आज हॉल में मात्र २५ लोग मिले ,जो इस शानदार प्रेम कहानी को देखने पहुचे.मुझे तकलीफ हुयी ,जहा बिना आइटम सोंग, और फाइट सीन ,के साथ उबाऊ वल्गर द्रश्य नहीं थे.वह आज दर्शक भी नहीं थे. ये फिल्म की खूबियों में इसका छायांकन और बैकग्राउंड म्यूजिक भी है.फिल्म के रंग और ध्वनि में शहर की ऊब, भीड़ , खुशी और गम के साथ ही हर व्यक्ति अकेलेपन को भी हम देख-सुन पाते हैं.
किसी अनाथ के साथ जब कुनबा मिलता है तब उसके अन्दर के भावनाए किस तरह मचलती है किसी को अपना बनाने के लिए उसका चित्रांकन भी जबरदस्त है ,
रितेश बत्रा की द लंचबॉक्स. सुंदर, लजीज , संवेदनशील, रियलिस्टिक और दिव्य जायेको वाली फिल्म है.हिंदी फिल्मों में मनोरंजन की भीड़ में ये कुछ दर्शकों के लिए खासकर वो जिन्हें ५ सितारा में खाना खाने का शौक है ,एक अच्छा स्वादिस्ट व्यंजन के सामान है .बाजारू मानशिकता को दरकिनार कर यह फिल्म लंच बॉक्स आत्मा को सुकून देती है..