16 साल की बाली उम्र को सलाम
सरकार तेरे नए नियम को मेरा लाल सलाम...। इस कानून को लेकर पता नहीं कोई सीरियस है या नहीं। किसी और का तो मुझे नहीं मालूम, पर मै चिंता मे हूं। न जाने कितने सवालों और उसके जवाब के मकड़जाल मे जब मै उलझ रही हूं, तो सरकार या वो माता पिता खामोश क्यों हैं?
सेक्स एजुकेशन किस वजह से और जेंडर एजुकेशन किसके लिए ? सरकार तो मान रही है कि 16 की लड़की बालिग हो गई, आम पक गए, पके पकाए को क्या सिखाना, क्या बिगड़ेगी। रेप नहीं, सहमति से सैक्स कहा जाएगा,मतलब 16 की उम्र में लड़की सेक्स के लिए सहमति दे सकती है। यहां सहमति अहम है। अगर सहमति है तो गलती कहां आती है। जब सही गलत का अहसास हो तो फिर जिम्मेदारी भी उसी की, जिसने फैसला लिया तोअलग सैक्स को बेडरूम से बाहर ला दें तो सब समझदार हो जाएंगी। फिर तो कोई दिक्कत नहीं है ना ? हां। अगर लड़की इस पर सफाई दे सकती हो तो कोई बात नहीं।
स्त्री की यौनिकता परिवार की मर्जी या समाज के पुरातन नियमों से क्यों नीलाम हो। वह अपनी मर्जी से जहां पसंद हो, अपने विवेक से इस्तेमाल कर सकती है।जैसे धर्म हमारा निजी मामला है, वैसे ही यौनिकता भी स्त्री का निजी मामला है।धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा, पर यहां सहमति शब्द बहुत ही नाजुक है इस शब्द का तत्कालीन परिस्थिति में कोई गवाह नहीं हो सकता लड़की बेहद उत्तेजना में सहमत हुई लड़की को किसी नशीली वस्तु खिलाकर सहमत किया गया या लड़की दबाव में सहमत हो गई। रेप में प्रमाण होते हैं लड़की के भीतरी और बाहरी अंगों पर चोट के निशान जो प्रतिरोध के होते हैं। अगर उत्तेजनावश सहमति हुई तो प्रतिरोध नहीं होगा सिर्फ कौमार्य भंग या वेजाइनल रैप्चर होगा, दबाव और नशे में भी यही बात होगी तो वह साबित कैसे करेगी अपनी असहमति ? लेकिन अगर हम उसे पढ़ाकर विवेकशील बनाएंगे तो यह भी दबाव बनाना होगा, उसके हकों, पसंद,च्वॉइस को नकारने जैसा होगा। समाज को ही खुलना पड़ेगा, हम चंडीगढ़, दिल्ली, मुंबई जैसे समाज में नहीं रहते। हम गांवों में रहते हैं। वहां अभी भी शादी से पहले असहमति ही होती है। चाहे 16 में या 18 में, लेकिन कानून की नजर में सब बराबर हैं। यही इस कानून की सबसे बड़ी खामी है। 16 साल की उम्र शिक्षित समाज के हिसाब से ठीक है । लड़की पांचवीं तक पढ़कर बाहर आ जाए तो वह शिक्षित नहीं है।स्त्री अभी भी अपने फैसले खुद नहीं ले सकती। स्त्री को अपनी यौनिकता का अहसास पहले मासिक में ही हो जाता है। तब से लेकर पूरे 16 साल तक वह इस बात से चिढ़ी रहती है कि सिर्फ उसे ही खून क्यों आता है ? भाई को क्यों नहीं? 16 साल की उम्र में उसे पता चलता है कि वह एक लड़की है। जिसे लड़के पसंद करते हैं। उससे दोस्ती करना चाहते हैं। क्यों ? क्योंकि वह एकलड़की है। लड़के उसे छूना चाहते हैं, क्योंकि वह मुलायम है। उसके शरीर पर बाल कम हैं। वह लड़कों से अलग बनावट की है। उसमें सैक्स है, क्योंकि उसे भी विपरीत लिंग की तरफ जाने की चाह होती है। यहां रुकावट समाज,परिवार के नियम हैं। जो उसे पहले बताए जाते हैं। यानी वर्जनाओं की बात पहले की जाती है। यानी वर्जनाओं की बात पहले की जाती है। विवेक से फैसला लेने की नहीं। क्या नहीं करना है, क्यों नहीं करना है, कहां नहीं जाना है वगैरह। यह बात शहरों में पांच साल की बच्चियों को भी बताई जाती है कि कौन सा स्पर्श क्या अर्थ रखता है।यानी लड़की के भेजे में भरा रहता है नो-नो नी वर्जनाओं की बात पहले की जाती है।विवेक से फैसला लेने की नहीं।क्या नहीं करना है, क्यों नहीं करना है, कहां नहीं जाना है वगैरह। यह बात शहरों में पांच साल की बच्चियों को भी बताई जाती है कि कौन सा स्पर्श क्या अर्थ रखता है।यानी लड़की के भेजे में भरा रहता है नो-नो जेंडर और सैक्स एजुकेशन बाद में इसे यस-नो के बीच के फासले को समझाने के लिए है। पर क्या यह बात समझ आएगी ?
