प्यार से नहीं...बाबू.. इन सड़कों से डर लगता है
एक मित्र ने कहा- और सुनाओ, क्या चल रहा है? मेरा जवाब था कुछ ख़ास नहीं, बारिश का मजा चल रहा है, सामने से सवाल आया, कहाँ हो? घर पे या बाहर? कहीं लॉन्ग ड्राइव पे? मैंने कहा कहीं नहीं घर पे? अरे? क्यों भई? ऐसे में तो भींगने का मजा लो, क्या घर की चाहरदीवारी में कैद हो? मैंने कहा, यहाँ की सड़कों का मत पूछो, बहुत गन्दा हाल है. कहीं भी जाने मतलब, आने के बाद सारे मूड की मटिया पलीद, अरे! मित्र बोल पड़े... तुम तो बारिश का सोचो, बस ये सब बकवास है ये सब ऐसे ही चलेगा, कुछ नहीं हो सकता हर साल का रोना है.
बारिश का मजा लूं तो कैसे लूँ? मेरे शहर की सड़कों, में इतने गड्डे हैं, कि साला समझ नहीं आता, गाडी निकालूं तो.. कहाँ से.. इधर से निकालूं या उधर से, मेरे शहर की सड़कें इन दिनों अपने ऊपर हुए सरकारी बलात्कार के जख्मों की गवाह बनी है, और वो रोज अपने पे छिडके जाने वाले नमक की जलन से झल्ली होकर, उस दर्द को सड़कें चिल्ला चिल्ला के कह रही है, सुन रहा है न तू, रो रही हूँ मैं... लेकिन हमारे नगर का प्रशासन उसके कानों में तो हैडफ़ोन लगे हुए है, कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा है, इसलिए अब अगर कोई कहे, या कहीं से ये सुनाई दे, की बाबूजी मुझे आपके प्यार से नहीं अपने यहाँ की सड़कों से डर लगता है, तो उसकी इस पीड़ा को समझना... इस बारिश का मजा लेने से पहले जरा उस सड़क की तरफ भी एक नज़र देखना, की कहीं आपकी गाडी के पहिये उसके उन जख्मों को और न कुरेदे, आप तो चले जायेंगे, बारिश का मजा चार चके पे लेने, लेकिन किसी की सीने को रौंदना अच्छी बात नहीं है.
दोस्त की एक बात बिलकुल सही लगी की हर साल का रोना है, लेकिन क्या हम लोगों का खून पानी हो गया है, की दिन भर मेहनत करके हम कमाते हैं किसलिए? घर के साथ अपनी उन जरूरतों को पूरा करे, जिसके लिए हमें अपनी कमाई से टैक्स इस निकम्मी सरकार को देना होता है, क्यों क्योंकि वो हमारे लिए सड़क और अन्य सुविधाओं को मुहैया कराए, लेकिन इस तरह की काला बाजारी की अब तो शर्म से डूबने का भी समय निकल गया, प्रदेश का मुखिया जिस दिन यहाँ तशरीफ लाएगा उस दिन रातों-रात उस सड़क को नए कपड़ो के साथ सजा-धजा के या कहूँ चिथड़ो को लगा कर, उस लड़की की तरह सजा दिया जाता है जिससे साथ एक रात बिताने कोठे पे नामुराद जाते हैं, रात के अंधेरो में, मुखिया की रात बीती, सब चापलूस अपने-अपने घर को घुस जाते है, और फिर वही रोज का आना-जाना चालु, न जाने कितनी दफा, वो सड़क अपने चिथड़ो को, बनते, मिटते देखती है, और हम जैसे कई लोग, रोज अपने दो पहिये, या चार पहियों से उसे रौंदते है, हम कर भी कुछ नहीं सकते ?
मेरे बातों को कई लोग फ़िल्मी कहेंगे, कहीं कहेंगे इसमें नया क्या है? सही भी है इसमे नया क्या है? आज इंसान के पास वैसे ही ज़िन्दगी कम है जीने के लिए, ऊपर से इस तरह की हालत में कोई कैसे निकले? हम बड़ी बड़ी बात नहीं करेंगे की मौत से डर नहीं लगता या मौत कब कहाँ आ सकती है, लेकिन ये सोचने वाली बात है, जिसको सोचने का आज हमारे पास वक़्त नहीं है, आपमें से किसी ने सोचा है की विधायक के घर के सामने की सड़क पक्की है, विधानसभा अध्यक्ष के घर के सामने की सड़क पक्की है, लेकिन जिस जगह आप में से कई लोग दुर्घटना ग्रस्त हो कर भर्ती होते हों वहां की सड़क पक्की नहीं है, क्यों? ये सवाल कभी आया किसी के दिमाग में, या जिस कॉलोनी में आपने लोन ले के अपना सपनों का घर बनाया है, उसके बिल्डर ने पहले आपको वहां की सड़क क्यों नहीं बनवा के दी? कचनार सिटी के वाशिन्दों से जा के मिलो? मुस्कान हाइट्स के लोगों से मिलो? क्यों? आपने तो अपने घरों की क़िस्त उनको दी है, आप तो निगम को टैक्स दे रहे हैं? फिर क्यों? जब तक ये सवाल किसी के दिमाग में नहीं आएगा, ये सब ऐसे ही चलेगा? आपके रुपयों से बंगला बनेगा, लेकिन वो उस अध्यक्ष का बनेगा जो वोट के नाम पे आम जनता के दिलों से, भावनाओं से खेल रहा है, क्योंकि जिस अस्पताल के सामने की सड़क नहीं बनी है, उसके करता-धर्ता का बंगला सिविल लाइन में बन रहा है, वहां की सड़कें जा के देखो, लेकिन किसी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि आज हम सब सिर्फ अपना देखते हैं, लेकिन जिस दिन हमारा कोई अपना पानी से भरे गड्डो की बलि चढ़ेगा, हमने तो तब रोना-धोना मचाना है, अब हम सब इस काम में माहिर हो चुके हैं, हमारी कमाई का माल खाए कोई और हमें क्या? हमारे हिस्से का सुख भोगे कोई और हमें क्या? हम जिस दिन इस धज्जियों भरी सड़को, और इस पे चल रहे वाहनों की नीचे आयेंगे, तब हम सोचेंगे की हमें क्या करना है? बहुत ही कम अकाल का है इंसान कभी कभी लगता है, अपने किसी को रूपये देने के बात आती है तो पहले लेने की बात करता है कि कब इसका ब्याज दोगे, लेकिन वहीँ दूसरी तरफ मेहनत की कमाई का कोई और घर भर रहा है, तो उसके आगे नतमस्तक हो जाता है, वाह रे इंसान तू और तेरे रूप?
आज दिमाग में बहुत गालियाँ है, बहुत कडवापन है, सिर्फ इसलिए नहीं की मुझे इस सुहाने मौसम का लुफ्त उठाने नहीं मिल रहा, बल्कि इसलिए कि जिनको मिलना चाहिए, उनको नहीं मिल रहा, वे घिसट रहे हैं, रेंग रहे हैं, और जिनका इससे दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं, वो मुफ्त खोरी का मजा ले रहे हैं. बात गहरी है.. समझोगे तो आपका भला... नहीं तो दो अपनी मेहनत की कमाई का हिस्सा.. इन जैसे मुफ्त खोरों को, जो आपको ज़िन्दगी को यूँ ही निचोड लेंगे...