जब नो का दायरा यस से बड़ा हो ? यह भी एक सर्वव्यापी सत्य है कि 16 साल की उम्र से ही स्त्री की यौनिकता बेकाबू होने लगती है। उसके दिमाग में भरे नो के चलते वह कई बातें दिल में छिपाने लगती है, क्योंकि बेकाबू होती इस यौनिकता को वह किसी को समझाकर नो को यस में नहीं बदल पाएगी। वह प्रेम, प्यार, चाहत और दोस्ती के अजीब से बंधनों में उलझती है। पढ़ाई और अच्छे नंबरों का सफर भी उसे तय करना है। सो वह ठान लेती है कि अभी नहीं। कुछ बन जाएं फिर देखेंगे। अभी थोड़े मजे कर लेंगे। बाकी कॉलेज में। यहां मजे से मतलब है थोड़ा घूमना फिरना, हंसी मजाक, पार्टी, आउटिंग या मूवीज। थोड़ी थोड़ी जिस्मानी छुअन और घर आकर तकिए को दोनों पैरों के नीचे डालकर सो जाना।लड़के इसी उम्र में नाइट फॉल और लड़कियां हॉट लैप्सेस की शिकार होती हैं। अगर मां को पता चले तो नो का दायरा फैलकर गर्दन पर फांस बना देता है।पर यौनिकता तो बेकाबू हो चुकी है। अब कुछ नहीं हो सकता।लड़के हनुमानजी के मंदिर में नजर आते हैं तो लड़कियां व्रत करती हैं। पढ़ाई में मन लगाने की कोशिश करती हैं।लड़कियों को हमेशा लगता है कि कोई उसे चाहे, सराहे, तोहफे दे। एक अजीब सी गुदगुदी होती है ऐसी वैसी बातों को सोचकर। केंद्र सरकार इसी उतावलेपन को सहमति मानती है। बाली उमर की इस दीवानगी को परिपक्वता की निशानी मानती है। 12वीं में लड़के लड़कियों के कॅरियर का एक अहम पायदान होता है।
यहां लुढ़के, मतलब अच्छे कॉलेज और कोर्स से गएतो पूरा जोर इस पढ़ाई में लगता है। नोट्स के बहाने चिट्ठी पत्री बंटती है। कैंटीन में, कभी लाइब्रेरी में मिलना हो जाता है।गुदगुदी ज्यादा हो तो ज्वॉइंट स्टडीज और कोचिंग अच्छा बहाना है। पर मुझे पढ़ना है, यही मंत्र दिमाग में छाया रहता है। एक साल का संयम और फिर कॉलेज में खुलेपन की छूट का लालच दोनों से यह सब करवा देता है। कॉलेज असल में हमारे शिक्षा तंत्र की मूल भावना, यानीविवेकशील होने की पहली सीढ़ी है। यहां सारे चेहरों से परदा हट जाता है, क्योंकि सब खुले हैं। कोई कुछ भी कहसकता है, बोल-समझ और जान सकता है। मां-बाप के बंधन काफी खुल जाते हैं। उन्हें मालूम है कि बिटिया अब शादी के लायक हो गई है। परिवार का यह अतिरिक्त समर्थन ही लड़की को अंदर से मजबूत बनाता है। यहां पैर फिसलते नहीं। जो फिसला वो जानबूझकर गया।बचकाने प्यार को ज्यादातर लड़कियां यहीं पर बाय बोल देती हैं। वे आगे बढ़ती हैं। उन्हें लड़के में स्मार्टनेस, करियर, फ्यूचर दिखना चाहिए। बोल्डनेस, बॉडी आदि गुणों के बाद आता है लुक का मसला। यहां दौलत और शोहरत मायने नहीं रखती।
तो कॉलेज में यानी 18 की उम्र आपको सहमति के लिहाज से ज्यादा मैच्योर लगती है या 16की?